‘रसीदी टिकट’ के बहाने अमृता को जैसा जाना मैंने!

चित्र साभार: कोबो.कॉम

कुछ कृतियाँ ऐसी होती हैं हिन्हें पढ़ते हुए हर दौर का पाठक उससे निजी रूप से जुड़ाव महसूस करते हुए भावनाओं में बह जाता है। प्रत्येक पाठक उस रचना का अपना पाठ करता है। ऐसी ही एक कृति है अमृता प्रीतम की आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’, इसका पाठ किया है निधि अग्रवाल ने। वह पेशे से चिकित्सक हैं और हिंदी की पत्र पत्रिकाओं में नियमित रूप से लिखती रहती हैं। आप ‘रसीदी टिकट’ पर उनकी टिप्पणी पढ़िए- जानकी पुल।  

=======================================

अमृता प्रीतम अपने नाम में निहित प्रीत की तरह ही उन्हें प्रेम का पर्याय कहा जा सकता है। एक पाठक के रूप में मेरा उनसे लव-हेट रिलेशनशिप रहा है। अमृता प्रीतम की लेखनी से मेरा परिचय बहुत देर से हुआ। पिछले साल जब एक साहित्यिक ग्रुप से जुड़ी तब जिस शिद्दत से उनका जिक्र किया जाता था, उससे उन्हें पढ़ने की जिज्ञासा जरूर जाग्रत हो गई थी। उनकी पहली रचना जो मुझे पढ़ने के लिए मिली वह थी-

अम्बर की एक पाक सुराही,
बादल का एक जाम उठा कर
घूँट चांदनी पी है हमने
बात कुफ़्र की की है हमने……

अमृता की जीवनी जितनी थोड़ी बहुत जानती थी वह उनसे प्रेम न करने के लिए पर्याप्त थी लेकिन यह रचना पढ़कर मन मे एक ऐसी टीस उठी और लगा कि क्या सच ही प्यार में होना कुफ्र की बात है?

दूसरी रचना थी-
अज्ज आखाँ वारिस शाह नूँ कित्थों क़बरां विच्चों बोल
ते अज्ज किताब-ए-इश्क़ दा कोई अगला वरका फोल
इक रोई सी धी पंजाब दी तू लिख-लिख मारे वैन
अज्ज लक्खां धीयाँ रोंदियाँ तैनू वारिस शाह नु कैन
उठ दर्दमंदां देआ दर्देया उठ तक्क अपना पंजाब
अज्ज बेले लाशां बिछियाँ ते लहू दी भरी चनाब

(आज वारिस शाह से कहती हूं, अपनी कब्र में से बोलो इश्क की किताब का, कोई नया पृष्ठ खोलो पंजाब की एक बेटी रोयी थी, तुमने लंबी दास्तान लिखी आज लाखों बेटियां रो रहीं हैं, वारिस शाह तुमसे कह रही हैं उठ! दर्दमंदों के दोस्त, उठ देख अपना पंजाब वन लाशों से अटे पड़े हैं, चिनाब लहू से भर गया है।)

यह लिखने की जरूरत ही नहीं कि  उन्हें पढ़ कर बंटवारे का दर्द और अमानवीयता की पराकाष्ठा आंखों के सामने सजीव हो उठती है। इसके बाद उनकी कुछ कहानियां पढ़ी। उनमें से मुझे ‘जंगली बूटी’ और ‘शाह की कजरी का ही स्मरण है। अन्य कहानियों को या तो मैं पूरा पढ़ नहीं पाई या उनके पात्रों से कुछ संवाद स्थापित करने में असफल रही और इस संवादहीनता का कारण एक पाठक के रूप में मेरे दृष्टिकोण में व्यापकता का अभाव भी हो सकता है।

