हिन्दी में लोकप्रिय उपन्यास धारा के दो शिखर लेखक रहे- सुरेंद्र मोहन पाठक और वेद प्रकाश शर्मा। 1990 के दशक में वेद प्रकाश शर्मा का उपन्यास आया ‘वर्दी वाला गुंडा‘, जिसने हिंदी में उपन्यासों के प्रचार के सारे बने-बनाये मानकों को ध्वस्त कर दिया। बाद में उसके बारे में यह लिखा जाने लगा कि इस उपन्यास की 8 करोड़ प्रतियाँ बिकीं। लेकिन क्या सच में वर्दी वाला गुंडा की आठ करोड़ प्रतियाँ बिकी थीं? इसी को लेकर प्रसिद्ध यह लेख लिखा है लोकप्रिय धारा के शिखर लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक ने। यह अपनी तरह का पहला लेख है जो एक बड़े लोकप्रिय लेखक ने दूसरे लोकप्रिय लेखक पर लिखा है। दिलचस्प आकलन है। पढ़ियेगा- मॉडरेटर
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‘वर्दी वाला गुंडा’ की आठ करोड़ प्रतियां बिकीं।
पहले ही दिन पंद्रह लाख प्रतियां बिकीं।
ये दो बहुत बड़े दावे हैं जिनको मैं सालों से सुनता आ रहा हूँ। और सुनने वाला मैं अकेला भी नहीं हूँ। मेरे अलावा न्यूजहाउन्ड हैं जो ऐसी न्यूज को कारोबारी अंदाज से भी लपकते हैं और मुसाहिबी अंदाज से हवा देना भी अपना फर्ज समझते हैं। हैरानी की बात है कि कभी किसी ने लेखक के दावे पर सवाल नहीं किया, ऐतराज नहीं जताया – न उसकी ज़िंदगी में, न सन् 2017 में उसके न रहने के बाद – कि ये मुमकिन नहीं, दिस डज़ नॉट स्टैंड टु रीज़न, फिर भी अगर लेखक का ऐसा दावा था तो उसे प्रमाणिकता की जरूरत है। लेकिन मैंने नहीं सुना कि कभी किसी ने इस बाबत कोई सवाल किया हो। सबने लेखक के कथन को ‘सतबचन महाराज’ कह कर कुबूल किया वरना ये स्थापित करना कोई कठिन काम नहीं कि जो कहा जा रहा था, वो नामुमकिन था।
बहुत से दावे ऐसे होते हैं जिनको झूठा या नामुमकिन साबित करने के लिए किसी सुबूत की जरूरत नहीं होती। जैसे मैं कहूँ कि मेरा कद दस फुट है तो ‘नहीं हो सकता’ कहने से पहले कोई कद नाप के नहीं देखेगा। मैं कहूँ कि मेरी उम्र एक सौ बीस साल है तो मुझे झूठा करार देने के लिए ‘प्रूफ ऑफ एज’ की मांग नहीं की जाएगी, स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट दिखाने को नहीं बोला जाएगा। कुछ बातें अपने आप में सुबूत होती हैं जिन्हें क्यूईडी (QED – Quod Erat Demonstrandum – a statement has just been proven, it needs no further proof) कहते हैं। बच्चा भी जानता है कि आदमजाद का दस फुट कद मुमकिन नहीं, उसकी एक सौ बीस साल उम्र मुमकिन नहीं। लिहाजा इस बाबत कहने वाले का कोई दावा कोई मायने नहीं रखता, उसकी कोई जिद, कोई गारंटी मायने नहीं रखती।
यहाँ पहले मैं दूसरे दावे पर आता हूँ जो कहता है एक ही दिन में पंद्रह लाख प्रतियां बिकीं।
लेखक ने अपनी ज़िंदगी में कभी उजागर नहीं किया था कि उसकी उस जानकारी का जरिया क्या था। लेखक खुद ही प्रकाशक था इसलिए तथ्य को, या कथ्य को, सत्यापित करने के लिए दूसरा सिरा नहीं पकड़ा जा सकता था। पहले ही सिरे पर रहते हुए अर्ज है कि लेखक नहीं जान सकता था, कोशिश भी करता तो नहीं जान सकता था, कि इतने बड़े हिंदुस्तान में किताब कब, कहाँ पहुंची और उसने अपने यहाँ पहले दिन की बिक्री का क्या स्कोर बनाया जिसका ग्रैंड टोटल पंद्रह लाख हुआ। गौरतलब है कि किताब सन् 1992 में पहली बार छपी थी जबकि इंटरनेट का आज सरीखा यूनीवर्सल इंकलाबी दौर अभी नहीं आया था। प्रकाशक विभिन्न ठिकानों पर पंद्रह लाख किताब एक ही दिन अरसाल किए जाने प्रबंध, मान लीजिए कि मेरठ जैसे छोटे शहर से किसी करिश्माई तरीके से, कर सकता था लेकिन वो ये कैसे सुनिश्चित कर सकता था कि किताब हर डेस्टिनेशन पर एक ही दिन पहुंचे, एक ही दिन सेल के लिए उपलब्ध हो? कहीं कोताही न हो कि किताब एक दिन पहुंचे और उसे बिक्री के लिए दूसरे दिन लगाया जाए। जमा, उसे हर डेस्टिनेशन पर एक जैसा इन्कलाबी रिसेप्शन हासिल हो? स्वाभाविक जवाब है, नहीं कर सकता था। चाह कर भी नहीं कर सकता था। लेकिन दावा आज तक बरकरार है कि पहले ही दिन ‘वर्दी वाला गुंडा’ पंद्रह लाख बिकी। गूगल तक में दर्ज है।
