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  • आनंद पांडेय की पुस्तक ‘आशंकाओं के द्वीप में लघुमानव’ की समीक्षा

    हाल ही में आनंद पांडेय ने विजयदेव नारायण साही पर केंद्रित किताब लिखी है ‘आशंकाओं के द्वीप में लघुमानव’। प्रस्तुत है इस किताब की पहली समीक्षा, समीक्षक हैं शुभम् मोंगा – अनुरंजनी

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    “साही के मन का मानचित्र:आकांक्षाओं के द्वीप में लघु मानव”

    विजयदेव नारायण साही हिंदी के एक मौलिक आलोचक, प्रतिभाशाली कवि और साहित्य चिंतक थे। उनकी कविता और आलोचना ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है लेकिन हिंदी आलोचकों ने उन पर व्यवस्थित अध्ययन की परंपरा नहीं डाली।उन पर समय-समय पर छिट-फुट लेखन होता रहा है लेकिन आज के पाठक के दिमाग में ऐसी कोई पुस्तक नहीं है जो साही का समग्र मूल्यांकन और पाठ करती हो।अभी हाल में ही साही शती पूरी हुई है।देशभर में साही जन्म शताब्दी वर्ष मनाया गया है। इस समय साही की पुस्तकों, और उन पर लिखी पुस्तकों की दुर्लभता का अनुभव हर किसी अध्येता को हुआ जो ऐसे आयोजनों का साक्षी बना।‘लघु मानव के बहाने हिंदी कविता पर एक बहस’ उनका ऐसा है लेख है जिसने हिंदी आलोचना में नई कविता संबंधी बहस को एक नया प्रस्थान बिंदु दिया है और यह लेख उनके आलोचक कर्म की आधारशिला भी है।ऐसे में आनंद पांडेय की आलोचना पुस्तक ‘आशंकाओं के द्वीप में लघुमानव’ साही अध्ययन में एक जरुरी और बहुप्रतीक्षित हस्तक्षेप से कम नहीं है।यह किताब साही के जीवन, रचना और आलोचना के सभी जरूरी आयामों को समेटती है और उनका दृष्टिसम्पन्न मूल्यांकन भी करती है।

    “साही साहित्य को नितांत समसामयिक बने रहने पर बल देते हैं। इसी समसामयिकता की कसौटी पर वे अतीत व भविष्य की चिंताओं-सपनों की सार्थकता तय करने की जरूरत को रेखांकित करते हैं।”

     मुझे यह कथन साही की आलोचना दृष्टि को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतीत होता है। संश्लिष्ट उत्तर का विश्लेषण करने के लिए समाज के इतिहास, संस्कृति, सभ्यता और राजनीति को जानना भी बेहद आवश्यक है और जब कोई आलोचक इस दिशा में अपना कदम बढ़ाएगा, तो उसका लेखन समसामयिक तत्वबोध से परिपूर्ण होगा ही। ‘अतीत और भविष्य की चिताओं-सपनों की सार्थकता’ तभी संभव होगी जब समसामयिक तत्वों की व्याख्या, साहित्य-विवेक के साथ की जाएगी। आलोचक की यह कृति अपने मूल में विजयदेव नारायण साही जी की इसी समसामयिकता की आग्रही आलोचना दृष्टि का विश्लेषण करती है, जो उनके विचारों के बनने की इस पूरी प्रक्रिया के प्रत्येक चरण को अपने भीतर आत्मसात किए है। 

    आनंद पांडेय लिखते हैं, “साही आजाद भारत की जरूरत और परिस्थितियों में साहित्य की भूमि और भूमिका की खोज करने वाले कवि-आलोचक हैं।” कोई भी आलोचक जब संवेदनापरक चिंतन की भूमिका में उतरता है तो उसकी दृष्टि में दार्शनिकता का आना स्वाभाविक है। यह कृति साही के लेखन में दर्शन और उनकी वैचारिक निर्मिति को समझने के लिए एक गहरा ‘ऑब्जर्वेशन’ है, जहाँ आलोचक साही के लेखन की सभी संकल्पनाओं से जीवन्त संवाद करता है। 

