जॉन नैश को श्रद्धांजलि स्वरूप विनय कुमार की कविता

जॉन नैश को कौन नहीं जानता। Game Theory के लिए अर्थशास्त्र के नोबल से सम्मानित नैश जीते जी ही किंवदंती बन गए थे। उनके जीवन पर बनी फ़िल्म Beautiful Mind एक ऑल टाइम क्लासिक मानी जाती है। फ़िल्म ने चार महत्त्वपूर्ण ऑस्कर अवार्ड जीते थे। जॉन नैश विस्फोटक प्रतिभा और स्कीज़ोफ़्रेनिया लेकर दुनिया में आए थे। जब तक रोग उन्हें अक्षम करता ,तब तक वे एक महान शोध कर चुके थे। उस शोध को सम्मान भले बाद में मिला मगर नैश के इस अनोखे योगदान की चर्चा पहले से थी।
अलीशा जॉन नैश से की पत्नी थीं। मैं इनसे २००७ में अमेरिकन साइकाएट्रिक असोसिएशन के वार्षिक सम्मेलन के मौक़े पर मिला था। जॉन नैश वहाँ कॉन्वकेशन लेक्चर देने आए थे।स्कीज़ोफ़्रेनिया के दुष्प्रभाव के कारण जॉन नैश मिलनसार नहीं थे। मगर अलीशा सहज, हँसमुख और गर्मजोशी से मिलनेवाली महिला थीं। चंद मिनटों की बातचीत में ही मुझे लगा कि उनका व्यक्तित्व आश्वस्त करनेवाला है। बोली में मिठास और सहायता को तत्पर। ये तस्वीरें तभी की हैं।
यह एक अजीब दुःखद संयोग है कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति के इस अनोखे दम्पति की मृत्यु एक साथ एक कार दुर्घटना में हुई। वे उस वक़्त नूअर्क एयरपोर्ट से प्रिन्सटन जा रहे थे।
आज जॉन नैश का जन्मदिन है। उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप यह कविता- विनय कुमार
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अलीशा नैश
कहा जा सकता है
कि अब तुम एक क़िस्सा हो
फिर भी तुम मेरे जीवन का हिस्सा हो
कोई दिन नहीं जब सदियों पुराने मेरे आकाश में
तुम आँसुओं की बदली सी न घुमड़ती हो
वह वधू जो अपने ठिठके हुए वर के भीतर
सुहागरात ढूँढने में मदद माँगने आयी है
या वह जो अपने आत्मलीन सहचर में संवाद
या वह जो अपने कंत की सूनी आँखों में वसंत
या वह जो अपने पुरुष में पालनहर विष्णु
या वह जो अपनी टूटी हुई तलवार में थोड़ी सी ढाल
या वह जो एक जलते हुए क्रोध में स्वयं के जीवित रहने भर जल
या वह जो अपने ही कमरे में बड़बड़ाती हुई अनिद्रा में दिन को ठीक-ठाक जागने भर नींद
या गालियों की मशीन में थोड़ी सी मर्यादा
या गली-मुहल्ले में परिवार के लिए थोड़ा सा सम्मान
या अपनी बेटी के लिए एक ऐसा बाप जो भींगी आँखों से कर सके कन्यादान
सब की सब तुम्हारी ही परछाइयाँ हैं अलीशा
मानता हूँ कि इनमें से किसी के साथ नैश नहीं होता
मगर एक डरा-सहमा या बौखलाया या चुप्पा या होश-बदर जॉन यक़ीनन होता है
माना ये तुम्हारी तरह एमआइटी-पलट भौतिकीविद् नहीं होतीं
मगर तुम्हीं कौन सी भागी थीं उस शोध के पीछे
जो तुझे नोबल के हीनयान पर बिठा दे
रौशन मंच तक जाते धूसर गलियरों से स्त्रीत्व के आँगन में तुम्हारा लौटना
एक उपन्यास लिखने की ख़्वाहिश का एक सिसकती रूबाई में जज़्ब हो जाना नहीं तो और क्या था
वह स्त्री कहाँ की
सल्वाडोर
या अमेरिका
या मलेशिया
या रूस
या चीन
या भारत
कहाँ की है वह
सिसकती रूबाई का कोई देश नहीं होता अलीशा
उसके गीले क़दम सारी काल्पनिक लकीरें पोंछ देते हैं
नहीं भूल सकता वह पल
जब सैन डीएगो के कन्वेन्शन सेंटर की
लम्बी-चौड़ी लॉबी में
अपने ममूलीपन का ज़िक्र करते हुए
माँगी थी तुमसे मदद
कि मैं मिस्टर नैश से मिलना चाहता हूँ
और तुम हौले से मुस्कुरायी थीं