लेखक सिर्फ एक तरीके से इस स्कोर से वाकिफ हो सकता था।
किताब की काउन्टर सेल पंद्रह लाख हुई होती।
यानी मेरठ में प्रकाशक के ऑफिस-कम-गोडाउन से लाइन लगा कर इतनी बड़ी तादाद में किताब खरीदी गई होती। अगर ऐसा मुमकिन हुआ होता तो खरीदारों की कतार कम से कम आधा मील लम्बी होती और वो अपनी खरीद को ढोने के लिए टेम्पो, ट्रैक्टर ट्रॉली, ट्रक लेकर आए होते। फिर किताब यूं ही तो थमा न दी जाती, उसको पैक कर के आगे सौंपा जाता। लिहाजा एक ही दिन में इतनी पैकिंग और डिलीवरी हैन्डल करने के लिए 50-60 वर्करों की जरूरत होती, 15-16 क्लर्कों/कैशियरों की दरकार बिल बनाने और कैश हैन्डल करने के लिए होती और पंद्रह लाख किताब एकमुश्त सेल के लिए स्टोर करने के लिए प्रकाशक के ठीये जैसे 20-22 और ठीयों की जरूरत होती।
जमा, प्रकाशक के ऑफिस से सामने की सड़क पर रायट कंडीशन जैसा ट्रैफिक जाम होता।
तब कहीं जा कर वो सपना साकार होता जो लेखक ने देखा और पुस्तक प्रेमी अवाम का दिखाया।
इतने बड़े प्रिन्ट ऑर्डर से ताल्लुक रखता एक और भी पहलू है जिसे अपना मुंहफट दावा ठोकते वक्त लेखक ने नज़रअंदाज किया।
जैसा कि मैंने ऊपर दर्ज किया कि किताब सन् 1992 में वजूद में आई थी जबकि अभी अत्याधुनिक ऑफसेट प्रिंटिंग और ऑटोमैटिक बाइन्डिंग उपलब्ध नहीं थी, जिस के तहत आजकल 64 पेज इकट्ठे छपते हैं, कागज के दोनों तरफ़ एक साथ छपाई होती है और बाइन्डिंग का तो जानिए कि बाउन्ड बुक का डेली पेपर की तरह परनाला बहता है। जब किताब लेटर-प्रेस में छपती थी और बाइन्डिंग मैनुअल थी। लेटर-प्रेस में किताब की मैनुअली कम्पोज़िंग होती थी। प्रशिक्षणप्राप्त कम्पोज़िटर होते थे जोकि अक्षर, अक्षर जोड़ कर किताब का सोलह पेज का फर्मा तैयार करते थे और किताब लेटर-प्रेस में छपती थी। यू जो अक्षर इस्तेमाल होते थे, उन्हें टाइप कहते थे और टाइप की लाइफ बहुत लिमिटिड होती थी। दस से पंद्रह हजार तक के इम्प्रेशन के बाद टाइप बिगड़ जाता था और अगर उत्तम प्रिंटिंग दरकार हो तो कम्पोज़िंग फिर करानी पड़ती थी, बहुत बड़ा प्रिन्ट ऑर्डर हो तो फिर, फिर और फिर करानी पड़ी थी। ये एक टाइमखाऊ प्रोसेस थी अमूमन प्रकाशक जिस से बचते थे और अमूमन रीप्रिन्ट की जगह नई स्क्रिप्ट की तरफ तवज्जो देते पाए जाते थे।
प्रकाशक की दुश्वारी यहीं खत्म नहीं होती थी। ज्यादा बड़ी दुश्वारी बाइन्डिंग की शक्ल में अभी आगे खड़ी होती थी। गौरतलब है कि एक माकूल, मुस्तैद बाइन्डिंग हाउस तब एक दिन में तीन हजार से ज्यादा किताब नहीं बना पाता था क्योंकि सबकुछ तो मैनुअल था – फ़र्मे मुड़ते मैनुअली थे, उनकी सिलाई मैनुअली होती थी, टाइटल मैनुअली चिपकाया जाता था जिस के सूख जाने का इंतजार करना पड़ता था – जल्दी काट दिए जाने पर टाइटल ठीक से चिपका नहीं रहता था, कटिंग मशीन के दबाव में अपनी जगह से सरक जाता था, इसलिए किताब पर चढ़ा आड़ा तिरछा कटने लगता था और किताब को खराब करता था। इसका कुल जमा नतीजा ये होता थे कि एक बड़ा बाइन्डिंग हाउस भी एक दिन में तीन हजार से ज्यादा किताब नहीं बना पाता था इसलिए बड़ा प्रिन्ट ऑर्डर कई प्रिंटिंग प्रेसों और बाइन्डिंग हाउसों के हवाले किया जाना पड़ता था ताकि किताब का एडीशन जल्दी हो सके।
गौरतलब है कि हर रीप्रिन्ट के लिए हर बार किताब फिर कम्पोज़ करानी पड़ती थी और एक ही बड़े एडीशन के लिए एक ही वक्त में कई कई बार करानी पड़ती थी।
और बड़ा एडीशन – पहला बड़ा एडीशन – भी कितना बड़ा?
