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  • मास्टर भगवानदास की कहानी ‘प्लेग की चुड़ैल’

     

    कुछ दिन पहले मैंने डेनियल डेफ़ो की किताब पढ़ी ‘ए जर्नल ऑफ़ द प्लेग ईयर’ पढ़ी। किताब 1665 में लंदन में आए प्लेग का रोज़नामचा है। आज की तरह की लॉकडाउन हो रहा था, लोग बाहर न निकलें इसके लिए प्रहरी तैनात थे। मरने वालों का अंतिम संस्कार करने वाले नहीं मिल रहे थे। दुकानें बंद थीं। छीना-झपटी की घटनाएँ बढ़ रही थीं। लेखक ने लिखा है कि इसका प्रकोप क़रीब एक साल तक रहा। मुहल्ला दर मुहल्ला आगे बढ़ता गया। उस जमाने में लंदन में क़रीब एक लाख लोग मारे गए थे। इस बीच लेखक मित्र शशिभूषण द्विवेदी ने मास्टर भगवानदास की इस कहानी का ध्यान दिलाया। कहानी 1902 में सरस्वती पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। आप भी पढ़िए-

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    प्लेग की चुड़ैल

    गत वर्ष जब प्रयाग में प्लेग घुसा और प्रतिदिन सैकड़ों गरीब और अनेक महाजन, जमींदार, वकील, मुख्तार के घरों के प्राणी मरने लगे तो लोग घर छोडक़र भागने लगे। यहां तक कि कई डॉक्टर भी दूसरे शहरों को चले गए। एक मुहल्ले में ठाकुर विभवसिंह नामी एक जमींदार रहते थे। उन्होंने भी अपने इलाके पर जो प्रयाग से पांच मील दूरी पर था, चले जाने की इच्छा की। सिवा उनकी स्त्री और पांच वर्ष के एक बालक के और कोई संबंधी उनके घर में नहीं था। रविवार को प्रात:काल ही सब लोग इलाके पर चलने की तैयारी करने लगे। जल्दी में उनकी स्त्री ने ठंडे पानी से नहा लिया। बस नहाना था कि ज्वर चढ़ आया। हकीम साहब बुलाए गए और दवा दी गई। पर उससे कुछ लाभ न हुआ। सायंकाल को गले में एक गिलटी भी निकल आई। तब तो ठाकुर साहब और उनके नौकरों को अत्यंत व्याकुलता हुई। डॉक्टर साहब बुलाए गए। उन्होंने देखते ही कहा कि प्लेग की बीमारी है, आप लोगों को चाहिए कि यह घर छोड़ दें। यह कहकर वह चले गए। अब ठाकुर साहब बड़े असमंजस में पड़े। न तो उनसे वहां रहते ही बनता था, न छोड़ के जाते ही बनता था। वह मन में सोचने लगे, यदि यहां मेरे ठहरने से बहूजी को कुछ लाभ हो तो मैं अपनी जान भी खतरे में डालूं। परंतु इस बीमारी में दवा तो कुछ काम ही नहीं करती, फिर मैं यहां ठहरकर अपने प्राण क्यों खोऊं। यह सोच जब वह चलने के लिए खड़े होते थे तब वह बालक जिसका नाम नवलसिंह था, अपनी माता के मुंह की ओर देखकर रोने लगता था और वहां से जाने से इंकार करता था। ठाकुर साहब भी प्रेम के कारण मूक अवस्था को प्राप्त हो जाते थे और विवश होकर बैठे रहते थे। ठाकुर साहब तो बड़े सहृदय सज्जन पुरुष थे, फिर इस समय उन्होंने एेसी निष्ठुरता क्यों दिखलाई, इसका कोई कारण अवश्य था, परंतु उन्होंने उस समय उसे किसी को नहीं बतलाया। वह बार-बार यही कहते थे कि स्त्री का प्राण तो जा ही रहा है, इसके साथ मेरा भी प्राण जावे तो कुछ हानि नहीं, पर मैं चाहता हूं कि मेरा पुत्र बचा रहे। मेरा कुल तो न लुप्त हो जावे। पर वह बेचारा बालक इन बातों को क्या समझता था! वह तो मातृभक्ति के बंधन में एेसा बंधा था कि रात भर अपनी माता के पास बैठा रोता रहा।
    जब प्रात:काल हुआ और ठकुराइन जी को कुछ चेत हुआ तो उन्होंने आंखों में आंसू भरकर कहा, ‘बेटा नवलसिंह! तुम शोक मत करो, तुम किसी दूसरे मकान में चले जाओ, मैं अच्छी होकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आऊंगी।’ पर वह लडक़ा न तो समझाने पर मानता था, न स्वयं एेसे स्थान पर ठहरने के परिणाम को जानता था। बहूजी तो यह कहकर अचेत हो गईं, पर बालक वहीं बैठा सिसक-सिसककर रोता रहा। थोड़ी देर बाद फिर डॉक्टर, वैद्य, हकीम आए, पर किसी की दवा ने काम न किया। होते-होते इसी तरह दोपहर हो गई थी। तीसरे पहर को बहूजी का शरीर बिल्कुल शिथिल हो गया और डॉक्टर ने मुख की चेष्टा दूर ही से देखकर कहा,‘बस, अब इनका देहांत हो गया। उठाने की फिक्र करो।’ यह सुन सब नौकर और नौकरानियां रोने लगे और पड़ोस के लोग एकत्रित हो गए। सबके मुख से यही बात सुन पड़ती थी,‘अरे क्या निर्दयी काल ने इस अबला का प्राण ले ही डाला, क्या इसकी सुंदरता, सहृदयता और अपूर्व पतिव्रत धर्म का कुछ भी असर उस पर नहीं हुआ, क्या क्रूर काल को किसी के भी सद्गुणों पर विचार नहीं होता!!’
