इरशाद ख़ान सिकन्दर की कहानी ‘मंडी हाउस’

इरशाद खान सिकंदर नई नस्ल के कुछ अच्छे शायरों में एक हैं. नहीं पता था कि वे कहानियां भी लिखते हैं. उनकी एक कहानी उनकी पुरखुलूस शायराना जुबान में- मॉडरेटर

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हवा– मैं मंडी हाउस की हवा हूँ और राही मासूम रज़ा के “समय” की छोटी बहन हूँ, मंडी हाउस के बारे में कभी भी कुछ जानना हो तो आप बेझिझक मेरे पास आ जाइएगा, फ़िलवक़्त मैं आपको ले चलती हूँ अपने दो नौजवान अदाकार के पास! दोस्तो, शायरी में फ़िलबदी, इंटरव्यू में प्रेज़ेन्स ऑफ़ माइंड और अदाकारी में इम्प्रोवाइज़ेशन बड़े काम की चीज़ें हैं, आइये आपको मिलवाती हूँ… दुनिया के कैनवास से अभी तक गुम दो अदाकार महेंद्र और साजिद से, दोनों  मंडी हाउस के सेन्ट्रल पार्क में आ बैठे हैं….आ तो सुबह ही गए थे,लेकिन पार्क में अभी पहुँचे हैं, साहित्य अकादमी हो आये, दूरदर्शन के सामने चाय का दौर हो चुका, एनएसडी के बाहर सिगरेट फूँक चुके, श्रीराम सेंटर के बाहर लगे सारे नाटकों के होर्डिंग्स पढ़ चुके, फाइनली सी पी से एक एक क्वाटर मारने के बाद अब पार्क में आ बैठे हैं, रात होने यानी घर जाने में अभी बहुत वक़्त है, और करने को कोई काम नहीं, वेटिंग फॉर गोडो से लेकर महारथी,बेगम का तकिया.बड़े भाई साहब,कोर्ट मार्शल सब नाटकों की धुलाई हो चुकी, कुछ ताज़ातरीन नेशनल अवार्ड विनिंग अदाकारों  और फ़िल्मों को भी भरपेट गरिया चुके…सवाल ये है कि अब क्या करें … महेंद्र का दिमाग़ जगमगाया है….वो साजिद से आँखों आखों में गुफ़्तगू कर रहा है, और साजिद ने भी हाँ में गर्दन हिलाई है..और ये लीजिये आया दनदनाता हुआ सवाल….

महेंद्र– तू कौन है?
साजिद– लगा हुआ हूँ खोज में इक दिन पाऊंगा
कौन हूँ मैं फिर तुझको भी समझाऊंगा
महेंद्र–  अच्छा तू शायर है!
साजिद–  पता नहीं.
महेंद्र– चल मान ले कि तू शायर है
साजिद-मान लिया!लेकिन एक शर्त है
महेंद्र– वो क्या ?
साजिद– अफ़सानानिगार भी हूँ मैं
महेंद्र– चल ठीक है डन.
साजिद–  और…तू?
महेंद्र-मैं …मैं..नक़्क़ाद हो जाता हूँ
साजिद-चूतिये…अनपढ़… साले नक़्क़ाद होने के लिए पढ़ना पड़ता है
महेंद्र– क्या शायर के लिए नहीं?
साजिद- शायर के लिए कोई ज़रूरी नहीं…
महेंद्र- ये तुझे कैसे पता?
साजिद– मैंने कहीं पढ़ा था..
महेंद्र– ok…यार फिर तो अपना कोई नाम भी होना चाहिए न?
साजिद- शेक्सपियर ने कहा है नाम में क्या रक्खा है? तूने पढ़ा नहीं?
महेंद्र- हाँ लेकिन हम शेक्सपियर नहीं हैं ना?
साजिद– तो ठीक है यार इसमें प्रॉब्लम भी क्या है? रख लेते हैं …तू अपना नाम सोच मैं अपना सोचता हूँ!
दोनों बड़ी देर तक उधेड़बुन में लगे रहते हैं सब तरफ़ दिमाग़ के घोड़े दौड़ाने के बाद..
महेंद्र– सोचा कुछ तूने?
साजिद-नहीं यार दिमाग़ काम नहीं कर रहा
महेंद्र-एक नाम सोचने में इतना टाइम?अबे शेर कैसे सोचेगा?
साजिद-शेर कहना और बात है,नाम रखना और..
महेंद्र-क्या और ..?
साजिद-यही कि नाम रखना कोई बच्चों का खेल नहीं
महेंद्र-और शायरी?
