‘चंपारण प्रयोग’ और गाँधी का जादू कैसे चला

यह गांधी के चम्पारण सत्याग्रह की शताब्दी का साल है. इस मौके को ध्यान में रखते हुए प्रसिद्ध पत्रकार और मूलतः चंपारण के निवासी अरविंद मोहन ने एक किताब लिखी है ‘चंपारण प्रयोग’. पुस्तक उन्होंने महात्मा गांधी के कम्युनिकेटर रूप को ध्यान में रखते हुए काफी अलग तरह से लिखी है. पुस्तक का प्रकाशन भारतीय ज्ञानपीठ से हुआ है. आज उसी पुस्तक का एक अंश- मॉडरेटर

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गान्धी ने किसानों के मन से शासन, गोरी चमडी और जेल वगैरह का डर किस तरह निकाला इसके दो तीन मजेदार किस्से जानने चाहिए. दादा कृपलानी को घोडे की सवारी का शौक था और तब चम्पारण मेँ लोग स्थानीय सवारी के लिए घोडोम का खूब इश्तेमाल करते थे. किसी दिन उन्होने किसी स्थानीय साथी का घोडा लेकर अपना शौक पूरा करना चाहा. उन्हे तेज सवारी अच्छे लगती थी. सो उन्होने घोडे को ऐड लगाए पर वह भडक गया. उसने सवार को ही पटक दिया. दादा कृपलानी के घुटने छिल गए और चोट लगी. घोडा जब भडककर मुडा तो एक बुजुर्ग महिला भी डर कर भागी और गिर गई. लोगोँ ने दोनोँ को सम्भाला और कृपलानी जी अपना यह कार्यक्रम त्यागा. पर जिस समय यह घटना हुई उसी समय स्थानीय पुलिस प्रमुख भी आसपास थे. उन्होने कृपलानी पर शांति भंग करने का मुकदमा कर दिया जिसमेँ खुद चश्मदीद गवाह बन गए. नोटिस मिलने पर सब हैरान थे पर गान्धी ने किसी वकील को उनकी पैरवी नहीँ करने दी. कृपलानी जी को चालीस रुपए जुर्माना या पन्द्रह दिन जेल की सजा हो गई. कृपलानी जुर्माना देने और आन्दोलन मे शामिल बाकी वकील अपील करने की बात करने लगे. गान्धी ने फिर उन्हे रोक दिया. उन्होने कहा कि अभी चम्पारण के लोग जेल जाने से काफी डरते हैँ. कृपलानी जी जेल जाएंगे तो लोगोँ के मन मेँ बैठा जेल का खौफ कम होगा. और इस प्रकार कृपलानी जी की पहली जेल यात्रा गान्धी ने ही कराई.

दूसरा मामला भी कम दिलचस्प नहीँ है गान्धी के समाधान के हिसाब से. हुआ यह कि जब किसान अपने ऊपर होने वाले जुल्मोँ की कहानी सत्याग्रह के कार्यकर्ताओँ को सुना रहे थे और वे लोग जिरह के जरिये हर मुद्दे का स्पष्टीकरण भी करते चल रहे थे तब काफी गहमागहमी रहती थी. कई जगहोँ पर ये गवाहियाँ चलती थीँ एक खुफिया अधिकारी बार-बार इस जगह से उस जगह जाकर गवाही देने वाले रैयतोँ का नाम-पता नोट कर रहा था. गवाही देने वाले और लेने वाले दोनोँ ही यह जानकर परेशान थे क्योंकि बाद मेँ बदले की कार्रवाई होने का अन्देशा था. पहले अक्सर ऐसा ही होता था. बाबू धरणीधर ने उस अधिकारी से कहा कि आप दूर रहेँ. इतना पास न आवेँ. गान्धी से शिकायत हुई तो वे भी आए. अधिकारी ने कहा यह हमारी ड्यूटी है. हम पास न जाएंगे तो सही जानकारी कैसे देंगे. फिर गान्धी ने अपने लोगोँ से कहा कि जब आप बयान लेते हैँ तो इतने रैयत घेरे बैठे रहते हैँ. आप कोई चोरी का काम तो नहीँ कर रहे हैँ. जब इतने रैयतोँ के मौजूद रहने से आपको दिक्कत नहीँ होती तो एक और आदमी के रहने से आप क्योँ परेशान हैँ. जो बात सबको मालूम होती है इस बेचारे से क्योँ छुपाई जाए. इनको भी रैयत ही समझिये. गान्धी का इतना कहना था कि सब लोग हंस पडे और अधिकारी पर मानो घडोँ पानी पड गया. वह अपना और शासन का रौब बढाने आया था पर यहाँ रैयत बन गया. उसके बाद से कोई रैयत सिपाही-दारोगा-खुफिया पुलिस को देखकर डरता न था.