लेखक ने कभी न बताया। जिस को ये बताना हमेशा याद रहा कि किताब पहले ही दिन पंद्रह लाख बिकी, उसने ये बताना कभी जरूरी न समझा कि उस फर्स्ट एडीशन का साइज़ क्या था जिस में से पहले ही दिन पंद्रह लाख कॉपी बिकी!
आप कल्पना कीजिए! तीस लाख! चालीस लाख! पचास लाख!
बरायमेहरबानी ये न भूलें कि बाद में इस फिगर ने आठ करोड़ तक पहुंचना है। अब फर्ज कीजिए कि पहला एडीशन पचास लाख था – ऐसा हुआ होना नामुमकिन है, महज फर्ज कीजिए। तदुपरांत अगर हर बार किताब एक लाख रीप्रिन्ट हो – ये भी नामुमकिन है – तो किताब 750 बार रीप्रिन्ट हुई होनी चाहिए। यानी बारह महीने तीन सौ पैंसठ दिन दस-बारह लेटर-प्रेस प्रिंटर ‘वर्दी वाला गुंडा’ ही छापते रहे होने चाहियें और इतने ही मैनुअल बाइन्डिंग हाउस यू व्यस्त होने चाहियें।
पॉकेट बुक व्यवसाय में तब किसी किताब का प्रिन्ट ऑर्डर निर्धारित करने का एक स्टैन्डर्ड तरीका होता था। प्रकाशक चौतरफा सर्कुलर भेजता था कि उसके यहाँ से फलां महीने में इतनी किताबों का सेट प्रकाशित होने जा रहा था। बुक सेलर अपनी जरूरत के मुताबिक अपना इंडेंट भेजता था जिसे कम्प्यूट कर के प्रकाशक फैसला करता था की उसने कौन-सी किताब कितनी संख्या में छापनी थी। मसलन यूं अगर उसे शर्मा की नई किताब के पचास हजार कॉपी के ऑर्डर हासिल होते थे तो उसकी कोशिश प्रिन्ट ऑर्डर को दस प्रतिशत कम रखने की ही होती थी क्योंकि कभी कोई ऑर्डर कैन्सल हो जाता था, कभी ऑर्डर का भेजा माल पार्टी छुड़ाती नहीं थी या कभी अनसोल्ड वापिस आ जाने का अंदेशा बन जाता था। ये एक मैकेनिकल प्रॉसेस थी, दस पाँच प्रतिशत की ऊंच नीच के साथ ही लेखक की एक स्थायी सेल का आंकड़ा यू प्रकाशक को उपलब्ध होता था और वो उसी के मुताबिक किताब प्लान करता था। अब अगर शर्मा की तुलसी में नए उपन्यास की स्थापित सेल पचास हजार चली आ रही थी तो वो अगले उपन्यास की पचास लाख नहीं हो सकती थी।
अब आप खुद सोचिए कि कैसे प्रकाशक ने ‘वर्दी वाला गुंडा’ का शुरुआती प्रिन्ट ऑर्डर निर्धारित किया? कैसे उसे इलहाम हुआ कि किताब की पहले ही दिन की सेल पंद्रह लाख पर पहुँचने वाली थी इसलिए उसे उससे कई गुणा – कई कई गुणा – ज्यादा किताब की सर्वत्र वितरण के लिए जरूरत पड़ सकती थी। फिर उस किताब से अगली किताब उतनी ही नहीं तो थोड़ी कम तादाद में छपती क्योंकि लेखक का सिक्का तो ‘वर्दी वाला गुंडा’ के सदके टकसाली साबित हो चुका था।
ऐसा तो न हुआ! उसी प्रकाशक की उसी लेखक की और कोई किताब तो ‘वर्दी वाला गुंडा’ के पास भी कहीं खड़ी दिखाई न दी – पास क्या, दूर भी कहीं दिखाई न दी!
