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  • मेहनत के बाद जोड़ी गई लक्ष्मी और मेहनत से अर्जित की गई सरस्वती (विद्या)

    गढ़वाल के एक गाँव से दीवाली पर यह टिप्पणी लिखी है युवा लेखक अभिषेक कुमार अम्बर ने। पहाड़ के जीवन और दीवाली के रिश्ते का बहुत जीवंत चित्रण किया है अभिषेक ने। अभिषेक के लेख के साथ जानकी पुल की तरफ़ से सभी को दीवाली की अनंत शुभकामनाएँ- प्रभात रंजन

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    चौखम्बा पर दोपहर के सूरज की रमक़ है, दूर केदारनाथ के उत्तुंग शिखर से बादलों की टोलियाँ धीरे धीरे पर्वतों की श्रृंखलाओं को अपने में समेटती जा रही हैं। मैं उनके ठीक सामने रुद्रप्रयाग के एक पहाड़ी गाँव की धार में बैठा प्रकृति का खेल देख रहा हूँ। जाते अक्टूबर का महीना है लेकिन पहाड़ पर धूप की तेज़ी से शरीर से जून का पसीना बह रहा है, वहीं हिमालय की परिक्रमा करके आती हवाएँ बदन में सिहरन पैदा कर रही हैं। टेढ़ी-मेढ़ी शांत सर्पीली सड़कें हैं जिन पर दिन भर में गिनती की गाड़ियाँ ही चलती है। लेकिन आजकल थोड़ी थोड़ी देर में कोई न कोई गाड़ी (टैक्सी) धूल उड़ाती आती दिखाई देती है। टैक्सी की सीटें ही नहीं छतें भी सवारियों से भरी हैं। लोगों के हाथों में, गोद में और छतों पर सामान ही सामान है और चेहरे पर गाँव लौट आने की ख़ुशी।

    पहाड़ में ऐसे मौक़े कम ही देखने को मिलते हैं जब शहर से गाड़ियाँ लोगों से भर-भर के गाँव की तरफ़ आती हैं वरना पहाड़ का पानी और जवानी सड़क और धारों के ज़रिए मैदानों में ही बह कर चला जाता है। लेकिन आज पहाड़ की तरफ़ बहती इस उल्टी धार में, मैं मैदान का रहवासी बहता हुआ सुदूर हिमालय की गोद में आ बैठा हूँ और देख रहा हूँ कार्तिक मास में पहाड़ पर आती बहार को।

    गाड़ियों में लदकर पहाड़ पर सिर्फ़ इंसान ही नहीं आ रहे बल्कि आ रही है उनके साथ साल भर की मेहनत के बाद जोड़ी गई लक्ष्मी, घर से दूर हॉस्टल और किराए के कमरों में रह कर कम ख़र्च में शहरों की महंगाई से मुक़ाबला करके अर्जित की गई सरस्वती (विद्या)।

    लोगों के लौट आने से बुढ़ाते गाँव जवान हो उठे हैं। अपनी धरोहर की रखवाली करती पथराई बूढ़ी आँखों में रौशनी आ गई है। साल भर से बंद पड़े पहाड़ी घरों के आँगनों में बच्चों की आवाज़ें गूँज रही हैं। बे-तरतीब उग आई घास, कंडाली को हटाया जा रहा है। आँगन में लगे माल्टे और नींबू के पेड़ों पर लदे फलों में अपने परिवार को देख समय से पहले रस उतरने लगा है, जैसे बच्चों को देख माँ की छाती से दूध की धार बहने लगती है।

    दीपावली साल का सबसे बड़ा त्योहार है, उत्तराखंड में इसे बग्वाल भी कहते हैं। भगवान राम के चौदह वर्ष का वनवास काट अयोध्या लौटने के उपलक्ष में मनाए जाने वाले इस त्योहार का महत्व पहाड़ के लोग बड़ी अच्छी तरह समझते हैं क्योंकि इन्हें भी श्रीराम की तरह अपने परिवार और गाँवों को छोड़ कर जाना पड़ता है, बस फ़र्क़ इतना है कि इनको वनवास नहीं ‘शहर-वास’ भोगना पड़ता है और वह भी किसी सत्ता के लिए नहीं सिर्फ़ रोज़ी-रोटी, बच्चों के लिए शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए।