पर गान्धी ने सिर्फ इनडाइरेक्ट कम्युनिकेशन और अपने काम या संकेत से दूसरोँ तक बात पहुंचाने के ही उस्ताद न थे वे सीधी बातचीत या लिखत-पढत मेँ बातचीत के भी उतने ही बडे माहिर थे. उनसे मिलने वाले चम्पारण वाले, बिहारी, भारतीय और बाहरी लोगोँ की छोडिये शासन मेँ बैठा कोई भी गोरा और शोषण तथा लूट का प्रतीक बन गए निलहोँ मेँ शायद ही कोई होगा जो उनसे प्रभावित न हुआ हो. और वे बुराई से नफरत करते थे, बुरे आदमी से नहीँ यह बात कदम-कदम पर दिखती है. लगभग सारे ही अधिकारी गान्धी से बातचीत करके प्रभावित लगते थे और अक्सर उनके सधे तर्क भी उनको गान्धी के पक्ष मेँ कर देते थे. इसलिए सिर्फ एक अदालती लडाई जीतने का मामला न था, गान्धी ने जिस तेजी से सरकारी जांच आयोग बनवाने मेँ सफलता पाई, उसकी जांच मेँ चम्पारण की खेती-किसानी के हर पहलू को अकेले ढंग से रखा और जो-जो चीजेँ पाना चाह्ते थे उन पर सर्वसम्मत सिफारिशोँ वाली रिपोर्ट तैयार कराके मनवा ली यह साधारण कौशल का काम न था. उन्होने किस तरह मूल सिद्धांतोँ पर अडिग रहते हुये छोटे-छोटे मसलोँ पर निलहोँ की जिद को मानकर यह हासिल किया इसकी चर्चा पहले की जा चुकी है. पर उनको भी यह लग गया था कि नील तो विदा हो रही फसल है, असल मामला निलहोँ और गोरोँ की विदाई का सन्देश देने का है और वह इस आयोग ने और उसकी सिफारिशोँ के आधार पर आए शासकीय आदेश से हासिल हो गया. दो-तीन साल मेँ नील-निलहोँ और फैक्टरियोँ-जिरातोँ का सारा खेल इतिहास की चीज बन गए.

गान्धी वकील भी थे और उन्हे कानून की बहुत बारीक समझ थी. अपने मुकदमे मेँ जिस तरह से उन्होने पूरे अंगरेजी शासन तंत्र को पटखनी दी वह साधारण समझ की चीज नहीँ है. सरकारी वकीलोँ की टोली और मजिस्ट्रेट समेत सारे लोगोँ को कुछ सूझा ही नहीँ जब गान्धी ने अपना लिखित छोटा बयान पढा ( देखेँ परिशिष्ट-2). और सीधे मुकदमा उठाने और जांच मेँ सहयोग देने का वायदा करने एक अलावा शासन को और रास्ता नहीँ सूझा.