अब ये भी सवाल है कि ऐसी सोना उगलने वाली किताब के होते लेखक का अपना प्रकाशन, जिसने कि मूलरूप से ‘वर्दी वाला गुंडा’ छापी थी, बंद क्यों हो गया? ऐसे प्रकाशन को कोई और किताब छापने की जरूरत ही क्या थी जबकि हकीकत ये है कि लेखक के अपने प्रकाशन में बाहरी लेखक भी छपे और घोस्ट लेखक भी छपे। आपके खादिम की वहाँ तेईस किताबें छपीं जिन में सत्तरह रीप्रिन्ट थीं और छ: नई थी। मेरे छ: नए नावलों के सिलसिले में लेखक का पार्टनर खुद कुबूल करता था कि उनके यहाँ शर्मा की नई किताब की और पाठक की नई किताब की सेल में उन्नीस बीस का ही फर्क था।
इस लिहाज़ से तो आप के खादिम की हर किताब प्रिन्ट ऑर्डर में और सेल में ‘वर्दी वाला गुंडा’ वाली ब्रैकेट में होनी चाहिए थी! कैसे होती? खुद लेखक की ही कोई दूसरी किताब उस ब्रैकेट में नहीं थी वरना उसका भी जिक्र ‘वर्दी वाला गुंडा’ जैसे ही बाजे-गाजे के साथ हुआ होता।
लेखक को लम्बी लम्बी छोड़ने की आदत थी, उसकी नीचे दर्ज मिसाल मुलाहजा फरमाइए:
- किताब के प्रकाशन में विलम्ब इसलिए हो रहा है क्योंकि टाइटल लंदन में छप रहा है। पाठकगण संज्ञान लें कि खुद इंग्लैंड की उनकी भाषा की किताबें न्यूज़ीलैंड और सिंगापुर में छपती हैं।
- कुछ रसूख वाले राजनैतिक नेताओं को किताब के टाइटल पर ऐतराज हुआ इसलिए टाइटल को मजबूरन काला पोतना पड़ा। किताब की टेक्स्ट से ऐतराज तो बहुत बार सुनने में आया था, किसी को टाइटल से ऐतराज हुआ, ये जरूर पहला वाकया था।
- ‘कानून का पंडित/बेटा लिखने की तैयारी के लिए मैंने एलएलबी की’। जबकि ‘पाखी’ के एक इंटरव्यू में लेखक ने खुद कुबूल किया है कि हिन्दी के अलावा उसे कोई भाषा नहीं आती।
न्यूजपेपर्स और जर्नल्ज़ की सर्कुलेशन को सत्यापित करने के लिए ‘ऑडिट ब्यूरो ऑफ सर्कुलेशन’ नामक एक महकमा होता है जो प्रकाशक के इस बाबत क्लेम को बाकायदा चेक करता है और तमाम आँकड़े दुरुस्त पाता है तो सर्टिफिकेट जारी करता है जो कहता है कि फलां न्यूज़पेपर की, फलां मैगजीन की, इतनी सर्टिफाइड सर्कुलेशन है। पुस्तक प्रकाशन के धंधे में तो ‘एबीसी’ जैसा कोई महकमा है नहीं इसलिए लेखक – या प्रकाशक – इस बाबत कुछ भी कह सकता है। लेकिन जब कुछ भी कहा शक्ल से ही नामुमकिन दिखाई दे तो उस बाबत सवाल तो होना चाहिए! सवाल तो होना चाहिए कि क्या लेखक ऑफ हैंड बता सकता है कि करोड़ में कितने ज़ीरो लगते हैं!
कोई नहीं करता। लेखक ने कह दिया, सुनने वालों ने सुन लिया और आगे कोट कर दिया। अंधे ने अंधे को रास्ता दिखाया। बार बार उचरा गया झूठ सच होने की जिद करने लगा। कोई सुनने वाले से सवाल करे कि उसने ऐसी असंभव बात क्यों कुबूल कर ली तो जवाब मिलेगा:
- लेखक कहता है।
- फलां पेपर में छपा है।
- गूगल कहता है।
तीसरी दलील सबका मुंह बंद कर देने के लिए काफी मानी जाएगी जोकि काफी नहीं है। गूगल में से वही निकाला जाता है जो उसमें फ़ीड किया जाता है। और ‘वर्दी वाला गुंडा’ सम्बन्धी फीडिंग का सोर्स क्या है? खुद लेखक, जिसे खुद को महिमामंडित करने के लिए झूठ बोलने से कोई गुरेज नहीं। जिसको दूसरे लेखकों के मुकाबले में खुद को दस हाथ ऊंचा करार देने से कोई गुरेज नहीं। अगर इंटरव्यू लेने वाला आपका खादिम हो और उसे लेखक का वो बड़ा बोल सुनना पड़े तो उसका लेखक से पहला सवाल होगा –
क्या लेखक ने आठ करोड़ बिकी होने वाली किताब की रॉयल्टी पर इंकम टैक्स भरा? उस वक्त पॉकेट बुक में छपी किताब के मूल संस्करण की कीमत दस रुपये होती थी जो बाद में होने वाले रीप्रिंट्स की निरंतर बढ़ती जाती थी। कीमत दस रुपये ही माने और लेखक को दस पर्सेन्ट रॉयल्टी मिलती मानें तो उसकी वसूली आठ करोड़ हुई। कम से कम इतनी ही प्राप्ति फर्म के पार्टनर के तौर पर प्रकाशन से हुई। अब लाख रुपये का सवाल है की क्या लेखक ने उस विपुल धनराशि पर इंकम टैक्स भरा जो कि करोड़ों में होता?
