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  • डेविड सोलले के उपन्यास ‘फ्लेश’ का एक अंश

     

    इस बार बुकर प्राइज़ कनाडा मूल के लेखक डेविड सोलले के उपन्यास ‘फ्लेश’ को मिला है। जिसके बारे में बुकर प्राइज़ के वेबसाइट पर लिखा है-‘फ्लेश’ जीवित रहने की कला और उसके साथ आने वाली समस्त यातनाओं का विवेचन है। मुख्य पात्र, इस्तवान, की भावनात्मक अनासक्ति, कथानक की जबरदस्त गतिशीलता के कारण उपन्यास में प्रवाह निरंतर बना रहता है। इस उपन्यास की कथा एक बड़े विषय की बात करती है-  हमारे फ़ैसलों से हमारे शरीर का अनासक्त रहना।’। यह उपन्यास का शुरुआती अंश का हिन्दी अनुवाद है, जिसमें कथा-नायक इस्तवान के किशोर जीवन की एक घटना का रोचक विवरण है। अनुवाद किया है कुमारी रोहिणी ने- मॉडरेटर

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    जब वह पंद्रह साल का हुआ तो अपनी माँ के साथ एक नए शहर में चला गया। वहाँ एक नए स्कूल में पढ़ने लगा। यह कोई आसान उम्र नहीं होती – स्कूल की सामाजिक व्यवस्था पहले से ही बन हो चुकी होती है। ऐसे में उसे दोस्त बनाने में थोड़ी दिक्कत हुई। कुछ समय बाद उसकी जिससे दोस्ती हुई, वह भी उसी की तरह अकेला था। वे कभी-कभी स्कूल के बाद शहर में खुले पश्चिमी शैली के नए शॉपिंग मॉल में साथ घूमने जाते।

    ‘क्या तुमने पहले कभी वो सब किया है?’ उसके दोस्त ने उससे पूछा।

    ‘नहीं’, इस्तवान बोला।

    ‘मैंने भी नहीं किया है’,  उसका दोस्त बोला, उसने बड़ी सहजता से यह बात बोली। सेक्स के बारे में बात करने का उसका तरीका सरल और स्वाभाविक था। वह इस्तवान को बताता रहता कि स्कूल में वह किन लड़कियों के बारे में सोचता था और उनके साथ क्या-क्या करने की कल्पना करता था। उसने बताया कि वह अक्सर दिन में चार-पाँच बार हस्तमैथुन करता है, जिससे इस्तवान को लगने लगता कि वह कमजोर है क्योंकि वह आमतौर पर एक या दो बार ही ऐसा कर पाता था। जब उसने यह बात बताई तो उसके दोस्त ने कहा, “तुम्हारी सेक्स ड्राइव कमज़ोर होगी।”

    यह सच भी हो सकता है, हालाँकि उसे पता है। वह नहीं जानता कि दूसरों के लिए यह कैसा होता होगा।

    उसके पास सिर्फ़ अपना अनुभव था।

    एक दिन उसके दोस्त ने उसे बताया कि उसने रेल की पटरियों के दूसरी तरफ रहने वाली एक लड़की के साथ ऐसा किया था।

    यह खबर विचलित करने वाली थी।

    जब उसका दोस्त सब कुछ विस्तार से बता रहा था तब इस्तवान अपने उस दोस्त की बातें बड़े ही ध्यान से सुन रहा था कि आख़िर क्या-क्या हुआ। वह समझने की कोशिश कर रहा था कि उसका दोस्त सच कह रहा है या झूठ। वैसे वह चाहता था कि उसकी बातें झूठ हों, लेकिन लेकिन उसे लग रहा था कि वह शायद सच ही कह रहा था। उसकी कही कुछ बातें इतनी अलग और हैरान करने वाली लग रही थीं कि उसे भरोसा ही नहीं हो रहा था कि उसके दोस्त की ऐसी बातें मनगढ़ंत होंगी।

    कुछ दिनों बाद, उसने बताया कि उसने उस लड़की से बात की है और उसने कहा है कि वह इस्तवान के साथ भी यही सब करेगी।

    ‘सच में?’ इस्तवान ने कहा।

    ‘हाँ’, दोस्त ने जवाब दिया।

    इस्तवान को लगा कि वे तीनों मिलकर ऐसा करेंगे, या वह अकेले ही उस लड़की के साथ ऐसा करेगा।

    वह खुद को लेकर इतना अनिश्चित था कि इस बारे में पूछ नहीं पाया।

    उसी दिन स्कूल के बाद, वे रेल की पटरियों के ऊपर बने फुटब्रिज पर चल गए।

    अँधेरा होने लगा था।

    वे फ़ुटब्रिज के दूसरी तरफ़ लोहे की सीढ़ियों से नीचे उतरे और तब तक चलते रहे जब तक कि एक रिहायशी कॉलोनी में नहीं पहुँच गए। यह उस कॉलोनी से अलग नहीं था जहाँ इस्तवान और उसकी माँ रहते हैं, बस यहाँ इमारतें, ऊँची थीं। उनमें से एक के गेट पर जाकर उसके दोस्त ने एक फ़्लैट के दरवाज़े की घंटी बजाई।

    कुछ पल बाद, बिना कुछ कहे, दरवाज़ा खुल गया और वे दोनों अंदर चले गए।

    लिफ़्ट से सिगरेट के धुएँ की गंध आ रही थी।

    इस्तवान ऊपर जाते हुए उसके अंदरूनी हिस्से में लगे लकड़ी जैसे दिखने वाले फ़्रेम को देख रहा था।

