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  • लेख
  • औपनिवेशिक ज्ञानकांड का प्रतिरोध और रामविलास शर्मा का चिंतन


    अभिषेक कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में ‘19वीं सदी का हिन्दी नवजागरण: औपनिवेशिक प्रभाव या आंतरिक गति का विकास’ विषय पर शोध कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है उनका एक लेख जो उन्होंने रामविलास शर्मा के अध्ययन-लेखन को आधार बना कर लिखा है- अनुरंजनी

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    ‘औपनिवेशिक ज्ञानकांड का प्रतिरोध और रामविलास शर्मा का चिंतन’

    हिंदी क्षेत्र की जनता की वैचारिक ज़रूरतों को पूरा करने का बड़ा भारी काम रामविलास शर्मा ने किया। उन्होंने समूचे हिंदी साहित्य के इतिहास के महत्वपूर्ण कवियों और लेखकों पर लिखा। कई महत्वपूर्ण लेखकों को स्थापित करने में उनका योगदान अन्यतम है। रामविलास शर्मा हिंदी में संभवत: रामचंद्र शुक्ल के बाद एकमात्र ऐसे आलोचक हैं जिनकी स्थापनाएं हिंदी अकादमिक दुनिया में मौलिकता की मिसाल हैं। रामविलास शर्मा का संपूर्ण जीवन एक साधक की तरह है। उन्होंने ‘निराला की साहित्य साधना’ लिखते हुए न केवल निराला के गुरुतर  व्यक्तित्व को सामने रखा अपितु अपनी कठोर साहित्य साधना से खुद को भी वैसा ही प्रस्तुत किया। रामविलास शर्मा ने हिंदी साहित्य, इतिहास, दर्शन, भारतीय संस्कृति, संगीत, कला-स्थापत्य, शरीर विज्ञान, मार्क्सवादी दर्शन इत्यादि पर गंभीरतापूर्वक विस्तार से लिखा। तकरीबन 200 से अधिक पुस्तकें उन्होंने लिखीं। इसे देखते हुए उनका जीवन भी निराला की साहित्य साधना की तरह ही एक साधना प्रतीत होता है। उनकी कई बड़ी-बड़ी पुस्तकें न केवल हिंदी साहित्य की वरन् समूचे भारतीय साहित्य की धरोहर हैं। उन्होंने जिन विषयों पर लिखा वे ऐसे विषय थे जिन पर हिंदी में लेखन कम होता रहा। अंग्रेजी भाषी बौद्धिकों से इस तरह की अपेक्षा की नहीं जा सकती थी और ना ही वे इसके लिए खरे उतरे। लेकिन रामविलास शर्मा ने इस बौद्धिक अकिंचिनता से हिंदी क्षेत्र की सामाजिक चेतना के निर्माण का आधार प्रस्तुत करते हुए हिन्दी क्षेत्र के समाज की जरूरतों को पूरा किया।

    साहित्य की सेवा करते हुए भारतेंदु हरिश्चंद्र, भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएं, निराला, निराला की साहित्य साधना, प्रेमचंद, प्रेमचंद और उनका युग, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण, आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिंदी आलोचना, नई कविता और अस्तित्ववाद, परंपरा का मूल्यांकन जैसी पुस्तकें उन्होंने लिखी। ये पुस्तकें हिंदी साहित्य के लिए प्रमुख अवधारणात्मक पुस्तकों के रूप में देखी जाती हैं। इसके अलावा उन्होंने इतिहास, संस्कृति, दर्शन तथा भाषा दर्शन पर भी पर्याप्त लिखा। भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद, भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश, भाषा और समाज, ऐतिहासिक भाषा विज्ञान और हिंदी भाषा, मार्क्स और पिछड़े हुए समाज, भारतीय साहित्य की भूमिका, भारतीय साहित्य के इतिहास की समस्याएं, आज के सवाल और मार्क्सवाद, भारतीय नवजागरण और यूरोप, पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद, इतिहास दर्शन, मानव सभ्यता का विकास, गांधी, अंबेडकर और लोहिया जैसी पुस्तकें लिखकर उन्होंने बता दिया कि हिंदी की वैचारिक दुनिया में वे पहले ऐसे विद्वान हैं जिन्होंने भारतीय संस्कृति, साहित्य और इतिहास से जुड़े हुए ऐसे किसी भी विषय पर लिखा, जिसका जुड़ाव भारत की जनता और उसके सरोकार से है।

    डॉ रामविलास शर्मा को हिंदी साहित्य के समूचे इतिहास के कालखंड में जो कवि और लेखक पसंद आए उन पर उन्होंने भरपूर लिखा। तुलसीदास, भारतेंदु हरिश्चंद्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, निराला, प्रेमचंद और आचार्य रामचंद्र शुक्ल उन्हें खास पसंद थे। जैसे भारतेंदु हरिश्चंद्र के लेखन में सामंतवाद और साम्राज्यवाद विरोध धुरी के रूप में दिखाई पड़ता है, उसी तरह रामविलास शर्मा के चिंतन में भी सामंतवाद और साम्राज्यवाद विरोध केंद्रीयता लिए हुए है। 1857 की क्रांति से रामविलास शर्मा को विशेष लगाव है। इतना कि उन्होंने अलग से एक पुस्तक लिखी- ‘सन सत्तावन की राज क्रांति और मार्क्सवाद’। नामवर सिंह ने 1857 के प्रति उनके विशेष लगाव को देखते हुए एक टिप्पणी की – 

