‘उत्तर पैग़म्बर’ जीवन, प्रेम और राग का अद्भुत समागम है

राजकमल से प्रकाशित अरूण देव के कविता संग्रह ‘उत्तर पैग़म्बर’ पर यह टिप्पणी राजीव कुमार की है। राजीव जी इतिहास, साहित्य, सिनेमा के गहरे अध्येता हैं। लिखते काम हैं लेकिन ठोस लिखते हैं- मॉडरेटर

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अरुण देव के “उत्तर पैगम्बर”  की खुली उद्घोषणा है,

“वह कोई कातिब नहीं कि  आखिरत में  तुम्हारा हिसाब किताब करेगा/ न जन्म के पहले कुछ था न मृत्यु के बाद कुछ है”

प्रेम और राग के कवि अरुण देव का काव्य संग्रह, ” उत्तर पैगम्बर ”  जीवन की विराटता और क्षणभंगुर निकष के आयाम पेश करते हुए शाश्वत सत्य की सूत्र युक्तियों की तरफ जाता हुआ दिखता है। परन्तु पूरा संग्रह जीवन, प्रेम और राग का अद्भुत समागम है। कवि प्रेम और राग का बड़ा चितेरा बनकर उभरा है। प्रेम का अंकुरण और छीजता हुआ प्राण – जल का ग्रहण, आखिर रिसती हुई बूंदों की चाह में और फिर प्रेम और राग का बिरवा मानव मात्र की संस्तुति में अर्पण, उत्तर पैगम्बर की काव्य यात्रा के सुखद कंचन मणि उपहार हैं।

हर रंग की कवितायें — धर्म , इतिहास, प्रेम, पश्चाताप, सर्वजन के लिए अप्रतिम राग, ज्वलंत मानवीय मुद्दे और सार्वभौमिक सत्य की परतें उधेड़ते हुए, नए बिंबों और रूपकों की रचनाधर्मिता का निर्वहन अधुनातन काव्य कसौटियों पर करते हुए, संग्रह में संकलित की गई हैं। काव्य भाषा की बड़ी बाजीगरी से बचा गया है अवसाद की गहरी खाइयों के किनारे तक जाकर लौटती हैं रचनाएं पर सारे सत्य का दर्शन कराती हुई। जो ठहरा है युगों से सवाल बनकर उसका त्वरित समाधान देने की कोशिश नहीं करती कविता। अदालत नहीं लगाती, आरोप पत्र नहीं बांटती और न्यायाधीश के तर्कहीन न्याय का अतिरेक नहीं, बल्कि  मनुष्यता के साथ किए जा रहे अपराध आप चुप रहते हुए समझ सकते हैं, अपने ऊपर प्रश्न चिन्ह उठाते हुए कि ये वर्तमान  सामाजिक , वैधानिक तरकीब का हिस्सा तो हैं ही।

कवि के प्रेम का लक्षित वह छोटा सा जीव भी है जो काव्य भूमि में अब तक सिर्फ उद्धृत होता रहा है लघुता के लिए। राग की परिधि यहां फैलती है और कीट को उसके स्थान दिए जाने की इच्छा प्राणी मात्र से प्रेम के रूप में अाती है।

“और यह भी कि/ यह धरती सिर्फ तुम्हारी नहीं है/आकाश, समुद्र और ज़मीन साझे के है/ उस पर रहनेवाले छोटे से छोटे कीट की भी यह उतनी ही है”

मानव के आरोहण की कथा पत्थर – गाथा है। पठारों ने उसे पाला , पहाड़ों ने संघर्ष की श्रृखलाएं तैयार कराई और शिखरों ने ऊंचे आदर्शों की तरफ़ बढ़ जाने के उद्देश्य दिये। मानव के विकास की कथा पत्थरों के परूष युगांतर की भी कथा है। पत्थरों ने युगों से तराशा है मानव को, उसे समय की चाल के आगे कठोर होना सिखाया।

“पत्थरों की मुलायम और नरम छांह में /खिले हैं संतातियों के फूल जैसे होंठ/ पत्थरों के पास आरक्त तलवों की लाली है/ पत्थरों ने अपनी गोद में बिठाया है बाल संवरती सुंदरियों को/ पत्थर की शैया पर पूर्वजों की भर आंख रातें हैं”

