जीवन जिसमें राग भी है और विराग भी, हर्ष और विषाद भी, आरोह और अवरोह भी

अनुकृति उपाध्याय के कहानी संग्रह ‘जापानी सराय’ को जिसने भी पढ़ा उसी ने उसको अलग पाया, उनकी कहानियों में एक ताज़गी पाई। कवयित्री स्मिता सिन्हा की यह समीक्षा पढ़िए- मॉडरेटर

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कुछ कहानियां अपने कहे से कहीं कुछ ज़्यादा कह जाती हैं । कुछ कहानियां जो निचोड़ ले जाती हैं हमारा कलेजा और जमी हुई साँसों की घनीभूत विचलन में हम महसूसते हैं जीवन को । जीवन जिसमें राग भी है और विराग भी , हर्ष और विषाद भी , आरोह और अवरोह भी ।

                   अनुकृति उपाध्याय का पहला कहानी संग्रह ” जापानी सराय ” ऐसी ही दस खुबसूरत और शानदार कहानियों का संकलन है । इन कहानियों को पढ़ते हुए स्वतः ही महसूस होता है कि यहाँ दृश्यों में भी हम ही बने हुए हैं और द्रष्टा भी हम ही हैं । जहाँ तमाम कहे जा चुके शब्दों के बीच एक ख़ामोश सी चुप्पी है । जहाँ बंदिशों से छूटने की एक उत्कट सी चेष्टा है । अनुकृति की सभी कहानियों में एक आत्मकथ्य है , एक आत्मनुभव , जो कथोपकथन में परिलक्षित  होते दिख पड़ते हैं । सारे किरदार इतने साधारण कि कहानियों के इर्द गिर्द घूमते हुए जाने कितनी ही बार आप खुद से टकरा जाएंगे ।
                         हालांकि मैं कहानी संग्रह की कहानियों को अक्सर एक ही रौ में पढ़ जाती हूँ , बावज़ूद इस किताब को पढ़ने के बीच मैंने कई ब्रेक लिये । यह ब्रेक इसलिए कि हर कहानी एक नये टोन,  एक नये फ्लेवर और नये ड्राफ्ट में सामने आती थी । और हर पहली कहानी का अंत मुझे उस मानसिक अवस्था में छोड़ जाता था जहाँ से सिर्फ़ आह या उफ़्फ़ करके निकल आना संभव नहीं था । हर अंत देर तक आपके जेहन पर दस्तक देता रहता और आप विचारों के व्योम में भटकते रहते । सारी कहानियों के केंद्र में होती एक स्त्री और हर स्त्री के हिस्से में एक अथक यात्रा । हर यात्रा का नया जोखिम , नया झंझावात और इनसे टकराते हुए खुद को पाने की ज़द्दोज़हद में संघर्षरत एक स्त्री ।
                            अब इसी संकलन की शीर्षक कहानी लीजिये । दो अजनबी अपनी पीड़ाओं को लेकर किस कदर आत्मीय हो सकते हैं , उसकी एक बानगी देखिये । ” दरअसल पीड़ा चिरंतन है , हम सब अपनी पीड़ा में एक से हैं , नंगे और निशस्त्र । तो उसे सहने में शर्म कैसी ? यह लो “, उसने अपनी जेब से टिशू का पैकेट निकाल कर बढ़ाया । ” तुम्हें इनकी ज़रुरत है । ” वह निश्चल रही , आँखों से आँसू गिरते रहे । चेरी ब्लॉसम, रेस्टरूम और शावर्मा ऐसे ही अनजाने लोगों की अनजानी कहानियां हैं , जिनकी स्मृतियां वक़्त की तारीखों में कैद हो गये ।
