यह किताब तो अहसासों का गुलदस्ता है

देवी प्रसाद मिश्र की पुस्तक ‘मनुष्य होने के संस्मरण’ पर कवि यतीश कुमार की यह टिप्पणी पढ़िए. यह पुस्तक राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है- जानकी पुल
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दोहे और मुहावरों को अमरत्व प्राप्त है और अगर कहानियाँ इस ओर मुखर होकर अमरत्व चख लें तो मुहावरों में बदल जाते हैं। लेखनी का मुहावरों में बदलना कोई असाधारण घटना नहीं हो सकती । `देखन में छोटन लगे घाव करे गंभीर’ बिहारी के दोहे की यह पंक्तियाँ देवी प्रसाद मिश्र के इस संग्रह ‘ मनुष्य होने के संस्मरण’ को सही अर्थों में परिभाषित करती है। बेधक और समयोचित छोटी-छोटी कहानियाँ या कहे गल्प आपके पाँव में काँटे की तरह गल्प धँसी रहती है। देवी प्रसाद मिश्र इन रचनाओं का सृजन करते हुए, कभी अद्वैतवादी तो कभी मध्यम मार्गी बन जाते हैं और वो मार्ग कवित्व पथ पर समयानुभव के छेनी हथौड़े से सृजित हो रहे हैं, दो पहाड़ को कविता के पुल से जोड़ने की कोशिश हो रही हैं और ऐसा करते हुए देवी किसी पहाड़ पर लालटेन भी जला रहे हैं । लिखते हुए लगता है अपने से अपने को थोड़ा- थोड़ा चुरा रहे हैं ताकि अंधेरा और रोशनी दोनों एक साथ क़ायम रहे। लोककथा के अनुगूँज बादलों के फाहे बनकर कहानीकार को गुदगुदी करे और फिर वन लाइनर्स की बारिश हो,ऐसा ही कुछ हुआ हो शायद लिखते समय। इसलिए देवी लिखते हैं ‘ भूल न जाऊँ इसलिए ज़ेहन में आई कहानियों के शीर्षक या संकेत या विचार को हथेली पर लिख लिया करता हूँ’ और मैं इसी क्रिया को बादलों के फाहे जो अगर बर्फ सी स्मृति में जम न जाये तो वाष्प बनकर उड़ जाने की बात कहता हूँ। उन्हें यह पता है कि कहावतों, मुहावरे और हास्य चुटकुलों में बारीक अंतर होता हैं जबकि उनके अर्थ की महत्ता बहुत ज़्यादा होती है। यहाँ कथा में कविता और कविता में कथा तिरोभाव से अभिर्भाव की ओर जाती यात्रा की युक्ति लग रही है ।यहाँ भटकन का बासी नहीं टटका भाव है जो इसे कविता और कहानी के मध्य संतुलित कर रहा है। मध्य संतुलन पतली रस्सी पर चलना ही तो है जबकि रस्सी पर चलते हुए ख़्यालों पर भटकना गंतव्य से दूर होना है पर इसके बावजूद पाया हुआ संतुलन देवी प्रसाद को देवी प्रसाद बनाए रखता है ।
यहाँ हरेक पंक्ति की आहट सुनते रहने की ज़रूरत है। पढ़ने की गति को अनियंत्रित नहीं होने देना है। अर्थों में चिकनाई नहीं रूखापन है फिर भी गति से मति हटी तो आपसे पंक्ति फुर्र आप नीचे चित। पहले पन्ने की ही एक पंक्ति इसी संदर्भ के लिए यहाँ इंगित कर रहा हूँ कि ‘ लकड़ी की सीढ़ियों पर चलने लगा तो मुझे लगा कि मैं अपने होने की आवाज़ सुन रहा हूँ जो इस बीच मुझ तक नहीं आती थीं’ और मैं आपसे इन पंक्तियों की आवाज़ सुनने को कह रहा हूँ। यह बिलकुल ऐसे है जैसे सरगम सुनते समय ‘र’ और ‘नी’ को सुने ही न और फिर कहें यार ये कुछ जम नहीं रहा जबकि मसला कुछ और ही है। संगीत सुनते समय ख़ुद सुर में रहने जैसा। यहाँ पंक्तियों में अकेले आदमी का निनाद है जो ‘मनुष्य होने का संस्मरण’ को गुंजायमान करता है। पहली कहानी से ही एक घुमड़ उठती है और फिर पारलौकिक इलहाम सा होना आरंभ होता है कि इस दुनिया में उस दुनिया की भी चिंता करने वाले लोग बचे हैं।