    “योद्धा के रूप में उनकी ख्याति तो है ही, विशेष रूप से उल्लेखनीय है ‘57 के स्वाधीनता संग्राम में उनका गहरा लगाव। सन ‘57 जैसे उनकी समस्त चिंतन की धुरी है और है उनके वैचारिक संघर्ष का बीज भाव।”1 

    रामविलास शर्मा के लेखन के विकास क्रम को यदि ध्यान में रखें तो एक विशेष बात पाते हैं। पहले तो उन्होंने हिंदी साहित्य के प्रमुख कालखंडों और प्रमुख लेखकों पर अपनी कलम चलाई और प्रमाणित किया कि वही लेखक और कवि हिंदी साहित्य में ऊंचा स्थान रखने की योग्यता रखते हैं जिनके लेखन में समाज की सामंती प्रवृत्तियों के प्रति विरोध और समाज के प्रतिरोधी संघर्ष की छवि मौजूद हो। रामविलास जी ने तुलसीदास पर एक निबंध लिखा था- ‘तुलसी साहित्य के सामंत विरोधी मूल्य’ जिसमें उन्होंने दिखाया है कि मध्यकालीन समय में होते हुए भी तुलसीदास अपने समय और समाज के सबसे चेतस पुरुषों में से एक थे। उन्होंने गरीबों, शोषितों, किसानों, आदिवासियों और सामान्य प्रजा का अपने लेखन में पक्ष लिया है। 

    अपने जीवन के बाद के दिनों में रामविलास शर्मा ने साहित्य पर चिंतन के साथ-साथ इतिहास, संस्कृति, सभ्यता के विकास, दर्शन और विमर्श तथा विश्व इतिहास में रुचि लेना प्रारंभ कर दिया। इसलिए बाद के दिनों की जितनी भी पुस्तकें हैं वह प्राय: इन्हीं विषयों पर केंद्रित हैं।  

    बहुत लोगों ने रामविलास जी के परवर्ती लेखन को ध्यान में रखते हुए उन पर आरोप लगाया कि रामविलास जी ने साहित्य से पलायन कर दिया है और अनावश्यक रूप से इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और दर्शन के क्षेत्र में चले गए। लेकिन ऐसा नहीं लगता है। दरअसल रामविलास जी साहित्य के इतिहास को एकांतिक होकर देखने के आदी नहीं थे। एक मार्क्सवादी चेतना सम्पन्न मस्तिष्क से ऐसी अपेक्षा भी नहीं है। वे साहित्य को सामाजिक सरोकारों से जोड़कर देखते थे और मानते थे कि साहित्य का लक्ष्य समाज-सापेक्ष सत्य का उद्घाटन और उसके सामने मौजूद चुनौतियों से आम जनों को लड़ने में सक्षम बनाना है। इसलिए वह अनिवार्य तौर पर साहित्य का संबंध समाज, इतिहास, संस्कृति और दर्शन जैसे विषयों से जोड़कर देखते हैं। उनके साहित्येतर लेखन की आलोचना का जवाब देते हुए नामवर सिंह ने ‘केवल जलती मशाल’ में लिखा- “हो सकता है, कुछ शुद्ध साहित्य प्रेमी सोचते हों कि भाषा विज्ञान और राजनीतिक इतिहास- जैसे साहित्येतर विषयों को इतना समय देकर डॉक्टर शर्मा अपनी प्रतिभा का अपव्यय कर रहे हैं। किंतु वस्तुतः भाषा विज्ञान और राजनीतिक इतिहास की पुस्तकें साहित्यिक समस्याओं के विश्लेषण के बीच से उन्हीं समस्याओं के समाधान स्वरूप पैदा हुई हैं।”2 आगे उन्होंने महावीर प्रसाद द्विवेदी के लिए लिखा रामविलास जी का ही कथन जोड़ा जो रामविलास जी पर भी उतना ही फिट बैठता है। वे “सीमित अर्थ में साहित्यकार नहीं है। उनका उद्देश्य हिंदी प्रदेश में नवीन सामाजिक चेतना का प्रसार करना है। इस उद्देश्य की सिद्धि के लिए वह समाज विज्ञान, प्रकृति विज्ञान, दर्शनशास्त्र और साहित्य इन सभी के विकास के लिए प्रयत्न करते हैं। साहित्य उनमें से एक है, शिक्षा प्रसार के लिए आवश्यक अन्य विषय उसके अंतर्गत नहीं है।” 3

    रामविलास शर्मा को देखते हुए एक बात कहीं जा सकती है कि हिंदी का आलोचक निरा साहित्य का आलोचक नहीं होता। उसका सरोकार इतिहास, दर्शन, राजनीति, भाषा और विश्व साहित्य से अनिवार्य तौर पर होना चाहिए क्योंकि वह एक अर्थ में अपने हिंदी क्षेत्र अथवा समाज की चेतना निर्माण का आधार प्रस्तुत करने वाले एक विचारक के तौर पर कार्य करता है। रामविलास जी के साथ ऐसा नहीं था कि साहित्य को छोड़कर इतिहास और राजनीति जैसे विषय पर लिखने का लक्ष्य कोई इतिहासकार होना या उस रूप में स्थापित होना था बल्कि वे साहित्य के प्रति दायित्वबोध के कारण साहित्येतर विषयों पर लिखने गए। साहित्य और समाज के प्रति उनका नजरिया किसी उच्चतर कर्म की प्रेरणा से प्रेरित मालूम पड़ता है। ‘आज के सवाल और मार्क्सवाद’ में उन्होंने लिखा- “मेरा भी अपना एक आग्रह है। मैं आग्रहहीन इतिहासकार नहीं हूं। इतिहासकार तो मैं हूं ही नहीं, इतिहास विवेचक नहीं हूं। तो, आग्रह तो मेरा है और वह साम्राज्यवाद विरोधी, सामंतवाद विरोधी आग्रह है। मैं समाज को विकासमान मानता हूं। जो प्रवृत्तियां सामंतवाद को खत्म करने वाली हैं, उनका मैं समर्थन करता हूं।” 4

