आत्मज: अप्प पिता भव !

प्रसिद्ध कवि विनय कुमार के काव्य नाटक ‘आत्मज’ पर यह टिप्पणी लिखी है हिन्दी की वरिष्ठ लेखिका मनीषा कुलश्रेष्ठ ने। आप भी पढ़ सकते हैं-

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छोटे से कलेवर की किताब है आत्मज, जो एक काव्य नाटक है। ऐसी विधा जिसे विलुप्त होते-होते मानो जीवन दान दिया हो, विनय कुमार जी ने। पाण्डुलिपि  के तौर पर इसे पढ़ने का अनुभव अलग था और किताब के तौर पर एकदम अलग। यह किताब अपने में एक युग बंद किए है जिसके पन्ने खोलते ही मानो इतिहास और दर्शन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा साँस लेने लगता है। वह हिस्सा जहाँ पुरुष अपनी ही संतानों से विमुख थे चाहे वे महान संन्यासी हों कि सम्राट। इतिहास का यह हिस्सा अपने स्थूल रूप में नहीं, एक कवि के आह्वान पर उसके फ्रायडियन काउच के सामने पसरे एकांतिक मंच पर अभिव्यक्त होता है – अपने विरोधाभासों में, आत्मदया में, क्रूरता में, प्रेम में, संशय में, प्रायश्चित्त  में। एक-एक पात्र कवि की हाजिरी पर आते हैं – हैरत, आश्चर्य और गुस्से के साथ कि इतिहास की नींद से जगाने का क्या मतलब। कवि के पास उत्तर भी हैं तो ढेर से प्रश्न भी,  जिनकी रोशनी में  वे पात्र एक दूसरे के अनदेखे को देख कर अपने होने के नए अर्थ और अलग संदर्भ पाते हैं। प्रशांत भिक्षु विमल और सब जीत कर भी हारा हुआ अजातशत्रु एक दूसरे के समक्ष! बहुत अनूठे प्रयोग हैं इसमें जिनमें जीवन सी ही विचित्र लयबद्धता है। मागध कवि और उसके अंतस पटल से होकर मंच पर एक एक कर आते वे पात्र जिनके जीवन में विडंबना का एक अवयव समापवर्तक है और वह है आंशिक या पूर्ण  पितृहीनता। अलग छिटक कर दूर जा गिरने पर भी सब एक पीड़ा-सूत्र से बँधे हैं, एक पूर्ण पिता की खोज में सब के सब विह्वल हैं, मगर सब के लिए पिता की परिभाषा नितांत अलग है।

यह ऐसा मुकम्मल काव्य-नाटक है कि बस उठाओ और मंचन कर दो, कुछ बदलाव नहीं करने, कोई गीत नहीं लिखने, कोई प्रॉप्स नहीं सोचने। बस संवाद याद करने हैं, गीतों को संगीत भर देना है, वेशभूषा तैयार करनी है और मंच पर ….। कवि-सूत्रधार का आरंभिक आह्वान ही इतना रोचक है कि बतौर पाठक आप एक काल्पनिक मंच बना बैठते हैं…

देवियों और सज्जनों

भाइयों और बहनों

हिन्दियो मिस्त्रियो मेसोपोटामियो ग्रीको सुमेरियो बेबिलोनियो

फ्रेंड्स रोमंस एंड कंट्रीमेन

स्वागत है लीला की छत पर

कवि आपको अकसर फ्रायडियन काउच पर लेटा मिलता है। वह एक-एक कर पात्रों का आह्वान करता है और पात्र इतिहास से निकल मंच पर आते हैं चकित से कि किसने बुला वह या हमें! जैसे पहले अंक में अचानक छोटे-छोटे देवदूत दिखने लगते हैं जो राहुल को लेकर आते हैं और राहुल चौंककर कहता है –

कहो देवदूतो, क्यों हूँ  मैं यहाँ

काल और देश के इस प्रकाशित मंच पर

भरी हुई दीर्घा के सामने

वस्त्र और देह और वाणी

मैं तो सब छोड़ चुका कब का

राहुल की व्यथा और अंत:संघर्ष को विनय जी अपनी बहुस्तरीय भाषा में इतना महीन उकेरते हैं कि लगता है उनके भीतर का कवि और एक मनोविश्लेषक एक हो गया हो। राहुल का राजसी एकांत माँ की मूक पीड़ा अपने दादा महाराज की विवशता को देखता है –

