गरिमा जोशी पंत की कहानी ‘संवेदनाओं की छिपकलियां’

व्यक्ति अपनी किशोरावस्था में जैसा होता है क्या यह ज़रूरी है कि एक लंबा उम्र जी लेने के बाद उसकी वह भावनाएँ, संवेदनाएँ बदलती होंगी ? वह उसे समझ पाता होगा और क्या समझ कर निर्ममता से उसे स्वीकार कर पाता होगा? इन्हीं सारे सवालों के साथ अपने अंतःमन में झांकने की कहानी लिखी है गरिमा जोशी पंत ने। आप भी पढ़ सकते हैं-

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संवेदनाओं की छिपकलियां

“आओ एस एस, क्या हाल चाल भाई? वेलकम वेलकम”, अपनी मन की आवाज़ को जुबान की आवाज़ से परास्त करते हुए मैंने कहा।

एस एस चहक के अंदर आया और इत्मीनान से सोफे पर पसर कर बैठ गया। उसके बैठने के अंदाज़ से ही अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि आज साहब देर तक पसरेंगे।

मन खीझ के रह गया।

बीवी पानी लेकर आई तो खीझ में इज़ाफा हो गया। मन ही मन मैंने कहा,” जब देखो मेहमानवाजी में लगी घरेलू औरत! बस अपने को अच्छा दिखाना है। कुशल, मृदुभाषी, रिश्ते निभाने वाली गृहिणी के रूप में स्थापित करना ही इसके जीवन का उद्देश्य रह गया है।

लोगों से चाय, नाश्ता, पत्नी, बच्चों के बारे में पूछते रहो। यही हुआ।

” कैसे हैं शांति भैय्या? और भाभी? चाय लेंगे या कॉफी”, पत्नी ने पूछा।

“चाय चलेगी भाभीजी। वही आपकी स्पेशल अदरक इलायची वाली और थोड़ी साथ में नमकीन। वैसे आपके हाथ के अप्पे भी बहुत पसंद हैं मुझे तो।”

उल्लू के पट्ठे शांति ने भी पूरी फरमाइश कर दी। हां शांति ही नाम है उसका। शांतिस्वरूप। एस एस उससे ही बना है।

“अरे तो अप्पे बन जायेंगे। वह तो इंस्टेंट रेसिपी है। आप दोनों गप्पें लगाएं, हम चूल्हे पर अप्पे लगाते हैं।” ऐसा कह पत्नी खुद ही ठठाकर हंस पड़ी। शांति भी हंस दिया। बहुत ही हंस दिए दोनों ऐसे ढाई पैसे के मज़ाक पर।

मन और खीझ गया। पर हंसा मैं भी। हम सभी अपने जीवन में थोड़े अभिनेता तो होते हैं।

अब चाय तो चाय। अप्पे भी बनेंगे तो शांति और ज्यादा बैठेगा और बे सिर पैर की उबाऊ बातें करेगा।

रविवार की छुट्टी और मुझे एक फिल्म देखनी थी। फिर किसी कॉलेज के एन एस एस कार्यक्रम के लिए एक टॉक तैयार करनी थी। विषय था, ” वर्तमान समय में युवा और उनकी मरती संवेदनाएं”

संवेदनाएं मर ही तो रही हैं। इंसान स्वार्थी हो गया है। पड़ोसी को पड़ोसी की खबर नहीं। हम आपाधापी में लगे हैं। प्रतिद्वंदी बन बैठे हैं, एक दूसरे के। आज का युवा भटक रहा है। एकल हो गया है। कुंठा, ईर्ष्या, हिंसा, नशा उसके जीवन के अंग बनते जा रहे हैं। जरूरत है कि आज की पीढ़ी और उनसे पहले की पीढ़ी के बीच संवाद का एक सेतु बने। आज की पीढ़ी, पुरानी पीढ़ी से ठहराव सीखे। टॉक के लिए ऐसा ही कुछ सोच रहा था कि शांति अशांति बन टपक पड़ा।

फिल्म तो शांति के साथ बैठ भी देखी जा सकती थी। लेकिन फिर वह तीन घंटे बैठेगा और उसके साथ फिल्म देखना.. ना बाबा ना।

