• कविताएं
  • कुमार पाशी की दस नज़्में

    आज उर्दू के प्रसिद्ध शायर कुमार पाशी की जयंती है। शंकरदत्त सचदेवा उर्फ़ कुमार पाशी का जन्म 03 जुलाई 1935 में बग़दाद-उल-जदीद (बहावलपुर, पाकिस्तान) में हुआ। तक़सीम-ए-हिंदुस्तान के बाद उनका परिवार दिल्ली आ गया। कुमार पाशी ता-उम्र दिल्ली में ही रहे, दिल्ली से ही उन्होंने ‘सुतूर’ नामक पत्रिका का संपादन किया, जो अपने वक़्त की मशहूर पत्रिका थी। बक़ौल प्रो. शमीम हनफ़ी “कुमार पाशी के लहजे पर शोर से ज़ियादा सरगोशी का गुमान होता है। ये सरगोशी लफ़्ज़ों से तस्वीरें बनाती हुई, आँखों के सामने रंगों की धनक बिखेरती हुई दिल में उतर जाती है। इस अंदाज़ ने उसके लहजे में ऐसा अनोखा पन भर दिया है कि नई शाइरी की सबसे तवाना, पुर-असर और मानी-आफ़रीं आवाज़ों के झुरमुट में हम उसे बा-आसानी पहचान लेते हैं।”कुमार पाशी नज़्मों के अच्छे शायर थे। आइये उनकी कुछ नज़्में पढ़ते हैं। उर्दू से इन नज़्मों का हिन्दी में लिप्यन्तरण किया है अभिषेक कुमार अम्बर ने- मॉडरेटर
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    गंदे दिनों का क़िस्सा ( एक तवील नज़्म)

    1.

    वो शहरों से आए थे
    तहज़ीब से आशना थे
    नफ़ासत से रहना उन्होंने ही हमको सिखाया था
    ऐसा किताबों में, मैंने पढ़ा है

    वो नारे लगाते हुए चल रहे थे
    फ़लक-बोस नारे
    मगर हमने ( जो दूर जाती हुई, चौड़ी सड़कों के दोनों तरफ़ हाथ बाँधे खड़े थे) कहा:

    ये बजा है, हमारे बुज़ुर्गों को तुमने
    नफ़ासत से रहना सिखाया था
    लेकिन
    हमारी तुम्हारी ज़बानें जुदा हैं
    हमारी ज़बाँ में भी इक-आध नारे लगाओ
    तभी हम
    तुम्हारे सफ़र के महूरत का इल्ज़ाम लेंगे

    2.

    ये सुनकर उन्होंने
    हमारी ज़बाँ में भी दो-चार नारे लगाए
    तो हम सब
    जवाबन बड़ी देर तक मुस्कुराए

    उसी रात हमने
    खुले आसमानों तले
    उन का स्वागत किया
    उनके सीनों पे जग-मग सितारों के तमग़े लगाए
    और उनकी विजय का
    सभी देवताओं से वरदान माँगा

    गई रात तक
    ये हसीं जश्न जारी रहा
    चन्द्रमाओं के प्यालों में हमने उन्हें
    जौ की मय पेश की
    जिसको पहले-पहल वो झिझकते हुए
    फिर मचलते हुए
    फिर फ़लक-बोस नारे लगाते हुए
    मिल के पीने लगे
    तब हमारे बुज़ुर्गों ने वक़्तों के साज़िन्दों ने
    साज़ अपने उठाए
    ख़लाओं में नग़मों के जुगनू हँसे
    रात अपनी लटें खोल कर रक़्स करने लगी

    और बड़ी देर तक
    वो हमारी हसीं बीवियों के
    थिरकते सितम्बू
    धड़कते उरोजों
    का गुणगान करते रहे
    फिर हमारी कुँवारी, जवाँ बेटियों को
    बग़ल में लिए
    दूर फैले हुए सायों में खो गए

    3.
    (और) वो शायद दिसम्बर का इक सर्द दिन था
    कि जब हमने कपड़े उतारे
    बदन पर स्याही मली
    और हाथों में अपनी लिखी सब किताबें उठाये
    हज़ारों की तादाद में घर से निकले
    तो सड़कों पे चलती हुई मोटरों में, बसों में
    से कितने ही लोगों ने फ़िक़रे उछाले
    मगर हम___कि शर्मिंदगी अपना तावीज़ था, बाज़ुओं पर सजाए
    उफ़ुक़ के इशारे पे घर छोड़ कर
    उन पहाड़ों पे पहुँचे
    जहाँ हम ने मिल कर खुद अपनी लिखी सब किताबें जला दीं

    हज़ारों बरस बाद
    शहरों में आए
    तो लोगों ने हम को बताया:
    हुकूमत हमारी है
    हम सारे मकतब तुम्हें सौंपते हैं
    तुम्हें फिर से बच्चों को तालीम देना पड़ेगी
    तुम्हें फिर से उन सब किताबों को लिखना पड़ेगा।

    (इख़्ततामिया)

    मगर एक दिन
    हमने सपने में देखा
    हमारी कुँवारी, जवाँ बेटियों ने
    जो बच्चे जने थे
    वो अब अपने हाथों में त्रिशूल लेकर
    हमारी ही जानिब चले आ रहे हैं
    तो शायद उन्होंने
    हमारी नई बेटियों (अपनी बहनों) के जिस्मों की बू सूँघ ली है।
    ============

    2.