    साही के लेखन व जीवन के संकल्पनावृत का पूर्णता में विश्लेषित करने के लिए वे अपनी इस पुस्तक को चार भागों में विभाजित करते हैं। 1.जीवनीपरक 2.काव्यपरक 3.आलोचनापरक और 4.जायसीपरक।

    साही जी की समग्र दृष्टि को खोलने के लिए और उनके व्यक्तित्व-कृतित्व का पूर्णता से विश्लेषण करने के लिए ये चारों अध्याय पर्याप्त हैं। कवि और आलोचक के रूप में साही के योगदान को देखना और उनके जीवन वृत्त को रखना, इस पुस्तक को साही के समग्र अध्ययन, मूल्यांकन एवं पाठ बनाता है। यही इस पुस्तक का योगदान और महत्त्व है। साही हिंदी कविता और आलोचना के ऐसे हस्ताक्षर रहे हैं जिनका हिंदी रचना और आलोचना में बहुत स्थायी प्रभाव पड़ा है। लेकिन साही पर व्यवस्थित अध्ययन और लेखन की बेहद कमी रही है। यह पुस्तक इस कमी को पूरा करती है। भविष्य में साही अध्ययन में इसकी भूमिका एक प्रवेशिका पुस्तक से कम नहीं होगी।

    इस पुस्तक के जीवनीपरक भाग का नाम ‘वह मामूली आदमी नहीं था’ है। इसमें साही की जीवन यात्रा के उन सभी पहलुओं पर विचार किया गया है, जो उनके साहित्य की यात्रा को निर्धारित व निर्मित करते हैं। आनंद पांडेय ने उनके जीवन और रचना संसार को आमने सामने खड़ा करके दोनों के अन्त:सूत्रों का विश्लेषण किया है। वे यह मानकर चलते हैं कि साही ने ‘साहित्य और राजनीति, दोनों विधाओं को उन्होंने शब्द और कर्म, दोनों रूपों में जिया।’ उनके इन्हीं अनुभवों को कृतिकार ने अपनी इस पुस्तक के पहले अध्याय में शामिल किया है। साही की साहित्य दृष्टि और जीवन प्रसंगों  की एकता के सूत्र खोजते हुए आनंद पांडेय लिखते हैं “उनकी साहित्य दृष्टि यह बताती है कि साहित्य के साथ-साथ उन्होंने विश्व इतिहास और दर्शन का ज्ञान भी हासिल कर लिया था।बिना इसके,उनके साहित्य सिद्धांत इतने स्पष्ट और व्यवस्थित नहीं हो सकते थे।”

    इससे हमें साही जी की इस विशेषता के बारे में पता चलता है कि उनके पास ज्ञान के सभी अनुशासनों का पर्याप्त बोध था और यही बोध उनकी वैचारिकता में भी उभर कर आता है, तभी वह अपने लेखन में निरंतर बहस करते हुए नजर आते हैं। आलोचक आनंद पांडेय उनकी इसी चेतना को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि “उन्होंने चेतना के चार स्तर – सामाजिक, पारिवारिक, मानवीय और ब्रह्मांड व्यापी बताए थे और साहित्यकार के लिए इन सभी स्तरों को साथ छूने की जरूरत रेखांकित की थी।” मुझे लगता है जब कोई साहित्यकार इन चारों स्तरों को एक साथ छूता है, तो ही उसकी प्रश्नानुकूलता उस व्याकुल दर्शनिकता का रूप धारण करती है, जिसे साही ‘अविराम बौद्धिक जिज्ञासा’ कहते हैं। पुस्तक का यह अध्याय हमें बताता है “साही के जीवन की राहें, उनकी चेतना और विचारों के प्रभाव में नित्य परिवर्तनशील रही क्योंकि उनके विचार, जीवन को परिभाषित करते थे। नई कविता के कवि, सिद्धांतकार, संपादक, प्रवक्ता के रूप में साही पुरानी पीढ़ी के छायावादी संस्कारों वाली कविता और कवियों से टकरा रहे थे।”

