बलराम कांवट के उपन्यास ‘मोरीला’ पर यतीश कुमार की टिप्पणी

युवा लेखक बलराम कांवट के उपन्यास ‘मोरीला’ पर यह टिप्पणी लिखी है कवि-लेखक यतीश कुमार ने। भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित इस उपन्यास की समीक्षा आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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करवट लिए एक साँवली, ग्रामीण, लेटी स्त्री-सी एक पहाड़ी है। उस सुंदर पहाड़ी में हुई एक मोर की हत्या ने किताब का पहला पन्ना खोला है। शुरुआती पन्नों से ही कथ्य और शिल्प दोनों का आपसी मेल-जोल आपको चुंबक की तरह खींचने लगेगा। पाता हूँ, लेखक दृश्यों को बिम्बों की रोशनी में उजागर कर रहा है, जहाँ खेतों के बीच जाती हुई सड़क उसे बहती हुई नदी लग रही है, जिसमें बहते चले जा रहे हैं, वाहनों के साथ इंसान भी।

किताब, कविताई एहसास के साथ ऐसे लिखी गई है, जहाँ दृश्यों को यूँ रचा गया है कि मानो चलचित्र हों।

पीपल और मोर के साथ मंदिर और देवता को समझने की यात्रा अभी-अभी शुरू हुई है। देवता का मतलब यहाँ प्रेम के देवता से है। मुझे इस किताब को पढ़ने की जल्दी थी, पर इसकी पंक्तियों ने मुझे दौड़ने के बदले डेग-डेग चलने की हिदायत दी। इन पंक्तियों में मैं समस्त रंगों के उज्ज्वल घोल के बीच से झाँकती खिड़की से मोर को देख रहा हूँ, जिसमें आसमानी नीलाई ज़्यादा प्रबल है।

पक्षी या जानवर न जाने कैसे, पर सच में समय के सबसे पाबंद होते हैं। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है और इसे मोर के संबंध में इस किताब में भी लिखा पाया। मुलाक़ात मोर से हो या प्रेमी से,  क़ुदरतन ऐसी मुलाक़ात प्रेम में ही संभव है। यह मुलाक़ात एक प्रश्न लिए आई है `कि क्या मुस्कुराते माहौल में दो अजनबीयों का न मुस्कुराना आकर्षण की पहली छवि हो सकती है?’  कुलबुलाते और बुदबुदाते शब्दों को जिस तरह बलराम ने गुना है, ये पंक्तियाँ दिल के बहुत करीब लगती हैं जैसे इन पंक्तियों के बीच थिरकते शब्द सच में ये मेरे ही शब्द हों।

पढ़ते हुए लगा सही में फूल प्रेम के सबसे कोमल प्रस्ताव का माध्यम है। प्रेम का पहला प्रभाव सपनों का आना में बदलता है। फूल का सपनों से जो रिश्ता है वह इस किताब के माध्यम से समझ रहा हूँ। मैं यह भी सोचने के लिए बाध्य हो गया हूँ कि फूल अंधेरे में क्यों खिलते हैं। खिलते हुए शब्दों को देखकर ये भी समझ में आया कि चीजों से सुंदर उसके विचार और उसकी कल्पना होती है।

एक लेखक की शब्द समृद्धि उसके शब्द प्रयोग से समझी जा सकती है, जहाँ सामान्य शब्दों के साथ वह जादुई प्रयोग करते हुए आपको भी अपनी कल्पना के लोक में बिना रोके-टोके चुपके से ले जाता है। “ट्रैक्टर ने हल की पैनी नोकों से खेतों में कंघियाँ करनी शुरू कीं” या “तिल्ली की सीपियाँ खनकने लगीं” या फिर “प्रेम मरा नहीं – वह जीवित रहा लेकिन उसमें एक अंतिम पकन शेष थी” जैसी और भी पंक्तियाँ आपको सच में समृद्ध जादुई लेखन के दर्शन करवाती हैं, जिसे पढ़ते हुए अत्यंत पाठकीय संतोष मिलता है।

बहुत दिनों बाद ऐसी जादुई भाषा से गुज़र रहा हूँ जो विनोद कुमार शुक्ल से लेकर शिवेन्द्र तक की याद दिला जाती है। प्रेम के दृश्यों के साथ प्रकृति की छटा का वर्णन सच में अद्वितीय है। इस लेखनी से गुजरते हुए एक मीठी ईर्ष्या, हल्की सी जलन, जो स्वयं में पाठकीय सुख के साथ मौजूद है महसूस होती है। बलराम का जादू सिर चढ़ कर बोलता है बिना एक भी क्लिष्ट शब्द का प्रयोग किए।