कहानियाँ विडंबनापूर्ण हैं। चूहा भूख के रेस में हैं या भूख चूहे सा रेस में समझ में नहीं आ रहा पर जो समझ में आ जाए वह अन्य कहानियाँ नहीं बल्कि वो जो अपनी पूरी नासमझी के साथ पैबंद है और सोचने को मजबूर करती जाए वो है अन्य कहानियाँ । एक अजानी स्त्री के पास अपने दाँत नहीं, अपना दंभ भूल आया वह और दंभ भूलना कोई साधारण घटना नहीं । हर कहानी को पढ़ते हुए मैं एक सीख नोट कर लेता हूँ जैसे स्मृतियों की इस कहानी ने अंत में एक प्यारी सीख बतायी कि स्मृतियाँ ज़िंदा रहने में मदद करती हैं और सलीक़े से किसी यात्रा में मर जाने में भी। एक-एक पंक्ति आत्मीय बातचीत नहीं पूरी चर्चा का आह्वान है । मैं चार कदम चल रहा हूँ और तीन कदम वापस आकर फिर से दर्शन के कूट का आनंद ले रहा हूँ, डूब रहा हूँ। कभी उन पंक्तियों में तो कभी ख़ुद से ही बतिया रहा हूँ।लिखा है – ‘मुझे लगा था कि दरवाज़े पर हवा होगी, मैंने बताया। मैंने हमेशा हवा होना चाहा, उसने कहा।’ यहाँ शब्द हवा से नहीं आप से खेल रहे हैं। इस चाहने और होने के अंतर को बचाए लेखक हवा के साथ धूप का भी स्वागत करता है । जीवन में ये दो तत्त्व, गद्य की तरलता के साथ-साथ बने रहें तो कविता में पानी भी बची रहेगी ।
पूरे संग्रह में लेखक जीवन को समेटता नजर आ रहा है, मृत्यु के बारे में सोचने से जीवन नहीं चलता और ऐसा सोचते हुए लेखक ख़ुद की पंक्तियाँ भूलने लगता है । जीवन कितना सुंदर है कि तुम को भुला दे और उसके इस असर को भी तो ऐसे में पंक्ति को भूलना जीवन जीने का सुंदर सलीका है। मैं भी भौचक्का हूँ इस कवि और लेखक के लेखकीय सम्मिश्रण को पढ़ते हुए कि अपनी ही अंतर्दृष्टि में इतना मौलिक कैसे रहा जा सकता है । मैं उसे पढ़ते हुए आउट हो गया जब वह मौलिक शख़्स यह कहता है कि जीवन में कभी छक्का नहीं मार पाया।उसने जब भी मारा तो वह कैच आउट हो गया। ऐसी हर पंक्ति मुझे क्लीन बोल्ड कर रही हैं और मुझे यूँ बोल्ड होने में ज़िंदगी को चखने का आनंद आ रहा हैं । पढ़ते हुए लग रहा हैं मसूरी के एक कोने में एक एकांत रेस्टोरेंट में धूप से डूबी चाय फूस के नीचे पी रहा हूँ ।गुनगुनी हुई जा रही है ज़िंदगी जैसे पंक्तियाँ सहलाते हुए इस देह या यूँ कहूँ रूह तक रिफ्रेश करती जा रही हैं मानो पंक्तियाँ नहीं दूब का लगातार स्पर्श है तलवे पर, नहीं मस्तिष्क या माथे पर सीधे ललाट पर जहाँ से एक बच्चे की मुस्कुराहट को दबाया गया था, अब खिलखिला रहा है । लेखनी का ऐसा जादू विरल है ।
