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बहुत उलझन होती है अपने से

आज मोहन राकेश का जन्मदिन है. नाटक, कहानी के साथ-साथ मोहन राकेश की डायरी का भी अपना महत्व है. जिन दो लेखकों की डायरी मैंने बार-बार पढ़ी है उनमें मोहन राकेश के अलावा दिनकर की डायरी. लेकिन आज पेश हैं मोहन राकेश की डायरी के कुछ अंश- 











बम्बई…?
दिन-भर परिभाषाएँ घड़ते रहे। साहित्य की, जीवन की, मनुष्य की। बे-सिर-पैर। सभी पढ़ी-सुनी परिभाषाओं की तरह अधूरी और स्मार्ट। दूसरों ने जितनी स्मार्टिंग की कोशिश की, उससे ज़्यादा खुद की। जैसे परिभाषा नहीं दे रहे थे, कुश्ती लड़ रहे थे। महत्त्व सिर्फ़ इस बात का था कि दूसरे को कैसे पटखनी दी जाती है। या फिर पटखनी खाकर भी कैसे बेहयाई से उठ खड़े होते हैं। साहित्य का वास्तविक लक्षण यह है कि…,’ ‘जीवन की आध्यात्मिक व्याख्याओं से हटकर वास्तविक व्याख्या इस रूप में दी जा सकती है कि…’ ‘नीत्शे की मनुष्य की कल्पना बहुत एकांगी है। मेरे विचार में मनुष्य का वास्तविक स्वरूप यह है कि…। जिसे जितने गुर आते थे कुश्ती के, उसने वे सब इस्तेमाल कर लिये। नतीजा? कुछ नहीं, सिवाय भेल-पूरी की दावत के। साहित्य, जीवन और मनुष्य, तीनों पर एक-एक डकार और बस के क्यू में शामिल।
बम्बई…?
बहुत उलझन होती है अपने से। सामने के आदमी का कुछ ऐसा नक्शा उतरता है दिमाग़ में कि दिमाग़ बिल्कुल उसी जैसा हो जाता है। दूसरा शराफत से बात करे, तो बहुत शरीफ़। बदमाशी से बात करे, तो बहुत बदमाश। हँसनेवाले के सामने हँसोड़। नकचढ़े के सामने नकचढ़ा। जैसे अपना तो कोई व्यक्तित्व ही नहीं। जैसे मैं आदमी नहीं, एक लेंस हूँ जिसमें सिर्फ़ दूसरों की आकृतियाँ देखी जा सकती हैं। कभी जब तीन-चार आदमी सामने होते हैं, तो डबल-ट्रिपल एक्सपोज़र होता है। अपनी हालत अच्छे-खासे मोंताज की हो जाती है।