तो ले ही आए मुझे अचिरावती के उस पार 

जहाँ से कंथक लौट गया था छंदक  के  साथ 

अश्व और मनुष्य  दोनों के नेत्र थे गीले 

दोनों की आँखों में बसी थी एक सी छवि  

विदा के आँसुओं से तर 

छंदक तो मनुष्य था मनुष्यों के बीच

किंतु कंथक की आँखों में तब तक बसे रहे युवा सिद्धार्थ 

जब तक वह रहा 

माँ को बहुत प्रिय थीं उसकी आँखें 

अक्सर हम जाते अश्वशाला 

देर तक माँ उसकी आँखें निहारती  

और युगों की थकान लिए लौटती ऐसे 

जैसे लौटा होगा कंथक पीठ पर उठाए आकाश

 

जीवन में धीरज का पहला वह पाठ 

कि अश्व की आँखों में पिता की छवि 

और कविता सी माँ का हो जाना काठ 

या फिर –

दादा महाराज के पास भी कम ही थे शब्द 

अधूरे वाक्यों से प्यार किया मुझे 

सदा अनुभव हुआ – 

कहना कुछ और चाह रहे कह कुछ और रहे 

 

 या फिर यह परिपक्वता –

 क्षमा करना पिता, क्षमा /क्या यह सत्य नहीं

कि मन्मथ के भस्म को देखती रति से सदा तुम भागे  

 जहाँ ‘आत्मज’ में आए इन जीवित पिताओं के पितृहीन पुत्रों के सवाल बेचैन कर जाते हैं। वहीं कवि सूत्रधार रूप में कभी अपनी जिज्ञासा से इतिहास तक को अवाक कर जाता है।  कभी उसका मसखरापन हँसाता है, तो कभी उसके सवाल रुला जाते हैं। कवि के पात्रों से संवाद आपको बहाए लिए जाते हैं – कभी नोक-झोंक, कभी करुणा तो कभी समानुभूति।  आम्रपाली  से तो वह लताड़ भी खा जाता है। देहमुक्त हो जाने के बावजूद  मंच पर आह्वान की गई आम्रपाली  जब अपने और बिंबिसार के अंतरंग अनुभवों पर बोलना शुरू करती हैं तो वह शरमा-घबरा भी जाता है –

“देवि! देवि ! देवि ! मैं तो सिर्फ आर्य विमल कोंडना के जन्म की कथा….”

“तो बिम्बिसार का नाम क्यों लिया

मैं जीवित नहीं हूँ कि स्वयं पर बीते को संपादित करूँ …”

 

‘आत्मज’ एक काव्य-नाटक ही नहीं, मेरे जैसे गद्य-प्रेमी के लिए एक उपन्यास भी है। इतिहास से कवि के आह्वान पर उतर आये पात्र – राहुल, विमल, अजातशत्रु, उदयभद्र, जीवक, और इनके साथ आम्रपाली , बुद्ध एवं भरतमुनि भी ! हाँ, भरतमुनि भी आते हैं और कवि को टोकते हैं कि मंचन का एक तरीका होता है, कनक्लूड होता है हर नाटक। उसे एक संदेश के साथ खत्म होना चाहिए। कविताई के दर्शन से मत टालो दर्शकों को। कथा आगे कहो।

“जाएंगे कैसे ये सुने बिना – क्यों तूने छेड़ा इन्हें

तिथियों के पार से अचानक बुलाया अतिथि किया”

या फिर

“शास्त्र से नहीं मैं लोक से आया था

सामने जो बैठे उन सबमें बैठा हूं

जाऊंगा नहीं लिए मैं वे मंगल वाक्य

जो मेरा यज्ञ-भाग”

और कवि अपना धर्म निभाता है। इस छोटे से कलेवर में हर पात्र अपनी मिट्टी से उठता है और विनय जी के शब्दों में ढल कर एक विराट चरित्र में बदल जाता है। अद्भुत व्यंजना, तरल भाषा, दृयात्मकता, चारित्रिक द्वंद्व इस काव्य-नाटक  में बहुत क्लासिक ढंग से आते हैं।

एक जगह अजातशत्रु विमल को देखा कर कहता है –

उन्नत ललाट किसी मागध सा बड़े बड़े नेत्र दिगंत से गहरे

नासिका तो वही पूरे मुखमंडल की गढ़न ही वैसी

मानो पिता बिंबिसार

अधर बस अलग लेकिन किसके

ऐसा क्यों लगता है देखा है कभी इन अधरों को निकट से

 इस काव्य-नाटक में आधुनिक समय और इतिहास एक साथ आवा-जाही करते हैं, बहुत से आधुनिक अवयव कवि के बहाने आकर इसे सघन बनाते हैं। काउच, एलीवेटर, चाय वगैरह – वगैरह। पिता के होते पितृहीन पात्रों का अनगिन परतों में दबा अतीत, कवि के आज से कोलायड ही नहीं होता है बल्कि वह आज पर एक प्रकाश-पुंज की तरह गिरता है और एक नई दृष्टि और सृष्टि का निर्माण करता है।