    अंतिम संस्कार

    सूख चुकी है बहती नद्दी
    आँखों में अब नीर नहीं हैं
    सोचो तो कुछ
    कहाँ गए वो भगत, पुजारी
    सुब्ह को उठ कर
    जो सूरज को जल देते थे
    कहाँ गया वो चाँद सलोना
    जो लहरों में होंट चूम कर
    झूम-झूम कर
    आँखों की पुर-शोर नदी में लहराता था

    पानी से लबरेज़ घटाओ!
    जल बरसाओ
    सुंदर लहरो!
    आँखों की नद्दी को जगाओ
    जाने कब से
    बीते जग के फूल लिए हाथों में खड़ा हूँ
    सोच रहा हूँ , उन्हें बहा दूँ
    जीवन का हर दर्द मिटा दूँ।
    ========

    3.

    जनमदिन

    आसमाँ की वुसअतों में
    मेरी नज़रें
    ढूँढ़ती हैं, उस हसीं माज़ी को, जिसकी
    याद के साए भी घुलते जा रहे हैं अब हवा में
    और मिरी आँखों से ओझल हो रहे हैं लम्हा-लम्हा

    मैं पुराना-सा कोई इंसान हूँ, महसूस ये होता है मुझको
    मैंने हर सावन में धोया है बदन को
    और ये धरती मुझे रोज़े-अज़ल से जानती है
    याद है वो दिन मुझे अच्छी तरह से
    खोलते, चिंघाड़ते लावे के बे-पायाँ समंदर से उछल कर
    हम इकट्ठे ही गिरे थे

    और सदियों बाद होश आया, खुली जब आँख मेरी
    मैंने देखा:
    मैं तो सदियों पहले पैदा हो चुका था

    =========

    4.

    नई फ़स्ल के नाम

    ये मासूम पौदे
    ये धरती के बेटे
    जिन्हें दूध का एक क़तरा भी शायद मयस्सर नहीं है
    ये दिन-रात बेजान आँखों से
    अपने बदन की तरफ़ बेसबब घूरते हैं

    बदन___जिन पे लिपटा हुआ मांस कुम्हला चुका है
    जहाँ अनगिनत टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें
    ख़ुनक चाँदनी की तमन्ना में उभरी हुई हैं

    ये मासूम पौदे
    ये धरती के बेटे, कि जिन की रगों में चुभन अपने होने की
    दुख के समंदर को कुछ और गहरा किये जा रही है

    बहुत दूर___नीचे
    तहों में पड़े मोतियों की चमक मांद पड़ने लगी है

    ये मासूम पौदे
    अभी तक तसव्वुर की रंगीनियों के सहारे मुक़द्दर के अनदेखे रुख़सार
    सहला रहे हैं

    मगर इन को इतनी ख़बर भी नहीं है कि इन के सरों पर
    खुला आसमाँ है
    जहाँ धूप किरणों के धागे से इन के क़फ़न सी रही है।
    ==========

    5.

    उसका दुख

    वो मुन्तज़िर थी
    हज़ार सदियों से मुन्तज़िर थी
    मैं एक ज़र्रा
    हवा के रथ पर सवार, हँसता हुआ
    ख़लाओं में गुनगुनाता
    हज़ार-हा साल के सभी हादसों की गर्मी रगों में भर कर
    घने दरख़्तों के नर्म सायों में आके उतरा

    वो मुन्तज़िर थी
    मुझे थकन से निढाल देखा
    तो खिलखिलाकर लिपट गई मुझसे बे-तहाशा
    मिरे बदन को वो रंग बख़्शा
    कि ख़ुशबुओं में नहाईं पगडंडियाँ सुहानी
    वो नूर मुझको अता किया
    जगमगा गईं जंगलों की तनहाइयाँ पुरानी

    हज़ार सदियाँ गुज़र चुकी हैं
    मैं आज ख़ुद को डुबो चुका हूँ हयात के
    ख़ैर-ओ-शर में यकसर

    मगर वो अब भी पुकारती है मिरे लहू को
    मेरे जनम की वो मुन्तज़िर है
    हज़ार सदियों से मुन्तज़िर है।

    ============

    6.