कन्नानोर : रात्रि—21.1.53
कल सहसा चल देने का निश्चय कर लेने के अनन्तर मुझसे कुछ भी काम नहीं हो पाया। यह व्याकुलता जो सहसा जाग उठीबिल्कुल आकस्मिक नहीं कही जा सकती। मैं जानता हूँ…चाहे यह विरोधोक्ति ही लगती हैकि मुझे अर्ध-चेतन रूप से सदा अपने से इसकी आशंका रही है। जहाँ तक चलते जाने का प्रश्न हैचलते जाएा जा सकता है। परन्तु जहाँ ठहरने का प्रश्न आता हैवहाँ बहुत-सी अपेक्षाएँ जाग्रत हो उठती हैं और उन सब की पूर्ति असम्भव होने सेफिर चल देने की धुन समा जाती है।
यहाँ रहकर एक बात हुई हैजिसे मैं सन्तोषजनक कह सकता हूँ। उपन्यास की आरम्भिक रूपरेखा के विषय में मैं इतने दिनों से संशययुक्त था…वह रूपरेखा अब बन गयी है। परन्तु मेरे इस सन्तोष को इतना मूल्य क्या कोई देगा,जितना इसके लिए मैंने व्यय किया है?
एक बात और। घूमने और लिखने की दो प्रवृत्तियाँ हैंजिन्हें शायद मैं आपस में मिला रहा था। अन्योन्याश्रित होते हुए भी ये अलग-अलग प्रवृत्तियाँ हैंऐसा मुझे अब प्रतीत हो रहा है। मैं कैसा भी जीवन व्यतीत करता हुआ घूमता रह सकता हूँपरन्तु बैठकर लिखने के लिए मुझे सुविधाएँ चाहिए ही।
आज यह निश्चय किया कि यथासम्भव सिगरेट और बियर (कम-से-कम जून का महीना) नहीं पीऊँगा। तुरन्त ही सिगरेट की ज़रूरत महसूस हुई और एक सिगरेट सुलगा लिया।
फिर दिन-भर खूब सिगरेट पिए।
कॉलेज से लौटकर कुछ पत्र लिखे। पुष्पा को लिख दिया कि मैं गुरदासपुर नहीं आ पाऊँगा। बाद दोपहर सोमेश आ गया। आजकल इतने मेहमान आते हैं कि अपना घर मेहमानखाना लगता है। कभी-कभी बड़ी कोफ्त होती है। एक तो नौकर के फर्ज सरअंजाम देने होते हैंफिर अपनी हद से बाहर खर्च होता है और उस पर तुर्रा यह कि हर मेहमान को उधार की भी ज़रूरत होती हैउधार जो कभी रिटर्नेबल नहीं होता। आजकल यार लोगों में यह शौक कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है। पिछले छह महीन
े में जो भी आया है
, उसने चलते हुए उधार ज़रूर माँगा है। और जब किसी को अपनी दास्ताने-हयात सुनाता हूँ तो वह समझता है कि यह जिक्र उसका नहीं, दूसरों का हो रहा है। हर व्यक्ति अपने को बहुत ही निजी, बहुत ही घनिष्ठ, बहुत ही बेतकल्लुफऔर इसीलिए उधार माँगने के लिए मौजूँ आदमी समझता है। यह उधार घर से चलते समय ही लोगों की प्लानिंग में शामिल होता है या हर एक को बाहर आकर टोट पड़ जाती है? अपनी शराफत के मारे कमर टूट रही है। हर समय अजब झुँझलाहट दिमाग़ में भरी रहती है।
रात को बातों-बातों में सोमेश की कहानी सुनना भूल गये। अम्माँ से पूछा कि क्या वे कुछ दिन सीलोन रहना पसन्द करेंगी, पर उन्हें तैयार नहीं पाया। ऊपर से वे कहती रहीं कि वे चली जाएँगी, पर उनका दिल नहीं है।
मैं नौकरी छोडऩे न छोडऩे के मसले में बुरी तरह उलझा हुआ हूँ। आज वीरेन्द्र को लिखा है कि क्या वह कुछ दिन अम्माँ को सपोर्ट कर सकता है? देखूँ, क्या उत्तर देता है?
8.11.64
कालिया का लेख उसकी बातचीत से ज़्यादा बचकाना है…दो बार लिखे जाने पर भी उसका कोई अर्थ नहीं बना। परसों वह तीन घंटे बैठा रहा। जो बात मन में थी, उससे कह भी दी…कि आधारभूत ईमानदारी लेकर न चलने से वह साल-दो साल के लिए एक भ्रम तो पैदा कर सकता है, पर वह भ्रम जब टूटेगा, तो वह बहुत तकलीफदेह स्थिति होगी। वह कहता रहा कि अब इस तरह की स्थिति से बचकर चलना चाहता है…जब शुरू-शुरू में दिल्ली आया था,तो ज्यादा ग़ैर-ज़िम्मेदार था…अब उतना नहीं है…कि विमल जैसे व्यक्ति का उस पर कोई प्रभाव नहीं है।
जब वह मासूम बनकर बात करता है, तो मन में बहुत हमदर्दी जागती है। पर साथ ही कहीं यह भी लगता है कि उसकी मासूमियत सिर्फ़ एक लबादा है…वह हर ऐसे व्यक्ति के साथ मासूम बन जाता है जो कहीं किसी तरह का प्रभाव रखता हो…
कभी-कभी यह भी सोचता हूँ कि ऐसा सोचना मेरा कमीनापन है…वह कहीं सचमुच मुझसे इमोशनली अटेच्डहै…या कम-से-कम उन दिनों की एक इज़्ज़त तो उसके मन में है ही जब डी.ए.वी. कॉलेज जालन्धर में मुझसे पढ़ता था। पर उसकी कही या लिखी हर बात का अंडरकरेंट इसके विपरीत जाता है।
जुकाम, खाँसी। हल्का-सा बुख़ार। घर से बाहर वैसे ही बहुत कम निकलता हूँ…आज दिन भर मजबूरन पड़े रहना पड़ा। बिना कुछ किए-धरे। हाँ, छींकते और रूमाल खराब करते हुए कुछ चिट्ठियाँ लिख डालीं। बेमतलब की चिट्ठियों की सफाई भी कर दी।
यह स्वीकृति कैसी है, नहीं जानता। सच, मुझे लगता है कि मुझे मौत से डर नहीं लगता…जो ख्याल आता है वह यही कि बहुत-सा काम अभी करने को पड़ा है। अनीता का ख्याल भी आता है। वह अभी बहुत छोटी है…उसे बीस-तीस साल की ज़िन्दगी मिलनी ही चाहिए, इतना। मगर अपनी वजह से, अपने शरीर की वजह से, डर नहीं लगता। दूसरों की तरह अपनी तरफ से भी मन काफी हद तक तटस्थ है उस दृष्टि से। हो सकता है कि यह स्वस्थ दृष्टि तब तक ही हो जब तक कि स्वास्थ्य ठीक है, उसके बाद न रहे। किसी ने कहा था कि यह दृष्टि स्वस्थ नहीं है। पराजय की स्वीकृति है। मैं नहीं जानता। मुझे इस अहसास से कहीं पराजय नहीं लगती। कुछ वैसा ही लगता है जैसे क्षणभर के इरादे से एक अच्छी-खासी लगी-लगाई नौकरी छोड़ देना।
Ooo