बिलकुल वैसे ही जैसे कुतूहल के मारे बच्चे को देखकर कोई माँ
अगर मैं भी अपनी पसंद का खिलौना लेकर
लौट आता उस रोज़
तो आज कुछ भी लिखने के लायक न बचती मेरी आत्मा
तुम्हारे होने के हँसते हुए रंगों ने
मेरी कृतज्ञता को वैसे ही बचाया
जैसे अप्रिय आवाज़ों से अपने नैश को
जब भी देखता हूँ अपने कैमरे से खींची तुम्हारी तस्वीर
श्रद्धानत हो जाता हूँ उस किरण के प्रति
जो बुद्धि के प्रिज्म से गुज़रकर सात देवियों में बँटी दिखती है
कंठों और जीभों की दुनिया में उत्सुक कान
क्रूर अधिकारों की दुनिया में विनम्र कर्तव्य
आदेश दनदनाती दुनिया में आश्वस्त करती सेवा
लम्पट लूट की दुनिया में मौनव्रती त्याग
और दिखती-दिखाती देहों की दुनिया में निरपेक्ष प्यार
यह तुम हो अलीशा….तुम
किसे परवाह थी
कि एमआइटी के गलियरों में भटकता एक सूरज
बेहद अटपटे ढंग से उगता है
जाने किधर मुँह फ़ेरे चढ़ता है आसमान
और हवा के चेहरों को घूरता
जाने किस से बुद-बुद बतियाता
कमरे में अपने अस्त हो जाता है
किसे परवाह थी कि अमित सम्भावनाओं का
सूरज हौले-हौले दरक रहा है
न होते अगर करुणा की तलैया पर
कमल से तिरते दो हँसते हुए नैन तुम्हारे
तो तरुण यह सूरज हो जाता अस्त अनदेखा ही
तुम्हीं लेकर गयीं उसे बोस्टन की गलियों में
बिस्ट्रो में रेस्तराँ और पब में
तुम्हीं ने चखाये उसे रसों के स्वाद
तुम्हीं ने पिलाए उसे घूँट रसकुल्लों के
तुम्हीं ने बचाया उसे ख़ुद से
तुम्हीं ने रचाया उसकी ठिठुरी हुई आत्मा का
अपनी ऊनी गहराइयों से ब्याह
तुम्हीं ने बचाया उसे दाग़ भर बचने से
कहते मनगुनिया कि ईगो जब दरकता
तो जो भी आभासी वही पास वही ख़ास
तुम्हीं थीं अलीशा कि “लॉजिक और रीज़न” की
छोटी सी छतरी को ताने रहीं
भ्रमों-विभ्रमों की तेज़ाबी बारिश में
पहनी तो नहीं कभी साड़ी न ओढ़ा दुपट्टा ही
आँचल की छाँव मगर फिर भी की
अपनी ही धूप से जल जाता जॉन
मगर उसे छिपाकर कहा मिस्टर नैश से
आओ मेरे पास मेरे पुरुष मेरे प्यार
क्रीड़ा के नियम भले लिखे उस तरुण ने
पीड़ा की गलियों में क्रीड़ा
कब
कैसे
क्यों
तुमने सिखाया
लम्बा एक जीवन कोई टूटा पुरुष कैसे जी पता
सिर्फ़ ब्रेड और चीज़ और मीट और वाइन के सहारे
पार्ट्नर या स्पाउस के सहारे
पृथ्वी और प्रकृति-सी भरी और पूरी
सारे सम्बन्धों की गरिमा और छटा लिए
तुझ-सी सम्पूर्णा सहगमन-सहवास को न होती यदि
कैसा था बंधन कैसी थी गाँठ जो खुली नहीं
सुखों के दैन्य अभावों की आँधी में
मृत्यु के प्राणांतक़ वार-प्रहार में
यूरोप से नूअर्क
नूअर्क से से प्रिंसटन घर की तरफ़ जाते हुए
विकट दुर्घटना के द्वार से एक साथ चले गए
दूर बहुत दूर
सारे अभावों से सारी सीमाओं से
भ्रमों-विभ्रमों आभासी आवाज़ों से दूर
निर्मल नीरोग निश्चिह्न अनंत में
शोध-शेष कथा-शेष मिस्टर जॉन नैश
कविता-शेष तुम
हाँ कविता-शेष तुम !
आज़ादी के बारे में सोचता हूँ
तो आकाश याद आता है
और पचास साल पुराना एक स्वप्न
जिसमें चाँदनी रात में देर तक उड़ता रहा था
आज़ादी के बारे में सोचता हूँ
दाख़िला भी मिल जाएगा
दाख़िल भी हो जाएगा
मगर उसके आगे
यह रोग जो रह रहकर होश छीन लेता है
इससे कैसे निपटेगा
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कवि विनय कुमार देश के जाने माने मनोचिकित्सक हैं और लेखक हैं। 

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