    एक पड़ोसी, जो कवि था, यह सवैया कहकर अपने शोक का प्रकाश करने लगा-
    सूर को चूरि करै छिन मैं, अरु कादर को धर धूरि मिलावै।
    कोविदहूं को विदारत है, अरु मूरख को रख गाल चबावै।।
    रूपवती लखि मोहति नाहिं, कुरूप को काटि तूं दूर बहावै।
    है कोउ औगुण वा गुण या जग निर्दय काल जो तो मन भावै।।
    स्त्रियां कहने लगीं,‘हा हा, देखो वह बालक कैसा फूट-फूटकर रो रहा है! क्या इसकी एेसी दीन दशा पर भी उस निठुर काल को दया नहीं आई? इस अवस्था में कैसे बेचारा अपनी माता के वियोग की व्यथा सह सकेगा! हा! इस अभागे पर बचपन ही में एेसी विपत्ति आ पड़ी!’ ठाकुर साहब तो मूर्छित होकर गिर ही पड़े थे। नौकरों ने उनके मुंह पर गुलाबजल छिडक़ा और थोड़ी देर में वह सचेत हुए। उनकी मित्र मंडली में तो कोई महाशय उस समय वहां उपस्थित नहीं थे। उनके पड़ोसियों ने जो वहां एकत्र हो गए थे, यह सम्मति दी कि स्त्री के मृत शरीर को गंगा तट पर ले चलकर दाह-क्रिया करनी चाहिए। परंतु डॉक्टर साहब ने, जो वहां लौटकर आए थे, ने कहा कि पहले तो इस मकान को छोडक़र दूसरे में चलना चाहिए, पीछे और सब खटराग किया जाएगा। ठाकुर साहब को भी यह राय पसंद आई क्योंकि उन्होंने तो रात ही से भागने का इरादा कर रखा था, वह तो केवल उस लडक़े के अनुरोध से रुके हुए थे। क्या उस लडक़े को भी उस समय वहां से ले चलना सहज था? नहीं, वह तो अपनी मृत माता के निकट से जाना ही नहीं चाहता था। अंत में ठाकुर साहब ने उस बालक को गोद में उठा लिया और उसे गाड़ी में बिठलाकर दूसरे मकान की ओर रवाना हुए। अलबत्ता चलती बार ठाकुर साहब ने स्त्री के मृत शरीर की आेर देखकर कुछ अंग्रेजी में कहा था, जिसका एक शब्द मुझे याद है, फेयरवेल। नौकर सब ठाकुर साहब ही के साथ रवाना हो गए, परंतु उनका एक पुराना नौकर उस मकान की रक्षा के लिए वहीं रह गया। पड़ोसी लोग भी इस दुघर्टना से दुखी होकर अपने घरों को लौट गए, परंतु उनके एक पड़ोसी के हृदय पर इन बातों का एेसा असर हुआ कि वह वहीं बैठा रह गया और मन में सोचने लगा कि एेसी दशा में पड़ोसी का धर्म क्या है? इस देश का रिवाज है कि जब तक मुहल्ले में कोई मुर्दा पड़ा रहता है तब तक कोई नहाता-खाता नहीं। जब उसकी दाह-क्रिया का सब सामान ठीक हो जाता है और लोग उसको वहां से उठा ले जाते हैं, तब पड़ोसी लोग अपने-अपने दैनिक कार्यों में तत्पर होते हैं। परंतु यहां का हाल देखकर पड़ोसी बहुत विस्मित होता था और सोचता था कि यदि ठाकुर साहब भय के मारे अपने इलाके पर भाग गए तो मृतक की क्या दशा होगी। क्या इस पुण्यवती का शरीर ठेले पर लदकर जाएगा? उसने उस बुड्ढे नौकर के आगे अपनी कल्पनाओं को प्रकाशित किया। उसने कहा कि अभी ठाकुर साहब की प्रतीक्षा करनी चाहिए, देखें वे क्या आज्ञा देते हैं। वह पड़ोसी भी यही यथार्थ समझकर चुप हो गया और संसार की असारता और प्राणियों के प्रेम की निर्मूलता पर विचार करने लगा। उस समय उसे नानक जी का यह पद याद आया,‘सबै कुछ जीवत का ब्योहार’ और सूरदास का ‘कुसमय मीत काको कौन’ भी स्मरण आया। परंतु समय की प्रतिकूलता देख वह इन पदों को गा न सका। मन-ही-मन गुनगुनाता रहा। इतने ही में ठाकुर साहब के दो नौकर वापस आए और उन्होंने बूढ़े नौकर से कहा कि हम लोग पहरे पर मुकर्रर हैं और तुमको ठाकुर साहब ने बुलाया है, वह मत्तन सौदागर के मकान पर ठहरे हैं, वहीं तुम जाओ। उस बुड्ढे का नाम सत्य सिंह था।
    जब वह उक्त स्थान पर पहुंचा तो उसने देखा कि ठाकुर साहब के चंद मित्र, जो वकील, महाजन और अमले थे, इक_े हुए हैं और वे सब एकमत होकर यही कह रहे हैं कि आप अपने इलाके पर चले जाइए, दाह-क्रिया के झंझट में मत पडि़ए, यह कर्म आपके नौकर कर देंगे, क्योंकि जब प्राण बचा रहेगा तो धर्म की रक्षा हो जाएगी। तब ठाकुर साहब ने इस विषय में पुरोहित जी की सम्मति पूछी, उन्होंने भी उस समय हां में हां मिलाना ही उचित समझा और कहा कि धर्मशास्त्रानुसार एेसा हो सकता है, इस समय चाहे जो दग्ध कर दे, इसके अनंतर जब सुभीता समझा जाएगा, आप एक पुतला बनाकर दग्ध-क्रिया कर दीजिएगा।
    इतना सुनते ही ठाकुर साहब ने पुरोहित जी से कहा,‘यह तीस रुपये लीजिए और मेरे आठ नौकर साथ ले जाकर कृपा करके आप दग्ध-क्रिया करवा दीजिए और मुझे इलाके पर जाने की आज्ञा दीजिए।’ यह कहकर लडक़े को साथ लेकर और मित्रों से विदा होकर ठाकुर साहब इलाके पर पधारे और पुरोहित जी सत्यसिंह प्रभृति आठ नौकरों को लेकर उनके घर पर गए। सीढ़ी बनवाते और कफन इत्यादि मंगवाते सायंकाल हो गया। जब नाइन बहूजी को कफनाने लगी, उसने कहा,‘इनका शरीर तो अभी बिल्कुल ठंडा नहीं हुआ है और आंखें अधखुली-सी हैं, मुझे भय मालूम होता है।’ पुरोहित जी और नौकरों ने कहा, ‘यह तेरा भ्रम है, मुर्दे में जान कहां से आई। जल्दी लपेट ताकि गंगा तट ले चलकर इसका सतगत करें। रात होती जाती है, क्या मुर्दे के साथ हमें भी मरना है! ठाकुर साहब तो छोड़ ही भागे, अब हम लोगों को इन पचड़ों से क्या मतलब है, किसी तरह फूंक-फांककर घर चलना है। क्या इसके साथ हमें भी जलना है?’