प्रेम की नदी में उतरने की शुरुआत को पानी की फेंक से जोड़ना, खेत का समंदर और प्रेम का मछली में बदल जाना लेखक की सुंदर उपमाओं में से एक है। लेखक बहुत सहज दृश्यों को उपमाओं के साथ गढ़कर उसके वितान को असीमित कल्पनीय विस्तार देता है, जो इस किताब की विशिष्टता कहलायेगी। आत्मा का गुमान करना, देवता का गुमान करना, प्रेम का पगना, पुष्ट होते देखना, साक्षी बनना सब यहाँ कितना रूमानी है। किताब में प्रेम संबंध को प्रकृति और वातावरण के विवरण से जोड़कर पढ़ते हुए आप एक अलग ही दुनिया में प्रवेश कर जाते हैं, जहाँ जटिल मनःस्थिति अपनी सरलता ढूँढती नज़र आती है।

भला मुस्कुराहट को कोई सत्य का खंडन मान सकता है, पर किरदार ऐसे हैं और इसे ऐसे रचा गया है कि हम मान ही लेते हैं। लेखक की लेखनी में ऐसा असाधारण आत्मविश्वास दिखता है कि हम पाठक भी किरदार के ऐसे स्वभाव और मनःस्थिति को असली मानकर पढ़ने लगते हैं या यूँ कहें इन किरदारों से बतियाने लगते हैं, जैसे पूरी किताब में लेखक बतियाता रहता है उस लड़की को कुरेदते हुए।

इस किताब को पढ़ते हुए मन के भीतर एक प्रश्न पगा कि “क्या प्रेम का जाना मृत्यु के आने के समान होता है, क्या आते-जाते वे किसी एक बिंदु पर आलिंगन बद्ध होते हैं, तो फिर क्या दोनों एक ही हैं, बस चेहरे बदल लेते हैं – जाते हुए प्रेम और आते हुए मृत्यु?” फिर मैं सोचने लगा कि क्या मन का रूखापन फूलों की ख़ुशबू पोंछ देता है ? या क्या ख़ुशबू वाइपर की तरह काम करती है? सच इसे पढ़ते हुए मन कितना दार्शनिक हो उठता है फिर प्रेम और दर्शन के बीच की जगह में टहलने लगता है।

आगे दृश्य के एक खंड में आकर एक ओर लगने लगा मैं उन बौरियों के लिए चिंतित हूँ, जिनमें कैरियाँ नहीं आने वाली हैं फिर भी वे अपनी ख़ुशबू बिखेरने से नहीं पलटतीं। दूसरी ओर लगता है जैसे – खेल, मज़ाक़ और फिर त्रासदी प्रेम की यात्रा के प्लेटफॉर्म्स का नाम जैसा है और अभी पढ़ते हुए बीच सफ़र में यह भी सोच रहा हूँ, धोखा और दुर्घटना क्या इन प्लेटफॉर्म्स की लूप लाइन तो नहीं ? संशय से भरे इन रास्तों पर धीमे पाँव बढ़ा रहा हूँ इस चौकन्नेपन के साथ कि गलती से अपरिचित दृश्यों से भरा कोई स्टेशन न छूट जाए।

“गमलों ने अपने आप को तोड़कर मिट्टी में मिला लिया था” इस पंक्ति पर आकर थोड़ी देर को ठहर जाता हूँ। देखा जाए तो जीवन का यह कितना महत्वपूर्ण दर्शन भाव है, जिसे कितनी आसानी से कितने सामान्य शब्दों में बिना किसी अन्यथा शब्द विन्यास के कह दिया गया है। ऐसी पंक्तियाँ ही लेखक को लीक से अलग बनाती हैं। इस किताब में ऐसी कई पंक्तियाँ आती हैं, जो जीवन सार समेटे हैं। यहाँ अकेलेपन को समूह में गुम होते देखा जा सकता है, जैसे कि व्यक्तित्व नहीं  कोई धुआँ है, जो बादलों की झुंड में गुम हो जा रहा है। यह फूलों को सहेजने और रौंदने के बीच की कहानी है और इन दो सिराओं के बीच की यात्रा में उठते कौंधते प्रश्नों का रेला भी साथ चलता है। यहाँ गर्मीयों के अलाव में फूलों को जलते देखा जा सकता है, जिन्हें धीमे-धीमे प्रेम के बुझने, मद्धम होने के रूप में देखा जा सकता है, तब मैंने जाना कि छोटी-छोटी कई त्रासदियों की वजह कम्बख़्त फूल ही तो हैं, जो चुपके से दूसरों को उन्हें दुखी करने का हक दे देते हैं और वो भी यादों के गुलदस्ते में सजकर।