    तश्ख़ीस

    ये सच है
    वो धरती के नश्शे की लज़्ज़त से वाक़िफ़ थे
    लेकिन
    ख़लाओं की सारी कथाएँ भी झूठी नहीं थीं

    मैं धरती का सब से पुराना मनुष
    वो अगर सारे मिलकर मेरे पास आते
    तो मैं उनको तरग़ीब देता:
    कि जाओ___लड़ो
    बादशाहत मिलेगी, हुकूमत करो

    फिर उन्हें वो कहानी सुनाता
    कि जिस में
    सुलगते हुए दिन की सारी तमाज़त
    सिमटते-सिमटते किरण बन गई थी

    और इस पर भी वो ख़्वाहिशे-मर्ग में
    अपनी उम्रें बता देने का ढोंग करते
    तो मैं उनसे कहता:
    समंदर का पानी पियो, धूप खाओ
    तुम्हारे लहू में नमक की कमी है।

    ========

    7.

    कनॉट-प्लेस

    आसमाँ पर प्यास से बे-दम सियह चीलों का ग़ूल
    टेढ़े-मेढ़े ख़ुश्क पेड़ों पर उतरती शाम-ए-ग़म
    एक-दूजे के गले लग कर सिसकती बिल्डिंगें
    घास पर टूटी हुई बीयर की ख़ाली बोतलें
    एक झाड़ी में फँसे रूमाल पर गंदा लहू
    कॉफ़ी हाउस में उधर ख़ारिश-ज़दा कुत्तों की बू।

    ==========

    8.

    सेल्फ़-पोट्रेट

    ये तय है तुम अगर उस शहर की तस्वीर देखोगे तो हरगिज़ ख़ुश नहीं होगे
    मैं जब ये बात कहता हूँ तो लफ़्ज़ों से परे जो मंज़रे-मौहूम है
    वो जाग उठता है
    धुएँ और गर्द में डूबी हुई तस्वीर मेरी
    मुझसे सदियों दूर से आवाज़ देती है

    मैं अपनी सैकड़ों रातों के मलबे के तले
    इक शहर को चलते हुए महसूस करता हूँ
    कोई कहता है:
    देखो किस क़दर बदबख़्त है ये शख़्स
    जो अपनी हदों को तोड़ कर गहरे धुंदलकों में रवाँ है एक मुद्दत से
    जिसे हँसना नहीं आता

    मैं डर जाता हूँ, ख़ुद से पूछता हूँ,
    अपने बच्चों को ख़ुशी का एक भी लम्हा नहीं दोगे?
    मगर उस वक़्त लफ़्ज़ों से परे जो मंज़रे-मौहूम है
    वो सरसराता है

    मेरी तस्वीर जो शायद पुरानी सी पुरानी है
    मिरे शानों पे सर रख कर सिसकती है
    मिरी नन्ही सी बच्ची मुझसे कहती है
    मिरे अच्छे से पापा!
    क्या तुम्हें हँसना नहीं आता?

    मैं अपने हाथ फैलाता हूँ, दिल ही दिल में कहता हूँ:
    ख़ुदा….मेरे ख़ुदा!
    मुझको भी तू अपने ख़ज़ाने से
    मिरी बच्ची की ख़ातिर ही सही, थोड़ी ख़ुशी दे दे
    ख़ुशी का एक लम्हा
    सिर्फ़ इक लम्हा ख़ुशी दे दे।

    ===========

    9.

    रिजेक्टेड

    बीवी अब उससे अक्सर झगड़ा करती है
    बच्चे भी अब उसका कहना नहीं मानते
    ग़ुस्सा उसको अब भी अक्सर आ जाता है
    लेकिन अब वो अंदर ही अंदर कुढ़ता है
    अब वो अपने आप को भी बूढ़ा लगता है।

    ==================

    10.

    तुम्हारे नाम लिखता हूँ

    तुम्हारे नाम लिखता हूँ: सितारे, तितलियाँ, जुगनू
    तुम्हारे रास्ते सीधे बनें
    साये हों उन पर जगमगाते आसमानों के
    खुलें तुम पर सुहाने राज़ अनदेखे जहानों के
    कि आँखों में तुम्हारी ख़्वाब हों ऊँची उड़ानों के

    तुम्हारे नाम लिखता हूँ: मसर्रत, आरज़ू, ख़ुशबू
    तुम्हारा एक इक दिन ख़ूबसूरत हो, मिसाली हो
    तुम्हारी कोई भी शब चाँद तारों से न ख़ाली हो
    सहर होते जो तुम उट्ठो
    तुम्हारे सामने फैले हुए गोशे हों फूलों के
    जो रात आए
    तुम्हारी आँख में सपने हों झूलों के

    तुम्हारे नाम लिखता हूँ वो शहरे-ख़ुशनुमा सारे
    कि जो देखे नहीं मैंने
    तुम्हारे नाम लिखता हूँ वो सारे ख़ूबसूरत लफ़्ज़
    जो लिक्खे नहीं मैंने

    तुम्हारे नाम उजली सुब्ह, रंगीं शाम लिखता हूँ
    बक़ा का जाम लिखता हूँ
    जो लम्हे सुख के हासिल हैं मुझे वो सब तुम्हारे नाम लिखता हूँ
    तुम्हारे नाम लिखता हूँ।

    (लिप्यंतरण : अभिषेक कुमार अम्बर)

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