वरिष्ठ लेखिका विजय शर्मा ने दिल्ली यात्रा और एक ऑटोचालक पर बड़ा दिलचस्प संस्मरण लिखा है. साझा कर रहा हूँ- मॉडरेटर
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इस बार की दिल्ली यात्रा में समय कम था और काम बहुत ज्यादा। दिल्ली खूब फ़ैल गई है। अब अव्ह दिल्ली नहीं है जो अस्सी के दशक में हुआ करती थी। जब शादी के बाद हम गुलमोहर पार्क में रह रहे थे। या बचपन में जब बुआ के यहाँ त्रिनगर जाया करती थी। जब पैदल चलना आम बात थी। ज्यादातर यात्रा बस में हुआ करती थी। आज तो दिल्ली में रास्ते फ़्लाई ओवर के कारण खूब घुमावदार हो गए हैं। ठीक सामने जाने के लिए कितने फ़्लार्र ओवर पार करने होते हैं। ज्यों-ज्यों सभ्यता बढ़ती जाती है रास्ते वन वे होते जाते हैं और आदमी से आदमी की दूरी बढ़ती जाती है।
समय की किफ़ायत के चक्कर में ऑटो सवारी ही एकमात्र जरिया बचा था। बस में चलने से परहेज नहीं पर समय की बचत करनी थी। अत: ऑटो में पानी की तरह पैसा बहाया। मन में धुकधुकी लगी रहती, क्योंकि लोगों का कहना था कि दिल्ली में यदि रास्ते मालूम न हों तो ऑटो वाले खूब ठगते हैं। झूठमूठ घुमाते रहते हैं और मीटर उठता रहता है। बाहर के लोगों को खूब उल्लू बनाते हैं। हाँ, अब मैं दिल्ली के लिए बाहरी हूँ। लेकिन मेरे लिए उपाय क्या था। फ़िर कई मामलों में मैं ठहरी एक नंबर की कंजूस। सो सोचा क्यों न इन ऑटो यात्राओं से एक पंथ दो काज किए जाएँ। बस फ़िर क्या था मेरे भीतर का लेखक सक्रिय हो गया। जिस ऑटो जिसमें बैठती, उसके चालक से बातचीत करने लगती। कुछ मजेदार अनुभव हुए। मानवीय संवेदना के कई रूप, कई चेहरे देखने यहाँ को मिले।
एक ऑटो में बैठी, रास्ता ठीक से मालूम न था। डर था पता नहीं कहाँ-कहाँ घुमा कर ले जाए। ऑटो वाले से कहा, ‘भैया उसी रास्ते से ले चलो जो छोटा हो और मीटर कम उठे।’ मेरी बात के उत्तर में ऑटो वाले ने अपनी पूरी राम कहानी सुना दी। बोला, “आप चिंता न करो। हम ऑटो चलाते हैं मगर बेईमान नहीं हैं। ईमानदारी की रोटी खाते हैं। आदमी ईमानदारी से रहे तो मन को बड़ा सकून रहता है। भगवान की दया से हमारे पास सब कुछ है। बच्चे पढ़-लिख गए हैं। पत्नी भी ३०-३५ हजार कमा लेती है। अपना छोटा-सा घर है और क्या चाहिए।’
मेरी उत्सुकता जगी। पूछ लिया, ‘क्या करती है आपकी पत्नी?’
‘अजी, सरकारी स्कूल में टीचर है। एमए, बीएड पढ़ी है।’
‘आप नहीं पढ़े?’ मेरे मुँह से निकल गया।
‘पढ़े हैं न। बी ए पास हैं।’ उसने बोलना जारी रखा, ‘जब शादी हुई पत्नी इंटर पास थी। बोली अब मेरी पढ़ाई कहाँ होगी। तो मैंने उससे कहा क्यों नहीं होगी तेरी पढ़ाई। तेरा मन पढ़ाई में लगता है, तेरे अच्छे नंबर आए हैं। सो जितना मन करे पढ़। और जी उसने पढ़ा। तो जी हम तो मेहनत में विश्वास करते हैं। मेहनत का फ़ल मिलता है।’ उसने बताया कि वह छपरा का रहने वाला है। कई साल से दिल्ली में है। कभी-कभा छपरा चला जाता है। भला अपना घर कहीं छूटता है।
मैं कुछ कहती उसके पहले ही मेरा गन्तव्य आ गया। उसने ईमानदारी से मुझे मेरे सही स्थान तक पहुँचा दिया था। बिना इधर-उधर घुमाए। और जाते-जाते अपनी, एक आम भारतीय आदमी की कहानी मुझे थमा गया था। यही है भारत का आम आदमी, सीधा-सादा, मेहनती, ईमानदार। और इसी के बल से भारत है।
मैं सोचने लगी कि छपरा का रहने वाले एक ऑटो रिक्शा ड्राइवर की सोच इतनी अच्छी है, कितनी प्रगतिशील है। शादी के बाद जिसने पत्नी की पढ़ाई में रूचि देख उसे पढ़ने के लिए प्रेरित किया। उसे पढ़ाया, बच्चों को भी पढ़ाया, लायक बनाया। मेहनत और ईमानदारी में जिसका विश्वास है। काश! ऐसी सोच सारे लोगों की होती तो बिहार इतना बदनाम और पिछड़ा न होता।
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