प्रेमचंद, शरद चंद और छायावादी कवियों के प्रति मेरा रुझान प्राय मुझे अलग तरीके के लेखन को पढ़ने में बाधक ही रहा है। इन सबके साथ फेसबुक और व्हाट्सअप पर अमृता को थोड़ा बहुत पढ़ने का अवसर मिलता रहा और  उनका जीवन परिचय भी।  एक स्त्री और वह भी शादीशुदा स्त्री जो प्रेम करती है किसी और से… और रहती है एक अन्य पुरुष के साथ! सामाजिक मान्यताओं के अनुसार चरित्र पर प्रश्नचिन्ह लगाने के लिए पर्याप्त कारण विद्यमान है। उनका जीवन बॉलीवुड की किसी मूवी की रोमांचकारी पटकथा प्रतीत होती है। निश्चित ही हमारे आस पास अगर कोई ऐसी स्त्री होती तो हम उसके जीवन में रोमांच की ही कल्पना करेंगे, उसके मन की गहराइयों तक जाने का समय और धैर्य हमारे समाज के पास नहीं है। हाँ, झूठी वेदना दिखाने वाले अवसरवादी पुरुषों का जमघट जरूर लग जाएगा।

साहित्यविदों के बीच रह कर अमृता को आप नकार नहीं सकते। तब मन हुआ क्यों ना उन्हें समझने का प्रयास किया जाए, और इसी क्रम में रसीदी टिकट पढ़ने का मन हुआ।

रसीदी टिकट के कुछ ही पन्ने थे कि यह पंक्तियां पढ़ कर मैं चौंक गई।

“यूं तो हर परछाई किसी काया की परछाई होती है। काया की मोहताज पर कई परछाइयां ऐसी भी होती है जो इस नियम के बाहर होती हैं। काया से भी स्वतंत्र मेरे पास भी एक परछाई थी। नाम से क्या होता है उसका एक नाम भी रख लिया था… राजन!”

चौंकने का कारण था कि अभी कुछ महीने पहले ही एक कहानी लिखी थी–आभास!  इस कहानी का आभास राजन का ही जुड़वां भाई प्रतीत हुआ। एक तरफ गर्व भी हुआ कि एक महान लेखिका की कल्पनाओं से मेरी कल्पना मिलती है,  वहीं दूसरी तरफ यह भी लगा कि शायद लोगों को यह विश्वास ना हो कि यह कहानी मैंने अमृता प्रीतम की जीवनी पढ़े बिना लिखी है। हालांकि सपनों के इस आभासी राजकुमार पर ना केवल अमृता और मेरा अधिकार है बल्कि सदियों से अधिकतर लड़कियां इसी को अपना हमदर्द मान आंखों में स्वर्णिम स्वप्न बसाए रहती हैं।

कुछ पन्नों बाद साहिर का अमृता के जीवन में प्रवेश होता है। आत्मकथा के अनुसार अमृता का साहिर के लिए झुकाव उन्हें पहली बार देखते ही हो गया था। साहिर ने भी शायद उसे महसूस किया होगा। इसी कारण जाने से पहले वह उन्हें एक नज़्म दे कर जाते हैं (उस नज्म का किताब में न होना खलता है)।

आगे मित्रों और रिश्तेदारों द्वारा विश्वासघात का जिक्र है। भारत और पाकिस्तान के विभाजन की त्रासदी को पढ़कर नहीं महसूस किया जा सकता उसे महसूसने के लिए सुनाने वाले की आँखों की नमी देखना बहुत जरूरी है।  ऐसे ही गायब हुए आभूषणों के संदूक और विश्वास की कहानी जब भी सुनती हूँ तब यही लगता है कि क्या लडाई केवल दो धर्म के अनुयायियों के मध्य थी? हिंदू-मुसलमान होने से पहले हर कोई केवल एक इंसान ही है।  झूठ, महत्त्वाकांक्षा और छल-कपट से भरे ऐसे ही कुछ इंसानों की असीमित इच्छाओं की परिणति था विभाजन, और विभाजन के दौरान हुई सभी अमानवीय घटनाएं!

साहिर के विषय में बात करते हुए दो या और भी अधिक स्थान पर लिखा है कि,
“साहिर की जिंदगी का एक सबसे बड़ा कांपलेक्स है कि वह सुंदर नहीं है!”