जाहिर है कि नहीं भरा। भरा होता तो वो खुद ही रिटर्न की कॉपी दिखाने को तड़प रहा होता। कैसे भरता, जबकि ऐसी कोई कमाई हुई ही नहीं थी।
कभी आशा भौंसले का दावा था कि उसने हिन्दी में और क्षेत्रीय भाषाओं में चालीस हजार गाने गाए थे और अपने इस करतब को गिनिस बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स (Guinness book of world records) में दाखिल करवाने की कोशिश की थी। जाहिर है की मैडम नहीं जानती थीं कि ऐसे किसी दावे की वेरीफिकेशन के लिए बाकायदा लंदन से एक्सपर्ट आते थे जो जब मुम्बई आए थे तो जिन्हों ने दावे को भरपूर ‘पैडिड’ पाया था और खारिज किया था।
गनीमत हुई कि ऐसा कोई दावा ‘वर्दी वाला गुंडा’ की बाबत पेश करना शर्मा को कभी न सूझा वरना ‘गिनिस’ के विशेषज्ञ ही सत्यापित कर जाते कि दावा झूठा था, फरेबी था।
(क्रमश:)
यहाँ मैं अत्यंत विनम्रता से खुद से ताल्लुक रखती एक मिसाल दर्ज करना चाहता हूँ:
मुम्बई के एक फिल्म निर्माता के साथ दिल्ली हाई कोर्ट में मेरा एक केस था जिसने मेरी इजाजत के बिना मेरे उपन्यास ‘पैंसठ लाख की डकैती’ पर फिल्म बनाने की तैयारी कर ली थी। उपन्यास पर आधारित प्रेज़ेन्टेशन को जब उसने अपने नाम रजिस्टर भी करा लिया तो मजबूरन मुझे कोर्ट में जाना पड़ा। मेरे वकील ने मेरे से हासिल जानकारी के आधार पर केस तैयार कर लिया और अप्रूवल के लिए ड्राफ्ट मुझे भेजा तो मैंने पाया की उसमें ‘पैंसठ लाख की डकैती’ की सेल करोड़ों में दर्ज थी। मैंने तुरंत ऐतराज किया और कहा की मैंने झूठ बोल कर अपना केस मजबूत नहीं करना था। वकील ने हवाला दिया की एक करोड़ की सेल तो एक न्यूज पेपर कटिंग में ही दर्ज थी। मैंने कहा वो खबर भी गलत थी। मेरे उक्त उपन्यास के तेईस संस्करण हुए थे और उनकी टोटल सेल पचास लाख से ज्यादा नहीं थी और उसी के मुताबिक ड्राफ्ट को करेक्ट किया जाए, मैंने झूठ बोल कर केस नहीं जीतना था।
भारतीय पॉकेट बुक ट्रेड में दो ही ऐसे लेखक हुए हैं जिनकी किताब का प्रिन्ट ऑर्डर लाखों में होता था – एक गुलशन नंदा और दूसरे चेतन भगत। मैं यहाँ सिर्फ गुलशन नंदा का जिक्र करूंगा क्योंकि चेतन भगत इंग्लिश भाषा के लेखक हैँ। अंग्रेजी में मुहावरा है, Apples should be compared with apples and oranges with oranges. इसलिए कम्पैरिजन में मैं नंदा जी का ही जिक्र करूँगा। नंदा जी जब पॉकेट बुक ट्रेड में कामयाबी के शिखर पर थे, तब हिन्द पॉकेट बुक्स ने उनका नावल ‘झील के उस पार’ छापा था जिस का ‘धर्मयुग’ के पहले पृष्ठ पर पॉकेट बुक्स के लिहाज़ से यादगार – और बहुत महंगा – विज्ञापन छपा था जिस में घोषणा की गई थी कि उपन्यास का पहला संस्करण ही पाँच लाख प्रतियों का हो रहा था।
क्या हुआ था?