साजिद-शायरी…शायरी भी बच्चों का खेल नहीं है
महेंद्र-ह्म्म्म तू ग़ालिब ही क्यों नहीं रख लेता?
साजिद-तूने अपना नाम सोच लिया
महेंद्र– नहीं
साजिद-तो यास यगाना चंगेज़ी रख ले..
महेंद्र-मज़ाक़ मत कर…
साजिद-शुरुआत तो तूने की थी …..गांजा है?
महेंद्र-हाँ है
साजिद-सिगरेट भर मैं धार मार के आता हूँ..
साजिद पेशाब करने चला जाता है ..महेंद्र जॉइंट बनाने लगता है कुछ देर में साजिद वापस आकर अपनी जगह पर बैठ जाता है, महेंद्र जॉइंट बना चुका है
महेंद्र-जलाऊँ कि तू जलाएगा?
साजिद-जला जला …(महेंद्र गांजे का कश लगाने लगा और साजिद तरन्नुम से शेर गुनगुनाता है)
जब हो माशूक़ चरस चेहरा तो आशिक़ आँखें
देखकर ख़ूब लगाती हैं दम उलटे सीधे
महेंद्र-ये कौन सा गाना है?
साजिद-गाना नहीं है चूतिये…फ़रहत एहसास का शेर है ये
महेंद्र– तो तू गा क्यों रहा था …अच्छा शेर कहा जाता है.. पढ़ा जाता है..हाँ शेर कमज़ोर हो तो तरन्नुम कम्पलसरी हो जाता है…
साजिद-साले दो फूँक मारते ही करेक्टर में आ गया तू तो…इधर ला मुझे दे मुखाग्नि  और नाम सोच अब
महेंद्र-सोच लिया तुम्हारा भी अपना भी..
साजिद-साले…गांजा असर कर गया तुझे ..बता
महेंद्र-तुम्हारा नाम रामलाल चिमनी
साजिद-ये चिमनी क्या है?
महेंद्र-तख़ल्लुस है
साजिद-लेकिन चिमनी क्यों?
महेंद्र-नम्बर एक की ये यूनिक है
साजिद-और नम्बर दो?
महेंद्र-कुछ नहीं बस यूनिक है…
साजिद-अच्छा तू अपना बता
महेंद्र-मेरा रहमान क़ैंची
साजिद-ये क़ैंची क्यों?
महेंद्र-क्योंकि…
साजिद-समझ गया यूनिक है.
महेंद्र-नहीं समझे
साजिद-तो?
महेंद्र-क़ैंची इसलिए क्योंकि नक़्क़ाद की ज़बान क़ैंची जैसी चलती है…
साजिद महेंद्र– (दोनों साथ में हँसते हैं)हाहा हाहा हाहा हहह्ह्हहहाहा
हाहाह हाहाह हा ….अबे हहाहाह
महेंद्र-ह्ह्ह्ह…ओह्ह्ह. चल src के सामने चलें?
साजिद-क्यों चाय पीनी है?
महेंद्र-नहीं दीदी के पास बैठकर किताब उलटे पुल्टेंगे
साजिद-नहीं वहां अंकित होगा …उससे मेरी फिर लड़ाई हो जायेगी
महेंद्र-एनएसडी चलें?
साजिद-नहीं अभी सारे अमिताभ वहीँ खड़े होंगे
महेंद्र-साहित्य अकादमी चलें?
साजिद-अजीब चूतिया है..चलें चलें क्या लगा रक्खी है तूने..? यहाँ पार्क में क्या दिक़्क़त है तेरे को?
महेंद्र-अबे भड़कता क्यों है…चल यहीं ठीक है ..कहीं नहीं जायेंगे!
कुछ देर दोनों चुप हो जाते हैं फिर साजिद घास पर लेट जाता है
महेंद्र-अबे तू तो लेट गया
साजिद-तू भी लेट जा
महेंद्र-क्यों?
साजिद-लेट के कर लियो
महेंद्र-क्या?
साजिद-तनक़ीद
महेंद्र-हाँ वो तो हम भूल ही गए ….यार चिमनी तू अपना कोई अफ़साना सुना
साजिद-गांजा और है?
महेंद्र-हाँ लास्ट
साजिद-ठीक है बना
महेंद्र गांजा बनाकर सिगरेट साजिद की तरफ़ बढ़ाता है
महेंद्र– ये ले चिमनी इस बार तू जला
साजिद-जला के दे न? मैं अफ़साना याद कर रहा हूँ
महेंद्र– ओह….एक मिनट(जलाकर देते हुए) ये ले
साजिद (कश लेते हुए)एक कहानी  सुन
महेंद्र– सुना
साजिद-यार मेरे गाँव का एक लड़का था मजनू और बग़ल वाले गाँव की एक लड़की थी लैला दोनो इंटरकालेज में साथ पढ़ते थे ….