    रामविलास जी के लेखन में परंपरा का मूल्यांकन भी इस तरह से हुआ है कि वह सामंतवादी मूल्य और तत्वों को गति देने वाली शक्तियों का प्रतिरोध करता नजर आता है तथा प्रगतिशील तत्वों को पोषण पहुंचने वाली शक्तियों का प्रोत्साहन करता दिखाइए देता है। सार्वजनिक जिम्मेदारियों से प्रेरित व्यक्तित्व से यही अपेक्षित है। अपनी पुस्तक ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में उन्होंने द्विवेदी जी के व्यक्तित्व को इसीलिए इतना उभारा क्योंकि द्विवेदी जी की दृष्टि केवल साहित्य के मनोरंजन तक सीमित नहीं थी बल्कि वह आम जनता, किसानों, मजदूरों, स्त्रियों और भारत की सच्ची स्वाधीनता के प्रति समर्पित थी। द्विवेदी जी रामविलास शर्मा को इसलिए भी पसंद आते हैं कि उनके लेखन में साहित्य के सामाजिक सरोकारों से जुड़ी चिंता दिखाई पड़ती है। द्विवेदी जी इतिहास, विज्ञान, भूगोल और तमाम भौतिक मुद्दों पर विचार करते दिखाई देते हैं। किसानों की समस्या, सामंतों के द्वारा उनका आर्थिक शोषण, भारतीय जनता की दीन-हीन दशा और अंग्रेज शासकों के स्वेच्छाचारी बर्ताव, भारत की अपार निर्धनता इत्यादि पर वे लिखते हैं। रामविलास जी द्विवेदी जी को इसलिए भी पसंद करते हैं क्योंकि उन्होंने साहित्य को दरबारी संस्कृति और श्रृंगारिक प्रभाव से दूर ले जाकर उसे सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक चिताओं से जोड़ा। ऐसा नहीं है कि शृंगारिक प्रभाव की कविता उपेक्षणीय है किन्तु समय की मांग का प्रश्न उसके साथ हमेशा जुड़ा रहेगा। 

    रामविलास जी को 1857 से विशेष लगाव है। वह अपनी पुस्तक ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी नवजागरण की समस्याएं’ में 1857 की छः विशेषताओं को रेखांकित करते हैं। इनमें ‘देश की एकता का लक्ष्य, राज्य सत्ता की मूल समस्या सामंतों के हित में न होकर जनता के हित में होना, स्वाधीनता संग्राम का सामंत विरोधी पक्ष और नेतृत्व उन सिपहियों और सूबेदारों के हाथों में होना जो साधारण किसान के बेटे थे, नितांत असंप्रदायिक होना और सबसे विशेष बात हिंदी क्षेत्र की जमीन पर हिंदी क्षेत्र के लोगों द्वारा लड़ा जाना शामिल है।’  यह सभी लक्षण उन्हें भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनके सहयोगियों के लेखन में दिखाई पड़ते हैं। रामविलास जी जानते थे कि अंग्रेज 1857 के विद्रोह से भयभीत हो चुके थे और उन्होंने देखा था कि हिंदी प्रदेश एकमात्र ऐसा प्रदेश है जो राष्ट्रीय एकता का गढ़ बन रहा है। इसलिए 1857 के बाद उन्होंने इसे अलग-अलग तरीके से बांटने की पूरी कोशिश की। ‘आज के सवाल और मार्क्सवाद’ पुस्तक में उन्होंने लिखा- “1857 के पहले यह प्रदेश संगठित था। 1857 के बाद अंग्रेजों ने देखा कि इस प्रदेश में बड़े विद्रोही हैं, यही हमसे सबसे ज्यादा लड़ने के लिए तैयार हैं, इसलिए इनको ऐसा बांटो कि फिर यह कभी ना उठ सके। इसलिए हमारा प्रदेश सबसे ज्यादा प्रांतों में विभाजित हुआ।”5

    1857 की लड़ाई में हिंदू और मुस्लिम कंधे से कंधा मिलाकर एक साथ लड़े थे। एक समय ऐसा आया था कि उपनिवेशवाद की जड़ें उखड़ने को थी। लेकिन अंग्रेजों ने इसे बुरी तरह से कुचल दिया और भयानक रूप से भारतीय जनता का दमन किया। बाद में उन्होंने इसी हिंदी प्रदेश को तरह-तरह से बांटने का यत्न किय। हिंदी-उर्दू विवाद के संबंध में अपनी पुस्तक ‘भारतीय साहित्य के इतिहास की समस्याएं’ में उन्होंने लिखा- “19वीं सदी के आरंभ में हिंदी उर्दू का अलगाव शुरू होता है और 20वीं सदी के पूर्वार्ध में निरंतर बढ़ता जाता है, बंगाल, पंजाब, कश्मीर, और सिंध के मुसलमानों को अंग्रेजों ने वहां की जातीय संस्कृति से विलग करने की पूरी कोशिश की। हिंदी प्रदेश में उन्होंने जातीय संस्कृति और जातीय भाषा को दो हिस्सों में बांट दिया। ” 6 