    सत्यसिंह ने कहा,‘भाई, जब नाइन एेसा कहती है, तो देख लेना चाहिए, शायद बहूजी की जान न निकली हो। ठाकुर साहब तो जल्दी से छोड़ भागे, डॉक्टर दूर ही से देखकर चला गया, एेसी दशा में अच्छी तरह जांच कर लेनी चाहिए।’
    सब नौकरों ने कहा,‘सत्यसिंह, तुम तो सठिया गए हो, एेसा होना असंभव है। बस, देर न करो, ले चलो।’ यह कहकर मुर्दे को सीढ़ी पर रख कंधे पर उठा, सत्यसिंह का वचन असत्य और रामनाम सत्य कहते हुए दशाश्वमेध घाट की ओर ले चले। रास्ते में एक नौकर कहने लगा,‘सात बज गए हैं, दग्ध करते-करते तो बारह बज जाएंगे।’ दूसरे ने कहा,‘फूंकने में निस्संदेह रात बीत जाएगी।’ तीसरे ने कहा,‘यदि ठाकुर साहब कच्चा ही फेंकने को कह गए होते तो अच्छा होता।’ चौथे ने कहा,‘मैं समझता हूं कि शीतला, हैजा, प्लेग से मरे हुए मृतक को कच्चा ही बहा देना चाहिए।’ पांचवे ने कहा,‘यदि पुरोहित जी की राय हो तो एेसा ही कर दिया जाए।’ पुरोहित जी ने, जिसे रात्रि समय श्मशान जाते डर मालूम होता था, कहा,‘जब पांच पंच की एेसी राय है तो मेरी भी यही सम्मति है और विशेषकर इस कारण कि जब एक बार ठाकुर साहब को नरेनी अर्थात पुतला बनाकर जलाने का कर्म करना ही पड़ेगा तो इस समय दग्ध करना अत्यावश्यक नहीं है।’ छठे और सातवें ने कहा कि बस चलकर मुर्दे को कच्चा ही फेंक दो, ठाकुर साहब से कह दिया जाएगा कि जला दिया गया। परंतु सत्यसिंह जो यथा नाम तथा गुण बहुत सच्चा और ईमानदार नौकर था, कहने लगा,‘मैं एेसा करना उचित नहीं समझता, मालिक का कहना और मुर्दे की गति करना हमारा धर्म है। यदि आप लोग मेरा कहना न मानें तो मैं यहां से घर लौट जाता हूं, आप लोग जैसा चाहे करें और जैसा चाहे ठाकुर साहब से कहें, यदि वह मुझसे पूछेंगे तो मैं सच-सच कह दूंगा।’ यह सुनकर नौकर घबराए और कहने लगे कि भाई तीस रुपये में से, जो ठाकुर साहब ने दिए हैं, तुम सबसे अधिक हिस्सा ले लो लेकिन यह वृत्तांत ठाकुर साहब से मत कहना। सत्यसिंह ने कहा,‘मैं हरामखोर नहीं हूं। एेसा मुझसे कदापि नहीं होगा, लो मैं घर जाता हूं, तुम लोगों के जो जी में आए सो करना।’
    जब यह कहकर वह बुड्ढा नौकर चला गया तो बाकी नौकर जी में बहुत डरे और पुरोहित जी से कहने लगे,‘अब क्या करना चाहिए, बुड्ढा तो सारा भेद खोल देगा और हम लोगों को मौकूफ करा देगा।’ पुरोहित जी ने कहा, ‘तुम लोग कुछ मत डरो, अच्छा हुआ कि बुड्ढा चला गया, अब चाहे जो करो, ठाकुर साहब से मैं कह दूंगा कि मुर्दा जला दिया गया। वह मेरा विश्वास बुड्ढे से अधिक करते हैं, तीस में से सात तो सीढ़ी और कफन में खर्च हुए हैं। दो-दो रुपये तुम सात आदमी ले लो, बाकी नौ रुपये मुझे नवग्रह का दान दे दो, मुर्दे को जल में डालकर राम-राम कहते हुए कुछ देर रास्ते में बिताकर कोठी पर लौट जाओ, ताकि पड़ोसी लोग समझें कि अवश्य ये लोग मुर्दे का जला आए।’ ये सुनकर वे सब प्रसन्न हुए और तेईस रुपये आपस में बांटकर मुर्दे को एेसे अवघट घाट पर ले गए जहां न कोई डोम कफन मांगने को था, न कोई महाब्राह्मण दक्षिणा मांगने को। वहां पहुंचकर उन्होंने एेसी जल्दी की कि सीढ़ी समेत मुर्दे को जल में डाल दिया और राम-राम कहते हुए कगारे पर चढ़ आए क्योंकि एक तो वहां अंधेरी रात वैसे ही भयानक मालूम होती थी, दूसरे वे लोग यह डरते थे कि कहीं सरकारी चौकीदार आकर गिरफ्तार न कर ले, क्योंकि सरकार की तरफ से कच्चा मुर्दा फेंकने की मनाही थी। निदान वे बेईमान नौकर इस तरह स्वामी आज्ञा भंग करके उस अविश्वसनीय पुरोहित के साथ घर लौटे।