महेंद्र– अबे लैला मजनू तो अरब की कहानी है और वो दोनों तो मदरसे में पढ़ते थे
साजिद-साले..कहानी मैं सुना रहा हूँ कि तू? दुनिया में सिर्फ़ अरब वाले ही लैला मजनू इश्क़ करते थे?हमारे गाँव के लैला मजनू इश्क़ नहीं कर सकते?….अबे हमारे गाँव वाले आशिक़ माशूक़ का नाम कुछ और था लेकिन उनके इश्क़ की शिद्दत को देखते हुए ज़माना उनको लैला मजनू कहने लगा था समझे…साले तुम नक़्क़ाद हो तो क्या अफ़साना पूरा हुए बिना क़ैंची चला दोगे?आंय?
महेंद्र-(बनावटी अदाकारी से) मोहतरम रामलाल चिमनी साहब आपसे दस्तबस्ता गुज़ारिश है कि आप ग़ुस्सा थूक कर अपना अफ़साना मुकम्मल कीजिये…अब हम नहीं बोलेंगे…बस ये मुखाग्नि हमें दे दीजिये
साजिद-नौटंकी ज़रा कम करो और करेक्टर का मज़ाक़ मत उड़ाओ, जो करेक्टर तुमको दिया गया है उसका इस्तेमाल सही जगह करो समझे ….हाँ तो मैं बता रहा था कि मेरे गाँव का जो मजनू था उसके प्यार मोहब्बत में कभी किसी तरह की कोई अड़चन पैदा नहीं हुई जैसा कि फिल्मों में किस्से कहानियों या हक़ीक़त में भी …समझ गए न?
महेंद्र– जब सब कुछ नॉर्मल था तो इसमें कहानी कहाँ बनी?
साजिद-बनी बेटा कहानी बनी…सभी कहानियां इश्क़ से शुरूअ होकर मौत पर या ज़ियादा से ज़ियादा तमाम मुश्किलों के बाद शादी पर ख़त्म हो जाती हैं लेकिन यहाँ तो कहानी शुरूअ ही शादी के बाद हुई है
महेंद्र-अच्छा?
साजिद– हाँ…. मतला सुन, झूट हो मेरी बात अगर, तेरा जूता मेरा सर
महेंद्र-अबे मतला नहीं अफ़साना सुना
साजिद– क्यों? मैं शायर भी तो हूँ जब जो जी में आयेगा सुनाऊंगा, जी में आया तो अफ़साना जी में आया तो अशआर
महेंद्र– लेकिन सुनाने का भी कोई रूल होना चाहिए कि नहीं…
साजिद– हाँ होना तो चाहिए…चल ठीक है फिर …सुन …मजनू की शादी हो गयी और सुहागरात में मजनू ने फ़ैसला किया कि वो लैला से जिस्मानी तअल्लुक़ात तब तक नहीं बनाएगा जब तक उसकी नौकरी नहीं लग जाती…
महेंद्र– अच्छा फिर?
साजिद– फिर क्या सुबह मुंह अँधेरे ही मजनू दिल्ली कमाने के लिए चल पड़ा यहाँ उसके कुछ दोस्त रहते थे उनके पास ठहरा,
महेंद्र– नौकरी लगी कि नहीं?
साजिद– लगी लेकिन तीन महीने लग गए, तीन महीने बाद उसे एक कारख़ाने में गार्ड का काम मिला..और जब उसे पहली तनख़्वाह मिली  उस रात पहली बार मजनू ने  लैला से जिस्मानी तअल्लुक़ात क़ायम किया
महेंद्र– लेकिन कैसे? लैला तो गाँव में थी ना?
साजिद– तसव्वुर में प्यारे तसव्वुर में …
महेंद्र– ओह्ह…ख़तरनाक तसव्वुर है…आगे बोल
साजिद-आगे क्या …अब तसव्वुर वाला सिलसिला शुरूअ हुआ तो रोज़ाना चलने लगा…और नतीजतन माशाअल्लाह लैला के पांव भारी हो गए
महेंद्र– हद है यार …सब कुछ तसव्वुर में हो रहा था ना?
साजिद– तो?
महेंद्र– तो इस तरह लैला के पांव कैसे भारी हो सकते हैं?