    यहां जातीय संस्कृति और जातीय भाषा के दो हिस्सों में बंटने से आशय हिंदू और मुस्लिम संस्कृति तथा हिंदी और उर्दू जाति के अस्तित्व से है। लेकिन रामविलास शर्मा इससे भयभीत न होकर अंग्रेजों की औपनिवेशिक साजिश का प्रतिरोध करने का विकल्प पेश करते हैं और कहते हैं- “राष्ट्र के अस्तित्व के लिए एक ही भाषा का व्यवहार आवश्यक नहीं है। संसार के अधिकांश राष्ट्र बहुजातीय हैं, उनमें अनेक भाषाओं का व्यवहार होता है।”7

    अंग्रेजों ने यहां आकर भारत की संस्कृति और साहित्य को उलटने पलटने का काम शुरू किया। उन्होंने जितना संभव हो सका उतना यहां के साहित्य और संस्कृति को यूरोपीय संस्कृति के मुकाबले हीनतर दिखाने की कोशिश की। 19वीं सदी में शिक्षा के जो भी प्रयास अंग्रेजी सरकार द्वारा किए जा रहे थे उनके मूल में रामविलास शर्मा इसी लक्ष्य को देख रहे थे। उनका लक्ष्य किसी भी तरह से यहां की संस्कृति को विनष्ट कर पश्चिमी प्रभाव छोड़ना था जिससे कि वह ऐसे लोग तैयार कर सकें जो उनके शासन-प्रशासन में उन्हीं की तरह सोच वाले हों और सहायक हों। इसलिए उन्होंने सबसे पहले काम किया यहां की भाषा, संस्कृति और इतिहास को कमतर दिखाने का। जाने कितनी बोलियों और सहायक भाषाओं में तमाम तरह का साहित्य लिखा जा रहा था, अंग्रेजों ने आकर उसकी गति को रोक दिया। इसी पुस्तक में रामविलास शर्मा ने लिखा- “इतिहास का एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि भारत में अंग्रेजी राज कायम होने से पहले बंगाल, पंजाब, सिंध और कश्मीर में साहित्य रचना काफी बड़े पैमाने पर हो रही थी… अंग्रेजी राज कायम होने के बाद कश्मीरी, पंजाबी और सिंधी में साहित्य रचना बहुत कम हो गई।”8 अंग्रेजों की इसी नीति का विरोध करने का काम रामविलास शर्मा ने अपने जिम्मे लिया और भारतीय संस्कृति, सभ्यता एवं इतिहास के विभिन्न कालखंडों से गुजरते हुए भारतीय संस्कृति के वास्तविक रूप सामने रखे और अंग्रेजों के औपनिवेशिक ज्ञानकांड की प्रतिदृष्टि तथा वैसे विभेदन की काट रखी।  

    हिंदी बनाम उर्दू के मामले को लेकर वे पहले से ही परिचित थे कि अंग्रेजों का लक्ष्य हिंदी जाति की एकता को पनपने  से रोकना था। भारत के औपनिवेशिक इतिहास में बंगाल और हिंदी प्रदेश दो ऐसे गढ़ थे जो राष्ट्रीय एकता तथा अंग्रेजी विरोध के सबसे बड़े केंद्र हो सकते थे। इसलिए अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन का प्रस्ताव रखा और हिंदी प्रदेश को सांप्रदायिक आधार पर बांटने की नीति चलाई। रामविलास शर्मा ने ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ पुस्तक में दिखाया कि इन दोनों प्रदेशों की एकता को भंग करने के लिए अंग्रेजों ने जिस तर्कहीनता और बिना किसी कारण के उन्हें बांटने का प्रस्ताव रखा, उससे साफ हो जाता है कि वे भारतीय जाति की एकता से डरते थे। अंग्रेजों के सामने यह तथ्य था कि भाषा कभी भी धर्म के आधार पर व्यवहृत नहीं होती है और हिंदी प्रदेश के मामले में भी ऐसी ही बात थी। हिंदी और उर्दू दोनों एक ही भाषा थी। यद्यपि उनके लिखने का और कुछ शब्दों के प्रयोग को लेकर अंतर जरूर था। परंतु क्योंकि अंग्रेजों को हिंदी क्षेत्र की एकता को पनपने से रोकना था इसलिए उन्होंने इसके विभाजन की कार्य योजना तैयार कर ली। ‘आज के सवाल और मार्क्सवाद’ में रामविलास शर्मा ने बताया “… कम से कम भाषा के लिए उर्दू शब्द का इस्तेमाल आप 1800 से पहले ना पाएंगे। इससे पहले जो भाषा थी वह हिंदी या हिंदुस्तानी ही थी।… 1802 में अंग्रेजी शिक्षाविदों ने यह बात चलाई हिंदी हिंदुओं की भाषा है, उर्दू मुसलमानों की और इसको लोगों के मन में बैठाने के लिए बाकायदा कोशिशें भी की गईं ।”9