    अब सुनिए उस मुर्दे की क्या गति हुई। उस सीढ़ी के बांस एेसे मोटे और हल्के थे जैसे नौका के डांड और उस स्त्री का शरीर कृशित होकर एेसा हल्का हो गया था कि उसके बोझ से वह सीढ़ी पानी में नहीं डूबी और इस तरह उतराती चली गई जैसे बांसों का बेड़ा बहता हुआ चला जाता है। यदि दिन का समय होता तो किनारे पर के लोग अवश्य इस दृश्य से विस्मित होते और कौए तो कुछ खोद-खाद मचाते। परंतु रात का समय था, इससे वह शव-सहित सीढ़ी का बेड़ा धीरे-धीरे बहता हुआ त्रिवेणी पार करके प्राय: पांच मील की दूरी पर पहुंचा। परंतु यह तो कोई अचंभे की बात न थी। अत्यंत आश्चर्यजनक घटना तो यह हुई कि गंगाजल की शीतलता उस सोपान-स्थित शरीर के लिए, जिसे लोगों ने निर्जीव समझ लिया था, एेसी उपकारी हुई कि जीव का जो अंश उसमें रह गया था वह जग उठा और बहूजी को कुछ होश आया। परंतु अपने को इस अद्भुत दशा में देख वह भौंचक-सी रह गईं। उनके शरीर का यह हाल था कि प्राणांतक ज्वराग्नि तो बुझ गई थी, परंतु गले की गिलटी एेसी पीड़ा दे रही थी कि उसके कारण कभी-कभी वह अचेत-सी हो जाती थीं। परंतु जब उस सर्वशक्तिमान जगदीश्वर की कृपा होती है तो अनायास प्राणरक्षा के उपाय उपस्थित हो जाते हैं। निदान वह सीढ़ी बहते-बहते एेसी जगह आ पहुंची जहां करौंदे का एक बड़ा भारी पेड़ तट पर खड़ा था और उसकी एक घनी डाली झुककर जल में स्नान कर रही थी और अपने क्षीरमय फल-फूल गंगाजी को अर्पण कर रही थी। वह सीढ़ी जाकर डाली से टकराई और उसी में उलझकर रुक गई और उस डाली में का एक कांटा बहूजी की गिलटी में इस तरह चुभ गया जैसे फोड़े में नश्तर। गिलटी के फूटते ही पीड़ाजनक रुधिर निकल गया और बहूजी को फिर चेत हुआ। झट उन्होंने अपना मुंह फेरकर देखा तो अपने को उस हरी शाखा की शीतल छाया में एेसा स्थिर और सुखी पाया जैसे कोई श्रांतपथिक हिंडोले पर सोता हो।
    सूर्योदय का समय था, जल में किनारे की तरफ कमल प्रफुल्लित थे। और तटस्थ वृक्षों पर पक्षीगण कलरव कर रहे थे। उस अपूर्व शोभा को देखकर बहूजी अपने शरीर की दशा भूल गईं और सोचने लगीं कि क्या मैं स्वर्गलोक में आ गई हूं, या केवल स्वप्न अवस्था में ही हूं, और यदि मैं मृत्युलोक में ही इस दशा को प्राप्त हुई हूं तो भी परमेश्वर मुझे इसी सुखमय अवस्था में सर्वदा रहने दे। परंतु इस संसार में सुख तो केवल क्षणिक होता है-
    ‘सुख की तो बौछार नहीं है, दुख का मेंह बरसता है।
    यह मुर्दों का गांव रे बाबा, सुख महंगा दुख सस्ता है।।’
    थोड़ी देर बाद पक्षीगण उड़ गए और लहरों के उद्वेग से कमलों की शोभा मंद हो गई। सीढ़ी का हिंडोलना भी अधिक हिलने लगा, जिससे कृशित शरीर को कष्ट होने लगा, बहूजी का जी ऊबने लगा। उनका वश क्या था, शरीर में शक्ति नहीं थी कि तैरकर किनारे पहुंचें, हालांकि चार हाथ की दूरी पर एक छोटा-सा सुंदर घाट बना हुआ था। वह मन में सोचने लगीं कि शायद मुझको मृतक समझ मेरे पति ने मुझे इस तरह बहा दिया है, परंतु उनको एेसी जल्दी नहीं करनी चाहिए थी, मेरे शरीर की जांच उन्हें भली-भांति कर लेनी चाहिए थी, भला उन्होंने मेरा त्याग किया तो किया, उनको बहुत-सी स्त्रियां मिल जाएंगी, परंतु मेरे नादान बच्चे की क्या दुर्दशा हुई होगी! अरे वह मेरे वियोग को कैसे सह सकता होगा! हा! वह कहीं रो-रो के मरता होगा! उसको मेरे सदृश्य माता कहां मिल सकती है, विमाता तो उसको और भी दुखदायिनी होगी! हे परमेश्वर! यदि मैं मृत्युलोक ही में हूं तो मुझे मेेरे बालक को शांति और मुझे एेसी शक्ति प्रदान कर कि मैं इस दशा से मुक्त होकर अपने प्राणप्रिय पुत्र से मिलूं। इतना कहते ही एक एेसी लहर आई कि कई घूंट पानी उसके मुंह में चला गया। गंगाजल पीते ही शरीर में कुछ शांति-सी आ गई और पुत्र से मिलने की उत्कंठा ने उसको एेसा उत्तेजित किया कि वह हाथों से धीरे-धीरे उस सीढ़ी रूपी नौका को खेकर किनारे पर पहुंच गईं। अब बांस की सीढ़ी छोड़ हाथ के सहारे से उस घाट की सीढिय़ों पर चढ़ गईं। परंतु श्रम से मूर्छित हो भूमि पर गिर पड़ीं। कुछ देर बाद जब होश आया तो उस स्थान की रमणीयता देखकर फिर उन्हें यही जान पड़ा कि मैं मरने के पश्चात स्वर्गलोक में आ गई हूं। गंगाजी के उज्ज्वल जल का मंद-मंद प्रवाह आकाशगंगा की शोभा दिखाता था और किनारे के स्थिर जल में फूले हुए कमल एेसे देख पड़ते थे जैसे आकाश में तारे-