साजिद- क्यों नहीं? तूने पढ़ा नहीं था अरब वाले क़िस्से में जब मुदर्रिस मजनू के हाथ पर छड़ी मारता है तो लैला तड़पती है और उसके हाथ पर चोट के निशान उभर आते हैं …उसी तरह यहाँ लैला के पांव भारी हो गए
महेंद्र– अबे साइंस कोई चीज़ है कि नहीं भाई
साजिद– साइंस की ऐसी तैसी..और तू ज़ियादा नक़्क़ादी मत झाड़ वरना मजनू वाला तसव्वुर मैं तुझपे हक़ीक़त में बदल दूंगा
महेंद्र– (गुनगुनाते हुए) जो तुमको हो पसंद वही बात कहेंगे तुम दिन को अगर रात कहो रात कहेंगे..आली जनाब राम लाल चिमनी साहब हमने अपनी क़ैंची अन्दर डाल ली है …आप …वो हिंदी में क्या कहते हैं …हाँ उवाचते जाइए
साजिद– इसका क्या मतलब हुआ?
महेंद्र – कुछ नहीं आप लैला मजनू वाला कंटीन्यू कीजिये
साजिद– ह्म्म्म …तो होना क्या था, उधर लैला के पांव भारी हुए और पूरे गाँव में कानाफूसी शुरू हो गयी, अब भाई एक कहावत है ना कि  पतीली पर ढक्कन होता है मुंह पर नहीं, सो गाँव भर मुंह बजाने लगा, मजनू के घर वाले  लैला से पूछने  लगे कि किसका है? लैला ने बिंदास हो बताया कि “और किसका होगा? उन्ही का है”
पूरे गाँव और मजनू के घर वालों ने हर तरह से हिसाब लगाकर देख लिया, लेकिन ज़र्रा बराबर भी कुछ समझ नहीं आया, वो तो अभी तक यही नहीं समझ पाए थे कि सुहागरात की भोर में ही लड़का घर से चला क्यों गया वो भी तब जब लड़की और लड़के का इश्क़ पूरे इलाक़े में मशहूर रहा हो..और दोनों की शादी भी ख़ुशी ख़ुशी हुई हो  ख़ैर थक हारकर सबने इस गुत्थी को सुलझाने का ज़िम्मा वक़्त और मजनू पर ही डाल  दिया…(साजिद ख़ामोश हो जाता है)
महेंद्र– चिमनी साहब अफ़साना मुकम्मल कीजियेगा कि इतने ही को मुकम्मल समझूं?
साजिद– अबे जाहिल ही हो क्या ..साले तुमको नक़्क़ाद किसने बना दिया?
महेंद्र-यार तुम तो बात बात में भड़क जाते हो..सुनाना हो तो सुनाओ नहीं तो हम चलें टाइम हो गया घर जाने का
साजिद– अच्छा तुम्हारा  घर भी है वाह ..ख़ैर अब मुआमला क्लाइमेक्स पर ही है …हुआ ये कि एक दिन मजनू ने कारख़ाने के मालिक से ये कहकर  छुट्टी ली कि उसे घर जाना है उसकी वाइफ़ की डिलीवरी है..मालिक ने एक डब्बे मिठाई उसकी तनख़्वाह और ख़ूब सारी दुआओं के साथ उसे विदा किया..मजनू जब घर पहुंचा तो उसकी बीवी को घरवाले अस्पताल लेकर गए हुए थे…वो भागा भागा अस्पताल पहुंचा तो उसे देखकर घरवालों का मुंह जो पहले से लटका हुआ था और लटक गया..मजनू कुछ समझ पाता इतने में नर्स अन्दर से बाहर आई और बोली मुबारक हो लड़का हुआ है …घर वालों ने मजनू की तरफ़ ऐसे देखा जैसे अब उनका लटका मुंह धड़ाम से नीचे गिर पड़ेगा लेकिन मजनू हैरत से उछलते हुए अपनी माँ का हाथ खींचता हुआ अपने बेटे से मिलने के लिए लपका ..और ज़ोर ज़ोर से चिल्लाये जा रहा था मैं उसका नाम फ़रहाद रखूँगा…मैं उसका नाम फ़रहाद रखूंगा…
महेंद्र– (ख़ूब हँसता है) ओ भाई ..अब तू करेक्टर से बाहर आजा ..बहुत हुआ तेरा इम्प्रोवाइज़ेशन…बस कर अब .
साजिद-(करेक्टर से बाहर निकलकर हँसते हुए)…कैसा था….
महेंद्र– सुपर …अगर ये लिख लिया गया होता तो कमाल की चीज़ दर्ज हो जाती
साजिद– यार कमाल की चीज़ें कभी दर्ज हो ही नहीं पातीं, जो दर्ज होती हैं उन्ही को कमाल समझना पड़ता है …आ घर चलें .. (समाप्त)

 

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