लाख दा’वे किये ख़ुदाई के–एक फ़िरऔन भी ख़ुदा न हुआ

जनाब सुहैब अहमद फ़ारूक़ी पुलिस अफ़सर हैं, अच्छे शायर हैं। उस्ताद शायरों जैसी सलाहियत रखते हैं। आज एक शेर में आए लफ़्ज़ के बहाने पूरा लेख लिख दिया। आप भी पढ़िए-
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लाख दा’वे किये ख़ुदाई के–एक फ़िरऔन भी ख़ुदा न हुआ
 
यह शे’र तो ख़ैर मेरा है। अभी आप यह नज़्म देखिए:-
 
मर्ज़ी
 
ज़मीं पर शोर बरपा था
यहाँ सिक्का हमारा है
कहीं फ़िरऔन की मर्ज़ी
कहीं नमरूद हाकिम है
कहीं शद्दाद की जन्नत
कहीं क़ारून कहता है
यहाँ हद्दे नज़र तक जिस को भी जो कुछ नज़र आए
फ़क़त मालिक हैं हम उस के
हमारी बारगाहों में
सरे तस्लीम ख़म कर दो
अचानक!!!
ज़लज़ला आया
ज़मीं की जुम्बिशों में सब तह-ओ-बाला नज़र आए
सुकारा ही सुकारा का अजब माहौल बरपा था
फ़लक से तब सदा गूँजी
मिरी दुनिया! मिरी मर्ज़ी
 
नज़्म जनाब शाहिद अनवर देहलवी साहब की है, जिसको मैंने कल पढ़ा था। सरसरी तौर पर एक बार पढने के बाद फिर पढ़ा। अब तक एक वज्द सा तारी है। मिरीदुनिया! मिरीमर्ज़ी। बहुत छोटी सी कविता है मगर, हर बार पढ़ने के बाद मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस कविता को आत्मसात करने के लिए आपको सेमिटिक या’नी इब्राहीमी मज़हबों में वर्णित फ़िरऔन, नमरूद, शद्दाद और क़ारून नाम के चरित्रों के बारे में जानना होगा। इन सभी लोगों में समानता यह है कि इनका अंत ईश्वरीय प्रकोप प्रदत्त आपदाओं के फलस्वरूप हुआ था।
 
फ़िरऔन (Firʻaun, Pharaoh) मिस्र के राजाओं की पदवी होती थी। संख्या में क़रीब 170 इन फ़िरऔनों ने तीन हज़ार सालों तक राज किया। हज़रत मूसा (known as Moses in Judeo-Christian theology) का समकालीन फ़िरऔन अत्यधिक अभिमानी, ढीठ, अविश्वा सी, दुस्साहसी और क्रूर तानाशाह था। उसके अत्याचारों से बचने के लिए हजरत मूसा ने अपने अनुयाइयों के साथ वतन छोड़ दिया था। ख़ुदा की मेहरबानी से हज़रत मूसा और उनके साथियों ने तो पानी का दरया पार कर लिया मगर, अंत में, फ़िरऔन और उसका लश्कर पानी में ग़र्क़ कर दिया गया था।
 
नमरूद, (namruud نَمرُود) हज़रत इब्राहीम का समकालीन बहुत बड़ा अत्याचारी नरेश था। उसने घोषणा कर दी कि वह ही परमेश्वर है और जो लोग उस पर विश्वास नहीं करते थे वह उनको सता-सता कर मार डालता था। हज़रत इब्राहीम को भी बादशाहे वक़्त के हुक्म की उदूली पर आग में डाला गया परन्तु, ईश्वर की अनुकम्पा से आग की तासीर ठंडी हो गई। भयंकर अकाल के पड़ने पर जो ज़रूरतमंद उसके पास जाता तो सिर्फ़ उसी को अनाज मिलता जो उसके खुदा होने का इक़रार करता। अंतत: उसकी बग़ावत को दबाने के लिए ईश्वर ने उसकी फ़ौज पर मच्छर छोड़ दिए जिन्होंने खून चूसने और मांस खाने के बाद उनके बदन पर सिर्फ हड्डियां ही छोडीं। एक मच्छर नमरूद की नाक के रास्ते दिमाग़ में घुस गया। मच्छर के काटने से पैदा हुई तकलीफ़ नमरूद के सर में चोट मारने से दूर होती थी । इस तरह से उसको पीटने वाले उसके ही हमदर्द बने और हमदर्दों की पिटाई के सबब नमरूद एक अज़ीयतनाक मौत तक पहुंचा । काफ़िर, ज़ालिम, बहुत क्रूर और दमनकारी शब्द उसके पर्याय के रूप में जाने जाते हैं।
 