    इस पुस्तक के काव्यपरक अध्याय  ‘आशंकाओं के द्वीप में लघु मानव’ है।इसके नाम से ही यह बोध हो रहा है कि इसमें उनके विचारों और काव्य-लेखन में उनके द्वारा दी गई स्थापनाओं और और उनकी काव्यपरक विशेषताओं पर सम्यक विचार किया गया है। उनकी कविताओं पर समग्र रूप से टिप्पणी करते हुए आनंद पांडेय कहते हैं-“निरंतरता में पढ़ने पर यह कविताएँ स्वत: भावसूत्रों और कथासूत्रों में अंतर्गुम्फित हो जाती हैं।असंबद्ध और स्वतंत्र होते हुए भी ये मिलकर एक रचना हो जाती हैं।” बकौल साही “क्योंकि तमाम सवाल मिलकर,सिर्फ एक सवाल बन गए हैं।” उनका लेखन लघुमानव की बहस है तभी “अशोक वाजपेयी ठीक ही उन्हें बहस करता हुआ आदमी कहते हैं।” इस अध्याय में साही के कवि रूप का विश्लेषण किया गया है। आनंद पांडेय उन्हें ‘ट्रैजिक विजन’ के कवि के रूप में रेखांकित करते हैं।

    वे साहित्य को सांस्कृतिक संवाद और मनुष्य के मानवीय अनुभवों का एक स्वतंत्र फलक मानते हैं, जहाँ अनेक दृष्टिकोण, अनेक विचारधाराएँ और अनेक अनुभव आपस में टकराते हैं। इस टकराहट से नवीन अर्थो की निर्मिति होती है। उनका काव्य भी समाज के साथ एक जीवंत व सजीव संवाद स्थापित करता है। यह संवाद लघु मानव के अस्तित्व और उसकी सांस्कृतिक पहचान को भी अपने भीतर समाहित किए हुए हैं। वे सामाजिक और आर्थिक कारकों के पार जाकर, व्यक्तिगत अनुभवों के स्तर पर अपने काव्य की सर्जना करते हैं। साही की कविता का विश्लेषण करते हुए कविता मात्र पर अंतर्दृष्टिपूर्ण टिप्पणियां करते हैं। पांडेय कविता में स्मृति तत्व की महत्वपूर्ण भूमिका देखते हुए लिखते हैं,  “कविता का स्मृति से आवयविक संबंध प्रतीत होता है। मानो स्मृतियों के बिना कविता संभव न होती हो। कविता मानो मनुष्य का स्मृतिकोष हो और कवि निरंतर उस कोष उसमें कुछ ना कुछ जोड़ने वाला। इस क्रम में वह स्वयं स्मृति बन जाना चाहता है।” 

    साही साहित्यिक रचनाओं को उनके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संदर्भों में समझने के पक्षधर थे। वास्तव में साही, इस ट्रैजिक विजन से ही अपनी सभ्यता और संस्कृति को देख रहे हैं। उनका काव्य संसार उस सांस्कृतिक व राजनीतिक माहौल की सृजना करता है, जहाँ सत्ता का भय और आतंक व्याप्त है। उनके सत्ता-विमर्श का, इस अध्याय में सूक्ष्मता से विश्लेषण किया गया है। जहाँ आनंद पांडेय दो महत्वपूर्ण स्थापनाएँ देते हैं। पहली यह कि “साही का सत्ता-विमर्श कबीर की तरह सगुण नहीं निर्गुण है। वह बार-बार सत्ता की कल्पना करते हैं, जिससे लड़ना उनके लिए मानव मुक्ति की पूर्वशर्त और नैतिक दायित्व है।”

    दूसरी स्थापना यह कि “वे सभी सत्ताओं के साहित्य के प्रति व्यवहार को समान रूप से साहित्य विरोधी समझते हैं।”