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आज मोहन राकेश का जन्मदिन है. नाटक, कहानी के साथ-साथ मोहन राकेश की डायरी का भी अपना महत्व है. जिन दो लेखकों की डायरी मैंने बार-बार पढ़ी है उनमें मोहन राकेश के अलावा दिनकर की डायरी. लेकिन आज पेश हैं मोहन राकेश की डायरी के कुछ अंश- 











बम्बई…?
दिन-भर परिभाषाएँ घड़ते रहे। साहित्य की, जीवन की, मनुष्य की। बे-सिर-पैर। सभी पढ़ी-सुनी परिभाषाओं की तरह अधूरी और स्मार्ट। दूसरों ने जितनी स्मार्टिंग की कोशिश की, उससे ज़्यादा खुद की। जैसे परिभाषा नहीं दे रहे थे, कुश्ती लड़ रहे थे। महत्त्व सिर्फ़ इस बात का था कि दूसरे को कैसे पटखनी दी जाती है। या फिर पटखनी खाकर भी कैसे बेहयाई से उठ खड़े होते हैं। साहित्य का वास्तविक लक्षण यह है कि…,’ ‘जीवन की आध्यात्मिक व्याख्याओं से हटकर वास्तविक व्याख्या इस रूप में दी जा सकती है कि…’ ‘नीत्शे की मनुष्य की कल्पना बहुत एकांगी है। मेरे विचार में मनुष्य का वास्तविक स्वरूप यह है कि…। जिसे जितने गुर आते थे कुश्ती के, उसने वे सब इस्तेमाल कर लिये। नतीजा? कुछ नहीं, सिवाय भेल-पूरी की दावत के। साहित्य, जीवन और मनुष्य, तीनों पर एक-एक डकार और बस के क्यू में शामिल।
बम्बई…?
बहुत उलझन होती है अपने से। सामने के आदमी का कुछ ऐसा नक्शा उतरता है दिमाग़ में कि दिमाग़ बिल्कुल उसी जैसा हो जाता है। दूसरा शराफत से बात करे, तो बहुत शरीफ़। बदमाशी से बात करे, तो बहुत बदमाश। हँसनेवाले के सामने हँसोड़। नकचढ़े के सामने नकचढ़ा। जैसे अपना तो कोई व्यक्तित्व ही नहीं। जैसे मैं आदमी नहीं, एक लेंस हूँ जिसमें सिर्फ़ दूसरों की आकृतियाँ देखी जा सकती हैं। कभी जब तीन-चार आदमी सामने होते हैं, तो डबल-ट्रिपल एक्सपोज़र होता है। अपनी हालत अच्छे-खासे मोंताज की हो जाती है।