    इनका त्याग भगवान राम के समान न सही पर उससे कुछ कम भी नहीं, भगवान राम को अपनी अयोध्या छोड़कर वनगमन करना पड़ा इन्हें अपने सोने जैसे पहाड़, चाँदी जैसी नदियाँ और स्वच्छ वातावरण को छोड़कर शहर की ज़हरीली फ़ज़ाओं, जेल जैसे छोटे-छोटे कमरों में क़ैद होना पड़ा।

    श्रीराम के पास साथ देने के लिए लक्ष्मण जैसा भाई और सीता जैसी धर्मपत्नी थीं लेकिन इनके पास शहर में अपना कहलाने वाला कोई नहीं। ये शहर में रहकर जंग लड़ते हैं और इनकी धर्म-पत्नियाँ पहाड़ में रहकर। हाड़ तोड़कर, ख़ून पसीना बहाकर इनके पूर्वजों ने पहाड़ों के सीनों पर जो सीढ़ीदार खेत बनाए गए थे, उनकी पूरी ज़िम्मेदारियाँ इनकी धर्म-पत्नियों पर ही तो हैं।

    सुबह जब सूर्य की पहली किरण चौखम्बा की चोटियों में रंग भरती है, ये अपनी जूड़ (घास ढोने की रस्सियाँ) उठाए वनों की ओर निकल पड़ती हैं कभी पहाड़ की चोटियों की तरफ़ तो कभी नदी किनारे सेरों की तरफ़। धान के मौसम में ढोल-दमौ की थाप पर थिरकती-सी धान रोपती हैं। हल लगाकर तैयार की गई भूमि पर कोदा, झंगोरा, भट्ट आदि बोती हैं। इतनी मेहनत के बाद भी जो फ़सल हाथ आती है वह है ऊँट के मुँह में जीरे के समान। यहाँ मेहनत तो पूरी लगती है लेकिन दिन प्रतिदिन उगने वाले अनाज की मात्रा कम होती जा रही है। हाड़ तोड़ मेहनत का फल इन्हें इतना भी नहीं मिलता कि वह अपना तथा बच्चों का साल भर पेट भी भर सकें उसके लिए भी बाज़ार की ओर रुख करना पड़ता है।

    धीरे-धीरे शाम ढल रही है। सूर्य डूबने लगा है। पहाड़ों पर से किरणें ऊपर उठती जा रही हैं। मैं देखता हूँ कि सूर्य और हिमालय पर्वत की श्रृंखलाएं चौखम्बा, केदारनाथ, सतोपंथ, जनहुकूट, मंदानी पर्वत, त्रिशूल, नंदादेवी, द्रोणागिरि आदि एक-दूसरे से मुख़ातिब हैं। सूर्य उनको अपनी रमक़ सौंप रहा है और वह सूर्य को शीतलता। सूर्य डूब रहा है फिर भी पहाड़ पर आज रात नहीं होने वाली। गाड़ियों का ताँता अभी भी जारी है। ब-मुश्किल 100-150 लोगों की आबादी वाले गाँव में आज 300-350 लोग हैं। घरों से हँसने-खिलखिलाने की आवाज़ें आ रही है। बच्चे अपने पिताओं द्वारा लाए पटाखें- फुलझड़ियाँ लिए दोस्तों के साथ सारे गाँव में घूमते फिर रहे हैं। अपने-अपने राम के घर लौटने पर कौशल्याएँ गाँव भर मिठाइयाँ बाँट रही हैं। कोई साल तो कोई दो साल में घर लौटा है।

    पत्थर और पठाल से बने झोंपड़ीनुमा घरों में लड़ियाँ जगमगाने लगी हैं। रसोईघरों में पूरी-पकौड़ियाँ तली जा रही हैं। बरामदे में कुत्ते और बिल्लियाँ साथ-साथ बैठे हैं। देहरियों पर तेल से लबालब भरे दीए जगमगा रहे हैं। हिमालय से आती ठंडी हवाओं से दीयों की लौ लहराए-लहराए जाती है। यह दीए बरसों से घर में फैले सूनेपन और अंधकार को रात भर में मिटा कर सुबह हिमालय की चोटियों पर नए दिन का आग़ाज़ करेंगे।

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