वह फिल्म पत्नी के साथ भी नहीं देखी जा सकती। बुद्धिजीवी व्यक्ति के देखने लायक आर्ट फिल्म है। फिल्म की नायिका हकलाती है। पूरी कहानी उसकी इस कमी के इर्द गिर्द घूमती है। उसका हकलाना एक संघर्ष है। पिछले संडे फिल्म देखने लगा तो लाइट चली गई। आज सोचा तो शांति आ गया।

मुझे लगा ये तो बोलेगा। बोलता रहेगा। मैं मन ही मन टॉक की तैयारी करता हूं।

” आज के युवा की संवेदनाएं मर गई हैं। अंधी दौड़ में वह अपने प्रतिद्वंदी की टांग खींच उसे नीचे कर रहा है। अब दोस्त नहीं, प्रतिद्वंदी हैं सब। यह दौड़, ईर्ष्या पैदा करती है। ईर्ष्या से मनुष्य की भावनाएं हिंसक होती हैं…

हमारा देश, संस्कृति, धर्म, शास्त्र, हमें क्या सिखाते हैं? दूसरो की व्यथा समझना। युवा धर्म, संस्कार, संस्कृति से दूर होता जा रहा है…

इस बीच शांति अपने पतले चेहरे पर जड़ी दो बड़ी बड़ी गोल गोल आंखों से कमरे में चारों ओर देख रहा था। उसकी पुरानी आदत है। ऊपर की ओर मुड़ी घनी पलकों से बद्ध उसकी बड़ी बड़ी गोल गोल आँखें हैं उसकी।मेरी पत्नी भोली आंखें कहती हैं उन्हें, जिज्ञासा से भरी।

पगली है वह तो। हम स्कूल कालेज में उसकी इन आंखों के चलते उसे “चौंकू पंडित” कह उसका मज़ाक उड़ाते थे। एक ही स्कूल रहा हमारा बचपन में। एक ही मुहल्ले के भी थे। फिर एक ही कालेज में दाखिला मिला। “पतलू राम” या “सींकिया पहलवान” बोल कर भी खूब चिढ़ाया था उसे। कैसा पतला सा था। “मरियल बकरी, आगे भी तो बोल। मैं.. मैं… किए जा रहा है… यही कहा था राजेंद्र ने एक दिन। वो आगे क्या बोलता। हमने फिर बोलने कहां दिया उसे। हंसी के फव्वारों के बीच उसकी बात ने बीच में ही दम तोड़ दिया था।

मैं उस चौंकु की आंखें देख मन ही मन हंस पड़ा। पता नहीं तब ही अपने युवा होते बेटे बेटी की यह बात कैसे और क्यों याद आ गई, ” कैसी बॉडी शेमिंग करते हो आप लोग, मोटा, काला, हकला, पतला, बौना, डिस्गस्टिंग…”

बच्चों का यूं टोकना मुझे अच्छा नहीं लगा था। मैंने डपट दिया था उन्हें। ” अरे मोटे हैं, तो कसरत करें,

इंसान को डिस्क्राइब कर रहे हैं हम तो बस।”

लेकिन आज शांति की उड़ाई मज़ाक की याद मुझे थोड़ा बेचैन कर गई। मैंने झटक दिया बेचैनी को ,” लड़कपन ” कह कर। मैं अपने ऊपर कोई दोष नहीं लगाना चाहता था।

“तुझे पता है विमल”,

शांति ने मेरी विचार श्रृंखला तोड़ी। ” मैं कल कहीं जा रहा था। सड़क के डिवाइडर पर प्लांट्स होते हैं ना, धूल से भरे, हरे पौधे। वो थे। एकदम नीचे बस एक नारंगी रंग का जीनिया का फूल झांक रहा था। देखता रह गया मैं। बहुत सुंदर था। बस एक छोटा फूल, सब बड़े बड़े पौधे।”

मुझे हमेशा की तरह उसकी यह बात बे सिर पैर की लगी।

” अभी तेरे घर पर देखा ना, ये ऑरेंज कुशन और हरे परदे का बैकग्राउंड तो वो जिनिया याद आ गया”, उसने फिर कहा।