कहानी-दर-कहानी आगे बढ़िए तो पाइयेगा यहाँ पंक्तियाँ एक लूटे हुए बाज़ार में उससे भी ज़्यादा लूटे हुए ख़रीदार की नज़र से देखी जा रही दुनिया की खिड़की है। वहाँ की बातचीत में एक बात एक सवाल बन कर निकली की जूते के दाम बढ़ गए है या आदमी के गिर गए हैं? यह भी जाना कि खोजते हुए पैर ख़ुद ही बड़े हो जाते हैं अपनी नाप से बाहर, फिर कोई जूता फिट नहीं बैठता । जूता फिट नहीं बैठना जातिवाद से ऊपर निकल जाना है। अपनी स्मृतियों के साथ कि सवर्ण व्यवस्था में इंसान जूते नहीं पहन सकता अगर पहन लिया तो रौंदने वाला बन जाएगा और फिर वह इंसान कहाँ रह जाएगा। देखिए ऊपर लिखा था मैंने और यहाँ फिर मैं कुछ भटक गया कुछ खोजने निकल पड़ा और मेरी उँगलियाँ मेरे जूते से निकल उसे सैंडल में तब्दील कर रही हैं और अंदेशा पूरा है कि मैं बहुत जल्द नंगे पाँव धान के बिचड़े में छुपे कीचड़ से खेल रहा होऊँगा। इस खेल को खेलते हुए इस सोच से घिर गया कि मनुष्य कालांतर से बेहतर के इंतज़ार में हैं और यह खेल है कि ख़त्म ही नहीं हो रहा । देवी कि इन कहानियों से गुजरना ऐसे ही खेल से गुजरना है । लगता हैं कि उठ जाऊँगा और फिर धड़ाम!
जितनी बार एक- एक कर कहानी से गुजरता हूँ, लगता है भागते मकानों से गुजर रहा हूँ फिर लगता है थके क़स्बों से, निचोड़े नालों से और फिर रुकता हूँ किसी खंडहर के सामने सुख का साँकल बजाने। दुख की प्रतिध्वनि कहती हैं ग़लत पता हैं तुम्हारी मंज़िल कोई और है।
मैं अगली कहानी से अब गुजर रहा हूँ। पैर को पता नहीं पता! हाँ उसकी धूल गंतव्य नहीं नेपथ्य का पता दे रही है ।कहानियों के बाद मन में ताली नहीं बजी शून्य का दायरा बढ़ गया । मन का पॉज़ बटन दब गया शायद । अभी-अभी एक दाग़दार आदमी मेरे सामने नया चोला पहन कर निकल गया जबकि कुछ देर पहले देश की सारी ज़रूरी चर्चा में वह शामिल था और उसने जिसके विरूद्ब बहस शुरू की उस विचार से लड़ने ख़त्म करने उसी आदमी से मिलने पृथ्वी से तीन तल नीचे घर में गया जिसकी दाड़ी का कुछ पता नहीं चल पा रहा है कि बढ़ाने के लिए रखी है या समय पर हजामत बनाने।
अगली बार देवी से मिलूँगा तो यह पूछूँगा कि आपके किरदार इतनी दबी ज़ुबान से क्यों बतियाते है। मसलन वो जूते पहनाने वाला आदमी अपनी ज़ुबान में धँसता चला गया और बात की गहराई बढ़ती चली गयी । वह नीम सी नींद से जागा नीम पेड़ वाला बूढ़ा जिसका मन हवा होना चाहता है और जो बच्चों को पत्तियाँ गिनने का और लेखकों को संगीत और शोर के मायने समझाना चाहता है। उसकी ज़ुबान भी समझाते-समझाते धीमी हो गई । ईश्वर की चर्चा भी इतनी ही दबी ज़ुबान में की गई है कि मैं सोचता रहा सारे हम्द और प्रार्थनाएँ भी तो इसी दबी ज़ुबान में होती है। डॉक्टर ऑपरेशन करते समय ईश्वर का चोला पहनता हैं तो नर्स से इसी ज़ुबान में बातें करता होगा। चर्च में फादर भी कुछ ऐसा ही अभिनय करते हैं और मस्जिद या गुरुद्वारे में सजदा और दुआ दोनों के तरीक़े सब मेल खाते हैं । मैने कहा था देवी आप भटकाने के उस्ताद हो और देखो मैं आपकी बुदबुदाहट में फिसल गया। तौबा तुम और तुम्हारी बुदबुदाहट!
