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अजय नावरिया की कहानी ‘विखंडन’

अजय नावरिया समकालीन हिंदी के उन लेखकों में हैं जिन्होंने हिंदी लेखन को अंतरराष्ट्रीय पहचान दी. मुझे एक संस्मरण याद आ रहा है. एक बार नॉर्वे की एक युवा लेखिका भारत आई. वह ‘जानकी पुल’ की पाठिका थी. उसके साथ ईमेल से बातचीत भी होती थी. दिल्ली आने के बाद उसने मुझे फोन किया और मुझसे मिलने के लिए समय माँगा. हौज खास विलेज के एक चाइनीज रेस्तरां में उस्ससे मिलने गया. देशी-विदेशी साहित्य को लेकर खूब बातें हुई. उसने मेरी कहानियां नहीं पढ़ी थी लेकिन पढना चाहती थी. बात हिंदी कहानियों की होने लगी. निर्मल वर्मा से बात शुरू हुई और उसने अचानक कहा- बट आई लव अजय नावरियाज शॉर्ट स्टोरीज. खैर, यह अजय नावरिया की नई कहानी है. हाल में ही एक जमाने की प्रतिष्ठित पत्रिका में छप चुकी है. आप भी पढ़िए- प्रभात रंजन

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उम्‍म उम्‍म उम्‍म….ऊं ऊं ऊं… ओ मामा …ओह मामा… ओह मामा….।

यह शोर सुन कर झटके से मेरी नींद टूटी।

…ओ माई गॉड… ओ माई गॉड….किसी स्‍त्री के रोने या पिटने की आवाजें हवा में तैर रही थी।

कमरे मे काफी रोशनी थी, पर फिर भी मैंने साइड में लगे टेबल लैम्‍प को जलाया। ठीक उसी वक्‍त ‘आह’  की आवाज़ के साथ सब तरफ ख़ामोशी छा गई…एकदम नीरवता।

यूनान में यह मेरा दूसरा ही दिन था। ‘इन रिविजि़ट’ होटल अर्थात पुनरागमन सराय… का यह दूसरा फ्लोर था। पुराने एथेन्‍स के भीड़-भाड़ वाले इलाके से दूर, यह एक शांत जगह थी। पूरा रिहायशी इलाका, जहॉं सिर्फ दो-एक होटल ही थे, यह होटल भी बहुत बड़ा नहीं, मामूली सा ही था… अपने नाम के हिसाब से किसी सराय जैसा ही। तीन फ्लोर थे इस में और हर फ्लोर पर पॉंच कमरे… लेकिन हर कमरा बहुत साफ और सुरूचिपूर्ण ढंग से सजा हुआ। घड़ी देखी, रात के ढाई बज रहे थे।

मैंने आवाज़ों के बारे में सोचा और पलंग से उठ खड़ा हुआ। यह जानने के लिए पूरे कमरे का चक्‍कर लगाया कि आखिर ये आवाजें किस की थी और कहॉं से आ रही थीं, पर कुछ समझ न आया। कमरे का दरवाजा चैक किया, बंद था। बाल्‍कनी में झॉंका, वहॉं बहुत अंधेरा था और नीचे सड़क पर किसी कुत्‍ते के भौंकने की आवाज़ आ रही थी। एथेंस में कुछ आवारा कुत्‍ते घूमते देखे जा सकते हैं, हालांकि बहुत कम… काफी तगड़े और ऊंचे कुत्‍ते, भारत के मरियल आवारा कुत्‍तों से एकदम अलग।

कहीं कोई ख्‍वाब तो नहीं देखा मैंने ? पर आवाजें…इतनी कातर… दर्द में डूबी…क्‍या वाकई यह सब सपना था ?

1

सुबह एंगेला से बात करुंगा, अब सो जाना चाहिए। काफी देर तक करवटें बदलता रहा। जरा सी आहट पर भी कान खड़े हो जाते। उत्‍सुकता और भय हर करवट में जैसे साथ करवट लेते। नहीं एंगेला को बता कर परेशान नहीं करना चाहिए। शायद वहम ही हो या शायद अर्द्धसुप्तावस्‍था… फिर इस में बताने जैसा भी क्‍या है ?