“क्या अजीब आदमी है ये”, मैंने सोचा। किस बात से इसे क्या याद आ जाता है। पर मालूम नहीं क्यों मुझे भी उसकी इस बात, और उसके पश्चात मेरे सोचने से एक बात याद आ गई। कॉलेज के पहले साल, सीनियर्स रैगिंग कर रहे थे हमारी। पतले दुबले शांति से सीनियर्स ने कहा, ” जा बे सींक। वो लड़की जा रही है ना, उसके कुर्ते में यह बर्फ़ का टुकड़ा डाल आ।”

शांति नहीं हिला। चुप चाप खड़ा रहा।

” जा ना! जा वरना, खायेगा लाफे हमसे। हम आठ हैं। 16 लाफ़े पड़ेंगे।

शांति फिर भी नहीं गया।

“देख लड़की मारेगी तो हम आ जायेंगे बचाने। हमसे कोई नहीं बचाएगा। वैसे भी लड़कियां खुद ही डर जाती हैं। कम ही होती हैं ऐसी जो सैंडल निकाले। जा ये भोली भाली लग रही है। कुछ न कहेगी। “

हम सब इंतजार कर रहे थे, लड़की के कुर्ते में बर्फ डाली जाए और तदुपरांत कोई सीन बने।

पर शांति नहीं गया।

“मैं नहीं जाऊंगा। मैं किसी लड़की को अपमानित नहीं कर सकता ऐसे सरेआम। आप मार लो।”

पिट गया उस दिन शांति। उसकी कोई बहन नहीं थी। एक बड़ा भाई था बस। मेरी दो बहनें थीं। एक छोटी, एक बड़ी। घर की इज्जत थीं। कोई उन्हें छेड़ दे तो बात मरने मारने पर आ जाती थी। पर उस दिन मैं भी सीन देखना चाहता था। किसी अनजान रास्ते चलती लड़की के लिए मुझ दो जवान बहनों के भाई के अंदर कोई संवेदना नहीं थी, शांति में कैसे थीं? मैं फिर बेचैन हो गया। मन बोल पड़ा मेरा,” अरे कोई संवेदना नहीं, डरपोक था वो। साइकिल चलानी नहीं आई थी उसे कितने ही दिन, बाद में आई भी तो भी भीड़ में नहीं चला पाया ठीक से। किसी के स्कूटर के पीछे भी बैठता था तो लड़कियों के जैसे, दोनों पैर एक तरफ़ कर के बैठता था। दाढ़ी मूंछ भी कितनी देर से आई थीं।” मेरी बेचैनी फिर थोड़ी कम हुई।

पत्नी अप्पे और चटनी ट्रे में सजा कर ले आई।साथ में चाय भी।

उसने फिसलते दुपट्टे को कंधों पर डालते हुए अप्पे की प्लेटें पकड़ाई। एक हाथ से दुपट्टा ठीक करती रही।

“गैली”, मेरे मन ने कहा।

“पहले साड़ी के पल्लू संभालती रहती थी। अब दुपट्टा। ठीक है तब मेरी मां चाहती थी कि वह साड़ी पहने, सिर ढक कर रखे। मैंने उस समय भी कितना चाहा था, पैंट , मिड्डी ना सही, सलवार कुर्ते पहने कभी। थोड़ी आधुनिक सी दिखे।

” देखो मां चाहती है कि ऐसे रहूं तो क्या दिक्कत है। कितनी अच्छी हैं। कितनी कम सास ऐसी होती हैं जो बहु के काम में हाथ बंटाती हैं। गुड्डू के टाइम पर ऑपरेशन हुआ था मेरा तो उन्होंने खुद ही मुझे गाउन पहनने को कहा था। सारा काम खुद करती थीं। मीरा और गुड्डू को उन्होंने ही संभाला। मीरा भी सिर्फ तीन साल की थी उस समय और गुड्डू तो एकदम छोटा। मेरे पैरों तक की मालिश की उन्होंने। एक ही तो चाह है उनकी कि मैं बिंदी , चूड़ी, साड़ी में रहूं। क्या फ़र्क पड़ता है। अब तो आदत भी हो गई इन सबकी। साड़ी पहनना कहां आता था मुझे। उन्होंने ही सिखाया।”

मेरे सामने अपनी दिवंगत मां और पत्नी के बीच की ये परस्पर स्नेहिल संवेदनाएं हिलोरें लेने लगीं। एक स्त्री की दूसरी स्त्री के प्रति संवेदनाएं।

