अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ में ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ था

आज अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की पुण्यतिथि है. हिंदी समय पर मृत्यु की तिथि लिखी हुई है होली 1947. खड़ी बोली हिंदी में पहला महाकाव्य लिखने वाले हिंदी के इस पहले सिख लेखक के बारे में लोग अब कम जानते हैं. जैसे यह कि इनका लिखा गद्य बहुत रोचक होता था. इनका उपन्यास है ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’, जरा उसकी किस्सागोई और भाषा की रवानी देखिये. वे पहले लेकक थे जिन्होनें एक तरह से हिंदी आधुनिक गद्य की बुनियाद रखी. आज ‘ठेठ हिंदी का ठाठ’ का अंश- मॉडरेटर

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सूरज वैसा ही चमकता है, बयार वैसी ही चल रही है, धूप वैसी ही उजली है, रूख वैसे ही अपनी ठौर खड़े हैं, उनकी हरियाली वैसी ही है, बयार लगने पर उनके पत्ते वैसे ही धीरे-धीरे हिलते हैं, चिड़ियाँ वैसी ही बोल रही हैं, रात में चाँद वैसा ही निकला, धरती पर चाँदनी वैसी ही छिटकी, तारे वैसे ही खिले, सब कुछ वैसा ही है, जान पड़ता है देवबाला मरी नहीं, धरती सब वैसी ही है, पर देवबाला मर गयी, धरती के लिए देवबाला का मरना जीना दोनों एक-सा है, धरती क्या, गाँव में चहल-पहल वैसी ही है, हँसना-बोलना गाना-बजाना, उठना, बैठना, खाना पीना, आना जाना सब वैसा ही है, देववाला के मरने से कुछ घड़ी के लिए दो एक जन का कलेजा कुछ दुखा था, पर अब उन को देवबाला की सुरत तक नहीं है। वह भी देवबाला को भूल गये। हाँ अब तक एक कलेजे में दुख की आग धहधहा रही है, अब तक एक जन की आँखों में आँसू बहता है, वह देवबाला के लिए बावला बन रहा है, यह दूसरा कोई नहीं, रमानाथ है। पीछे किरिया करम का झमेला हुआ, दूसरे काम काज की झंझट हुई, रमानाथ को ही यह सब सम्हालना पड़ा, धीरे-धीरे उस का दुख भी घटने लगा, धीरे-धीरे वह भी देवबाला को भूल रहा है। एक-एक कर के दिन जाने लगे, देवबाला को मरे कई दिन हो गये, पर देवनंदन अब तक उसको नहीं भूले हैं, अब तक वह लड़कपन की हँसती खेलती देवबाला, अब तक वह ब्याह के पहले की, बिना घबराहट की, लजीली, देवबाला, अब तक वह दुखिया रोती कलपती देवबाला, उनकी आँखों में, कलेजे में, जी में, रोंये-रोंये में, घूम रही है। सोते, उठते, बैठते, खाते, पीते, देवबाला ही की सूरत उनको बँधा रही है। वह सोचते हैं। क्यों? देवबाला की कोई ऐसी कमाई तो नहीं थी जिससे उसको इतना दुख मिले, फिर किसलिए उसका ब्याह ऐसे निठल्लू, निकम्मे, अनपढ़, बुरे के साथ हुआ, जिससे उसको कलप-कलप कर दिन बिताना पड़ा, क्यों उसके माँ बाप ने उसको ऐसे घर में ब्याहा जहाँ वह एक मूठी नाज के लिए भी तरसती रही। क्यों ब्याह के छही महीने पीछे ससुर मर गया, बरस भर पीछे पुरुख परदेस चला गया, उसके थोड़े ही दिन पीछे सास भी मर गयी। माँ बाप जगरनाथ जी गये, फिर न लौटे, रमानाथ कहते थे, वह दोनों एक ही दिन कलकत्ते में मर गये। क्यों एक के पीछे एक यह सब कलेजा कँपानेवाली बातें होती गईं, और क्यों जब उस के दिन फिर फिरने पर हुए तो वह आप ही चल बसी? क्यों जो इस धरती पर डर कर चलता है वही मुँह के बल गिरता है? क्या धरम से रहने वाले ही को सब कुछ भुगतनी होती है? राम जानें यह क्या बात है! पर जो ऐसा न होता, देबबाला को इतना दुख न भोगना पड़ता। सास ससुर सब दिन जीते नहीं रहते, माँ बाप भी कभी लड़की के काम आते हैं, माँ, बाप, ससुर, सास के मरने से कभी देवबाला को इतना दुख न भुगतना होता, जो रमानाथ भला होता, रमानाथ के बुरे और निकम्मे होने ही से देवबाला की यह सब दसा हुई। इससे मैं समझता हूँ देस की बुरी रीत जो रामकान्त के जी को डाँवाडोल न करती, अनसमझी से जो वह हाड़ ही को सब बातों से बढ़कर न समझते, झूठे घमण्डों के बस उतर कर ब्याह करके लोगों से हँसे जाने का जो उन को डर न होता, तो वह हठ न करते, और जो हठ न करते, तो रमानाथ जैसे क्रूर के साथ देवबाला का ब्याह न होता, और जो रमानाथ के साथ देवबाला का ब्याह न होता, तो कभी देवबाला जैसी भली तिरिया की यह दसा न होती। देस की बुरी रीतियों, झूठे घमण्डों से कितने फूल जो ऐसे ही बिना बेले कुम्हिला जाते हैं, कितनी लहलही बेलियाँ जो नुच कर सूख कर धूल में मिल जाती हैं, नहीं कहा जा सकता, राम! क्या तुम यही चाहते हो, यह देस बुरी रीतियों के बस ऐसे ही दिन मिट्टी में मिलता रहे?