    रामविलास शर्मा ने अपने सामने औपनिवेशिक काट का एक और लक्ष्य रखा था- औपनिवेशिक ज्ञान कांड का संपूर्ण प्रतिरोध करना। इसी क्रम में उन्होंने पहले तो हिंदी नवजागरण की अवधारणा, फिर बाद में उसका विस्तार करते हुए भारतीय नवजागरण को वेदों से लेकर उपनिषद, भक्ति काल और आधुनिक युग तक दर्शाया। नवजागरण का व्यापक विश्लेषण और विवेचन करते हुए उन्होंने दिखाया कि भारतीय साहित्य और संस्कृति तथा इसकी सभ्यता अंग्रेजी सभ्यता से कहीं से भी हीन नहीं है। यहां नवजागरण की एक महान परंपरा मौजूद है। समय-समय पर उसने अपने भीतर की बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठाई और अपने धर्म तथा समाज की कुरीतियों के प्रति एक मुहिम चलाई। उन्होंने दिखाया कि जब पश्चिमी सभ्यता अंधकार और सभ्यतायी संघर्ष के युद्ध में लिपटी थी तब भारतीय इतिहास में अनेक प्रकार के नवजागरण घटित हो रहे थे। अपनी पुस्तक ‘भारतीय नवजागरण और यूरोप’ में आधुनिक युग के नवजागरण को औपनिवेशिक संस्कृति के प्रभाव में आकर घटित होने का जवाब देते हुए उन्होंने तो यहां तक कहा कि भारतीय नवजागरण किसी भी तरह से अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति के संपर्क का परिणाम नहीं है। इसकी तुलना में भारतीय नवजागरण का प्रकाश इतना दूर तक फैला हुआ था कि उसने एशिया और यूरोप को भी प्रभावित किया। अपने भाषा संबंधी चिंतन और तर्कों के माध्यम से उन्होंने सिद्ध किया कि भारत के धर्मों और भाषाई प्रभाव के बीज एशिया और यूरोप में फैले पड़े हैं। नामवर सिंह ने अपने आलेख ‘इतिहास की शव साधना’ में रामविलास शर्मा की अतिशयता की चुटकी लेते हुए लिखा- “इस प्रकार भारत में चार नवजागरण हुए और हिंदी में आधुनिक नवजागरण के चार चरण! जिस देश और प्रदेश के पास इतने नवजागरणों की पूंजी हो उससे कोई ईर्ष्या कर सकता है – खासतौर से यूरोप और अमेरिका! ” 10

    दरअसल रामविलास शर्मा ने अंग्रेजों के द्वारा प्रचारित ‘प्राच्यवाद’ के खिलाफ एक दूसरी तरह का ‘प्राच्यवाद’ तैयार किया जिसका लक्ष्य अंग्रेजों को उन्हीं की भाषा में जवाब देना था। स्वत्व की रक्षा के लिए संस्कृति और इतिहास के स्तर पर रामविलास शर्मा ने इस लड़ाई की कमान संभाली।  “उपनिवेशवाद की छाया में भारतीय संस्कृति के लोप का खतरा था। इसलिए अपनी संस्कृति की रक्षा का प्रश्न स्वत्व रक्षा का प्रश्न बन गया।”11  इसी कारण रामविलास शर्मा ने नवजागरण की व्याख्या को लेकर इतनी दूर वैदिक सभ्यता तक समुद्र मंथन किया। उन्होंने अंग्रेजों के द्वारा प्रचारित मिथ्या इतिहास दृष्टि के विरोध में एक प्रति-इतिहास दृष्टि विकसित की। इसी को लेकर नामवर जी ने लिखा “नवजागरण की एक बहुत बड़ी देन संभवत: वह इतिहास दृष्टि है जिससे अपने अतीत को शत्रु से मुक्त करके उसके विरुद्ध वर्तमान में इस्तेमाल करने की कला आती है और भविष्य के लिए एक स्वप्न दृष्टि भी मिलती है।”12 

    अंग्रेजी सभ्यता के प्रतिनिधियों ने आरंभ में भारत के दर्शन तथा लेखन को उलटने पलटने का काम शुरू किया। वे जहां एक ओर भारतीय दर्शन और चिंता-धारा की प्रशंसा करते दीखते हैं, वहीं दूसरी ओर वह अपने औपनिवेशिक हितों के कारण उसे यूरोपीय सभ्यता से कमतर भी दिखाते हैं। वास्तव में भारत और तमाम ऐसे देश जहां अंग्रेजों ने अपने उपनिवेश कायम किए, वहाँ लंबे समय तक अपने शासन को बनाए रखने और उसके औचित्य को सिद्ध करने के लिए अंग्रेजों को कारण चाहिए था जिससे वे यह जता सकें कि उपनिवेशन का लक्ष्य उन्हें सभ्य बनाना है। ऐसे में यह अनिवार्य ही था कि उनकी सभ्यता को यूरोपीय सभ्यता से कमतर बताया जाए।विलियम जॉन्स, मैक्स मूलर जैसे यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय ज्ञान की तारीफ करते हुए भी यहां के समाज को पिछड़ा हुआ बताया। विलियम जॉन्स का विचार था कि भारत का धर्म ऐसा है, यहां का कानून ऐसा है कि लोग स्वाधीन रह ही नहीं सकते। एशिया की जातियां चाहे प्राचीन हो, आधुनिक, वे यूरोप की जातियों से घटकर ही हैं। उनके मुताबिक ‘ब्रिटेन का संविधान सबसे अच्छा है, इसलिए भारतवासियों का सौभाग्य है कि उनके देश पर अंग्रेजी राज कायम हो रहा है।’ वह यहां तक सोचते थे कि हिंदुस्तानियों में तो उनके धर्म के कारण लोकतंत्र का विचार है ही नहीं। ऐसे में भारतीयों को चाहिए कि वह अंग्रेजी शासन से खुश रहें और उसका समर्थन करें। ‘भारत को फिर से खोजते हुए’ लेख में वरिष्ठ आलोचक शंभूनाथ ने मैक्समूलर के इस कथन का उल्लेख किया- ” यह तो गनीमत है कि इंग्लैंड भारत पहुंचा और वहां आम मानवता के व्यापक सिद्धांतों को पुनः प्रतिष्ठित किया।”13