    साही के काव्य-संसार में यही सबसे महत्वपूर्ण भी है कि यहाँ भी साहित्य को सदैव समाज से सम्पृक्त पाते हैं, क्योंकि इन दोनों के केंद्र में मनुष्य है लेकिन सत्ता मनुष्य को अपदस्त कर वहाँ केंद्र में अपना एकाधिकार स्थापित करना चाहती है। साही की मान्यता है कि साहित्य सहज मनुष्य को नहीं बल्कि देश कालबद्ध मनुष्य को पकड़ता है और परिभाषित करता है। इसका अर्थ यह है कि लेखक अपने समय के मनुष्य के मानस और हृदय को अभिव्यक्त करता है।

    इस पुस्तक का तीसरा अध्याय साही का ‘अलोचनापरक’ है– ‘साही की आलोचना का दर्शन शास्त्र।’ यह सच है कि साही आलोचना की आचार्य परंपरा से नहीं आते परंतु इसके बावजूद बकौल आनंद पांडेय “वे हिंदी आलोचना की आंतरिक सत्ता संरचना और दृष्टि को गहराई से प्रभावित करने वाले आलोचक हैं।” साही परंपरा के सतत पुनर्मूल्यांकन पर बल देते थे। आनंद पांडेय मानते हैं कि उनकी आलोचना में परम्परा के पुनर्मूल्यांकन का विस्तृत चिंतन हुआ है। वे लिखते हैं, “साहित्य परंपरा का सातत्य उसके मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया के द्वारा ही अविच्छिन्न रखा जा सकता है। रचना का पाठ स्वयं एक सतत् प्रक्रिया है। उसका मूल्यांकन और पुनर्मूल्यांकन आलोचना का क्षेत्र है। साही के पास पुनर्मूल्यांकन का व्यवस्थित दर्शन है।” 

    इसी के साथ इस अध्याय में साही की आलोचना के शिल्प पर भी लेखक अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। आज हिंदी साहित्य में प्रायः आलोचना की भाषा और शिल्प पर चर्चा नहीं की जाती लेकिन यह सच है कि, “आलोचना का भी एक शिल्प है। इसकी भी एक कलात्मक संरचना है। इस दृष्टि से जब हम साही की आलोचना को देखते हैं तो समझ में आता है कि उनकी आलोचना का स्वभाव व शिल्प ज़िरह का है।” उनकी आलोचना दृष्टि अधिक लोकतांत्रिक है। आनंद पांडेय लिखते हैं, “वे साहित्य में किसी वाद के प्रतिबद्ध वादी नहीं थे। वह मुक्त चिंतक या ‘फ्री थिंकर’ थे। यही प्रमुख कारण है कि अपने इन्हीं सिद्धांतों पर दृढ़ रहने के बावजूद भी साही नई कविता के कवि और समाजवादी राजनीतिक कार्यकर्ता होने के बाद भी अपनी विशिष्टता को बनाए रख पाते हैं।” वे अपनी आलोचना दृष्टि में भी व्यक्ति-सत्ता को महत्वपूर्ण मानते हैं और यही से वह उस विशाल दृष्टि को अर्जित करते हैं जिसका ‘रेंज’ मध्यकालीन साहित्य से लेकर समसामयिक साहित्य की व्याख्या और मूल्यांकन तक फैली हुई है। आनंद पांडेय लिखते हैं- “साही की आलोचना दृष्टि व लेखन वह मेल्टिंग पॉट है, जहाँ प्रगतिवाद, रूपवाद, अंतर्वस्तुवाद, व्यक्तिवाद और सामाजिकता के ध्रुवांत निरर्थक हो जाते हैं।” 