देवी कहते हैं किताबों को पढ़ने की बाद मोर्चुअरी से बाहर आने जैसा क्यों लगता है । बात तो सही है पर कोई जवाब है क्या? किताब दरअसल जवाब नहीं देती अहसास छोड़ जाती है। और यह किताब तो अहसासों का गुलदस्ता है महकते हुए गुलों को समेटे। शुक्रिया उस अनार और अंगार की तरह लाल लड़की से मिलवाने का जिसके बग़ैर ज़रूरी बात जो ग़ैरज़रूरी होने से बच गया। उसे समझने के लिए कि, उन्मुक्तियाँ साधारण को असाधारण कैसे बना देती हैं। अंतर बस छोड़ देने भर का साहस भर है। उम्मीद के अंधेरे में डूबा वह कैमरामैन को भी उस लड़की जैसे साथी की ज़रूरत है क्योंकि उस लड़की को भी अभी लाल से समुंदर वाला नीला होना है। लड़की जब उससे मिली वह भूल गई कि उसे आसमान वाला नीला या समंदर वाला नीला में कौन सा नीला पसंद है। जबकि लड़का मुस्कुरा रहा था सोचता हुआ कि दोनों प्रतिबिंब हैं एक दूसरे का! अब समय फूल है कि कुल्हाड़ी यह सिर्फ़ उन आँखों को पता है। लड़के ने लड़की से फिर कहा मेरे एक जेब में अलाव और दूसरे में बदलाव है! लड़की उसे अपने चश्मे बदलने की सलाह देती है कहती है ज़्यादा देखने से आँखें ख़राब हो जाती हैं । कवि कहता है जो मरा हुआ हैं वही मिलेगा जो नहीं मरा वो हाथ नहीं आएगा ।ऐसी कई बातें पढ़ते हुए लगता है जैसे किसी ने चाकू मार दिया एक फ़्लैश में और फिर सब सामान्य । चाकू मारने का दर्द घटना के बहुत बाद होता हैं।
किसी के पास आत्मा तो किसी के पास ख़ुल्ला नहीं है। सोचता हूँ `नहीं होना’ एक नियामत नहीं है तो और क्या है? देवी आप सोचवाते बहुत हो यार! यह भी सोचता हूँ चश्मे का नंबर नहीं बदलता तो फ़ाइलों की धूल नहीं दिखती चिड़ियों कि आवाज़ तो सुन ही रहा था, पत्तियों का दर्द नहीं दिखता पर हद तो तब कर दी जब चश्मा दूरबीन में बदल गया और थोड़ी देर के लिए अंधा होना भी सबसे सुकून का पल हो गया।
दैनिक जागरण नहीं नव जागरण की ज़रूरत को बताने वाले ज़्यादा कवि आरण्यक हैं । तमाम मास्कों को बटोरता कवि, कवि जिसे `आम’ में बदलता मौसम और `नदी’ में अलौकिक शाश्वतता नज़र आती है, असल में वह सबकुछ लूटा देने के सुख का वांछित बन भटक रहा है । सुंदर होने की यातना से भागता कवि प्रेम में पुरुष पहल से घबराई लड़की को आलिंगन देने के लिए चिंतित है ! घर लौटते हुए मुल्तवी के नियमों के सारे नियम याद करता कवि, प्रतीक्षा और पहुँच के बीच विकल्प ढूँढता टहलता उस लड़की के बारे में सोच रहा है जो यह सोचती है कि आज आदमी ज़्यादा बुरा है या दिन। किसान से अच्छे बीज के खोने का दुःख जानने की इच्छा से परेशान घूमता और फिर सिगरेट से ज़्यादा सुलगता हुआ आदमी कवि में बदल जाता और वह इच्छाओं को चिंदीचिंदी करने वाला कवि में तब्दील हो जाता है। एक पूरे दरवाज़े से आता और एक कम खुले दरवाज़े से निकल जाता है और कविता केबदले कहानी में बदल जाता है।