प्रेम उस गंध से जो फूल के मरने और झर कर खत्म हो जाने से पहले तक विद्यमान है और अपनी इस जिजीविषा से कौतूहल पैदा करता है। खुशबू का स्पर्श संभव नहीं, स्मृतियां उसका आकार आभासी मस्तिष्क शिराओं में तय करती हैं। घ्राण शक्ति अपने रूढ़ बिंबों से अलग एक इशारे का प्रतिमान सिराजती हुई।

“मरते हुए फूल में अभी भी बची हुई गंध ने जैसे पूछा हो/ मेरी खुशबू का तुम्हें ज़रा भी इल्म है?/ तुम्हारी कोशिका में मेरे एहसास का कोई इशारा भी कहीं बचा है”

प्रेम के ऐलान और प्रेम में होने के निष्कलुष भाव जो दावे पेश करते हैं अरुण देव की कविताओं की जान हैं। छोटी प्रेम कविताओं ने, छोटी प्रेम युक्तियों ने कवि की मानसिक विराटता का भव्य परिचय दिया है। आंखें जब खुलें अपने अहंकार की ऊंचाइयों के प्रतिकार में तो प्रेम सामने हो, मंदिरों के मंत्र जब अस्पष्ट हों, कान ग्रहण कर सकने में अक्षम दिखे तो सामने ईश्वर रूप में प्रेम हो। जो अभीष्ट था वह प्रेम था जिसके हेतु जीवन था वह प्रेम था। मेरा सारा अस्तित्व प्रेम का है। जीवन की सारी बानगी प्रेम के लिए ।

‘मुझे कभी मिलना तो इस तरह मिलना जैसे कोई स्त्री मिलती है किसी से”——-“तुमसे आज बात हुई/ आज बस यही एक बात हुई”

प्रेम की पराकाष्ठा के दुर्गम उदाहरण भरे पड़े हैं कई कविताओं में। यह विरहजनित प्रेम नहीं है, प्रेम सर्वाधिक  महत्त्वपूर्ण जीवन के भाव रूप में है यहां।   काव्य – संग्रह प्रेम का उत्सव है। कविताई  अपने उच्चतम संदर्भों को समेटे हुए। कहीं कवि दिखता नहीं कि प्रेम की गूढ़ संरचना पर सायास कविता कर रहा हो, प्रेम अचानक कहीं से भी मुखर हो उठता है। राग की किसी भी घाटी से आप गुजरें प्रेम का रंग पोर पोर में विद्यमान। पलक झपकते ही प्रेम की शिराओं में लिपटी पंक्तियां सजीव आकार ग्रहण करने लगती हैं।

“अगर मैं गिरा तो प्रेम में गिरा/ झुका तो सामने प्रेम खड़ा था/ अगर मैं अनैतिक हुआ तो प्रेम में हुआ/समझौते हुए होंगे प्रेम बचाने के लिए/ चालाकियां प्रेम पाने के लिए”——–“होंठ जहां जहां छूते हैं वहीं खिल जाते हैं फूल/ यह को महकता हुआ फूल है/ वह तुम्हारी देह में कहां खिलता है”—— “वह कौन सी ऐसी जगह है जहां मूंद जाती हैं आंखें”———“तुम्हें पाने की मेरी बेचैनी मेरी उम्र जितनी लंबी है/ जैसे छलकता है पानी सागर के लिए”

“मेरी आवाज़ के टुकड़े गिर रहे थे अर्थ की छाया में/पुकार के वैभव से मैंने जाना शब्द बिना अर्थ के भी रहते हैं “———-“दुर्गम में खुलनेवाले फूलों के रंग गंध खिलने से पहले ही/ चुरा लिए गए हैं”———” तुम्हारी नींद के बाहर/ धरती का बदन असंख्य घावों से टीसता रहता है”———-“तुम्हारे सुख में हंस न सकूं/ रो न सकूं तुम्हारे दुख में/ तो बन जाऊं भारी पत्थर”——–“हवाओं में नमी लिए / मेघ की तरह आओ”