कन्नानोर : रात्रि—21.1.53
कल सहसा चल देने का निश्चय कर लेने के अनन्तर मुझसे कुछ भी काम नहीं हो पाया। यह व्याकुलता जो सहसा जाग उठीबिल्कुल आकस्मिक नहीं कही जा सकती। मैं जानता हूँ…चाहे यह विरोधोक्ति ही लगती हैकि मुझे अर्ध-चेतन रूप से सदा अपने से इसकी आशंका रही है। जहाँ तक चलते जाने का प्रश्न हैचलते जाएा जा सकता है। परन्तु जहाँ ठहरने का प्रश्न आता हैवहाँ बहुत-सी अपेक्षाएँ जाग्रत हो उठती हैं और उन सब की पूर्ति असम्भव होने सेफिर चल देने की धुन समा जाती है।
यहाँ रहकर एक बात हुई हैजिसे मैं सन्तोषजनक कह सकता हूँ। उपन्यास की आरम्भिक रूपरेखा के विषय में मैं इतने दिनों से संशययुक्त था…वह रूपरेखा अब बन गयी है। परन्तु मेरे इस सन्तोष को इतना मूल्य क्या कोई देगा,जितना इसके लिए मैंने व्यय किया है?
एक बात और। घूमने और लिखने की दो प्रवृत्तियाँ हैंजिन्हें शायद मैं आपस में मिला रहा था। अन्योन्याश्रित होते हुए भी ये अलग-अलग प्रवृत्तियाँ हैंऐसा मुझे अब प्रतीत हो रहा है। मैं कैसा भी जीवन व्यतीत करता हुआ घूमता रह सकता हूँपरन्तु बैठकर लिखने के लिए मुझे सुविधाएँ चाहिए ही।
आज यह निश्चय किया कि यथासम्भव सिगरेट और बियर (कम-से-कम जून का महीना) नहीं पीऊँगा। तुरन्त ही सिगरेट की ज़रूरत महसूस हुई और एक सिगरेट सुलगा लिया।
फिर दिन-भर खूब सिगरेट पिए।
कॉलेज से लौटकर कुछ पत्र लिखे। पुष्पा को लिख दिया कि मैं गुरदासपुर नहीं आ पाऊँगा। बाद दोपहर सोमेश आ गया। आजकल इतने मेहमान आते हैं कि अपना घर मेहमानखाना लगता है। कभी-कभी बड़ी कोफ्त होती है। एक तो नौकर के फर्ज सरअंजाम देने होते हैंफिर अपनी हद से बाहर खर्च होता है और उस पर तुर्रा यह कि हर मेहमान को उधार की भी ज़रूरत होती हैउधार जो कभी रिटर्नेबल नहीं होता। आजकल यार लोगों में यह शौक कुछ ज़्यादा ही बढ़ गया है। पिछले छह महीने में जो भी आया है, उसने चलते हुए उधार ज़रूर माँगा है। और जब किसी को अपनी दास्ताने-हयात सुनाता हूँ तो वह समझता है कि यह जिक्र उसका नहीं, दूसरों का हो रहा है। हर व्यक्ति अपने को बहुत ही निजी, बहुत ही घनिष्ठ, बहुत ही बेतकल्लुफऔर इसीलिए उधार माँगने के लिए मौजूँ आदमी समझता है। यह उधार घर से चलते समय ही लोगों की प्लानिंग में शामिल होता है या हर एक को बाहर आकर टोट पड़ जाती है? अपनी शराफत के मारे कमर टूट रही है। हर समय अजब झुँझलाहट दिमाग़ में भरी रहती है।
रात को बातों-बातों में सोमेश की कहानी सुनना भूल गये। अम्माँ से पूछा कि क्या वे कुछ दिन सीलोन रहना पसन्द करेंगी, पर उन्हें तैयार नहीं पाया। ऊपर से वे कहती रहीं कि वे चली जाएँगी, पर उनका दिल नहीं है।