शद्दाद पैगंबर हज़रत हूद के समय का एक निरंकुश व भोगवादी शासक था। उसके भाई शदीद के मरने के बाद पूरा राज्य उसके नियंत्रण में आ गया था। सत्ता के नशे ने उसे इतना अहंकारी बना दिया कि उसने भी खुद को ख़ुदा घोषित कर दिया और लोगों को अपनी ही पूजा करने के लिए मजबूर कर दिया। हज़रत हूद ने उसे उसकी ग़लत सोच और आचरण को बदलने की सलाह दी। शद्दाद ने कहा कि यदि वह एक ईश्वर की सत्ता में यक़ीन कर लेगा तो बदले में उसे क्या मिलेगा? हज़रत हूद ने बताया कि अच्छे आचरण के बदले मरने के बाद उसे जन्नत में जगह मिलेगी। अभिमान और सत्ता के मद में शद्दाद ने ईश्वर की सत्ता को नकार कर पृथ्वी पर ही अपना मानव-निर्मित एक स्वर्ग बनाया। शद्दाद की जन्नत ‘इरम’ के महल सोने और चांदी की ईंटों से बने थे। उन महलों के स्तंभ माणिक और पन्ना से बने थे। घरों के फर्श और रास्ते भी गहनों के बने होते थे। फर्श पर पत्थरों की जगह सुंदर मोती बिछाए गए थे। लेकिन इरम का उदघाटन करने जाते समय शद्दाद अपने लश्कर से बिछुड़ गया और मौत के फ़रिश्ते ने उसकी जान उसकी बनायी हुई जन्नत को भोगने से पहले ही ले ली।
 
Qaaruun,क़ारून قارون मिस्र के राजा फ़िरऔन का मंत्री था जिसने राजा की शह पाकर वह अपने ही लोगों से टैक्स वसूल कर अपने समय का सबसे बड़ा धनी बन गया। उसका ख़ज़ाना परिमाण में इतना था कि ख़ज़ाने की तिजोरियों की चाभियाँ भी साठ ऊंटों पर ढोई जाती थीं। लेकिन वह धनवान होने के साथ उतना ही कंजूस भी था। अहंकार में वह मानने लगा था कि उसकी संपत्ति सिर्फ उसकी सक्षमता और योग्यता का परिणाम है। अंत में वह और उसका समस्त ख़ज़ाना एक भूकंप के परिणामस्वरूप ज़मीन में समा गया था।
 
हज़रात! मेरा मकसद किसी धार्मिक प्रवचन या डिस्कशन से नहीं है। उपोक्त नज़्म के समझने और समझाने के लिए उपरोक्त वर्णित स्वघोषित ख़ुदाओं से अपरिचित दोस्तों को उन के बारे में बताने की कोशिश की है। ये अहंकारी और घमंड में चूर सत्ताधीश हर क्षेत्र, हर युग, हर धर्म में मिल जाएंगे। इन निरंकुशों ने उनकी सत्ता के चलते अपने जैसे इंसानों को इंसान न समझा, उन पर अपना निरंकुश राज करना स्थायी अधिकार समझा और चाहा कि जनता या’नी उन जैसे इंसान उनके दरबार में उनकी आज्ञाकारिता में सर झुकाएं और सर्वशक्तिमान ईश्वर को न मानकर सिर्फ उनकी निष्ठा के सामने नतमस्तक रहें। जब तक उन स्वयंभूओं की चली, उन्होंने अपना सिक्का चलाया, हुक्म मनवाया, अपने वैभव और विलास की जन्नतें सजाईं, इतना धन एकत्र किया कि दम्भ हो गया कि उनसे ज्यादा धनी कोई नहीं और मानने लगे कि दुनिया उनकी मर्ज़ी को मानते हुए उनको ख़ुदा माने। फिर उनके दंभ के शिखर को मटियामेट करने हेतु ख़ुदाई क़हर, क़ुदरती आफ़तों की शक्ल में आया और प्रकृति के एक हलके से इशारे मात्र से उनको उनके अहंकार और ताक़त को पूर्णत समाप्त करते हुए एक आवाज़ आई थी । मिरी दुनिया! मिरी मर्ज़ी ! आह! आह! अब एक बार फिर पढ़िए । मुझे यक़ीन है आप पर भी सुकारा वाली कैफियत तारी हो जाएगी। कितना भ्रम है हम शक्तिमानों को कि यह मेरी दुनिया है जो मेरी मर्ज़ी के अनुसार चलती है।
 