    दोहा: गंगा के जल गात पै दल जलजात सुहात।
    जैसे गोरे देह पे नील वस्त्र दरसात।।
    तट पर अंब-कदंब-अशोकादि वृक्षों की श्रेणियां दूर तक चली गई थीं और उनके उपवन की शोभा ‘जहां बसंत ऋतु रह्यौ लुभाई’ एेसी थी कि मनुष्य का चित्त देखते ही मोहित हो जाता था। कहीं करौंदे, कहीं कोरैया, इंद्रबेला आदि के वृक्ष अपने फूलों की सुगंध से स्थानों को सुवासित कर रहे थे, कहीं बेला, कहीं चमेली, केतकी, चंपा के फूलों से लदी हुई डालियां एक-दूसरे से मिली हुई यों देख पड़ती थीं जैसे पुष्पों की माला पहने हुए बालिकाएं एक से एक हाथ मिलाए खड़ी हैं। उनके बीच में ढाक के वृक्ष लाल फूलों से ढके हुए यों देख पड़ते थे जैसे संसारियों के समूह में विरक्त वनवासी खड़े हों। इधर तो इन विरक्तों के रूप ने बहूजी को अपनी वर्तमान दशा की ओर ध्यान दिलाया, उधर कोकिला की कूक ने हृदय में एेसी हूक पैदा की कि एक बार फिर बहूजी पति के वियोग की व्यथा से व्याकुल हो गईं और कहने लगीं कि इस वक्त शोक-सागर में डूबने से बेहतर यही होगा कि गंगाजी में डूब मरूं, फिर सोचा कि पहले यह तो विचार लूं कि मेरा मरना भी संभव है या नहीं। यदि मैं स्वर्गलोक के किसी भाग में आ गई हूं तो यहां मृत्यु कैसे आ सकती है, परंतु यह स्वर्गलोक नहीं जान पड़ता क्योंकि स्वर्ग में शारीरिक और मानसिक दुख नहीं होते, और मैं यहां दोनों से पीडि़त हो रही हूं। इसके अतिरिक्त मुझे क्षुधा भी मालूम होती है! बस निस्संदेह मृत्युलोक ही में इस दशा को प्राप्त हुई हूं। यदि मैं मनुष्य ही के शरीर में अब तक हूं और मरकर पिशाची नहीं हो गई हूं तो मेरा धर्म यही है कि मैं अपने अल्पवयस्क बालक को ढूंढक़र गले से लगाऊं। परंतु मैं शारीरिक शक्तिहीन अबला इस निर्जन स्थान में किसे पुकारूं, किधर जाऊं! ‘हे करुणामय जगदीश! तू ही मेरी सुध ले। यदि तूने द्रोपदी, दमयंती आदि अबलाओं की पुकार सुनी है तो मेरी भी सुन।’ यह कहकर गंगाजी की ओर मुंह फेर घाट पर बैठ गईं और जल की शोभा देखने लगीं। इतने ही में दक्षिण दिशा से एक दासी हाथ में घड़ा लिए गंगाजल भरने को आई। जब उसने पीछे से ही देखा कि कोई स्त्री कफन का कपड़ा पहने अकेली चुपचाप बैठी है उसके मन में कुछ शंका हुई। जब उसने देखा कि नीचे पानी में एक मुर्दावाली सीढ़ी भी तैर रही है तब तो उसे अधिक भय मालूम हुआ। और उसने सोचा कि अवश्य कोई मरी हुई स्त्री चुड़ैल होकर बैठी है। जब उसके पांव की आहट पाकर बहूजी ने उसकी ओर मुंह फेरा और गिड़गिड़ाकर उससे कुछ पूछने लगी तो वह उनकी खोडऱाई हुई आंखों और अधमरी स्त्री की सी चेष्टा देखकर भय से चिल्ला उठी और चुड़ैल-चुड़ैल करके वहीं घड़ा पटककर भागी। बहूजी ने गला फाड़-फाडक़र उसे बहुत पुकारा, पर वह न लौटी और अपने ग्राम में ही जाकर उसने दम लिया। जब उसकी भयभीत दशा देखकर और स्त्रियों ने उसका कारण पूछा तब उसने सब वृत्तांत कह सुनाया। परंतु वह एेसी डर गई थी कि बार-बार घाट ही की आेर देखती थी कि कहीं वह चुड़ैल पीछे-पीछे आती न हो।