    इन उद्धरणों से पता चलता है कि क्यों रामविलास शर्मा को भारतीय सभ्यता और संस्कृति के उच्चतर मूल्य और ज्ञान को सामने रखना पड़ा। शंभूनाथ जी ने लिखा “दरअसल भारत की विभिन्न खोजों में भारत को बार-बार गायब किया जाता रहा है। बौद्धिक उपनिवेशन की मारी इस विडंबना से निपटने के लिए रामविलास शर्मा ने अपना पूरा जीवन भारत को फिर से खोजने में लगा दिया इसी दृष्टिकोण से उनके काम को आकना चाहिए।”14  रामविलास शर्मा के चिंतन में अतिशयोक्ति का कारण यहीं से स्पष्ट हो जाता है।  

    रामविलास शर्मा मार्क्सवादी विद्वान थे और वे उसके दर्शन तथा सिद्धांतों में विश्वास करते थे। इस कारण वे सामंतवादी जड़ता और साम्राज्यवाद का निषेध अनिवार्य समझते थे। इतिहास में जब यह सवाल उठा कि अंग्रेजों के आगमन से भारतीय सभ्यता के भाग्य खुल गए और यहां आधुनिकता का आगमन हुआ। अंग्रेजों ने आकर पूंजीवादी विकास किया। तब इस बात को रामविलास शर्मा ने एकदम अस्वीकार कर दिया। इसके उलट उन्होंने मार्क्सवादी सिद्धांतों के आधार पर भारत के इतिहास की आर्थिक व्याख्या की और औपनिवेशिकता के समानांतर भारतीय किस्म की आधुनिकता को सिद्ध करने का दायित्व ले लिया। उन्होंने अंग्रेजों की किसी भी तरह की प्रगतिशील भूमिका को स्वीकार नहीं किया। वे नहीं मानते थे कि अंग्रेज यहां पर किसी भी तरह के आधुनिक विकास के लिए आए थे। उनका कहना है कि भारतीय समाज में जहां एक ओर सामंती समाज होते हुए भी किसान और आम जनता जमींदारों के चंगुल तले दबी-कुचली थी, वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजों ने आकर उसे शोषण तथा निर्धनता की और अधिक मार झेलने को विवश कर दिया। वे मानते थे कि अंग्रेज यहां पर सबसे बड़े सामंत थे। उन्होंने सामंतों के माध्यम से भारतीय जनता और यहां के धन-धान्य की लूट की। दादाभाई नौरोजी ने पारंपरिक इतिहास लेखन से हटकर पहले ही अंग्रेजों की आर्थिक लूट को अपनी पुस्तक ‘पॉवर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ में दर्ज किया था। रामविलास शर्मा ने भी ‘महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण’ में अंग्रेजों के शासन में हुए अत्याचार और असमय पड़े अकालों का विवरण दर्ज किया है जिससे कम्पनी और अंग्रेजी शासन के कथित सभ्य एवं लोकतांत्रिक रूप का पर्दाफाश होता है। 

    रामविलास शर्मा ने माना कि भारत में अंग्रेजों से पहले यहां पूंजीवादी विकास की प्रारंभिक अवस्था विद्यमान थी। उन्होंने मध्यकाल में पूंजीवाद की एक अवस्था सौदागरी पूंजीवाद के प्रमाण इकट्ठे किए हैं। उनके अनुसार उस समय छोटे-मोटे व्यापारी सामंतो के चंगुल से मुक्त होकर छोटे पैमाने पर ही सही लेकिन व्यापार को गति दे रहे थे। अतिरिक्त उत्पादन हो रहा था और उसका व्यापार विस्तार भी हो रहा था। यद्यपि उत्पादन का तरीका वही पुराना था। विभिन्न जनपद एक दूसरे के संपर्क में आ रहे थे। इससे एक आपस की जनपदीय बोलियाँ तथा वहां के लोग आपसी संपर्क कर रहे थे। उन्होंने कहा, जब किसी समाज के लोग एक जनपद से दूसरे जनपद में व्यापार-व्यवहार करने लगते हैं तो इस आपसी व्यवहार के कारण कोई बोली आगे बढ़ जाती है और बढ़ते-बढ़ते भाषा का रूप ले लेती है। इस तरह भाषाई आधार पर एक लघु जाति का गठन होता है। यही लघु जाति धीरे-धीरे व्यापार-विस्तार के कारण महाजाति में कन्वर्ट हो जाती है और इस तरह ‘नेशन’ का निर्माण होता है। यही कारण है कि रामविलास शर्मा 12वीं शताब्दी में भारतीय नेशन की अवधारणा को देखते हैं। उस समय के समाज की आर्थिक गतिविधियां और उसमें आ रही जागरण की चेतना के कारण उन्होंने उसे ‘आधुनिक युग’ की संज्ञा दी। ‘भारतीय संस्कृति और हिंदी प्रदेश’ के खंड-दो में रामविलास शर्मा ने लिखा- ” पूंजी का अस्तित्व यहां था और यूरोप में भी था… वह व्यापारिक पूंजीवाद है, औद्योगिक पूंजीवाद नहीं है। यहां विभिन्न प्रदेशों के बीच विनिमय का विकास बड़े पैमाने पर हुआ था… उत्पादन का पुराना तरीका कायम रहता है लेकिन बड़े पैमाने पर बिकाऊ माल तैयार होने लगता है। विनिमय का विकास होता है, नए पूंजीवादी संबंध कायम होते हैं और उनके साथ नए सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन भी उभर आते हैं।”15 