विनय जी के पास एक खास काव्य भाषा है। इनके यहाँ  गजब की व्यंजना और मारक अंत्यानुप्रास हैं।  कथा-प्रवाह को आगे बढ़ाते नाटक के गीत हिन्दी गीतों के क्लासिक ठाट कि याद दिलाते हैं और जब वे छंद-मुक्त होते होते हैं तब भी एक लय बनी रहती है। यहाँ नाटक में ही प्रयुक्त पद  “कविता की गोधूली’ याद आ रही है।

आप मेरी वाणी में बात

आप मेरे साथ जैसे ये दोनों हाथ

आप ही मेरे विरुद्ध जैसे युद्ध

जो सदा और सर्वथा अशुद्ध

यह भी भाषा की ताकत है कि पात्रों को उनका चरित्र पहना देती है एकदम त्वचा की तरह कि यशोधरा के पुत्र राहुल हैं, आम्रपाली पुत्र विमल। राहुल जो नवजात वयस में ही गौतम बुद्ध द्वारा पीछे छोड़ दिए गए, और विमल जो बुद्ध को पिता मान बैठते हैं और भिक्षु बन बुद्ध का ही प्रतिरूप लगते हैं। तभी तो  अजातशत्रु विमल को बुद्ध समझ बैठता है। इस विमल वाले अंक में पिता कई  तरह से परिभाषित हुए हैं, और यह काव्य नाटक  का सबसे अनूठा अंश है –

‘पिता वह नहीं है जो है जननी का पुरुष

पिता होना दैनिक तपस्या है “   

अजात शत्रु का चरित्र कई तरह से खुलता है यहाँ। विमल, आम्रपाली  और स्वयं कवि के संवाद में… ‘

कवि : आता है वह भी स्वप्न में मेरे

विह्वल – विक्षिप्त बिसूरता मुक्ति को तड़पते एक प्रेत सा।‘

 

विमल  : मेरे अर्धभ्राता, भाषा में आपकी राख बहुत है

और यह राख वैशाली की नहीं आपकी अपनी है।

बहुत कुछ जलाने में बहुत जले हैं

अग्नि के जूते पहन वर्षों चले हैं

बिंबिसार और अजातशत्रु की मृत्यु की कई कथाएँ हैं। एक कथा के अनुसार उसी के पुत्र अजातशत्रु ने उसे बंदी बना कर मरने तक भूखा छोड़ दिया था, और अजातशत्रु की हत्या उसके पुत्र उदय ने की थी। विनय ने पितृ-हनन की प्रवृत्ति / परम्परा के मानवीय और सामाजिक कारकों की शिनाख्त करने के लिए उन कथाओं को चुना है जो इस नाटक और हमारे समय के लिए प्रासंगिक और अर्थपूर्ण हैं। पितृहंता उदयभद्र के आगे कवि का  चीत्कार उठना कितना अर्थपूर्ण है, समझ जा सकता है – पिता बनो पिता बनो / अब भी समय है/ पिता बनो ओ रे पितृहीन !

इस नाटक  का अंतिम आत्मज है – जीवक, जो कवि का रूपक है। वह मनोचिकित्सकीय गहनता से पहले कवि का और फिर अपना विश्लेषण करता है। मनोविश्लेषण के इस सत्र में जीवक को अपनी यात्रा की वजह और उपलब्धि का पता चलता है. और कवि को अपनी उलझन से मुक्ति और नाट्य गुरु के लिए भरत वाक्य की प्राप्ति होती है।

बुद्ध ने कहा था-

अपना दीपक स्वयं बनो

और यह विह्वल अन्वेषी अ-बुद्ध आज कहता है

थोड़ा या अधिक पितृहीन हर राष्ट्र हर समाज

थोड़ा या अधिक पितृहंता हर राष्ट्र हर समाज हर इसी लिए- अप्प पिता भव!

विनय कुमार हमारे समय के अनूठे कवि हैं।  गिनती के काव्य नाटकों  की परंपरा में आत्मज एक नई और अनोखी कड़ी है,  जिसे पढ़ना मेरे लिए एक अद्भुत अनुभव रहा है। मुझमें इसके मंचन को देखने की प्रतीक्षा अँखुआ चुकी है।

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पुस्तक शीर्षक : आत्मज

विधा : काव्यनाटक

पृष्ठ संख्या – 94

मूल्य -199₹

प्रकाशक – राजकमल पेपरबैक्स

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