बाद मेँ गान्धी ने इस सहयोग का भी पर्याप्त सांकेतिक लाभ लिया. गान्धी ने निषेधाज्ञा का उल्लंघन करके और गिरफ्तार करके पेश होने पर मजिस्ट्रेट के सामने अपना गुनाह कबूला और सजा भुगतने पर हामी भरी. बाद मेँ जब गान्धी ने अपना काम शुरु किया तो प्रशासन ने उनसे पूछा कि आपको क्या सहयोग चाहिये तो गान्धी ने कहा कि एक मेज और दो कुर्सियाँ. इस पर शासन के अधिकारी ने कहा कि हमारा एक आदमी भी आपके साथ रहेगा तो गान्धी ने उस पर आपत्ति करने या यह आदमी कौन होगा, यह पूछे बिना कह दिया कि उसके लिए आपको एक और कुर्सी देनी होगी. सहमति के बाद हुकुमत ने तीन कुर्सियाँ और एक मेज बैलगाडी मेँ लदवा कर गान्धी के पास भेजवा दिये. और गान्धी भी इस सहयोग तो ठुकराने की जगह उन सब जगहोँ पर प्रदर्शित करते रहे जहाँ वे जाते थे. वे जहाँ पहुंचते थे, इन चार फर्नीचरोँ वाली बैलग़ाडी वहाँ जाती थी.

और इस एकमात्र कानूनी लडाई मेँ बैरिस्टर गान्धी ने क्या कर दिया इसकी मिसाल मिलनी मुश्किल है. शासन तो स्तब्ध रहकर सहयोग देने के वायदे पर आया, निलहे सहमकर पीछे हुए पर देश दुनिया के अखबारोँ ने इस खबर को सुर्खियाँ दीँ, सम्पादकीय लिखे, लेख और टिप्पणियाँ छपीँ. राजेन्द्र प्रसाद की किताब चम्पारण मेँ महात्मा गान्धी मेँ विस्तार से अखबारोँ की खबरोँ और टिप्पणियोँ को उद्धृत किया है. मद्रास के इंडियन पैट्रियट, बम्बई के द मैसेंजर, मद्रास के न्यू इंडिया, लाहौर के द पंजाबी, बम्बई के द इंडियन सोशल रिफार्मर, लखनऊ के द एडवोकेट, मद्रास के मद्रास टाइम्स, बम्बई के बाम्बे क्रानिकल, कलकत्ता के द बंगाली, और लाहौर के ट्रिब्यून के सम्पादकीय मेँ मुकदमा जीतने पर खुशी का इजहार किया गया था. ये सब गान्धी की हवा बनाने और अंगरेजोँ की हवा बिगाडने मेँ सहायक हुए.

पर गान्धी को अदालती कामकाज और कानून की सीमाओँ का भी पता था सो अपनी तरफ से उन्होने कभी अदालत का दरवाजा नहीँ खटखटाया और ना ही अपने साथ के नामी वकीलोँ को ऐसा करने दिया. वे उनकी सेवाएँ किरानी एक तौर पर ही लेते रहे. बल्कि जब शरहबेशी के मामलोँ मेँ लोमराज सिन्ह समेत कुछ लोग हार-जीत के अदालती खेल मेँ लगे रहे और पहले से चल रहे इस मुकदमे मेँ ब्रजकिशोर प्रसाद भी जुटे थे, तब भी गान्धी ने उस या उस तरह के मुकदमे पर भरोसा करने की जगह सिर्फ शरहबेशी का सिर्फ चार आना पैसा ही वापस करने जैसा समझौता कर लिया क्योंकि उनको साफ लगता था कि ऐसे 75000 मुकदमे कौन किसान लडेगा, कितनोँ के पास अदालत की लडाई लडने का खर्च होगा और किस मामले मेँ अदालत क्या रुख लेकर गाडी पटरी से उतार दे इसका भरोसा मुश्किल है. जहाँ तक नील और गाडी के सट्टोँ की बात है तो तीन लाख सट्टे समाप्त कराने के मुकदमोँ की तो कल्पना भी मुश्किल है. गान्धी ने बाकी जीवन भी अपनी लडाई मेँ अदालती और कानूनी मदद की कोशिश नहीँ की, चम्पारण के लोग भी राजनैतिक लडाई मेँ अदालत नहीँ गए. कानूनी मसले आए, नए कानून बनाने के विवाद हुए, इन पर गोलमेज बातचीत हुई और गान्धी ने सबमेँ अपना पक्ष अच्छे से रखा पर अदालत और कानून के भरोसे अपनी लडाई नहीँ लडी. कानून पर भरोसा रखा पर अदालतोँ और वहाँ के कामकाज पर नहीँ.