लेकिन मन ने उन संवेदनाओं के कान उमेठ उन्हें बैठा दिया। मन फिर उचक के बोला, “अब तो मां , बाबा दोनों नहीं रहे। अब किसका सम्मान करना है? पर क्या ख़ाक पहनेगी अब? बेडौल हो गई है। कोई एक्सरसाइज नहीं। बस बुहार फटकार में लगी रहती है। कभी घुटना दर्द, कभी ऐड़ी। हुंह।”

” बहुत अच्छे अप्पे बने हैं। आप के हाथ में बहुत स्वाद है भाभी। मुझे बताओ कैसे बनाते हैं, मैं श्यामली को बना कर खिलाऊंगा। अदरक की चाय तो उसे अब मेरे हाथ की ही अच्छी लगती है। एक दिन उसे अप्पे बना कर खिलाऊंगा। आजकल उसका बहुत कुछ करने का दिल नहीं करता। वेट गेन हो रहा है। बहुत पाल्पीटेशन होते हैं उसे। जोड़ों में दर्द होता है। डॉक्टर्स का कहना है, मिडिल एज हार्मोनल इंबैलेंस है। लाइफस्टाइल और खाना ठीक करो। टेंपररी है। ठीक हो जायेगा। आजकल हम दोनों वॉक पर जाते हैं सुबह शाम। ये अप्पे काफी हेल्थी डिश है। यही बना कर खिलाऊंगा श्यामली को।”

मेरे अंदर एक और संवेदना ने नाखून चुभाया।

मैंने अपनी पत्नी के खाने की तारीफ कब की थी, याद नहीं। पर उसे ताने देने से कभी बाज़ नहीं आता।उसकी किसी भी स्वास्थ्य संबंधी शिकायत से मुंह फुला लेता हूं।

शांति को क्या हम गलत समझे थे? पता नहीं कहां से आज मेरी संवेदनाएं सिर उठा रही थीं ! ये वही शांति है जिसने कभी सिविक्स की किताब में जाति समानता की बात पढ़ कर, अपने सरनेम को त्याग दिया था कक्षा नौ में । हम तब भी बहुत हंसे थे। सुना था, घर पर भी बहुत डांट पड़ी थी शांति को। पर वह शांति जिसे हम गधा समझते थे, उस समय अड़ियल टट्टू बन कर रहा और उसने फिर कभी अपने नाम के आगे सरनेम नहीं लगाया।

मैं उठा और अपने आप पानी पीने किचन में चला गया। पत्नी से नहीं कहा। पता नहीं क्यों, वहां मेरी सांस घुट रही थी। बौना सा महसूस कर रहा था इसलिए अपने कद्दावर शरीर के गठन को खड़े होकर महसूस करने से थोड़ा अच्छा लगा। पत्नी पीछे पीछे सकपकाई सी आई, ” अरे मुझे कहते पानी के लिए। आप बैठिए ना शांति भैय्या के पास।” ।

” नहीं वो मुझे बाथरूम भी जाना था”, मैंने कहा। बाथरूम से वापस आया तो शांति मेरी पत्नी से अप्पे बनाने की बारीकियां सीख रहा था।

मुझे देखते ही बोला,” तू भी खा ना विमल। बहुत अच्छे बने हैं। अरे सुन!

श्यामली याद कर रही थी तुझे। घर आ ना कभी। राजेंद्र, नवल, आशु , सब आओ यार किसी दिन। श्यामली को तो तुम सब जानते हो। दोस्त बैठेंगे एक साथ।”

हां श्यामली को तो हम सब जानते थे। हमारे ही कॉलेज में थी। फाइन आर्ट्स की स्टूडेंट थी श्यामली । सांवली सी श्यामली, जिसके होंठ भरे भरे थे और आंखें छोटी। कॉलेज में ठंडे हवा के झोंके सी आई थी वह।