लेखक ने उपन्यास की पृष्ठभूमि के समानांतर अलग-अलग छोटी कहानियों की ज़मीन तैयार की है, जो इस पृष्ठभूमि की ज़मीन को और मजबूत करती है। इन कहानियों का जोड़-घटाव उपन्यास को थोड़ा और रहस्यमयी बनाने में मदद करता है। साथ ही भूत और वर्तमान में कथ्य की आवाजाही इसकी रोचकता को और लहकाने का काम करती है। कुल मिलाकर यह उपन्यास आपको प्रेम और संशय भरी स्मृतियों के बीच डोलती नाव लगेगा, जिसे रोचकता और रहस्यमयता के पतवार से खेया जा रहा है।

“मैं संतुष्ट नहीं हुआ, इस बिंदु पर मेरा संतुष्ट होना बाकी रहा” यह एक सामान्य शब्द विन्यास है, पर जिस जगह, जिस तरह इसे रखा गया है ऐसे प्रयोग लेखक और उसके लेखन को अलग बनाते हैं और फिर लेखनी को जैसे हस्ताक्षर मिल जाते हैं, जिसे पढ़ते हुए हम आराम से कभी भी भविष्य में कह सकते हैं कि, अरे! यह तो बलराम कांवट ही लिख सकता है। यह हस्ताक्षर पा लेना ही साहित्य में सामान्य घटना नहीं है, जिसका हर लेखक बेसब्री से इंतज़ार कर रहा होता है।

एकबारगी त्रिशंकु खंभा एक सार्थक उपयुक्त प्रतीक लगा मुझे और लगा लेखक की सजगता दृश्य के प्रति कितनी जागृत है कि कहानी के ठीक उस मोड़ पर इस प्रतीक का प्रयोग किया, जहाँ से इक नया मोड़ कहानी का इंतज़ार कर रहा है। मुझे इस मोड़ पर दूसरे प्रेम की बात याद आ गयी और याद आया संगीत में आविर्भाव और तिरोभाव का होना। मुझे लगा कहानी के तिरोभाव वाले हिस्से में मैं इस वक्त टहल रहा हूँ। प्रेम की तितली को अब मैं फूलों को छोड़कर आम के बौरों पर मँडराते हुए देख रहा हूँ।

एक सौ पच्चीस पन्नों के बावजूद उत्सुकता रुकने का नाम नहीं ले रही जबकि मैं इतना फूँक-फूँक कर चल रहा हूँ पंक्तियों के बीच कि अब मैं लगभग भारी पलकों से इन्हें पढ़ रहा हूँ और पढ़ते हुए उत्सुकता को हाँक भी लगा रहा हूँ “ साथ चलते हैं दोस्त, यूँ आगे-आगे न भागा करो!” तभी पढ़ता हूँ  “सब्र रखिए”, यही कहा था लड़की ने लेखक से, मुझे लगा वो मुझसे कह रही है और वही बात मैं उत्सुकता से कहते हुए दोहरा रहा हूँ।

यहाँ एक विचित्र सी स्थिति है, जिसे देखकर थोड़ा आश्चर्य तो होता ही है। वह है सच की ओट में झूठ का होना, जबकि अबतक हमने झूठ को इसे उजागर करते देखा है। अब इस झूठ की ओट से प्रेम का उगना देख रहा हूँ। प्रेम को उगने की बदलती ज़मीन को देख रहा हूँ और लग रहा है क्या सच में यही प्रेम है या उसकी झूठी छाया भर है।

देशज शब्दों का सुंदर प्रयोग इस किताब में यूँ दिखता है, जैसे दसबजिया फूल खिल रहा हो आपके इर्द-गिर्द । फूल को आम के बौरों में बदलते हुए देखती आँखों को चार आँखों की टकराहट से परहेज हो रहा है। देखते ही देखते वह आँखें दरवाज़े से परे भीतर उतरने लगी और लड़की की घबराहट का सबब बन गयीं। देखते-देखते कल्पना में प्रेम भी भयावह दृश्य रचने लगा और फिर मोर के पंख नीले से काले होते चले गए। किताब का कथ्य अनुभव की ज़मीन पर कल्पना को उगाते हुए आपसे कुछ यूँ मिलेगा कि अंत तक आते-आते जैसे लगेगा सारे पंख उड़ गए और हाथ में कुछ नहीं आया सिवाय उन सुंदर एहसासों के, जो प्रेम में रूह तक महसूस करता है आदमी।अब आप इस किताब के प्रेम में हैं।

कहानी का अंत दीवार में एक खिड़की थी कि याद दिलाएगी। अंत में मुझे यह भी लगा कि बलराम ने क्या इसका अगला हिस्सा आगे बढ़ाने के लिए छोड़ दिया है और क्या वह किसी की छटपटाहट की शिनाख़्त करते हुए ख़ुद इलाज की खोज में निकल पड़ा है।

अंत में एक और बात समझ आई कि देवता नहीं मरते, प्रेम भी नहीं, स्मृतियाँ भी नहीं, लेखनी भी नहीं!

बलराम को बहुत बहुत बधाई एक पठनीय रोचक संग्रहणीय उपन्यास को लिखने के लिए ।

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