उभरेंगे रंग सभी: ‘मनमर्जियां’ में इश्‍क का मनोवैज्ञानिक शेड

हाल में रीलीज़ हुई फिल्म ‘मनमर्जियां’ पर पाण्डेय राकेश की टिप्पणी- मॉडरेटर

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‘प्रेम के मनोविज्ञान की यही सबसे खास बात है कि व्‍यक्ति अपने संभावित प्रेमी/ प्रेमिका में स्‍वयं के ‘कैरेक्‍टर से बाहर’ आने की संभावना देखता है।’

 

 

 

 

‘मनमर्जियां’ में अनुराग कश्‍यप अपनी विशिष्‍ट सिनेमाई भाषा में बात करते हैं। वह प्रेम की व्‍याख्‍या करने के किसी सायास बौद्धिक प्रयास के मारे नहीं हैं। पर, मनमर्जियां का फिल्‍मकार आम दर्शक के दिल और दिमाग में इस कदर घुसता है जिससे हर दर्शक खुद अपने प्रेम संबंधों के बारे में एक ‘कैथारसिस’ से गुजरने लगता है। एक दर्शक के रूप में हम अपने प्रेम संबंधों के अलग- अलग रंगों के बारे में कुछ जरूरी अहसास और इनसाइट लेकर निकलते हैं।

सिनेमा में जो ‘प्रेम का मनोविज्ञान’ है, प्रेम के बारे में उस सैद्धांतिक समझ को फिल्‍म के सिनेमाई अहसास से अलगाया नहीं जा सकता। ‘प्रेम का मनोविज्ञान’ सिनेमा की कहानी और इसके कलात्‍मक कलेवर मे रचा- बसा है। फिल्‍म की समीक्षा कलात्‍मक धरातल पर ही हो सकती है। पर, एक साधारण चर्चा के रूप में फिल्‍म की कहानी में प्रेम का जो मनोवैज्ञानिक पक्ष है, उसपर अलग से बात की जा सकती है।

‘काला ना सफेद है/

इश्‍क दा रंग यारा/

ग्रे वाला शेड है’।

इस गाने से शुरूआत होती है, और एक टोन सेटिंग हो जाता है। रूम्‍मी (तापसी पन्‍नू) और विकी (विकी कौशल) के संबंध में पैशन है। सेक्‍स की उफान मारती उर्जा है। फिल्‍म की रूचि पैशन को ‘ब्‍लैक’ या ‘व्‍हाइट’ में न देखकर इश्‍क के अनेक रंगों में एक रंग के रूप में देखने में है। रूम्‍मी और विक्‍की के संबंध में घनघोर आकर्षण और अटैचमेंट है, पर इस संबंध में अनेक विरोधाभास हैं। पैशन हर विरोधाभास का समाधान नहीं है, यानि यह प्रेम का अकेला रंग नहीं है। रूम्‍मी और विकी को समाज की कोई बासी चिंता नहीं है, तो ऐसा भी नहीं है कि वह संबंध समाज के प्रति कोई सोचा- समझा विद्रोह हो। यह वह प्रेम है जो ‘हो जाता है’। रूम्‍मी और विकी के व्‍यक्तित्‍व में समस्‍याएं हैं (व्‍यक्तित्‍व और उसमें समस्‍याओं का होना असामान्‍य नहीं बल्कि इंसानी है, व्‍यक्तित्‍व है तो समस्‍याएं हैं)। दोनों के लिए प्रेम और सेक्‍स व्‍यक्तित्‍व की जड़ समस्‍याओं के तनाव से फौरी राहत का एक माध्‍यम भी है। उनका प्रेम सेक्‍स के साथ जड़ है। उनका प्रेम उनकी आदत है। उनका प्रेम जीवन के बड़े फलसफे और बड़े निर्णयों पर पहुंचने में बार- बार असमर्थ होता है।