बिना दुपट्टे के वास्केट वाले सूट हमने उसे ही पहने देखा था। वह लॉन्ग स्कर्ट पहन कर आती और हम छुप छुप कर उसे देख आहें भरते। हम सब छुप कर उसी की बातें करते। कैंटीन में ऐसी जगह बैठते जहां से वह दिखे। वो आती तो जोर जोर से हंसते। कभी रूप तेरा मस्ताना जैसा गाना गाने लगते। कभी बात हमने उससे नहीं की। वह दबंग लगती थी। उसे हमारी इन उटपटांग हरकतों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। कभी कभी बहुत हो जाने पर अपनी छोटी छोटी आंखों से इतना घूर के देखती थी कि हमारी लंपटता थोड़ी सी ही सही भस्म हो जाती थी। उसे रंग मिला था पिता का और नैन नक्श मां के। पिता सिख थे उसके, और मां नॉर्थ ईस्ट की। हमारी संवेदनाएं, नॉर्थईस्ट के लोगों के लिए अलग थीं। थोड़ी अश्लील! वे संवेदनाएं नहीं थीं। कुत्सित विचार थे।

शांति भी उसे शांति से बैठा देखा करता था, मुग्ध होकर।

एक दिन हमने चढ़ाया शांति को , ” शांति लगता है, प्रेम करता है श्यामली से। जा, अपने दिल की बात बोल दे उसे। शांति शरमाया। हम हंसी दबा, उसे चढ़ाते रहे। हम चाह रहे थे कि यह मरियल गधा चने के झाड़ पर चढ़े और श्यामली की सैंडल के नीचे दब कर दम तोड़ दे। शांति अगले दिन ही पहुंच गया अपना दिल खोलने, श्यामली के पास। हम गधे और शेरनी का युद्ध देखने के अभिलाषियों के दिल पर अगले ही दिन से ये मोटे मोटे सांप लोटे।

श्यामली और शांति अब हमेशा साथ होते। कला,कविता, साहित्य पर बातें करते, साथ कॉफी पीते। हंसते, खिलखिलाते दिखते।

अरे बेवकूफ लड़की ने क्या देखा शांति में। हमें पता था उसका नाम शांतिस्वरूप है, फिर भी हमने यह कहने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि “श्यामली को शांति नाम की सखी मिल गई. दोनों सखियां साथ में गट्टे खेलती हैं, चित्र बनाती हैं, खाना खाती हैं।”

कभी हम चिढ़ के ये भी कहते, ” अरे मां ने जैसे बाप को फांसा, ऐसे बेटी ने भी एक गुलाम फांस लिया। ये नॉर्थईस्ट वालियां भी ना फांसने में तेज होती हैं। मछली सी आंखों से मगरमच्छ फांस ले ये।”

पता नहीं क्यों पर हमारी उम्र बढ़ रही थी लेकिन हमारी संवेदनाओं का लड़कपन जा ही नहीं रहा था। और एक दिन शांति ने हमें फिर चौंका दिया। बी ए फाइनल पूरा नहीं हुआ था और अगले ने बैंक परीक्षा पास कर ली। बी ए का रिजल्ट आते ही उसकी नौकरी लग जायेगी। परीक्षा हम सबने दी थी। वह पास हो गया। उसे पास होना था श्यामली के साथ घर बसाने के लिए। वह जुट गया। हमारे पास ना छोकरी थी, ना नौकरी। हम जले भुने बैठे थे। दिलजलों ने एक स्वर में एक संवेदना रहित बात कही, ” विकलांगों का भी कोटा होता है। आरक्षण की जय हो।” जबकि हम जानते थे, शांति विकलांग नहीं था।

हम कैसे ईर्ष्यालु हुए जाते थे श्यामली और शांति को लेकर कि हम यह सोच खुश होते रहे कि, शांति के विशुद्ध जाति परिवार वाले ये संबंध नहीं स्वीकारेंगे। इस रिश्ते का विरोध हुआ या नहीं, पता नहीं। पर एक दिन हमारे हाथ में शांतिस्वरूप वेड्स श्यामली का विवाह निमंत्रण पत्र था।

हम फिर उवाचे, ” घर वालों ने सोचा होगा कि हमारे इस छोकरीनुमा को कौन छोकरी देगा? कैसे हाथ पीले होंगे इसके। जो मिल रही है, जैसी मिल रही है, निपटा दो, हा हा हा…। ” बड़ी रावणिय, मुगम्बिय, हंसी हंस कर हमने अपनी संवेदना को कहीं दुबका दिया था उस दिन।

शांति मेरी पत्नी को बता रहा था कि वह खेल कूद में अच्छा नहीं था। दौड़ में हमेशा लास्ट आता था। गेंद कभी कैच नहीं कर पाया। बातों बातों में उसने मेरी और बाकी दोस्तों की तारीफें की।