पर्यावरण जागतिक चिंता में शामिल है। हिंदी साहित्य के मनीषी कवियों ने ग्रंथों में प्रकृति और इससे राग की विशद व्याख्याएं की हैं। यहां पर्यावरण की चिंता जीवन राग के साथ अनुस्यूत है।

“धरती पर को कुछ भी कहीं/ दुर्गम अलक्षित मनोरम थानष्ट हो रहा है”——“अगर नदी तुम्हें विमोहित नहीं करती/ तो तुम्हारी नाव तुम्हें कहीं नहीं ले जाएगी/ गर वृक्ष तुम्हें कृतज्ञता से नहीं भर देते/ तो तुम्हारे अंदर एक कुल्हाड़ी छुपी है”——-“रात रानी की खुशबू /मेरे आंगन में बिखरी है/ ओस उन्हें हर सुबह ताज़ा रखती है”

बौद्ध दर्शन में जीवन कोलाहल और अंधेरों के निषेध में है, हिंसा का तीव्र प्रतिकार है और दीये की रोशनी पूज्य है। बौद्ध विहारों ने शांत , प्रशमित दीये प्रदान किए भारतीय वांग्मय को। ये अंधेरे दूर करने के महज प्रतीक नहीं, शांति औरज्ञान की लौ रूप में भी हैं। कमल के फूल सदियों मानव जीवन को रंग से भरते रहे और सुभाषित भी करते रहे।

“अनेक दीये / अंधेरे से बाहर आते हुए”——– “इसी धरती पर सूफी फूल की तरह खिले / जिसकी सुगंध आज भी बिखरी है हवाओं में”

प्रेम और राग का एक रूप जगत की सर्वकालिक चिंतना का भी है। जीवन की सामान्य गति अपनी निस्पृहता में, अकंपन में प्रेम और राग का धुन छेड़ती है। जीवन शनै: शनै: चलता रहता है। छोटी छोटी पंक्तियां गूढ़ अर्थ समेटे बिखरी पड़ी हैं पूरे संग्रह में:

“पंचायतें थीं प्रेम के प्रतिशोध में/ नफ़रत की आंधी में कुछ दिख नहीं रहा था”——-“मेरी रातों में/ तुम्हारी उजली हंसी फैली है”——-“जल में कामनाओं का घेरा बनता बिखरता है/ यह सुलगती हुई पीर मुझे ज़िंदा रखती है”——–“ज्वर की तरह चढ़ता है अकेलापन/ तुम्हारे मिलने से टपने लगता है/इसकी कोई दवा नहीं”———-“चिड़िया ने तैयार किया है / घास फूस तिनकों का अपना घोंसला/ उस उमगते शिशुओं की चिंता रहती है/ कहीं गिर न जाएं”———“पूर्णिमा पूर्णता का संतुलन है/ अमावस अपने को खो देने की गरिमा”——–“उदास स्त्री को मिले उसका व्यतीत प्रेम/ प्रेम को मिले उसकी आतुरता”

कवि अपने प्रेम के निकष में  जो भी बात कहता है शांत और सीधी,  अतिशय भारी शब्दों या  द्युतिमान प्रतीकों का सहारा नहीं लेता।  मानो कह रहा हो बासी जितना भी लगे तुम्हें मेरे प्रेम का कोलाहल, इसे मेरी संवेदनाओं ने रोज जन्म दिया है। ये सब अभी के उपजे है , ताज़े हैं।

“मेरे पास सिवाय चाहत के और कुछ नहीं है”——–” वह वनस्पतियों की जड़ों में बैठे पानी को ले आया घरतने से लिपट भीगता रहा/ कवच के बीच मीठे जल से वह बचा रहा/ फुनगी से झरते मद से भरे उसने अपने कटोरे”———-“बच्चे जब कोई प्रश्न करते हैं खुश होता हूं/ प्रश्न अभी बचे हैं”