अंधेरों से ज़्यादा अंधेरे में बैठा कवि यह भी जानता है कि जब वह, जिसकी आँखों में चमकता चाँद है, उससे मिलेगा तब दोनों मिलकर इच्छाओं को नहीं अंधेरे को काटेंगे और अंधेरे पर कैंची चलाने से नभ के तारे आँचल के सितारों में बदल जाएँगे। लिखता रहा तो यह सिलसिला एक ट्रांस से दूसरे में बदलता जाएगा और मैं आधे टूटे चक्रव्यूह के व्योम में फँसा लिखता रहूँगा। अब उस ट्रांस से बाहर कि बात । इस संग्रह के सिर्फ़ दो पन्नों पर एक जगह एक किरदार का नाम आता है बाक़ी सारे किरदार बेनामआते रहते हैं । ज़िंदगी में नाम नहीं और उसपर सरनेम नहीं तो सामाजिक टकराहट चकनाचूर हो जाएगी । शायद देवी के भीतर का कम्युनिस्ट ऐसा ही चाहता हो । क्या पता! निरूपायता भी एक दृश्य है जिसे देवी कई बार प्रयोग में लाते हैं जैसे उन्हें लगता हो यह भाव साधारणतः मुमकिन नहीं इसलिए किरदार एक दूसरे को कई बार निरुपायता के भाव से देखते मिलते हैं।
अतिसूक्ष्मवाद या मिनिमिलिज्म को केंद्र में रखकर रची गई रचना लेखकीय चातुर्य नहीं कहानी की बेहद मौलिक आधारिक ज़रूरतें प्रतीत होती हैं जो इन अन्य कहानियों को, जो कि अपने शिल्प क्राफ्ट और व्यंजना में अनूठी हैं, आज के गद्य शैली को एक मीठी चुनौती देती प्रतीत होती हैं । यह नवोन्मेषी नवोन्मुख कथा प्रविधि जिसे अन्य कथाएँ कहा गया है विश्व साहित्य में एक नया तारा बिंदु उगता प्रतीत होता है । भाषा की तरलता और सरलता का तारतम्य इसके दर्शन बिंदु को संप्रेषित करने में मदद करती हैं और मुझ जैसा पाठक भी इसे पढ़ते हुए ट्रांस में भटक जाता है जो कि हर किताब की अपनी इच्छा भी होती है कि उसका पाठक पढ़ते हुए वहाँ खो जाये । सामान्य से असामान्य दार्शनिकता पैदा करना और मेटाफ़िजिक्स को जीवन के उड़उड़ापन भरे दर्शन से जोड़ने की कला देवी ने कब कैसे सीखी यह तो वो ही बता सकते हैं पर हम जैसे पाठक को तो बस उस संगम में गोते लगाने से मतलब है और गोते लगाते हुए कुछ अद्भुत शब्द संयोजन को अपनी पूँजी की तरह समझ प्रयोग के समीकरण बटोरने से मतलब है और ऐसा करने में लेखक और पाठक दोनोंसफल रहा नहीं तो मुझसा नवांकुर देवी के इस जादुई किताब का पहला पाठ यूँ नहीं कर पाता …
अत्यंत संग्रहणीय संग्रह है । कुछ बातें भाषा से इतर -:इस किताब के कई कलात्मक पक्ष में एक यह हैं कि शीर्षक छोड़कर सारे शब्दबोल्ड लेटर्स में हैं । यह इसे और आकर्षक और पठनीय बना रहा है। और सबसे विशेष लक्षणीय बात इस किताब को देवी जी कीअसाधारण गद्य के इतर हेम ज्योतिका जी की पेंटिंग जो की विषय के अपने दायरे में अद्भुत इज़ाफ़ा करने का अपना अलहदा तरीक़ा है।अमूर्त जब काव्य भाषा सी बातें करते हैं तब सृजन में चार चाँद लगजाता है । यह सच में देहानुभवों के बिंब अलक्षित कर रहे हैं अपितु इसका विस्तार भी भेद रहे हैं ।

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