ना जाने मैं क्यों सुन्न सा पड़ता जा रहा था। मेरा दिमाग मुझे एक कमज़ोर दुबले पतले लड़के की याद दिला रहा था जो अपने तगड़े दोस्तों की दोस्ती, उनका अपनत्व चाहता था। आज ना जाने क्यों पर मुझे ये बातें इतनी प्रभावित कर रही थीं। ग्लानि की कगार तक पहुंच रहा था कि मन खींच खींच के कहता रहा, ” अरे वह लड़कपन था। उसके मुंह पर कहा क्या तुमने कुछ? नहीं ना? दोस्ती निभाई ना। आता है न अभी भी तुमसे मिलने घर। यही संवेदना क्या कम है तुम्हारी?” क्या सच कह रहा था मन? या हम उसे जोकर समझ, उससे अपना मनोरंजन करते रहे। उसकी कमियों का मज़ाक बनाते रहे। उसके गुणों को किस्मत बता कर नज़रंदाज़ करते रहे।

“लड़कपन था वह”, मैंने मन की हां में हां मिलाई। इस दौरान पत्नी की निगाह शांति से बात करते करते भी, मुझ पर थी। मेरी बेचैनी को भांप कर वह चिंतित हो रही थी।

मैंने लड़कपन की थ्योरी को पकड़ खुद को आश्वस्त किया।

शांति चलने को तैयार हुआ। उसने फिर से दोस्तों की बैठक के प्रस्ताव को दोहराया और विदा ली। हम पति पत्नी उसे दरवाज़े तक छोड़ने गए। उसके सिर के बाल पीछे से उठे उठे से थे। जैसे परदे , कुशन के रंग से उसे झांकता हुआ जिनिया का फूल याद आया था, मुझे वह दिन याद आ गया, जब तक करीब करीब हम सब दोस्तों का विवाह हो गया था। हम सब नौकरी धंधे में लग गए थे। मैं शिक्षक बन गया था। कोई बिजली विभाग में था। कोई व्यापार कर रहा था। लड़कपन छोड़ हम व्यस्क जिम्मेदार पुरुष बन गए थे। शांति का विवाह हम सब में सबसे पहले हुआ था। वो भी श्यामली से। हम लड़कपन त्याग चुके थे पर खुन्नस थी। दोस्तों की महफिल जमी थी। तब शांति चुपचाप बैठा था। कितना ही ना मानें पर हमने अपने मनोरंजन के लिए उसे कुरेदा।

” यारों बाप नहीं बन पा रहा मैं। श्यामली को मां बनने का सुख नहीं दे पा रहा। पता नहीं उसमें कमी है या मुझ में। मैं सब जांच, इलाज के लिए तैयार हूं। बस श्यामली को बुरा ना लगे। वह दुखी न हो जाए। कोई अच्छा डॉक्टर का पता मालूम हो तो बताओ ना प्लीज।”

हम सब चाह रहे थे, शांति जल्दी रुखसत हो अब महफिल से और हम बातों के लच्छे बनाएं। विजय ने एक डॉक्टर का पता भी बता दिया और झूठी संवेदना प्रकट की, “श्यामली को तेरा साथ चाहिए यार। तू जा उसके पास। अकेला मत छोड़ा कर उसे।”

शांति चला गया था उस दिन। उसके सिर के बाल उस दिन भी ऐसे ही उठे उठे थे। ” उसके जाते ही हमने ठहाकों के बीच क्या क्या बातें नहीं की शांति और श्यामली की निजता की। क्या धज्जियां उड़ाई। क्या उपमाएं नहीं दी उनके अंतरंग संबंधों की। मैं एक शिक्षक हूं। आज वह सब बोल नहीं पाऊंगा। छी!

और जब बेटी होने की खुश खबर दी थी शांति ने तब भी हम क्या क्या कह कर खी खी कर हंसे थे। मुझे खुद से घृणा हो आई। बेचैनी ने फिर मुझे घेर लिया। इस बार मन लड़कपन का लॉलीपॉप भी नहीं थमा पाया मुझे।

पत्नी चिंतित थी। शांति को विदा करते ही मेरे पास आ गई, ” ठीक तो हो आप? क्या हुआ? डॉक्टर को दिखाना है?”