बाकी जगह पर मोहन सिंह, सत्यदेव शर्मा और अन्य कई लेखकों और रेडियो स्टेशन के उन कर्मचारियों का अमृता के लिए झुकाव का जिक्र, अमृता का जो आभा मंडल स्थापित करता है, वह सोचने पर मजबूर करता है कि साहिर के काम्प्लेक्स का कारण कही अमृता ही तो नहीं थी? एक प्रश्न भी मन में आता है कि किसी भी स्त्री या इंसान के लिए स्वयं की प्रशंसा लिखना कितना सहज रहा होगा। आत्मकथा लिखना निश्चित ही तलवार की धार पर चलने जैसा है।  इसका जवाब भी मिलता है जहां अमृता कहती हैं,

“आत्मकथा को प्राय चमकती-दमकती एकांकी सच्चाई समझा जाता है। आत्मश्लाघा का कलात्मक माध्यम पर बुनियादी सच्चाई को की अपनी आवश्यकता मानकर मैं कहना चाहूंगी कि यह यथार्थ तक पहुंचने की प्रक्रिया है।”

अमृता का साहिर की जगह बचपन में हुई सगाई को ही निर्वाह करना भी मन में प्रश्न उठाता है कि जिस लेखिका की कहानी के अधिकतर मुख्य नारी पात्र उन्मुक्त जीवन जीते हैं वह स्वयं क्या इतनी कमजोर थी या फिर वह साहिर से नहीं साहिर के रूप में एक काल्पनिक प्रेमी राजन की कल्पना से ही अधिक अभिभूत रही? साहिर को पा जाने पर क्या वह प्रेम कहानी इतनी ही रोमांचकारी रहती या एक साधारण गृहस्थ जीवन जीते प्रेम की कशिश दम तोड़ देती? और जैसा कि रचनात्मक क्षेत्रों में बहुधा देखने को मिलता है कि व्यक्ति से अधिक उसकी कला से प्रसंशकों का जुड़ाव होता जाता है। कुछ ऐसा ही प्रेम अमृता का साहिल के लेखन से भी लगता है। वह लिखती भी हैं-

“फिर अखबारें, किताबें जैसे मेरे डाकिए हो गईं और मेरी नज्में मेरे खत हो गए उसकी तरफ।”

अमृता की कहानी के पात्रों की ही तरह कहीं-कहीं पर आत्मकथा में कृत्रिमता का भी आभास होता है। कई लंबे सपनों का जिक्र और साहिर का बच्चों को लकड़हारे की कहानी सुनाना और अमृता के बेटे की शक्ल साहिर  से मिलना! अमृता प्रीतम के बाद के चित्रों में मुझे कभी-कभी इंदिरा गांधी की छवि का भी एहसास होता है लेकिन इंदिरा होना और अमृता होना उतना ही भिन्न है जैसे धरती-आकाश होना। स्वयं अमृता के ही शब्दों में,

“… दृष्टिकोण मेरा भी यही था पर इंदिरा जी के लिए जो मन की सहज अवस्था है मेरे जैसे साधारण इंसान के लिए, वह एक उस मंजिल की तरह थी जिसका रास्ता बड़ा कठिन हो।”

आगे बढ़ने पर दो बड़ी ही प्यारी पंक्तियां भावविभोर करती हैं। पहली इमरोज के लिए लिखी गयी हैं–

“राही तुम मुझे उस संध्या बेला में क्यों मिले। जिंदगी का सफर खत्म होने वाला है।  तुम्हें मिलना था तो जिंदगी की दोपहर के समय मिलते उस दोपहर का सेक तो देख लेते।”

दूसरी जो मुझे सही से स्मरण नहीं, पर कुछ इस प्रकार है–
“दर्द सबका अलग होता है लेकिन इस दर्द की आकृति प्रायः मिल जाया करती है।”

जहां एक तरफ अमृता के शब्दों और रूप के तिलिस्म में खोए कई प्रशंसक और मित्र थे, वहीं उनसे नफरत रखने वाले भी कम नहीं थे, और यह नफरत शायद अमृता का सामीप्य ना पाने की उनकी कुंठा अधिक हो। वह लिखती हैं–
“पंजाबी लेखकों के पास लिखने के लिए कोई गंभीर विषय नहीं होता। वे स्वयं ही कई अफवाह फैलाते हैं। स्वयं ही उनको अपनी मर्जी से जिधर चाहे मोडते हैं और फिर उन्हें लिख-लिख कर उनमें लज्जत लेते हैं।”

सामाजिक असहिष्णुता और विश्व व्यापक अशांति के अनेक सन्दर्भों में एक जगह वह कहती हैं —
“एक वक्त था जब  केरल में जातिवाद की भयानकता को देखकर स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि केरल भारत का पागल खाना है। आज मैं भरी आंखों से कहना चाहती हूं कि हम हर प्रांत को भारत का पागल खाना बना रहे हैं।”