     कहना ना होगा कि वे भारतीय समाज के भीतर इस तरह के बदलावों को मध्यकालीन समय में देख रहे थे। भक्ति काल में हुए सामाजिक-सांस्कृतिक आंदोलन को वह इसी नजर से परिभाषित करते हैं और इसे ‘लोक जागरण’ की संज्ञा देते हैं। ‘भारतीय साहित्य के इतिहास की समस्याएं’ पुस्तक की भूमिका में अंग्रेजी राज की प्रगतिशील भूमिका को अस्वीकार करते हुए ऐसे इतिहासकारों और अंग्रेजी सोच को वे चुनौती देते हुए लिखते हैं- “अधिकांश इतिहासकार मानते हैं, आधुनिक साहित्य का निर्माण अंग्रेजी राज कायम होने के बाद हुआ। इसके पहले ‘मध्यकाल’ है। मध्यकाल में आधुनिक जातियों का अस्तित्व नहीं है। इन इतिहासकारों की समझ में जातियों का निर्माण अंग्रेजी राज कायम होने के बाद हुआ। ऐसे इतिहासकार किसी न किसी रूप में अंग्रेजी राज की प्रगतिशील भूमिका स्वीकार करते हैं।”16

    इस तरह वे मध्यकाल को किसी पिछड़ी सामाजिक चेतनायुक्त ना मानकर उसे आधुनिक युग की संज्ञा देने की वकालत करते हैं। भक्ति कालीन साहित्य जो इस समय मिलता है उसकी एकता और पारस्परिक सम्मिलन को देखते हुए उन्होंने टिप्पणी की-  “आश्चर्य की बात है कि जो साहित्य दूर-दूर के जनपदों को एकता के सूत्र में बांधता आया है, लाखों किसानों को आंदोलन करता रहा है उसे लोग मध्यकालीन कहते हैं…”17  आगे इस पुस्तक में उन्होंने घोषित किया “जिसे लोग मध्यकाल कहते हैं, उसे आधुनिक काल का प्रथम चरण मानना चाहिए।”18

    अंग्रेजों की प्रतिगामी भूमिका को स्वीकार करते हुए रामविलास शर्मा उन्हें सबसे बड़ा सामंत घोषित करते हैं और भारतीय पूंजीवाद के विकास में एक बाधक मानते हैं। वे मानते हैं कि भारतीय समाज में आधुनिक ढंग के विकास की संभावनाएं पहले से मौजूद थी और अपनी गति से आगे बढ़ रही थी लेकिन उपनिवेशवाद के आगमन ने इसे बीच में ही रोक दिया। इस तरह भारत की दुर्गति के रास्ते उसने तय कर दिए। ‘भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद’ पुस्तक में अंग्रेजों तथा सामंतों की मिली-जुली प्रतिक्रियावादी भूमिका को रेखांकित करते हुए उन्होंने लिखा- “अंग्रेजों ने यहां सामूहिक संपत्ति वाले कबीलाई ग्राम समाजों का विघटन नहीं किया, उन्होंने यहां के प्रतिक्रियावादी सामंतो से मिलकर उभरते हुए पूंजीवाद का नाश किया।”19

    रामविलास शर्मा के संपूर्ण चिंतन और लेखन में यह बात सामने आती है कि वे भारतीय समाज को स्थिर और परिवर्तनशील मानने के विचार के विरोधी हैं और उन्होंने मध्यकालीन समाज की गतिशीलता को दिखाते हुए बाकायदा यह सिद्ध करने की कोशिश कि भारतीय समाज अपने ढंग की गति से आगे बढ़ रहा था। 

    जातीय विकास के मामले को लेकर रामविलास शर्मा की जाति संबंधी मान्यता स्टालिन की स्थापनाओं से संबंधित है। सामान्य आवास भूमि, सांझी संस्कृति, साझी भाषा और साझी ऐतिहासिक परंपरा के साथ जाति निर्माण में मुख्य बात यह है कि जातियां आधुनिक पूंजीवादी विकास की देन है लेकिन रामविलास शर्मा की मौलिक खोज इस बात में है कि उन्होंने आधुनिक जातियों के निर्माण के पहले लघु जातियों के गठन की बात की। कहना ना होगा कि भारतीय समाज में वे इस तरह के जाति के गठन को देख पा रहे थे। भारतीय साहित्य पर विचार करते हुए उन्होंने लिखा- “यूरोप में जब पुनर्जागरण आरंभ हुआ, उससे बहुत पहले वैसे ही युग का आविर्भाव तमिलनाडु में हो चुका था। इटली की तरह यहां साहित्य के साथ कलाओं का विकास हुआ, व्यापारिक संबंधों का प्रसार हुआ और इटली से भिन्न काफी समय तक तमिलनाडु राजनीतिक रूप से एकताबद्ध  रहा। जब अंग्रेजों ने भारत में अपना राज्य कायम किया तब तमिल भाषा उसके साथ तमिल जाति का विकास हो चुका था।”20 {भारतीय साहित्य की भूमिका 1996}