    उस समय ग्राम के कुछ मनुष्य खेत काटने चले गए थे और कुछ ठाकुर विभवसिंह के साथ टहलने निकल गए थे। केवल स्त्रियां और लडक़े गांव में रह गए थे। उनमें से किसी को यह साहस नहीं होता था कि घाट पर जाकर उस दासी की अपूर्व कथा की जांच करे। चुड़ैल का नाम सुनकर ही वे एेसी डर गई थीं कि अपने-अपने लडक़ों को घर में बंद करने लगीं कि कहीं चुड़ैल आकर उन्हें चबा न डाले। उस समय ठाकुर साहब का लडक़ा नवलसिंह भी अपनी मृत माता का स्मरण कर-कर नेत्रों से आंसू बहाता हुआ इधर-उधर घूम रहा था और लडक़ों के साथ खेलने की उसे इच्छा न होती थी। जब एक स्त्री ने उससे भी कहा कि भैया, तुम अपने बंगले में छिप जाओ, नहीं तो चुड़ैल आकर तुम्हें पकड़ लेगी, वह आश्चर्यचकित होकर पूछने लगा कि चुड़ैल कैसी होती है? यदि वह यहां आएगी भी तो मुझे क्यों पकड़ेगी, मैंने उसकी कोई हानि नहीं की है।
    इधर यह बातें हो रही थीं, उधर बहूजी निराश होकर मन में सोचने लगीं कि यह तो निश्चय है कि मैं अभी तक मृत्युलोक में ही हूं पर क्या वास्तव में मेरा पुनर्जन्म हुआ है? क्या मैं सचमुच चुड़ैल हो गई हूं, जैसा यह स्त्री मुझे देखकर एेसा कहती हुई भागी है! इसमें अवश्य कुछ भेद है वरना मैं इन कृशित अंगों पर कफन का स्वेत वस्त्र लटकाए हुए इस अज्ञात निर्जन स्थान पर कैसे आ जाती! हे विधाता! मैंने कौन-सा पाप किया जो तूने मुझे चुड़ैल का जन्म दिया। क्या पतिव्रत धर्म का यही फल है? अब मैं इस अवस्था में अपने प्यारे पुत्र को कहां पाऊंगी। और यदि पाऊंगी तो कैसे उसे गले लगाऊंगी? वह तो मेरी डरावनी सूरत देखकर ही भागेगा। पर जो हो, मैं उसे अवश्य तलाश करूंगी, और यदि वह मुझसे सप्रेम नहीं मिलेगा तो उसको भी इसी दशा में परिवर्तित करने की चेष्टा करूंगी। यह सोचकर वह धीरे-धीरे उस ओर बढ़ी जिस ओर दासी भागी थी।
    दुर्बलता के मारे सारा देह कांपता था, पर क्या करे, क्षुधा के मारे रहा नहीं जाता था, निदान खिसकते-खिसकते उपवन डाककर वह वाटिका में पहुंची जिसमें अमरूद, नारंगी, फालसा, लीची, संतरा इत्यादि के पेड़ लगे हुए थे और क्यारियों में अनेक प्रकार के अंग्रेजी और हिंदुस्तानी फूल फले हुए थे। वाटिका के दक्षिण ओर एक छोटा-सा बंगला बना हुआ था जिसको देखकर बहूजी ने मन में कहा, यह तो वैसा ही बंगला मालूम होता है जैसा मेरे इलाके पर बगीचे में बना हुआ है, क्या मैं ईश्वर की कृपा से अपनी ही वाटिका में तो नहीं आ गई हूं! अरे, यह पुष्प मंडल भी तो वैसा ही जान पड़ता है जिसमें तीन वर्ष हुए नवलजी को गोद में लेकर खिलाती थी। मैं जब यहां आई थी तो ग्राम की स्त्रियों से सुना था कि निकट ही गंगाजी का घाट है। मैंने ठाकुर साहब से वहां स्नान करने की आज्ञा मांगी थी परंतु उन्होंने नहीं दी, क्या उसी पाप का तो यह फल नहीं है कि मैं इस दशा को प्राप्त हुई हूं! परंतु उसमें मेरा क्या दोष था! स्त्री के लिए तो पति की आज्ञा का पालन करना ही परम धर्म है। यह फल मेरे किसी और जन्म के पापों का मालूम होता है।
    इसी तरह मन में अनेक कल्पनाएं करती हुई बहूजी एक नारंगी के पेड़ के नीचे बैठ गईं और लटकी हुई डाल से एक नारंगी तोडक़र अपनी प्रज्वलित क्षुधाग्नि को बुझाना चाहती थीं कि इतने में नवलसिंह घूमता-घामता उसी स्थान पर आ गया, उसे देखते ही बहूजी की भूख-प्यास जाती रही। जैसे मृगी अपने खोए हुए शावक को पाकर उसकी ओर दौड़ती है। वैसे ही बहूजी झपटकर नवलसिंह से लिपट गईं और ‘बेटा, नवलजी! बेटा नवलजी’ कहकर उसका मुख चूमने लगी। उस समय नवलसिंह की अपूर्व दशा थी। कभी तो बहूजी की डरावनी सूरत देखकर भय से भागना चाहता था, कभी माता के मुख की आकृति स्मरण करके प्रेमाश्रु बहाने लगता था और भोलेपन से पूछता था कि माता, तुम मर के फिर जी उठी हो और चुड़ैल हो गई हो? हम लोग तो तुमको घर ही पर छोड़ आए थे, तुम अकेली गिरती-पड़ती यहां कैसे आ गई हो? बहूजी ने कहा,‘बेटा, मैं नहीं जानती कि मैं कैसे इस दशा को प्राप्त हुई हूं। यदि मेरा शरीर बदल गया है और मैं चुड़ैल हो गई हूं तो भी मेरा हृदय पहिले ही का सा है। और मैं तुम्हारी ही तलाश में खिसकते-खिसकते इधर आई हूं।’