” नहीं कुछ नहीं, थोड़ी एसिडिटी, गैस हो गई है बस”, ऐसा कह उसके हाथ पकड़ कर मैंने उसकी हथेलियां अपनी आंखों पर रख लीं। इतने वर्षों बाद मेरे इस अप्रत्याशित व्यवहार से वह और चिंतित हो गई।

” इस बार अपने सारे टेस्ट करा लो। पचपन के हो गए हो। शुगर, कोलेस्ट्रोल, बी पी, सब। फल खाया करो ना। एंटीऑक्सीडेंट्स बहुत जरूरी हैं। स्ट्रेस मत लिया करो। मेडिटेशन करो। और ये टॉक शॉक कुछ नहीं देने जाओगे। लीव के लिए अप्लाई करो।”

मैं देखता रह गया। कितना कुछ जानती है ये। कभी तूल ही नहीं दिया। अगली ने जो पहना हो, जो किया हो, पूरा घर चलाया है।

“मैं मीरा , गुड्डू को भी फोन करती हूं। यहां आएंगे।”

” अरे क्यों बुलाती हो? उनकी नौकरी , पढ़ाई में क्यों डिस्टर्ब करना? “

“नौकरी, पढ़ाई होती रहेगी।जीवन में साथ देना, एक दूसरे को समझना, ये ज्यादा बड़ी पढ़ाई है। मीरा बड़ी समझदार है मेरी। कहूंगी, तो खुद ही दौड़ी आयेगी।और गुड्डू, उसे भी सीखना है अब ये सब।”

मैंने पत्नी की बातें मान लीं। टेस्ट करा लिए, छुट्टी ले ली।बच्चों को आना नहीं पड़ा।पर फोन रोज करते हैं।सब ठीक है।

एक दिन चौक तक गया था। पास में ही शांति का घर है। सोचा मिल आऊं। वहां गया। घंटी बजाई। श्यामली ने दरवाजा खोला। लॉन्ग स्कर्ट और क्रॉप टॉप पहने थी। बड़ी गर्मजोशी से स्वागत किया उसने। शांति भी आ गया। श्यामली दुबली पतली छरहरी सी थी अब भी। मुझे थोड़ी ईर्ष्या सी हुई। शांति चाय बना लाया। श्यामली ने कोई नए तरीके के पैनकेक बनाए। मेरी नज़र एक पेंटिंग पर गई। नीचे श्यामली का नाम था। पेंटिंग में एक कोलाहल भरी सड़क पा रोड के डिवाइडर में लगे बड़े हरे पौधों के बीच से एक नारंगी जिनिया झांक रहा था। डेट भी थी नीचे, चार दिन पहले की। शांति सिर्फ अप्पे नहीं खिला रहा था श्यामली को। वह उसको मानसिक रूप से भी पोषित कर रहा था। श्यामली अब भी आर्टिस्ट है।

पता नहीं क्यों मेरी ईर्ष्या बढ़ गई।

मुझे अपनी पत्नी के बी ए के विषय भी याद नहीं। मेरी बेचैनी फिर बढ़ने लगी।

मैं विदा ले बाहर आ गया। अच्छा है, मैं उस दिन टॉक देने नहीं गया था। मेरा मन फिर कोई सफाई देने को तत्पर था। आंखों के सामने वर्तमान के युवा , मेरे अपने बच्चे मुझे ” डिस्गस्टिंग” कह जैसे मुंह चिढ़ा रहे थे।

मेरी और मेरे जैसे कइयों की संवेदनाओं की छिपकलियां हमारे अपरिपक्व लड़कपन और उल्टी सीधी पूर्वाधारणाओं, पूर्वाग्रहों की संकीर्णता की सर्द सतहों की खोह में दबी पड़ी हैं। उन्हें बाहर आने के लिए अभी और अधिक समझ, और अधिक प्रेम और व्यापकता की ऊष्मा चाहिए। वे बाहर आएंगी तो नफरतों के कीट खायेंगी। विश्व में शांति और सद्भाव की स्थापना तभी होगी । मेरे अंदर का शिक्षित शिक्षक जाग रहा है। बेचैनी थोड़ी कम हो रही है। मैंने अपनी शर्ट के ऊपर के दो बटन खोल दिए। लंबी सांस ली। मैं घर जा रहा हूं।

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लेखक संपर्क- garima.pant2000@gmail.com

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