दमनकारी शक्तियां जो राजनीति की दिशा तय करती हैं और उसी जनता पर शक्ति का इस्तेमाल करती हैं, जो चुन कर उसे भेजती है। नैतिकता जिस जीवन में और जहां सबसे जरूरी है वहां नैतिकता का विकल्प है ही नहीं।

(पेपरवेट) ” भार से वह/ कागजों को कुचलता नहीं कभी भी/ ताकत की यह भी एक नैतिकता है।”

विरह की झलक मात्र है कुछ जगह और जहां भी है एक अचानक विस्मय का पूरा शास्त्र लेकर बहुत ही कम शब्दों में।

“क्या उसने शेर को बताया उसका जंगल / चिड़िया को उसकी उड़ान/ नदी को उसकी गति”———“क्या तुमने कभी खरगोश को प्रार्थना में झुके देखा है/उसकी दौड़ ही प्रार्थना है”——“उसकी प्रतीक्षा नहीं अब किसी को/ उसका प्रेम कुछ दिन उसकी राह देखता रहा/ और फिर विरह की सड़क की दूसरी तरफ चला गया”

व्यथित प्रेम, खाक के नीचे दबा जीवन राग और अंतहीन प्रतीक्षा का आभास अरुण देव की कविताओं में है।

“किसने लिखी है इसकी पटकथा?/ यह मृत्यु का धूसर संगीत जो हर जगह बज रहा है/ किसका है यह वाद्य”

“सुजान” कविता के जिक्र के बगैर उत्तर पैगम्बर का पाठ पूरा नहीं हो सकता। मुहम्मद शाह रंगीला का शासन काल लाल कुंवर और सुजान का युग , मुगल कालीन भारत का घनघोर अवनति काल जब पायल और तबला की थाप  पर राज दरबार में सेना नायकों और सिपहसालारों के चेहरे पर स्मिती और छटा बिखरने लगी। ध्रुपद और खायाल के आविर्भाव और संवर्द्धन का युग, शायरों , वेश्याओं और सांस्कृतिक दरवेशों का युग, पेंटरों और तबालचियों का युग इसी युगमें घनानंद और सुजान का प्यार परवान चढ़ता है। कवि इस अलोम हर्षक त्रासदी को बहुत सुंदर ढंग से उकेरते हैं। यह अनूठी कविता बहुत दिनों तक याद की जाती रहेगी। प्रेम और त्रासदी का अप्रतिम चित्रण इस कविता को शिखर प्रदान करता है।

सुजान घनानंद की प्रेमिका थी और कई रकीब एक साथ इश्क़ फरमाते थे। घनानंद प्रेम में त्याग लिए अमर हुए। लाल कुंवर आक्रांता और विजेता नादिरशाह की रखैल हो गई। कोहिनूर लाल कुंवर के इशारे पर ही मुहम्मद शाह की पगड़ी से नादिरशाह को प्राप्त हुई।

एक कालानुक्रम की छोटी विसंगति सी दिखती है यहां। मुगल बादशाह मुहम्मद शाह  अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण से नहीं मारा गया। बल्कि नादिरशाह के आक्रमण, 1739, ने मुहम्मद शाह ही नहीं हिंदुस्तान की ही कमर तोड़ दी। अहमद शाह अब्दाली पहली बार 1748 में आक्रमण करता है जिसका सामना मुहम्मद शाह की सेना सफलतापूर्वक सरहिंद के युद्ध में करती है। अपने पहले आक्रमण में अब्दाली दिल्ली नहीं आया था।

ध्रुपद और खयाल गायकी और पेंटिंग का अंतिम हिस्से का उत्कर्ष काल 1739 से 1743 के बीच का है जो नादिरशाह के आक्रमण के बाद का है। हां,  कविता में वर्णित खयाल का अवसान मुहम्मद शाह की मृत्यु,1748, के साथ ही हुआ। इसका पुनरुद्धार 1806 के बाद अकबर द्वितीय के शासन काल में होता है।

परन्तु इतिहास का यह वर्णन अवांतर है , जो कविता को शीर्ष तक लेे जाने में मदद करती है । “उत्तर पैगम्बर” काव्य – संग्रह हिंदी साहित्य के लिए  बड़ी संपदा है।

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