रूम्‍मी और विक्‍की दोनों के व्‍यक्तित्‍व में समस्‍याएं हैं। रूम्‍मी क्रोध में निर्णय लेती है, ‘नाटक’ खड़ा कर परिस्थितियों को मैनुपुलेट कर अपनी फौरी समझ के आधार पर निर्णय लेना और उस निर्णय को दूसरों पर थोप देना जानती है। मां- बाप के न होने से उसका अवचेतन व्‍यथित है और चेतन के स्‍तर पर वह इस बात का भी पूरा फायदा उठाती रहती है (जैसा कि वह बार- बार कहती है)। उसने अपनी वेदनाओं को अपनी प्रतिक्रिया और अपनी प्रतिक्रियाओं को इस असुविधाजनक समाज में अपना डिफेंस बनाया हुआ है। अपने इम्‍पल्सिव स्‍वभाव के कारण अपने परिवार के बिजनेस में योगदान देने में मिसफिट है, अपने प्रिय खेल हॉकी से दूर हो गई है। इसी तरह, विक्‍की गैर- जवाबदेह है। लाड़- प्‍यार में पला और बचपन से ही हर उस खिलौना जिसपर मन मचले उसे जिद करके पा लेने वाला बंदा है जो पा लेने के बाद अपनी रूचि को सस्‍टेन नहीं करता है। वह पाना जानता है, पर निभाना नहीं जानता है। अपने व्‍यक्तित्‍व की नामुनासिबत (inadequacies) को वह आड़े- तिरछे फैशन में छिपाता है। अपने पॉप- म्‍यूजिक प्रोफेशन में वह ज्‍यादा कुछ क्रिएट नहीं कर रहा, पर वह जगह अपनी नामुनासिबत के साथ जीने के लिए मुफीद है। पुन: यह कमजोरियां मानवीय हैं, ‘ब्‍लैक’ या ‘व्‍हाइट’ नहीं।

अपने- अपने व्‍यक्तित्‍व की उलझनों को लेकर रूम्‍मी और विक्‍की परस्‍पर ‘इंडल्‍ज’ रहना चाहते हैं। दुनिया का सामना करने में बनने वाला तनाव और एंक्‍जायटि उस जवां- उम्र में सेक्‍सुअल- एंक्‍जायटि बन जाता है, और सेक्‍स की उर्जा के साथ ड्रेन होता रहता है। यह भी प्रेम का एक रंग है। पर, किसी भी एक रंग की तरह यह अपने- आप में संपूर्ण प्रेम नहीं है। वह दोनों अपने संबंध को ‘फैसला’ के एक बिंदु पर ठहराव देने में असमर्थ हैं।

कमाल की बात यह कि उनके व्‍यक्तित्‍व की यह कमजोरियां सिक्‍का का एक पहलू है। उसी सिक्‍का का दूसरा पहलू यह है कि उनका व्‍यक्तित्‍व बहुत पैशनेट, बहुत फोर्सफुल और समाज की छोटी- मोटी जड़ताओं में बंधने से पहले ही उसे तोड़ देने में सक्षम व्‍यक्तित्‍व है। समाज से डिफेंस में ही सही, दुनिया को ठेंगा दिखाने की काबिलियत उनके सेक्‍स को दुनियावी चिंताओं से मुक्‍त बनाती है, कम से कम चेतन के स्‍तर पर, और इसलिए सेक्‍स गतिशील है।

सिनेमा की कहानी में हर जरूरी पड़ाव पर दो बिलकुल एक- सी दिखने वाली लड़कियां उभरती हैं, रूम्‍मी को तेज नजरों से सहानुभूति से घूरती रहती हैं, नाचती और गाती हैं। वह दोनों प्रतीक हैं रूम्‍मी के व्‍यक्तित्‍व के द्वंद की। वह इन दो सीमाओं के बीच झूलती है, उसका स्‍वयं के बारे में इनसाइट और नियंत्रण अभी कमजोर है। रूम्‍मी ने अभी अपने व्‍यक्तित्‍व के दो छोरों का समान अधिकार से उपयोग करना नहीं सीखा है। वह विद्रोहिनी सी दिखती है, पर अभी उसका विद्रोह अन- गाइडेड मिसाइल है। वह अभी अपने ही व्‍यक्तित्‍व के दो छोरों के बीच अपनी ही स्‍वतंत्र इच्‍छा से आवाजाही करने वाली बनी नहीं है। इम्‍पल्‍स अभी उसका ड्राइविंग फोर्स है। पर, प्रेम एक यात्रा है जिससे गुजरकर वह अपने जीवन पर अपने नियंत्रण की संभावनाओं को एक्‍सप्‍लोर कर रही है। वह इस आग में जल जाने या इससे तप कर बाहर निकलने की दो संभावनाओं के बीच झूल रही है।