इतना कहकर देवनंदन फिर सोचने लगा, जब मैंने जग से सब नाता तोड़ लिया, जी के उचाट से घर दुआर छोड़ कर साधु हो गया, अपना ब्याह तक नहीं किया, एक कौड़ी भी अपने पास नहीं रखता, काम लगने पर दूसरे का दुख छुड़ाने के लिए दो-चार सौ अपने भाई से लेता था, अब वह भी नहीं लेता, उसी को समझा दिया, मेरे बाँट के रुपये से दीन दुखियों का भला करते रहना, जब इस भाँत मैं सब झमेलों से दूर हूँ, तूँबा और लँगोटी ही से काम रखता हूँ, तो फिर एक तिरिया की घड़ी-घड़ी सुरत किया करना, उसके दुखों को सोच-सोच कर मन मारे रहना, देस की बुरी रीत के लिए कलेजा पकड़ना, आँसू बहाना, मुझ को न चाहिए, अब इन बखेड़ों से मुझ को कौन काम है, धरती का ढंग ही ऐसा है, सब दिन सब का एक सा नहीं बीतता, उलट फेर इस जग में हुआ ही करता है, इस को कौन रोकनेवाला है। फिर उस ने सोचा भभूत लगाने से क्या होगा, गेरुआ पहनने से क्या होगा, घर दुआर छोड़ने से क्या होगा, लँगोटी किस काम आवेगी, तूँबा क्या करेगा, साधु होने ही से क्या, जो दूसरे का दुख मैं न दूर करूँ, दुखिया को सहारा न दूँ, जिस काम के करने से दस का भला हो उस में जी न लगाऊँ। देस की बुरी रीत के दूर होने के लिए जतन करना, लोगों के झूठे घमण्डों को समझा बुझा कर छुड़ाना, जिससे एक को कौन कहे लाखों का भला होगा, क्या मेरा काम नहीं है, क्या मेरे साधु होने का सब से बड़ा फल यह नहीं है? देवबाला भूल जावे,भूल जावे, उसको अब भूल जाना ही अच्छा है! पर साँस रहते मैं दूसरे की भलाई के कामों को कैसे भूल सकता हूँ! पर क्या कभी मेरे मन की बात पूरी होगी? क्या कभी यहाँ वाले अपने देस की बुरी चालों को दूर करना सीखेंगे? क्या दूसरों की भलाई का रंग यहाँ वालों पर चढ़ सकता है? क्या हठ छोड़ कर इस देस के लोग बातों के करने में जी लगा सकते हैं, क्या जतन करने से कुछ होगा?

इसी बेले देवनंदन ने सुना, जैसे किसी ने कहा, ”हाँ होगा” उन्होंने आँख उठा कर देखा, आकास से एक जोत सामने उतरती चली आती है, और उसी में बैठा जैसे कोई कह रहा है ”हाँ! होगा” देवनंदन थिर होकर उस को देखने लगे, उसी में से फिर यह बात सुन पड़ी, ”क्यों मुझ को तुम जानते हो? मेरा नाम आसा है, मेरे बिना धरती का कोई काम नहीं चल सकता, मैं तुम को बतलाती हूँ, जतन करो, जतन करने से सब कुछ होगा” देवनंदन ने बहुत विनती के साथ कहा, कब तक होगा माँ? फिर बात सुनने में आयी, ”जतन करने वाले को कब तक की बात मुँह पर न लानी चाहिए, जब तक उस का काम न हो तब तक उस को जतन करते रहना चाहिए” देवनंदन ने देखा, इतनी बातों के कहने पीछे यह जोत फिर आँखों से ओझल हो गयी।

देवनंदन कब तक जीते रहे और किस ढंग से उन्होंने देस की बुरी चालों को दूर करने के लिए जतन किया, कैसे-कैसे खोटी रीत छुड़ा कर अपने देस भाइयों का भला करना चाहा, इन सब बातों को यहाँ उठाने का काम नहीं है, पर जब तक वह जीते रहे, उन का यही काम था, कुछ दिनों पीछे रमानाथ भी उनका साथी हो गया था, बहुत दिन तक लोगों ने देवनंदन को दूसरों की भलाई के लिए घूमते देखा था, पर पीछे उन को भी धरती छोड़नी पड़ी। जिस दिन उन्होंने धरती छोड़ी, उस दिन चारों ओर से लोगों को यह बात सुन पड़ी थी, ”क्या फिर कोई देवनंदन जैसा माई का लाल न जनमेगा’।

“हिंदी समय से साभार”

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