    इधर तो इस प्रकार प्रेमालिंगन और प्रश्नोत्तर हो रहा था, उधर ग्राम्य स्त्रियों ने दूर से ही घटना देखकर हाहाकार मचाया और कहने लगीं, ‘अरे, नवलजी को चुड़ैल ने पकड़ लिया! चलियो! दौडिय़ो! बचाइयो! अरे, यह क्या अनर्थ हुआ! हम लोग क्या जानती थीं कि वह डाइन वाटिका में आ बैठी है। नहीं तो नवलजी को क्यों उधर जाने देतीं।’ इस तरह सब दूर ही से कौआ रोर मचा रही थीं, परंतु डर के मारे कोई निकट नहीं जाती थी। इतने ही में विभवसिंह और उनके साथ जो आदमी टहलने गए थे, वापस आ गए। यह कोलाहल देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ। उस दासी के मुंह से वृत्तांत सुनकर ठाकुर साहब ने कहा,‘मुझे प्रेतयोनि में तो विश्वास नहीं है। पर ईश्वर की अद्भुत माया है। शायद सच ही हो।’ यह कहकर और झट बंगले में से तमंचा लेकर वह उसी नारंगी के पेड़ की ओर झपटे, जहां नवलसिंह को चुड़ैल पकड़े हुए थी और गांववाले भी लाठी ताने उसी आेर दौड़े। पिता को आते देखकर लडक़े ने चाहा कि अपनी माता के हाथों से अपने को छुड़ाकर और दौडक़र अपने पिता से शुभ संदेश कहे। लेकिन उसकी माता उसे नहीं छोड़ती थी। ठाकुर साहब ने दूर ही से यह हाथापाई देखकर समझा कि अवश्य चुड़ैल उसे जोर से पकड़े है। और ललकारकर कहा,‘बेटा घबराओ मत, मैं आया।’ जब पास पहुंचे तो उन्होंने चाहा कि चुड़ैल को गोली मारकर गिरा दें। पर लडक़े ने चिल्लाकर कहा,‘इन्हें मारो मत, मारो मत, माता है माता।’ ठाकुर साहब को उस घबराहट में लडक़े की बात समझ में नहीं आई और चूंकि वह पिस्तौल तान चुके थे, उन्होंने फायर कर ही दिया। आवाज होते ही बहूजी अचेत होकर भूमि पर गिर पड़ीं और लडक़ा चौंककर जमीन पर बैठ गया। ठाकुर साहब ने उसे गोद में उठा लिया और कहा,‘बेटा डरो मत, अब तुम बच गए। बताओ तो यह कौन है, क्या यह वास्तव में चुड़ैल है?’ बहूजी को अचेत देखकर अब आदमी चिल्लाकर कहने लगे, ‘चुड़ैल मर गई, चुड़ैल मर गई।’ यह सुनकर स्त्रियां भी समीप आईं और चारों ओर खड़ी हो देखने लगीं। उनमें से वह दासी बोली,‘यही दुष्टिन चुड़ैल है जो घाट पर बैठी थी और यहां आकर नवलजी को निगलना चाहती थी।’ दूसरी स्त्रियां कहने लगीं,‘हमने तो सुना था कि डायनों और चुड़ैलों के बड़े-बड़े दांत और नख होते हैं। इसके तो वैसे नहीं हैं। यह निगोड़ी किस प्रकार की चुड़ैल है!’
    एक ने कहा, ‘यह डाइन की बच्ची है। बढऩे पर इसके भी दांत बड़े होते।’ इधर तो ठिठोलियां हो रही थीं कि उधर जब नवलसिंह को निश्चय हुआ कि माता गोली की चोट से मर गई तो वह शोक के मारे अचेत हो गया। अब सब लोग भयातुर होकर उसकी ओर देखने लगे। कोई कहता था कि यह पिस्तौल की आवाज से डर गया है, कोई कहता था कि इसे चुड़ैल लग गई है। निदान जब उसे होश में आया तो रो-रो कर कहने लगा,‘यह तो मेरी माता है। मैंने तो मना किया था, आपने इन्हें गोली से क्यों मारा?’ ठाकुर साहब ने कहा,‘तुम्हारी माता तो मर गई और पुरोहित जी की चि_ी कल ही रात को आ गई कि उनको गंगा के तट पर ले जाकर जला दिया, यह चुड़ैल तुम्हारी माता कैसे हो सकती है?’ लडक़े ने कहा,‘आप समीप जाकर पहचानिए तो कि यह कौन है।’ ठाकुर साहब ने निकट ध्यान देकर देख पड़ा। जब छाती पर से कपड़ा हटाकर देखा तो मुख की आकृति उनकी स्त्री ही की-सी देख पड़ी और मस्तक पर मस्सा भी वैसा ही देखा तो हृदय पर दो तिल वैसे ही देख पड़े जैसे बहूजी के थे। तब तो ठाकुर साहब बड़े ही विस्मित हुए और कहने लगे, ‘क्या आश्चर्य है! यह तो मेरी प्रिय पत्नी ही मालूम होती है।’ फिर उन्होंने लडक़े से कहा,‘बेटा, तुम सोच मत करो, मैंने इन्हें गोली नहीं मारी है। जब तुमने मना किया तो मैंने आकाश की ओर यह समझकर गोली चला दी कि यदि कोई बला होगी तो तमंचे की आवाज ही से भाग जाएगी।’ लडक़े ने कहा,‘देखिए, इनके गले में गोली का घाव है, आप कहते हैं कि मैंने गोली नहीं मारी।’ ठाकुर साहब ने कहा,‘यह तो गिलटी का घाव है। मेरी गोली तो आकाश में तारा हो गई।’ इसके अनंतर ठाकुर साहब ने सब लोगों को वहां से हटा दिया और स्वयं कुछ दूर खड़े होकर गांव की नाइन से कहा,‘तुम बहूजी के सब अंगों को अच्छी तरह से पहचानती हो, पास आकर देखो तो कि यह वही है, कोई दूसरी स्त्री तो नहीं है।’ नाइन डरते-डरते पास गई और आंखें फाड़-फाडक़र देखने लगी। इतने में बहूजी को कुछ होश आया और बहू ज्योंही उठके बैठने लगीं त्यों ही नाइन नाइन भाग खड़ी हुई। बहूूजी ने उसे पहचानकर कहा,‘अरी बदमिया, मेरा बच्चा कहां गया? नवलजी को जल्दी बुला नहीं तो मेरा प्राण जाता है। ठाकुर साहब तो मेरे प्राण के ही भूखे हैं। प्रयागजी में मुझे बीमार छोड़क़र भाग आए। जब मैं किसी तरह यहां आई तो मुझ पर गोली चलाई। न जाने मुझसे क्या अपराध हुआ है। यदि प्लेग में मरकर मैं चुड़ैल हो गई हूं तो इस प्रेत शरीर से भी मैं उनकी सेवा करने को तैयार हूं। यदि वह मेरी इस वर्तमान दशा से घृणा करते हैं तो मुझसे भी यह तिरस्कार नहीं सहा जाता। मैं जाकर गंगाजी में डूब मरूंगी। पर एक बार मेरे बच्चे को तो बुला दे, मैं उसे गले तो लगा लूं। अरे उसे छोडक़र मुझसे कैसे जिया जाएगा? हे परमेश्वर, तू यहीं मेरा प्राण ले ले।’ यह कहकर वह उच्च स्वर में रोने लगी। ठाकुर साहब से ये सच्चे प्रेम से भरे हुए वियोग के वचन सहे नहीं गए। उनका हृदय गदगद हो गया, रोमांच हो आया और आंसू गिरने लगे। झट दौडक़र उन्होंने बहूजी को उठा लिया और कहा, ‘मेरे अपराध को क्षमा करो। मैंने जानबूझकर तिरस्कार नहीं किया। यदि तुम मेरी पत्नी हो तो चाहे तुम मनुष्य देह में या प्रेत शरीर में, तुम हर अवस्था में मुझ ग्राह्य हो, यद्यपि मेरे मन का संदेह अभी गया नहीं है। इसकी निवृत्ति का प्रयत्न मैं धीरे-धीरे करता रहूंगा, परंतु तुमको अभी से मैं अपनी प्रिय पत्नी मानकर ग्रहण करता हूं। यदि तुम्हारे संसर्ग से मुझे प्लेग-पीड़ा या प्रेत-बाधा भी हो जाए तो कुछ चिंता नहीं, मैं अब किसी आपत्ति से नहीं डरूंगा।’ यह कहकर वह बहूजी को अपने हाथों का सहारा देकर लता भवन में ले गए और नवलजी को भी वहीं बुलाकर सब वृत्तांत पूछने लगे।
    इतने ही में सत्यसिंह भी शहर से आ गया। जब उसने गांववालों से यह अद्भुत कथा सुनी तो वह सारा भेद समझ गया और ठाकुर साहब से जाकर कहने लगा,‘महाराज! अब अपने मन का संदेह दूर कीजिए। यह सचमुच बहूजी हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। कल जब नाइन इनको कफनाने लगी थी तो उसने कहा था कि उनकी देह गर्म है। मैंने इसकी जांच करने के लिए कहा, पर दुष्ट नौकरों ने न करने दिया और उन्हें ले जाकर कच्चा ही गंगाजी में फेंक दिया। अच्छा हुआ, नहीं तो अब तक बहूजी जलकर राख हो गई होतीं। मुझे निश्चय है कि बहूजी की जान नहीं निकली थी और गंगाजी की कृपा से वह बहती-बहती इसी घाट पर लगीं और जी उठीं। अब अपना भाग्य सराहिए। इनको फिर से अपनाइए और बधाई बजाइए।’
    इतना सुनते ही ठाकुर साहब ने फिर से क्षमा मांगी और नि:शंक होकर बहूजी को अंक से लगाया और पे्रमाश्रु बहाए। बहूजी भी प्रेम से विह्वल होकर नवलजी को गोद में लेकर बैठ गईं और उनके कंधे पर अपना सिर रखकर रोने लगीं। जब गांववालों ने यह वृत्तांत सुना तो वे आनंद से फूल उठे और बहूजी के पुनर्जन्म के उत्सव में मृदंग, मंजीरा और फाग से डफ बजाकर नाचने गाने लगे और स्त्रियां सब पान-फूल, मिठाई लेकर दौड़ीं और बहूजी को देवी मानकर उनका पूजन करने और क्षमा मांगने लगीं। बहूजी ने कहा,‘इसमें तुम लोगों का कोई दोष नहीं। यह मेरा दुर्भाग्य है जिसने एेसे दिन दिखाए। अब ईश्वर की कृपा से जैसे मेरे दिन लौटे, वैसे ही सबके लौटें।’

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