लेकिन पिछले डेढ़ साल से यह भ्रम भी टूट गया है। आप मेरे साथ कोविद-19 के साथ जी तो रहे हैं लेकिन इस वायरसे आज़म की नीयत मारने की ही रहती है। मगर कोई तो है जो निज़ामे हस्ती चला रहा है, वही ख़ुदा है । दिखाई भी जो न दे नज़र भी जो आ रहा है, वही ख़ुदा है । (मुज़फ्फर वारसी) वाकई कोई तो है जो इस नश्वर संसार को जीवंत रखे हुए है । वही सर्वशक्तिमान हर नश्वरता के बाद ज़िन्दगी को फिर लाता है, हर मायूसी के बाद ज़िन्दगी फिर गाती है। एक ही नाम सदैव था, है और रहेगा।
 
कल एक तद्फ़ीन के सिलसिले में बटला-हाउस क़ब्रिस्तान में मौजूद था। ताज़ी क़ब्र क़ब्रिस्तान के नए वाले हिस्से में थी। जामिया नगर के बाशिंदों को मालूम होगा कि जो क़ब्रिस्तान का अब नया हिस्सा है, वह पहले पुराना था और जो अब पुराना कहलाने लगा है वह नया था। मतलब दुनिया गोल है। पुरानी शै के बाद नई शै आती है और हर नई शै बाद में पुरानी हो जाती है। ख़ैर! क़ब्रिस्तान और शमशान में आकर आदमी थोड़ी देर के लिए अपने ‘होने की’ क्षणभंगुरता और निस्सारता को जान लेता है। लेकिन लास्ट रिचुअल्स के लास्ट होते ही उसे फिर ‘उसकी दुनिया-उसकी मर्ज़ी’ में पहुँचने की जल्दी उसे इस टेम्परेरी फ़ेज़ से जल्दी बाहर निकाल लेती है। जनाज़े के इंतज़ार में पुराने क़ब्रिस्तान की तरफ़ चला गया। शहरी क़ब्रिस्तान होने की वजह से यह इस्लाम के सभी फ़िरक़ों के मुर्दों के लिए ओपन है। यहाँ आकर मुझे #राजेश_रेड्डी साहब का शे’र बरबस याद आ गया:-
 
उम्र भर जिनको अक़ीदों ने लड़ाए रक्खा — बाद मरने के वो सब एक ही रब के निकले
 
साथियों! सबसे बड़ा अहंकार स्वयंश्रेष्ठ होने का अहंकार है जिसको, मैं जन्मना अतिवाद कहता हूँ। पैदा होने के बाई-डिफॉल्ट चांस को लेकर हम अपने धर्म, जाति विशेष को ही श्रेष्ठ समझते रहते हैं और इसी पूर्वाग्रही चश्मे से सारी ज़िन्दगी को देखते और समझते रहते हैं। अंत में आपसे आग्रह है कि मात्र बाई-डिफॉल्ट पैदा होने के दम्भ से अपने को बाहर निकालें और अपने जैसों के साथ फ़िरऔनियत न निबाहें क्यूंकि:-
 
लाख दा’वे किये ख़ुदाई के – एक फ़िरऔन भी ख़ुदा न हुआ
 
दुआओं में याद रखियेगा!
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शब्दार्थ व संदर्भ
बरपा-फैला
हाकिम-शासक
हद्दे नज़्र-जहाँ तक नज़र जाए
बारगाह-दरबार
सर ए तस्लीम ख़म-आज्ञाकारिता में सर झुकाना
ज़लज़ला-भूकम्प
जुम्बिश-हरकत
तह ओ बाला नीचे से ऊपर बॉटम टू टॉप
सुकारा- अरबी शब्द है। भूकंप के बाद की स्थिति जो नशे की तरह होती है
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