नहीं, नहीं हुआ था। प्रकाशक ने खुद कुबूल किया था की स्कोर तीन लाख तक भी नहीं पहुँच पाया था। गौरतलब है कि ये स्कोर प्रिन्ट ऑर्डर का था, बिक्री का नहीं था। प्रिन्ट ऑर्डर की नाकद्री का ये हाल था कि बाइन्डर प्रकाशक को कहते थे किताब उठाओ, हमारे पास स्टोरेज की जगह नहीं थी, प्रकाशक किताब नहीं उठाता था क्योंकि स्टोरेज प्रॉब्लम उसके साथ भी थी और आइंदा डिस्पैच का कोई हाल नहीं था। किताब की डिमान्ड बनी रहती तो प्रकाशक ही जिद करता कि किताब उसे फौरन भेजी जाती। वहाँ तो टालमटोल का खुल्ला आलम था। यानी कितनी ही किताब बिकने को भेजी जाने की जगह भटक रही थी क्योंकि कोई ‘टेकर’ नहीं था।
इसकी एक जुदा किस्म की मिसाल मुलाहजा फरमाइए।
उन्हीं दिनों मैंने अपने एक मित्र, हमउम्र प्रकाशक के साथ वैष्णो देवी गया। हम ट्रेन से जम्मू पहुंचे तो मित्र बोला कि करीब ही एक बड़ा बुकसेलर था जिससे वो अपने कारोबार के सम्बंध में मिलना चाहता था। यानी जम्मू में अपनी मौजूदगी का फायदा उठाना चाहता था। हम मुलाकात के लिए पहुंचे तो बुकसेलर प्रकाशक के साथ बड़े प्रेम भाव से मिला। उनके व्यापारिक वार्तालाप के दौरान मैंने दुकान में निगाह दौड़ाई तो पाया कि वो आम दुकानों के लिहाज से बहुत बड़ी थी और उसमें ‘झील के उस पार’ का इतना हेवी डिस्प्ले था कि लगता था कि बुकसेलर का सारा फोकस उस एक ही बुक की सेल पर था। लेकिन उसके दो तिहाई हिस्से में आजू से बाजू और नीचे से ऊपर तक आने वाला एक टेम्परेरी पर्दा टंगा हुआ था। मुझे बड़ा अजीब लगा। दुकान में ऐसे परदे का क्या काम? भद्दा लग रहा था, दुकान की शक्ल बिगाड़ रहा था। जब वो दोनों बातचीत में मशगूल थे तो तब मेरे से न रहा गया मैंने हाथ बढ़ा कर पर्दे का एक कोना थामा और उसे परे सरका कर उसके पीछे झांका।
परदे के पीछे छत तक ‘झील के उस पार’ भरी हुई थी।
तब तक प्रकाशक अपनी कारोबारी गुफ्तगू से फारिग हो चुका था इसलिए मैं बुक सेलर से पूछे बिना न रह सका, “इतनी किताब मंगा ली, अभी ढेर डिस्प्ले पर भी है, कब को बिकेगी?”
“बिक जाएगी।” उसने लापरवाही से जवाब दिया, “नंदा जी की किताब है, कहीं रुकती है!”
“रुकती तो नहीं लेकिन आपने तो डिमान्ड से कहीं ज्यादा मंगा ली! इतनी ज्यादा कि रखने की जगह नहीं हैं, आप खुद यहाँ फंस के बैठे मालूम पड़ रहे हैं!”
“टेम्परेरी दिक्कत है।” उसका जवाब फिर भी कान से मक्खी उड़ाने जैसा था।
“फिर भी, मैं गुस्ताखी की माफी के साथ पूछ रहा हूँ, इतना बड़ा ऑर्डर क्यों दिया जबकि आप की फौरी जरूरत, समझो कि एक तिहाई की थी?”
“यार, बाद में ऑर्डर करने पर किताब मिलती नहीं। रीप्रिन्ट में बड़ा टाइम लगता है। किताब फिर कम्पोज़ करानी पड़ती है न! इसलिए पहले ही ज्यादा मँगा ली।”
“इतनी ज्यादा, जो भले ही साल में खत्म हो!”
“इतना टाइम नहीं लगेगा, यार, नंदा जी की किताब है आखिर!”