    इसमें कोई दो राय नहीं है कि आलोचक साही अपने समय के साथ-साथ समय के बाहर भी एक दृष्टा की तरह देख पाने की सभी योग्यताओं से लैस थे। साही की आलोचना दृष्टि का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि वे सामाजिक संवेदनशीलता और समाज के सामूहिक अनुभवों के प्रति भी जागरूक थे। वे साहित्य में समाज के विभिन्न वर्गों के स्वरों को शामिल करने के हक में थे और वे हाशिए की अस्मिताओं को केंद्र में पुनर्स्थापित करने के लिए भी कार्यरत थे। उनका यही दृष्टिकोण उनकी आलोचना को भी अधिक समावेशी बनाने के साथ ही उसमें पूरे समाज की अभिव्यक्ति के लिए संघर्षशील दिखाई देता है। आनंद पांडेय लिखते हैं, “साही की दृष्टि में आलोचना का कर्तव्य साहित्य की इस उपलब्धि को व्यवस्थित करके, चेतना को अगली चढ़ान के लिए तैयार करना है।” इसी समावेशिता और समग्रता के कारण उनकी आलोचना दृष्टि अधिक मानवीय संवेदनाओं से युक्त है, जहाँ व्यक्तिगत, सामाजिक, सांस्कृतिक और आत्मिक सभी पहलुओं का एक समान महत्व है। उन्होंने इस दृष्टि पर भी बल दिया कि साहित्य की आलोचना करते समय आलोचक को रचना के आंतरिक तत्वों, संवेदनशीलता, भाषा और भावनात्मक स्तर पर भी अपना फोकस रखना चाहिए। वे साहित्यिक रचना के कलात्मक पक्ष पर भी अपनी बात रखते हैं और उसके बौद्धिक पक्ष पर भी। यही व्यापक दृष्टि और सृजनात्मक क्षमता, उन्हें हिंदी साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और विशिष्ट स्थान दिलाती है।

    इस पुस्तक का चौथा और अंतिम अध्याय मलिक मुहम्मद जायसी और उनके काव्य पर आधारित है। आनंद पांडेय ने शीर्षक दिया है– ‘साही के जायसी और उनका काव्य’। साही जी ने जायसी के व्यक्तित्व पर चढ़े सूफीवाद के आवरण को उतारते हुए उन्होंने विशुद्ध कवि के रूप में देखा और उनका मूल्यांकन प्रस्तुत किया।जायसी को सूफी कवि मानने की धारणा हिंदी आलोचना में व्यापक रूप से फैली हुई थी। साही ने आलोचकों की इस धारणा का खंडन किया और उन्हें कवि के रूप में प्रतिष्ठित किया। इस अध्याय में आलोचक आनंद पांडेय ने साही द्वारा जायसी के काव्य पर स्थापित स्थापनाओं को अपने विचार का केंद्र बनाया गया है। हम सब जानते हैं कि “साही जायसी की व्याख्या में शुक्ल से बहुत आगे तक गए। उनकी अनेक स्थापनाओं से असहमति जताते हुए, उन्हें काटते हुए, अनेक महत्वपूर्ण स्थापना की।” इसके साथ ही आलोचक का यह भी मानना है कि “साही ने उसे समय के मध्यकालीन समाज और काव्य को समझने के लिए और समकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं के समाधान के लिए साही ने जायसी से ही वह विलक्षण दृष्टि प्राप्त भी की है।”

    साही जी ने जायसी को सम्प्रदाय और अध्यात्मवाद के घेरे से भी मुक्त किया।जायसी को प्रेम की पीर का कवि कहा जाता है लेकिन साही ने उनकी इस छवि को तोड़ा। उनके अनुसार ‘पद्मावत में जितना प्रेम है उतना युद्ध भी है।’ यह कुछ नवीन स्थापनाएँ हैं, जो लेखक ने इस अध्याय में साही जी के संदर्भ में जोड़ी हैं। वे साही की जायसीकृत आलोचना के दो ही केंद्र मानते हैं-“एक सूफी प्रसंग और दूसरा पद्मावत की कथा की ऐतिहासिकता और अनैतिहासिकता का प्रसंग।” लेखक ने अध्याय में समग्र रूप से साही की जायसी कृत वैचारिकी को केंद्र में रखकर, उस पर विविध कोणों से सोचा-परखा है। इस अध्याय में लेखक ने साही की जायसीपरक आलोचना का धैर्यपूर्वक विश्लेषण किया है और उन सीमाओं को रेखांकित किया है जो साही ने अपनी दृष्टि के वशीभूत होकर जायसी पर आरोपित की हैं।

