योगी आदित्यनाथ पर शशिशेखर की टिप्पणी

कल जब योगी आदित्यनाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनाए जाने की घोषणा हुई तो उसके बाद से उनको लेकर काफी कुछ लिखा गया. बहुत सारा मैंने पढ़ा भी. लेकिन ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ के संपादक शशिशेखर ने आज अखबार में पहले पन्ने पर जो ‘त्वरित टिप्पणी’ की वह सबसे संतुलित लगा और उनका विश्लेषण भी बहुत बारीका लगा. न पढ़ा हो तो पढियेगा- मॉडरेटर

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योगी आदित्यनाथ को देश के सबसे बड़े सूबे की सत्ता सौंप कर भारतीय जनता पार्टी ने यकीनन बड़ा दांव खेला है। योगी हिन्दुत्व के ‘फायरब्रांड’ प्रतीक माने जाते हैं। उनकी नजर में हिन्दुत्व मिशन है और राजनीति सेवा का माध्यम। वे संतों की उस परंपरा से ताल्लुक रखते हैं, जो धर्म और राजनीति को एक सिक्के का दो पहलू मानती है।

उनकी दिनचर्या भी साधु-संतों सी है। आप गोरखपुर स्थित गोरक्षपीठ में जाइए, उनका कक्ष देखकर कहीं से भी नहीं लगेगा कि यह ऐसे शख्स का कार्यालय है, जो पांच बार से सांसद है। भोर में साढ़े तीन बजे उठ जाते है और स्नान-ध्यान के बाद पांच बजे तक विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। बाद में पांच से छह बजे तक मंदिर परिसर में भ्रमण और छह से साढ़े आठ बजे तक स्वाध्याय। साढ़े आठ से साढ़े नौ बजे तक गोरक्षपीठ से जुड़ी संस्थाओं के काम निपटाकर साढ़े नौ से दस के बीच सादा अल्पाहार लेते हैं।

पूर्वाह्न 10 बजे से वे आमजन के साथ बैठते हैं और तब तक नहीं उठते जब तक वहां आए अंतिम व्यक्ति की समस्याओं का समाधान न हो जाए। प्राय: रोज अपने क्षेत्र में जाते हैं और लौटते ही गायों की सेवा में जुट जाते हैं। गौशाला से लौटकर मंदिर स्थित कार्यालय में प्रबुद्ध लोगों से मुलाकात और सात से रात नौ बजे तक का समय पूजा-पाठ में बिताते हैं। नौ बजे से साढ़े नौ बजे के बीच रात का भोजन और फिर साढ़े 11 बजे तक स्वाध्याय। वे सिर्फ तीन से चार घंटे की नींद लेते हैं। योगी आदित्यनाथ निजी जिंदगी में ब्रह्मचर्य के कठोर तप का पालन करते हैं।

यही वजह है कि पूर्वांचल में वे राजनेता से ज्यादा ‘योगी महाराज’ के नाम से जाने और माने जाते हैं।

कई बार उन्होंने हिन्दू हित की बात कुछ इस अंदाज में की कि बड़ी संख्या में लोग सकते में आ गए। 2007 में गोरखपुर में राजकुमार अग्रहरि की हत्या के बाद योगी आदित्यनाथ ने कर्फ्यू तोड़ धरना दे दिया था, जिससे प्रशासन की चूलें हिल गई थी। उन्हें बाद में गिरफ्तार किया गया, तो लोग भड़क उठे। ट्रेन पर हमला, कई जगह तोड़फोड़ और आगजनी हुई। उसी दौरान तय हो गया था कि उनके ‘सिद्धांतों’ को कितना जनसमर्थन हासिल है। कई मायनों में वे बाल ठाकरे के समकक्ष नजर आते हैं पर उन्होंने जो मुकाम हासिल किया, वह ठाकरे के लिए कभी न पूरा होने वाला ख्वाब था।

तो क्या यह अर्थ निकाला जाए कि एक गेरुआधारी संत को राजसत्ता सौंप कर भारतीय जनता पार्टी ने संदेश दिया है कि वह ‘हिन्दू पद पादशाही’ के सिद्धांत को बढ़ावा देगी? हमें नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर प्रदेश की लगभग बीस करोड़ की आबादी में 19.26 फीसदी के करीब मुसलमान हैं। क्या वे सत्तानायक के तौर पर उनका भरोसा जीतने की कोशिश करेंगे?

यह भी ध्यान देने वाली बात है कि प्रदेश के आधे से अधिक जनपद सांप्रदायिक तौर पर संवेदनशील माने जाते हैं एवं रामजन्म भूमि भी इसी प्रदेश का हिस्सा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का ‘कश्मीर’ और आजमगढ़ की ‘आतंक फैक्ट्री’ भी उन्हीं के राज्य का अभिन्न अंग हैं। योगी आदित्यनाथ राम के बिना राष्ट्र को अधूरा मानते हैं, उनके उद्देश्यों में भव्य मंदिर का निर्माण भी शामिल है।

यहां उनके व्यक्तित्व के एक और पहलू पर नजर डालनी जरूरी है। वे हिन्दू हित के साथ ‘गरीबों के पोषक’ भी हैं। उन्होंने कई बार सार्वजनिक मंचों से कहा है कि गरीबों की पीड़ा के साथ मजाक करने वाला कभी सुखी नहीं रह सकता। यकीनन, वे आग और पानी एक साथ नजर आते हैं।

उनके प्रशंसक अब उनसे उनकी इन मान्यताओं पर अमल की उम्मीद करेंगे।

बतौर नेता अपने विधायकों को पहले संबोधन में उन्होंने ‘सबका साथ, सबका विकास’ के मोदी-सिद्धांत पर जोर दिया। क्या वे इसके जरिए प्रदेश की समूची जनता को कोई संदेश देने की कोशिश कर रहे थे? क्या हम उम्मीद करें कि ‘योगी महाराज’ की नई पारी प्रदेश में बेहतरी की बयार लाएगी? वे यकीनन जानते होंगे कि देश और दुनिया के करोड़ों लोग उन्हें कौतूहल से देख रहे हैं।

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