आश्वस्त तो मैं न हुआ लेकिन खामोश हो गया।
साहबान, इस सूरतअहवाल की तुलना शर्मा के दूसरे दावे से कीजिए और अपना नतीजा खुद निकालिए।
कभी चेतन भगत के एक नावल की ये हाईप बनाई गई थी कि उसका प्रिन्ट ऑर्डर पच्चीस लाख था। यहाँ उसका जिक्र इसलिए है की उसकी भी यादगार नाकद्री हुई थी। नावल दरियागंज के प्रसिद्ध संडे बुक बाजार में तो पटड़ी पर बिकता ही था, वहीं रोज़ दो सौ रुपये किलो भी बिकता था।
अगाथा क्रिस्टी के प्रसिद्धतम उपन्यासों में वरीयता से नाम ‘एंड देन देर वर नन’ (And then there were none) का आता है जिसकी नकल मार कर हिन्दी में ‘गुमनाम’ फिल्म बनी थी। उसको ‘बेस्टसेलर क्राइम नावल ऑफ आल टाइम्स’ का दर्जा हासिल है और उसकी ‘टोटल वर्ल्डवाइड सेल’ दस करोड़ बताई जाती है। और विश्व की सौ भाषाओं में ‘टोटल ग्लोबल सेल’ दो सौ करोड़ है। अब इसके समकक्ष ‘वर्दी वाला गुंडा’ को रखिए जिसका विश्व की किसी भाषा में तो क्या, भारत की ही किसी अन्य भाषा में अनुवाद नहीं हुआ, जिसके मूल प्रकाशन से कभी उसका रीप्रिन्ट नहीं हुआ, सन् 2020 तक – यानी मूल प्रकाशन से अट्ठारह साल बाद तक – किसी दूसरे प्रकाशक ने जिसके पुनर्प्रकाशन में रुचि न दिखाई, उसकी सेल का स्कोर आठ करोड़ है। यानी क्रिस्टी को तो नाहक दुनिया ने आसमान पर चढ़ाया हुआ है, हमारा घर का क्रिस्टी तो अकेली हिन्दी भाषा में ही – जोकि आधे से ज्यादा भारत में नहीं बोली जाती – उसको बोल्ड कम्पीटीशन दे रहा है।
‘टॉप टेन हाइएस्ट सेलिंग मिस्ट्री बुक्स इन इंग्लिश’ के संदर्भ में कहा जाता है जिस के साथ दूसरे से दसवें नम्बर तक जिन बाकी नौ नावलों का जिक्र होता है वो टॉप सेलिंग, नम्बर वन बुक से बस जरा ही पीछे होते हैं। इसके विपरीत आठ करोड़ के स्कोर वाले ‘वर्दी वाला गुंडा’ का जिक्र आता है तो नम्बर दो से सौ तक भी कोई अन्य नावल जगह पाए नहीं दिखाई देता है। आप खुद बताइए, क्या ये मुमकिन है? किसी दूसरे लेखक के किसी नावल की मिलती जुलती हैसियत न सही, खुद शर्मा के भी ‘वर्दी वाल गुंडा’ के अलावा किसी नावल की ऐसी या उससे उन्नीस हैसियत न बनी! जब ‘वर्दी वाला गुंडा’ इतना नामुमकिन स्कोर खड़ा कर रहा था, तब लेखक के उससे पहले नावल की क्या पोज़ीशन थी? पहले से पहले नावल की क्या पोज़ीशन थी? सालों निरंतर लिखते रहने के बाद भी, पौने सौ उपन्यास लिख चुकने के बाद भी, लेखक के लिखे के साथ पहले कभी ऐसा कारनामा न हुआ? पहले क्या, बाद में भी न हुआ! हुआ ही नहीं! क्यों लेखक ‘वन बुक वन्डर’ बन के रह गया? क्यों नहीं कह पाता कि ‘वर्दी वाला गुंडा’ आठ करोड़ बिका तो कोई दूसरा गुंडा साढ़े सात करोड़ बिका, सात करोड़ बिका; तीसरा गुंडा साढ़े छ: करोड़ बिका, छ: करोड़ बिका, वगैरह!
पॉकेट बुक्स ट्रेड में सेल में इजाफे की एक अपनी केमिस्ट्री होती है। लेखक जैसे जैसे पॉपुलरिटी गेन करता है, वैसे वैसे उसके प्रिन्ट ऑर्डर में इज़ाफा होता है। ऐसा लेखक कोई नहीं हुआ जो एक ही छलांग में फर्श से अर्श पर पहुँच गया हो। लेखक कितना ही बढ़िया लिख ले, जब तक उसका लिखा पाठकों को नहीं कुबूल होने लगता तब तक उसका मुकाम नहीं बन पाता। ये एक ग्रेजुअल प्रोसेस है जिसमें न लेखक कोई हथेली लगा सकता है, न प्रकाशक कोई जैक लगा सकता है। फिर ये करिश्मा क्योंकर हुआ कि जिस लेखक का आम प्रिन्ट ऑर्डर हजारों में होता था, वो करोड़ों वाली ब्रैकेट में पहुँच गया! किसी ने ‘आबरा का डाबरा’ उचरा, किसी ने गिली गिली कह के कोई डंडा किताब या लेखक या प्रकाशक पर फिराया?