और मुझे लगता है कि यह कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज हम उस विक्षिप्तता को पूर्णता प्राप्त कर चुके हैं। वायोत्सारोव की एक कविता के अनुवाद में वह लिखती हैं,
“कल यह जिंदगी सयानी होगी यह विश्वास मेरे मन में बैठा है और जो इस इस विश्वास को लग सके वह गोली कहीं नहीं वह गोली कहीं नहीं,”

कितने ही हिटलर आये और गए लेकिन यह सच है कि एक इस विश्वास की ढाल ही उम्मीद की आत्मा को जिंदा रखे है।

कविताओं के संदर्भ में ही अमृता एक अन्य स्थान पर वह लिखती हैं कि,
“मन में एक प्रार्थना उठ रही है काश कि दुनिया की सारी सुंदर कविताएं मिल जायें और वियतनाम की रक्षा कर सकें।”

क्रागुयेवाच शहर के निर्जन में 18 गज लंबे  और 10 गज ऊंचे दो सफेद पंखों के ( जो जर्मन फौजियों द्वारा स्कूल के बच्चों और मास्टरों के गोलियों से बींध दिए जाने की भयावह घटना के स्मारक हैं) संदर्भ में वह लिखती हैं–
“यह पत्थर के पंख उस उड़ान के स्मारक हैं जो उन 300 बच्चों की छाती में भरी हुई थी।”

म्यूनिख में जहां  हिटलर की ट्रायल हुई थी, एक जर्मन लड़की द्वारा उनसे पूछा गया कि आपका क्या ख्याल है हमारे लोगों ने यह जो कुछ किया था कभी हमें इसका फल भुगतना पड़ेगा… ? और मैं सोच रही हूं कि जो हम प्रकृति और मानवता के साथ कर रहे हैं क्या उसका खामियाजा भुगतने से हमारे बच्चे बच पाएंगे?

जातीय  समीकरणों और राष्ट्रीय महत्वाकांक्षाओं से दूर, बहुत ही प्यारी संवेदनाओं से भरे क़िस्से इस किताब में है। रविंद्र नाथ टैगोर के बारे में वह लिखती हैं कि रविन्द्र नाथ ठाकुर ने बुडापेस्ट में एक पेड़ लगाया था और एक कविता लिखी थी,
“मैं जब इस धरती पर नहीं रहूंगा, तब भी मेरा यह वृक्ष आपके बसंत को नव पल्लव देगा और अपने रास्ते जाते सैलानियों से कहेगा कि एक कवि ने इस धरती से प्यार किया था।”

रविंद्र नाथ जी से ही जुड़ा एक और किस्सा लिखते  हुए वह कहती हैं कि अमृता ने जब एक कविता उन्हें सुनाई तो उन्होंने जो प्यार और ध्यान दिया था वह कविता के अनुरूप नहीं था…  उनके अपने व्यक्तित्व के अनुरूप था। अपने व्यक्तित्व के अनुरूप आचरण ही महान व्यक्तियों की के व्यक्तित्व को परिभाषित करता है।

और जैसे कि मैं हमेशा कहती हूं की एक कहानी का नायक दूसरी कहानी का खलनायक हो सकता है इसी संदर्भ में वह इज्जत बेग (जो समरकन्द का था और भारत में एक कुम्हारिन से प्रेम करने लगता है), का जिक्र करते हुए कहती है कि समरकन्द में एक स्त्री ने कहा- हमारे देश में तो वह बस एक अमीर सौदागर का बेटा था और कुछ नहीं प्रेमी  वह आपके देश जाकर बना सो (उस पर) गीत आपको ही लिखने थे, हम कैसे लिखते ?

“किन देशों के लोग किन देशों में जाकर गीतों का विषय बन जाते हैं और अपने व्यक्तित्व का कौन सा भाग कहां छोड़ आते हैं बड़ा मनोरंजक इतिहास है!”