मैं नौकरी छोडऩे न छोडऩे के मसले में बुरी तरह उलझा हुआ हूँ। आज वीरेन्द्र को लिखा है कि क्या वह कुछ दिन अम्माँ को सपोर्ट कर सकता है? देखूँ, क्या उत्तर देता है?
8.11.64
कालिया का लेख उसकी बातचीत से ज़्यादा बचकाना है…दो बार लिखे जाने पर भी उसका कोई अर्थ नहीं बना। परसों वह तीन घंटे बैठा रहा। जो बात मन में थी, उससे कह भी दी…कि आधारभूत ईमानदारी लेकर न चलने से वह साल-दो साल के लिए एक भ्रम तो पैदा कर सकता है, पर वह भ्रम जब टूटेगा, तो वह बहुत तकलीफदेह स्थिति होगी। वह कहता रहा कि अब इस तरह की स्थिति से बचकर चलना चाहता है…जब शुरू-शुरू में दिल्ली आया था,तो ज्यादा ग़ैर-ज़िम्मेदार था…अब उतना नहीं है…कि विमल जैसे व्यक्ति का उस पर कोई प्रभाव नहीं है।
जब वह मासूम बनकर बात करता है, तो मन में बहुत हमदर्दी जागती है। पर साथ ही कहीं यह भी लगता है कि उसकी मासूमियत सिर्फ़ एक लबादा है…वह हर ऐसे व्यक्ति के साथ मासूम बन जाता है जो कहीं किसी तरह का प्रभाव रखता हो…
कभी-कभी यह भी सोचता हूँ कि ऐसा सोचना मेरा कमीनापन है…वह कहीं सचमुच मुझसे इमोशनली अटेच्डहै…या कम-से-कम उन दिनों की एक इज़्ज़त तो उसके मन में है ही जब डी.ए.वी. कॉलेज जालन्धर में मुझसे पढ़ता था। पर उसकी कही या लिखी हर बात का अंडरकरेंट इसके विपरीत जाता है।
जुकाम, खाँसी। हल्का-सा बुख़ार। घर से बाहर वैसे ही बहुत कम निकलता हूँ…आज दिन भर मजबूरन पड़े रहना पड़ा। बिना कुछ किए-धरे। हाँ, छींकते और रूमाल खराब करते हुए कुछ चिट्ठियाँ लिख डालीं। बेमतलब की चिट्ठियों की सफाई भी कर दी।
यह स्वीकृति कैसी है, नहीं जानता। सच, मुझे लगता है कि मुझे मौत से डर नहीं लगता…जो ख्याल आता है वह यही कि बहुत-सा काम अभी करने को पड़ा है। अनीता का ख्याल भी आता है। वह अभी बहुत छोटी है…उसे बीस-तीस साल की ज़िन्दगी मिलनी ही चाहिए, इतना। मगर अपनी वजह से, अपने शरीर की वजह से, डर नहीं लगता। दूसरों की तरह अपनी तरफ से भी मन काफी हद तक तटस्थ है उस दृष्टि से। हो सकता है कि यह स्वस्थ दृष्टि तब तक ही हो जब तक कि स्वास्थ्य ठीक है, उसके बाद न रहे। किसी ने कहा था कि यह दृष्टि स्वस्थ नहीं है। पराजय की स्वीकृति है। मैं नहीं जानता। मुझे इस अहसास से कहीं पराजय नहीं लगती। कुछ वैसा ही लगता है जैसे क्षणभर के इरादे से एक अच्छी-खासी लगी-लगाई नौकरी छोड़ देना।
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9 thoughts on “बहुत उलझन होती है अपने से