विक्‍की के गैर- जवाबदेह व्‍यवहार से कोफ्त होकर क्रोध और इम्‍पल्‍स में जब वह इस बात के लिए राजी होती है कि वह ‘कहीं भी’ शादी कर लेगी तब उसके जीवन में रॉबी (अभिषेक बच्‍चन) आता है। रॉबी ऊपर से पूरा ‘मैरिज मैटेरियल’ है। रूम्‍मी मजाक में उसे राम जी कहती है। पर, उसके व्‍यक्तित्‍व के भी शेड्स हैं। वह अपनी ही ‘शराफत’ में कैद है, रूम्‍मी मजाक में कहती है तुम क्‍या अपने ‘कैरेक्‍टेर से बाहर’ नहीं आते। पर, सच्‍चाई यह है अपनी तथाकथित ‘शराफत’ से बाहर निकलना रॉबी के अवचेतन की मुख्‍य चाह है। रूम्‍मी में उसे एक ऐसी लड़की दिखती है जो उसे उसके उदास जीवन से बाहर ले जाएगी और जीवन में जरूरी उत्‍तेजनाएं भर देगी। वह अपने इस ड्राइव के कारण रूम्‍मी की ओर आकर्षित होता है। और आक‍र्षित होने के बाद उसका प्रेम अवसरवादी भी बनता है, जब वह पशोपेश में पड़ी हुई रूम्‍मी के साथ शादी कर लेने में देर नहीं करता। उसके इस प्रेम में उसका अवसरवाद भी क्षुद्र होकर नहीं उभरा है। फिल्‍मकार ने कहना चाहा है कि ‘प्रेम (और युद्ध) में सब जायज’ भी प्रेम का एक रंग है। पर, रॉबी मूलत: स्‍व– केंद्रित नहीं है। रॉबी में एक ठहराव है, वह अपने प्रेम को समानता, सहानुभूति, होश और जवाबदेही के साथ जीना जानता है। रॉबी अपने एक पुराने प्रेम की टीस से और अपने द्वारा अपने सबसे प्‍यारे दोस्‍त को दुर्घटनाग्रस्‍त कर अपाहिज कर देने के कारण उदासी को अपना स्‍वभाव बनाए बैठा है और जिंदादिल रूम्‍मी के सहारे अपने इस ‘कैरेक्‍टर से बाहर’ निकलना चाहता है। रॉबी के व्‍यक्तित्‍व में उदासियों के बावजूद जो मूल्‍य– गर्भित ठहराव है वह रूम्‍मी के लिए आईना है जिसमें वह अपने बेचैनियों को देखती चली जाती है और रॉबी के साथ एक जुड़ाव में जुड़ती चली जाती है। प्रेम के मनोविज्ञान की यही सबसे खास बात है कि व्‍यक्ति अपने संभावित प्रेमी/ प्रेमिका में स्‍वयं के ‘कैरेक्‍टर से बाहर’ आने की संभावना देखता है।

पुराने संबंध की आदत से निकलना रूम्‍मी और विक्‍की के लिए आसान न था। रूम्‍मी के अनिश्‍चय के साथ कोप करना रॉबी के लिए आसान न था। प्रेम के अनेक रंगों में आदत और ऑब्‍सेशन तथा ईर्ष्‍या और असुरक्षा भी कुछ अवश्‍यंभावी रंग हैं।

न तो पैशन पर टिका संबंध और न ही विवाह अपने- आप में प्रेम में ठहराव की गारंटी है। एक स्‍थायीत्‍व के लिए प्रेम बराबरी, सच्‍चाई, फैसला, निष्‍ठा और जवाबदेही की मांग करता है। नाटकीय तनावों के क्रम में रूम्‍मी विक्‍की की आदत से बाहर निकलती है और रॉबी उस शादी को तोड़ देता है जिसके भीतर ‘सच’ बचा नहीं रह पा रहा था। तीनों पात्र फिर एक समान धरातल पर खड़े होते हैं, एक दूसरे से पर्याप्‍त डिटैच। अब रूम्‍मी के सामने नए इनसाइट हैं। अब रूम्‍मी का अपने निर्णयों पर अधिक कंट्रोल है। रूम्‍मी अपने विरोधाभासों से बाहर निकलती है और अपने जीवन के बारे में साफ निर्णय लेने लगती है। जवाबदेह बनने के दबाव से गुजरते हुए विक्‍की भी अपने संबंध के नशे से बाहर निकलता है और फिलवक्‍त अपने जवाबदेह बनने की राह को अधिक जरूरी समझकर मात्र उसी पर चलने को तैयार हो जाता है। वह संबंध जो था जैसा था खूबसूरत था और दोनों पात्रों के लिए वह किसी ‘गिल्‍ट’ का आधार न होगा। रूम्‍मी के सामने रॉबी के साथ अपनी संभावना फिर- से देखने का विकल्‍प खुला रहता है। रूम्‍मी को अपने बचपन, अपने स्‍वभाव, अपने माता- पिता, अपनी हॉकी सबकी स्‍मृति फिर- से ताजी होने लगती है।

वह अनुराग कश्‍यप जिसपर ‘गंदा’ होने का आरोप लगता है वह अक्‍सर अपनी फिल्‍मों में एक साफ आईना के तरह हमारे सामने होता है और  हमें घुमा- घुमाकर अपना चेहरा देखने का अवसर देता है। मनमर्जियां में भी ऐसा ही हुआ है।

 

पांडेय राकेश

लेखक पब्लिक- पॉलिसी- ट्रेनिंग और लाइफ- कोचिंग क्षेत्रों से संबंध रखते हैं। स्‍वतंत्र लेखन भी करते हैं।   

 

 

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