एक और दिल छूती हुई पंक्ति एक विदेशी औरत पर लिखी कहानी के संदर्भ में आती है, जिसमें उस स्त्री के पात्र की कहानी में मृत्यु हो जाती है पर वर्षों बाद जब अमृता उसके देश गई और कसकर गले लगकर मिली तब उसके पहले शब्द थे,

“देखो मैं अभी भी जिंदा हूं… कहानी की मृत्यु में से गुजर कर भी जिंदा हूं!”
… और यह कितना बड़ा सच है।  प्राय: आम जिंदगी के आम पात्र कहानी के सुपर हीरोज से भी कहीं अधिक संघर्ष करते हैं और कहीं अधिक हिम्मत रखते हैं। पृथ्वी के अक्षुण्ण अस्तित्व की घोषणा करता एक किस्सा अमृता की शादी के समय का आता है, जहां उनकी मां की सहेली ने अपने हाथ की सोने की चूड़ियां उतारकर उनके पिताजी को दे दी थी क्योंकि उन्हें लगा कि ससुराल वाले शायद कुछ मांग रहे हैं। अमृता लिखती है–

“मां की सहेली ने वह चूड़ियां वापिस हाथों में पहन ली, पर ऐसा प्रतीत होता है चूड़ियां उतारने का वह एक क्षण दुनिया की अच्छाई का प्रतीक बन कर सदा के लिए ठहर गया है…।”

… और मुझे लगता है कि यह छोटे छोटे क्षण कितने बड़े सम्बल बन जाते हैं, जीवन समर में विजय पाने के लिए!

एक और बहुत प्यारा प्रसंग उनकी प्रिय सहेली उज़्बेक की कवियत्री जुल्फ़िया खान के साथ का है जहां एक पुस्तक की जिल्द पर बनी तस्वीर को देखकर अमृता कहती हैं–

“इन आँसुओं और औरत की आँखों का ना जाने, क्या रिश्ता है कोई भी मुल्क हो उनका यह रिश्ता बना ही रहता है!”

इमरोज़ के जिक्र के बिना अमृता पूरी नहीं होती, लेकिन अमृता को पढ़कर इमरोज़ यानी इंद्रजीत को समझना असंभव है। साहिल और अमृता तो कुछ ना कुछ अंश में हम सब के भीतर हैं लेकिन इमरोज शायद दुनिया में एक ही हुआ है।

अमृता का इमरोज से पहला परिचय साहिर के लिए अपने आखिरी खत को प्रकाशित कराने के लिए एक चित्रकार की तलाश में हुआ था। अमृता ने बचपन से एक कल्पना की  थी। वह उस कल्पना का मन पहचानती थी लेकिन इस कल्पना का कोई चेहरा नहीं था। वह चेहरा उन्हें कुछ हद तक साहिर में नजर आया। वह कहती हैं-
“मेरी और साहिर की दोस्ती में कभी भी लफ्ज़ हायल नहीं हुए थे यह खामोशी का हसीन रिश्ता था।”
मुझे लगता है अपने बचपन के काल्पनिक सखा और संबल रतन को सहेजते अमृता प्रेम का दूसरा नाम बन गयी  थी और उन्हें पाने के लिए खुद को मिटा बस प्रेम ही बचाना था, और यह सहजता इमरोज़ में साहिर से कहीं अधिक  प्रतीत होती हैं। अमृता  के शब्दों में–
‘इमरोज़ एक दूधिया बादल है। चलने के लिए वह सारा आसमान भी खुद है, और वह पवन भी खुद  है जो उस बादल को दिशा-मुक्त करती हैं…’

साहिर, इमरोज और अमृता के रिश्तों की सच्चाई जो भी रही हो लेकिन संसार और प्रेम के सौंदर्य में निष्ठा रखने वाले अनगिनत पाठको की तरह मैं भी इन रिश्तों की रूहानियत को जीती अमृता की आत्मकथा के हर एक शब्द पर यकीन करते हुए, दुनिया को प्रेम के नए आयाम देने के लिए उन्हें शत-शत नमन करती हूं!

===============

डॉक्टर निधि अग्रवाल

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 mins
WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify WooCommerce Swatches Pro Plugin Swiper Slider Widget for Elementor WooCommerce Drag & Drop Uploader | Ajax File Upload Media Boxes Portfolio – WordPress Grid Gallery Plugin StockUpp – Split Order For WooCommerce TextLocal for LatePoint (SMS Addon) PDFMentor Pro – WordPress PDF Generator for Elementor WooCommerce Email Template Customizer MobiKwik (Zaakpay) Payment Gateway WooCommerce Plugin Contact Lenses Prescription Plugin | WooCommerce WordPress