  1. hindi natak sahitya ke niyantha mohan rakesh ji ki vichitra manasikatha dhi,unke purush patre,sahitya our rajaneeti,kam yevam mukthi,purnatha our apurnatha ke sangharsh ke bhokta hai diary ke ye ansh na aanevala kal upnyas ke nayak manoj ka smaran dilate hai jo chahiye ya nahim chahiye ke beech kaskar fas jata hai

  2. Mohan Rakesh ka jitna prabhaavshali vyaktitv thaa
    utna hee prabhaashali krititv bhee . Unkee adhikansh kritiyon ke naam pathkon kee zabaan par hain . Ve Prem Chand , Yash Pal , Jainendra
    Kumar , Upendra Nath Ashk , Vrindavan Lal Verma , Dharmveer Bhari , Shreelal Shukl ,
    Kamleshwar kee Shrenee mein aate hain . Un sab
    kee kritiyan yadgar hain . Aaj ke kitne rachnakar hain jinkee kritiyon ke naam pathkon ko yaad hain ?

  3. Mohan Rakesh ka jitna prabhaavshali vyaktitv thaa
    utna hee prabhaashali krititv bhee . Unkee adhikansh kritiyon ke naam pathkon kee zabaan par hain . Ve Prem Chand , Yash Pal , Jainendra
    Kumar , Upendra Nath Ashk , Vrindavan Lal Verma , Dharmveer Bhari , Shreelal Shukl ,
    Kamleshwar kee Shrenee mein aate hain . Un sab
    kee kritiyan yadgar hain . Aaj ke kitne rachnakar hain jinkee kritiyon ke naam pathkon ko yaad hain ?

  4. …यह स्वीकृति कैसी है, नहीं जानता। सच, मुझे लगता है कि मुझे मौत से डर नहीं लगता…जो ख्याल आता है वह यही कि बहुत-सा काम अभी करने को पड़ा है।

    shukriya prabhat ji!

  5. मोहन राकेश अपनी रचनाओं में स्‍वयं को जीते है
    उनके पात्र किसी अन्‍य नाम से मोहन राकेश को जी रहे होते है
    'आषाढ का एक दिन' का कालिदास 'लहरों के राजहंस' का नंद 'एक और जिंदगी' का प्रकाश, ये सब ऐसे पात्र है जिनके माध्‍यम से मोहन राकेश ने अपने द्वंद्वो को आकार दिया है…….
    आज मोहन राकेश का जन्‍मदिवस है ….
    आज हिंदी कहानी,नाटक के पुरोधा का जन्‍मदिवस है……

  6. मोहन राकेश की डायरी के अंश पढवाने के लिए शुक्रिया..उनकी तटस्थ दृष्टि ही उन्हें एक महान रचनाकार बना गई. जब वह मासूम बनकर बात करता है, तो मन में बहुत हमदर्दी जागती है…कभी-कभी यह भी सोचता हूँ कि ऐसा सोचना मेरा कमीनापन है…शायद यही वजह है की आशाड का एक दिन में विलोम कालिदास मल्लिका अम्बिका सभी चरित्र ग्रे हैं.. जो हालात से समझौता अपने प्रति निष्ठावान भी बने रहते हैं…

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