                     अब बात ” प्रेज़ेंटेशन ” की । कानपुर जैसे छोटे शहर से निकली मीरा दिल्ली से इंजीनियरिंग करके बिना शर्त शादी के बंधन में बंध जाती है । तमाम बेहतरीन कैरियर प्रोस्पेक्टस को दरकिनार कर रिश्तों को सहेजने की मशक़्क़त में उसने खुद की प्राथमिकता ख़त्म कर दी । बावज़ूद उसकी ज़िंदगी दुधारी तलवार पर चलने सी बनी रही । उसका प्रोफेशन भी कभी उसके लिये सलाहत भरा मसला नहीं रहा । परिवार और नौकरी के बीच संतुलन बनाती मीरा के मानसिक द्वंद को देखकर दिल और दिमाग भन्ना उठता है । अच्छी बात यह रही कि लेखिका ने अपनी स्त्री किरदार को कमज़ोर होने की हद तक संवेदनशील नहीं बनाया । उनकी चेतना हमेशा उनके बस में रही और यही व्यावहारिकता मीरा को दीपू और परिवार के स्वार्थ का शिकार होने से बचा पायी । प्रोफेशनलिज्म और मध्यमवर्गीय परिवार की चुनौती को झेलते हुए अपने लिये राह बनाने का जोखिम उठाया है स्त्री पात्रों ने और यही जिजीविषा इस किताब को खास बनाती है ।
                         अनुकृति के लेखन में एक किस्म की परिपक्वता है , विषयांतर के साथ साथ विषयों की ग्राह्यता है और मानवीय संवेदनाओं का सूक्ष्म अवलोकन है । सघन रिश्तों के बीच किरदारों की कसमसाहट को सहज ही महसूस किया जा सकता है । एक और कहानी है ” हरसिंगार का फूल “, जहाँ पीड़ा के बीच भी प्रेम सृजित होता है । मृत्यु की वेदना की छाया में मोना और विश्वा के बीच घटित होता प्रेम । हालांकि उस पीड़ा में प्रेम की इस मुखरता को कहने का जो साहस लेखिका ने किया , प्रश्नों के घेरे में उसे जस्टिफाई करना उनके लिये थोड़ा मुश्किल होगा । किंतु एक स्त्री मन और उसकी उद्दीप्त कामनाओं को एकदम से ख़ारिज भी नहीं किया जा सकता । फ़िर यहाँ मोना और विश्वा का प्रेम जुगुप्सा भी पैदा नहीं कर रहा , बल्कि उनकी आकांक्षाओं के आलोक में आपकी आत्मा स्वतः नम होती चली जाती है । रिश्तों के  समीकरणों की इतनी तीखी बानगी कि कहीं किसी कोने में आप खुद को अटका पायें मुक्ति की चाह में । मुक्ति,  जो देह और आत्मा के आख्यानों से मुक्त थी । मुक्ति जो यथार्थ की संश्लिष्टता की पुष्टि करती दिखती है ।
              कुछ और कहानियां हैं जिनका जिक्र आवश्यक हो जाता है , जैसे “जानकी और चमगादड़ “और “डेथ सर्टिफिकेट “। “जानकी और चमगादड़” में जानकी उन सभी युवाओं का प्रतिनिधत्व करती नज़र आती है , जो प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को लेकर सजग और गंभीर हैं । जबकि ” डेथ सर्टिफिकेट ” में कारपोरेट वर्ल्ड की  भयावहता है , जिसे लेखिका ने बड़ी कलात्मकता से कथ्य में पिरोया है । अनुकृति अपनी चमत्कृत भाषा शैली और सम्मोहक कथ्य के कारण भी अचंभित करती हैं । नई वाली हिन्दी ने हिन्दी का जितना नुकसान किया उतना किसी और ने नहीं । ऐसे में अनुकृति के शब्दकोश से निकले सुंदर , सुगठित और परिष्कृत हिन्दी के शब्द ताज़ा हवा के झोंके सी ताजगी लाते हैं । लेखिका का अनुभव उनकी क़लम में बोलता दिखता है । हर कहानी में एक नयी सी ठसक उसे औरों से अलग बनाती है । लेखिका रहस्यों का ऐसा अनूठा संसार रचती हैं , जिसमें अप्राप्य सा कुछ नहीं । जहाँ दुःख की अपनी परिभाषा है , पर सुख भी अबूझ नहीं । कालातीत की स्मृतियां भी जीवन सृजित कर सकती हैं और करती रही हैं । और जीवन के इसी छोर अछोर के बीच की उस यात्रा में हम सब संलग्न हैं ।

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