सरकार से पत्राचार हो या कहीँ औपचारिक सम्वाद का अवसर गान्धी उस कम्युनिकेशन के भी उस्ताद थे. उनकी कापी का एक-एक शब्द महत्वपूर्ण होता था और उसको बदल सकना भी मुश्किल था. वे जिस सम्बोधन से पत्राचार शुरु करते थे वह भी अपने आप मेँ काफी महत्वपूर्ण होता था. अधिकारियोँ के नाम लिखी उनकी चिट्ठियाँ इतिहासकार बी.बी. मिश्र और प्रशासनिक अधिकारी श्रीधर वासुदेव सोहोनी के सौजन्य से काफी समय पहले सामने आ गई थीँ  और वे इस बात की गवाही देती हैँ. पर सबसे दिलचस्प तो वे रिपोर्टेँ और स्मरणपत्र हैँ जो गान्धी ने विभिन्न अवसरोँ पर शासन को या अन्य संस्थाओँ को औपचारिक रूप से दिये थे. चम्पारण के किसानोँ की स्थिति पर उनकी सबसे शुरुआती रिपोर्ट भी उनकी इस प्रतिभा का अच्छा प्रमाण है जबकि अभी गान्धी को चम्पारण आए एक महीना भी नहीँ हुए थे और वे भोजपुरी न जानने एक चलते काफी हद तक पंगु बने रहे थे.

अरविन्द मोहन

गान्धी जब चम्पारण मेँ थे तब रोज औसतन पच्चीस से तीस चिट्ठियाँ लिखते थे, तार भेजते थे. जाहिर है उनके कम्युनिकेशन का यह सबसे प्रिय तरीका था. और कई बार तो वे पूरी-पूरी रात लिखते-पढते ही गुजार देते थे. जिस दिन मोतिहारी अदालत मेँ उनका मुकदमा था वह् रात तो उन्होने अपना जबाब लिखने और लोगोँ को पत्र लिखने और तार देने का मसविदा लिखने मेँ ही गुजार दी. और पत्रोँ की भाषा औपचारिक सरकारी पत्राचार से एकदम अलग होती थी. इसमेँ वे अपने भतीजे को यह भी लिखते हैँ कि तुम्हारे पत्र का इंतजार मैँ चातक द्वारा स्वाति की बून्द के इंतजार की तरह करता हूँ. डेनमार्क की नन एस्थर फैरिंग को पत्र लिखते सम्य उनका स्नेह ऐसा उमडता है कि आज भी महसूस किया जा सकता है. अहमदाबाद आश्रम स्थापित करने मेँ लगे मगनलाल के पत्र जिम्मेवारियोँ और भरोसे एक सन्देश से भरे हैँ. बाकी साथियोँ के पत्र मेँ स्वास्थ्य का हालचाल लेने और आहार सम्बन्धी सलाह से लेकर आन्दोलन की रिपोर्टिंग तक है. अर्थात हर किसी से निजी स्तर का रिश्ता बनाने जताने वाला सन्देश. एस्थर को वे चम्पारण के बारे मेँ बुनियादी जानकारियाँ दीन के साथ घूमने-फिरने का इंतजाम करने की सूचना देते हैँ. और उन्ही को लिखी शुरुआती चिट्ठी से यह सूचना मिलती है कि गान्धी को चम्पारण आते ही यहाँ के काम मेँ छह महीने से अधिक समय लगने का अनुमान हो गया था.

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