    इसी तरह उनका भाषा संबंधी चिंतन जो ‘भाषा और समाज’, ‘भारतेंदु हरिश्चंद्र और हिंदी भाषा की विकास परंपरा’, ‘भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी प्रदेश’ तथा ‘भारतीय साहित्य के इतिहास की समस्याएं’ जैसी पुस्तकों में देखने को मिलता है। यहाँ औपनिवेशिक ज्ञान कांड के प्रतिरोध का राष्ट्रीय आधार भाषा संबंधी चिंतन में दिखाई पड़ता है। उन्होंने भाषा-विज्ञान संबंधी कई सारी गलत मान्यताओं का प्रतिरोध किया और इस संबंध में मौलिक चिंतन प्रकट किया। उनके लेखन से ऐतिहासिक भाषा-विज्ञान की कई सारी सीमाएं सामने आई, जिसे बाद के दिनों में खुद भाषा वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया। उनका भाषा-विज्ञान संबंधी कार्य एक राजनीतिक कर्तव्य की पूर्ति है जिसे उन्होंने बड़े इत्मीनान और मौलिक ढंग से किया। उनकी एक-एक पुस्तक इस संबंध में उपलब्धि है। नामवर सिंह ने अपनी एक निबंध में इस संबंध में लिखा- 

    “और नहीं तो सिर्फ भाषिक तथ्यों की दृष्टि से यह ग्रंथ भारत के समस्त भाषा परिवारों का अभूतपूर्व विश्वकोश है – ऐसा भाषा कोश हिंदी में तो है ही नहीं, किसी अन्य देसी या विदेशी भाषा में भी होगा या नहीं, हमें नहीं मालूम… महत्वपूर्ण बात तो यह है कि जो कार्य भारत के इतने सारे सुविधा संपन्न भाषा-विज्ञान विभाग मिलकर भी ना कर पाए, डॉ शर्मा ने तन्हा अपने बूते पर उसे संपन्न कर दिखाया।”21

    इस तरह रामविलास शर्मा के संपूर्ण साहित्य-चिंतन और लेखन में सामंतवाद तथा साम्राज्यवादविरोध केंद्र में है। उन्होंने प्रत्येक स्थिति में ऐसे तत्वों, मूल्यों और पोषणकारी शक्तियों का प्रतिरोध किया जो भारतीय समाज, संस्कृति और उसके साहित्य को किसी भी तरह से कमतर सिद्ध करने की कोशिश करती हैं। उनका 1857 से लगाव, नवजागरण की परंपरा का विस्तार, हिंदी जाति की अवधारणा, भारतीय संस्कृति के साझे तत्वों की पहचान, भाषा संबंधी चिंतन कई स्तरों पर प्रतिरोध के प्रतिफलित रूप हैं। उन्होंने शुरुआत में तो हिंदी साहित्य को जरूर उसकी अपनी सीमाओं में विवेचित-विश्लेषित करने का प्रयत्न किया लेकिन बाद के दिनों में वे हिंदी साहित्य को ही नहीं वरन् सभी भाषाओं के साहित्य को भारतीय जाति के साहित्य के रूप में देखने, विवेचित-विश्लेषित करने का सुझाव दिया। इस अर्थ में रामविलास शर्मा न केवल हिंदी जाति के साहित्य अपितु संपूर्ण भारतीय जाति के साहित्य के प्रतिनिधि विचारक और लेखक जान पड़ते हैं। उनका योगदान अन्यतम है और उनकी देन महानतम। नामवर सिंह के शब्दों में- 

    “प्रगतिशील आलोचना के अग्रदूत होने के साथ थी वह हिंदी जाति के प्रतिनिधि समालोचक हैं और इस हैसियत से समूचे भारतीय साहित्य के विकास में उनका योगदान अन्यतम है… राम की शक्ति पूजा का वह बिंब अपने समूचे अर्थ गौरव के साथ मूर्तिमान हो रहा है: … भूधर ज्यों ध्यानमग्न, केवल जलती मशाल!”22

    सन्दर्भ-

    1. स. विश्वनाथ त्रिपाठी, हिन्दी के प्रहरी : डॉ रामविलास शर्मा, पृ. 2 
    2. वही, पृ. 6 
    3. वही, पृ. 6 
    4. रामविलास शर्मा, आज के सवाल और मार्क्सवाद, पृ . 370 
    5. वही, पृ. 267 
    6. रामविलास शर्मा, भारतीय साहित्य के इतिहास की समस्याएं, पृ.60 
    7. वही, पृ.69 
    8. वही, पृ.59 
    9. रामविलास शर्मा, आज के सवाल और मार्क्सवाद, पृ .415 
    10. 10.स. नंदकिशोरनवल, नामवरसंचयिता, 412 
    11. 11.वही, पृ . 412 
    12. 12.वही, पृ. 405 
    13. 13.स. विश्वनाथत्रिपाठी, हिन्दीकेप्रहरी : डॉरामविलासशर्मा, पृ.135 
    14. 14.वही, पृ. 132 
    15. 15.रामविलासशर्मा, भारतीयसंस्कृतिऔरहिन्दीप्रदेश, खंड- 2, 1999
    16. 16.रामविलासशर्मा, भारतीयसाहित्यकेइतिहासकीसमस्याएं, पृ.5 
    17. 17.वही, पृ. 43
    18. 18.वही, पृ. 54 
    19. 19.रामविलासशर्मा, भारतमेंअंग्रेजीराजऔरमार्क्सवाद, 142
    20. 20.रामविलासशर्मा, भारतीयसाहित्यकीभूमिका, 1996 
    21. 21.स. विश्वनाथत्रिपाठी, हिन्दीकेप्रहरी : डॉरामविलासशर्मा, पृ.7 
    22. 22.वही, पृ. 2,10 

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