एक ही मुमकिन जवाब है। एक ही हजम होने वाला जवाब है:
कुछ न हुआ। सब झूठ है, फरेब है, शर्मनाक क्लेम है।
सर आर्थर कानन डायल (1859-1930) ने अपना पहला उपन्यास ‘ए स्टडी इन स्कार्लेट’ (A study in Scarlett) सन् 1887 में लिखा था। फिर सन् 1891 में उनका दूसरा नॉवेला (Novella) ‘दि साइन ऑफ फोर’ प्रकाशित हुआ था। तदुपरांत उन्होंने शरलॉक होम्ज़ को चित्रित करते दो और उपन्यास और 56 कहानियाँ लिखी थीं, जो तरतीबवार स्ट्रैन्ड मैगजीन में प्रकाशित हुई थीं। तब से आज का दिन है उनकी कोई रचना कभी डेड नहीं हुई, आउट ऑफ प्रिन्ट नहीं हुई। सारे विश्व में होम्ज़ के कारनामे छपते हैं और ये प्रमाणिक तथ्य है कि हर साल उनकी शरलॉक होम्ज़ स्टोरीज़ की पचास लाख प्रतियाँ बिकती हैं – हर साल बिकती हैं, किसी एक साल बिकी नहीं।
अब आप बाजार में जाकर ‘वर्दी वाला गुंडा’ तलाश कीजिए। कहीं दो कॉपी मिल जाएं तो करिश्मा जानिए।
आप ये भी न समझें कि ‘वर्दी वाला गुंडा’ के लाखों की तादाद वाले दर्जनों एडीशन दर्जनों प्रकाशकों ने छापे थे। ऐसा नहीं था। मेरी जानकारी में किताब को उसकी पूरी लाइफ में दो ही प्रकाशकों ने छापा था। एक लेखक के अपने प्रकाशन तुलसी पॉकेट बुक्स ने और दूसरा प्रकाशक हाल ही में पेंगविन की मिल्कियत हिन्द पॉकेट बुक्स था जिस पर किताब की फेक पब्लिसिटी की धौंस बस इतनी चली थी की उसने – प्रकाशित हिन्दी पुस्तकों की तादाद बढ़ाने के लिए – किताब का नया संस्करण निकाला था जो लाखों में हुआ हो, इसका खयाल भी नहीं किया जा सकता। आप मार्केट में इस किताब को ढूँढने जाइए, या तो मिलेगी नहीं या यूं मिलेगी जैसे कोई भूली बिसरी आइटम हो जो पुस्तक विक्रेता को भी याद न रही हो कि उसने कभी उसका ऑर्डर दिया था। सच पूछें तो किताब के दर्शन साल में एक ही बार संभव हैं, वो एक बार है विश्व पुस्तक मेला। वरना किताब ऑन लाइन मिले तो मिले, और कहीं मिलना नामुमकिन नहीं तो बहुत ही मुश्किल जरूर है। और ये हाल भी तब है जब कि किताब की खुशकिस्मती थी कि सन् 2020 में ‘हिन्द’ की उस पर नजरेइनायत हुई वरना किसी को याद भी न रहता कि कभी इस नाम का कोई उपन्यास रीडिंग पब्लिक का नूरेनजर हुआ करता था।
अब आप खुद फैसला कीजिए, आठ करोड़ का स्कोर बनाने वाली किताब की कद्र और पूछ ऐसी होती है!
लेखक की ज़िंदगी में उसकी स्पैशलिटी थी ‘वर्दी वाला गुंडा’ का गुणगान करना। मैं जब उस बड़े बोल से वाकिफ हुआ था तो लेखक द्वारा स्कोर चार करोड़ बताया जाता था। तदुपरांत जब भी उससे किताब के बारे में सवाल होता था, वो स्कोर में पचास लाख का इजाफा कर देता था और ऐसा लेखक तब तक करता रहा था जब तक कि स्कोर आठ करोड़ नहीं पहुँच गया था और जब तक किताब को छापने वाला ही कोई नहीं था लेकिन स्कोर था कि हनुमान जी की पूँछ की तरह बढ़ता ही जाता था और इस सिलसिले को तभी विराम लगा था जबकि दुर्भाग्य से लेखक की कदरन कम उम्र में मृत्यु हो गई, खुदा के करम से और जिंदा रहते तो स्कोर को निश्चित रूप से दस करोड़ तक – या और भी आगे तक पहुंचाते।
ये एक स्थापित तथ्य है कि पॉकेट बुक्स ट्रेड में गुलशन नंदा से मकबूलियत में बड़ा लेखक हिन्दी में आज तक नहीं हुआ। इस महकमे में नंदा जी के जौहर और पूछ से वो लोग भी वाकिफ हैं जिन्होंने उनकी कभी कोई किताब नहीं पढ़ी। किसी से भी पूछिए इस कारोबार का हिन्दी में सबसे मकबूल लेखक कौन है, बिना सोचे समझे सहज, सरल, स्वाभाविक जवाब श्रोता के मुंह से निकलेगा – गुलशन नंदा।
नंदा जी के मुकाबले में शर्मा ‘ऑल्सो रैन’ भी नहीं है फिर भी वो ‘वर्दी वाला गुंडा’ का बखान यू करता था, उसे यूं महिमा मंडित करता था, जैसे नंदा जी कि उसके सामने कोई हैसियत ही नहीं थी।
भारत में दूसरा कोई फिनामिनल सेल वाला लेखक हुआ है तो वो चेतन भगत है। मैं निसंकोच कहता हूँ कि पापुलरिटी में शर्मा भगत की परछाईं भी कभी नहीं था। लेकिन उसका या उसके प्रकाशक का उसकी सेल के मामले में इतना बड़ा दावा कभी पेश नहीं हुआ। फिर भगत – या गुलशन नंदा – काहे का बड़ा राइटर हुआ जबकि उसकी लाखों की सेल से मुकाबिल करोड़ों की सेल वाला लेखक मौजूद था!
वेद प्रकाश शर्मा ईएसक्यू!