    अंत में निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि साही की आलोचना समकालीन आलोचना परंपरा से भिन्न प्रतीत होती है और इसका प्रमुख कारण यह है कि वे साहित्य के मूल्यांकन व विश्लेषण के लिए किसी एक प्रचलित वाद या विचारधारा के अधीन नहीं थे।वे साहित्य के जरिए हमारी सौंदर्य दृष्टि और संवेदना का विस्तार करना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने अपने विचारों को किसी एक सैद्धांतिक ढांचे में ही कैद नहीं रखा।उन्होंने साहित्य में आलोचना को बहुत व्यापक नजरिए से देखा।यहाँ भी उन्होंने उसके आंतरिक शिल्प के पक्षों पर और मानवीय दृष्टि के साथ संस्कृति व समाज के परिवेश का भी विश्लेषण करने पर बल दिया। वे विचारधारा के आधार पर साहित्य के मूल्यांकन का घोर विरोध किया।साही स्वयं भी कहते हैं कि “उनका उद्देश्य जायसी का पुनर्मूल्यांकन और पुनर्व्याख्या नहीं है, बल्कि एक हद तक उधेड़बुन है।” यह पुस्तक विजय देवनारायण साही की एक मुकम्मल और प्रामाणिक अध्ययन की मिसाल है। इसमें समग्र रूप में साही जी की जीवनदृष्टि, इतिहासबोध और आलोचनात्मक चिंतन को समझने का सार्थक प्रयास किया गया है और इसके साथ ही जायसी संबंधी उनकी आलोचना पर भी लेखक ने स्वतंत्र रूप से चिंतन-मनन मनन किया है। उनके आलोचनात्मक और काव्यात्मक संघर्ष के साथ-साथ उनकी वैचारिक-राजनीतिक-साहित्यिक  सभी अहम् जानकारियाँ, यह पुस्तक अपने भीतर समेटे है।  साथ ही यह कृति ‘लघुमानव’ जैसे मानवीय प्रत्यय और उससे जुड़ी बहस के निहितार्थ को समझने के लिए बेहद जरूरी है। 

    “साही इसी सामाजिक राजनीतिक ढाँचे को कलात्मक ढाँचे में रूपांतरित करके मानवजीवन के प्रसंगों और मनोभावों को प्रकट करते हैं।इसी में उनकी सामयिकता भी है और लघु मानव की नियति की नित्यता। इसी में उनका यथार्थ है और स्वप्न।” ‘लघु मानव’ की इसी संकल्पना को विजय देवनारायण साही ने इतिहास, राजनीति, संस्कृति, समय और समाज के व्यापक संदर्भ में विश्लेषित करने का प्रयास किया है। ‘लघु मानव’ का अर्थ उसे आम नागरिक से है, जो समाज के मुख्य धारा में उपस्थित होकर भी अदृश्य रह जाता है। वह मात्र सत्ता पक्ष का मोहरा बनने पर विवश है। उस आम इंसान के संघर्ष, उसकी संवेदनाएँ और अस्मिता भी उतनी अधिक महत्वपूर्ण है जितनी की समाज के किसी खास व्यक्ति की। वे लघु मानव के इसी जीवन में आने वाले संघर्षों को साहित्य में शामिल करना चाहते है और आलोचक आनंद पांडेय की यह पुस्तक उनके इन्हीं सब प्रयासों का एक मुकम्मल आईना प्रस्तुत करती है। 

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    पुस्तक : आशंकाओं के द्वीप में लघुमानव : साही साखी

    पृष्ठ संख्या 160

    मूल्य 449

    प्रकाशन: सर्वभाषा ट्रस्ट, नयी दिल्ली।

    वर्ष : 2025

    समीक्षक-

    डॉ.शुभम् मोंगा

    सहायक आचार्य 

    J.V.M.College

    हरियाणा 

    9996884112

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