    हर मंज़िल से गुज़रते हुए लगातार होने वाली चरमराहट और एक अलग तेज़ टिक-टिक की आवाज़ के साथ लिफ्ट बहुत धीरे-धीरे ऊपर जा रही थी।

    ‘तुम ठीक हो?’ उसके दोस्त ने उससे पूछा।

    ‘हाँ’,  इस्तवान बोला।

    ‘तुम डरे हुए लग रहे हो’, उसके दोस्त ने कहा।

    ‘नहीं’, इस्तवान ने जवाब दिया।

    वे लिफ्ट से ऊपर की एक मंज़िल पर पहुँचे और उसके दोस्त ने एक फ्लैट का दरवाज़ा खटखटाया। एक लड़की ने दरवाज़ा खोला जो लगभग उन्हीं की उम्र की थी।

    ‘हाय’, लड़की ने कहा।

    ‘हाय’, इस्तवान के दोस्त ने बोला।

    वह दरवाज़े के एक तरफ़ हो गई ताकि वे दोनों भीतर आ सकें।

    ‘यह मेरी दोस्त है’, इस्तवान के दोस्त ने परिचय करवाया। ‘पता है। वही जिसके बारे में मैंने तुम्हें बताया था।’

    ‘ठीक है’, लड़की ने कहा।

    वह और इस्तवान एक पल के लिए एक-दूसरे को देखने लगे।

    ‘ठीक है?’ इस्तवान के दोस्त ने कहा।

    ‘हाँ,’ लड़की बोली।

    वे तीनों वहीं खड़े रहे।

    लड़की फिर इस्तवान की तरफ देखने लगी।

    वह उसकी तरफ नहीं देख रहा था।

    ‘ठीक है,’ इस्तवान के दोस्त ने कहा।

    ‘क्या तुम अंदर इंतज़ार करना चाहोगे?’ लड़की ने एक दरवाज़े की तरफ़ इशारा करते हुए उससे पूछा।

    ‘हाँ ठीक है,’ इस्तवान के दोस्त ने कहा। हो सकता है वह निराश हो, मानो उसे खुद भी यकीन नहीं था कि वे सब साथ में करेंगे या नहीं, और उसे उम्मीद थी कि वह ऐसा कर पाएगा।

    इस्तवान सिगरेट सुलगाने लगा, सिगरेट में आग की लौ पकड़वाने के लिए वह बार-बार  लाइटर को ऑन-ऑफ कर रहा था।

    उसके दोस्त ने एक पल के लिए उससे नज़रें मिलाईं और मुस्कुरा दिया।

    इस्तवान ने मुस्कुराने की कोशिश तक नहीं की। उसे घबराहट जैसा कुछ महसूस हो रहा था।

    वह लड़की के पीछे-पीछे एक छोटे से अँधेरे गलियारे से होते हुए आखिर के एक कमरे में पहुँच गया।

    उसे वह कमरा कुछ ज़्यादा समझ नहीं आया, सिवाय इसके कि इसमें ढेर सारा सामान था, जिसमें पिंजरे में बंद एक छोटा सा जानवर भी शामिल था।

    लड़की वहाँ रखे एक बिस्तर पर बैठ गई।

    और इस्तवान एक कुर्सी पर।

    ‘तुम्हारा नाम क्या है?’ लड़की ने उससे पूछा।

    उसने एक बार फिर से अपना नाम बताया।

    लड़की ने भी उसे अपना नाम बताया।

    ‘तुम ठीक हो?’ लड़की ने पूछा।

    “हाँ,” उसने जवाब दिया।

    उन्होंने कुछ मिनट आपस में बातें कीं। वह लगातार बोले जा रही है। हालाँकि कुछ देर तक सन्नाटा भी रहता है, जिसमें कभी-कभी पिंजरे में छोटे जानवर के हिलने की आवाज़ सुनाई दे जाती। उसने उससे पूछा कि वह कहाँ से है। जब वह उसे बताया, तो लड़की ने एक बार फिर से पूछा कि ‘कैसा है?’

    ‘ठीक हूँ’, उसने जवाब में कहा।

    दोनों चुपचाप बैठे रहे।

    शायद कुछ करना ज़रूरी था इसलिए लड़की ने सिगरेट जला ली।

    थोड़ी देर बाद, बिना कुछ कहे, वह उठकर चली गई।

    कुछ मिनट बाद दरवाज़ा फिर से खुला।

    इस्तवान ने ऊपर देखा, सामने उसका दोस्त खड़ा था।

    उसे उम्मीद थी कि वह लड़की होगी।

    ‘क्या हुआ?’ उसके दोस्त ने पूछा।

    ‘क्या मतलब?’

    ‘क्या हुआ?’ उसके दोस्त ने फिर से पूछा।

    ‘कुछ नहीं।’

    ‘वह चाहती है कि तुम चले जाओ,’ उसके दोस्त ने कहा। ‘तुमने क्या किया?’

    ‘कुछ नहीं।’

    ‘कुछ नहीं?’

    ‘हाँ।’

    वे फ्लैट से बाहर निकले और बाहर गलियारे में उसके ने दोस्त ने उससे कहा, ‘ठीक है, मिलते हैं।’

    ‘क्या तुम नहीं आ रहे हो?’ इस्तवान ने उससे पूछा।

    ‘नहीं, वह चाहती है कि मैं वापस उसके पास जाऊँ’, दोस्त ने जवाब दिया।

    ‘हाँ?’

    दोस्त ने सिर हिलाते हुए कहा ‘फिर मिलते हैं।’

    ‘ठीक है।’

    वह अब भी समझ नहीं पाया था कि आख़िर ऐसा क्या हुआ। गहरी सोच में डूबा इस्तवान अकेले ही लिफ्ट से नीचे उतर रहा था।

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