तभी साथ वाले कमरे से किसी के फ्लश चलाने की आवाज आई…रात के इस सन्‍नाटे में इस शोर ने सहारा दिया कि इतनी रात को मेरे अलावा भी कोई है जो जाग रहा है। कुछ ही देर बाद फिर फ्लश चलने की आवाज़ हुई।

एंगेला का कमरा, मेरे साथ वाला ही था…रुम नम्‍बर 206 और मेरा 207… तो क्‍या एंगेला इस वक्‍त जाग रही है? मैं उठा और दरवाजे़ तक गया। धीमे से दरवाज़े का सुनहला गोल हेण्‍डल घुमाया और दरवाज़ा खोल कर कॉरीडोर में आ गया। एंगेला के दरवाजे के नीचे देखा, पर वहॉं घुप्‍प अंधेरा था। धीमे कदमों से मैं वापस लौटने लगा। तभी मेरी नज़र रूम नम्‍बर 208 के दरवाजे के नीचे गई, वहॉं भीतर लाईट जल रही थी।

हॉं याद आया, कल सुबह जब मैंने चेक-इन किया था, तब इस कमरे से एक अधेड़ दम्‍पत्ति को निकलते हुए देखा था। उन्‍हें हेलो भी किया था मैंने और उन्‍होंने मुस्‍कुराते हुए जवाब भी दिया था।

सोच कर मैं मुस्‍कुरा गया। ‘ओह तो ये मोहतरमा चिल्‍ला रही थीं इस उम्र में भी।’

वापस आ कर मैं इत्‍मीनान से सो गया। होटल में सिर्फ चाय मिल सकती थी, वह भी आर्डर करने पर क्‍योंकि जो यूगोस्‍लावियन महिला सान्‍या रिसेप्‍शन पर बैठती थी, वही चाय भी ला कर देती। मुझ से कुछ दसेक साल बड़ी लगी वह मुझे। चालीस के आसपास का बासापन उस के गोरे चेहरे पर पुता रहता। हालांकि देह उस की अब भी छरहरी थी और काफी फुर्तीली भी थी वह। उस की मिनी स्‍कर्ट में चमकती दो सुडौल जांघें इस बात की गवाही देती कि उस ने खुद का भरसक ध्‍यान रखा है। सुबह सात बजे वही चाय ले कर आई। चाय के साथ दो डाइजेस्टिव बिस्किट भी। यही मेरा नाश्‍ता था। लकड़ी के फर्श पर जिस तेजी से वह आई, उसी तेजी से खट-खट करती निकल भी गई।

2

एंगेला आज भी ग्‍यारह बजे ही उठी, हमेशा की तरह। उस ने मुझे फोन किया और गुड मार्निंग कहा। कमरे में इंटरकॉम की सुविधा सिर्फ रिसेप्‍शन के लिए थी, इसलिए हमें मोबाइल फोन पर ही बात करनी पड़ती। मुझे पहले ही वह ताकीद कर चुकी थी कि जब तक बहुत ज़रूरी न हो, ग्‍यारह से पहले मैं  उसे न जगाऊं। बहुत कोशिश कर के मैं सात बजे तक सो पाता क्‍योंकि मुझे पॉंच साढ़े पॉंच तक उठने की बीमारी थी। पर यहॉं यूरोप की एक बात मुझे बहुत अच्‍छी लगती कि ये लोग साफ कहना और सुनना पसंद करते हैं। अगर कुछ परेशानी है तब भी और अगर प्‍यार है तब भी। वरना ये आप से बात भी नहीं करेंगे। लिजलिजी भावुकता को यह फालतू बात मानते हैं शायद। कोई गलतफहमी नहीं रखते और न रहने देते।

एंगेला के फोन के थोड़ी देर बाद मैं तैयार हो कर नीचे आ उतरा। नीचे एक छोटी सी लॉबी…जिस में एक छोटा बार, कुछ सोफे और सामने दीवार पर एक लटका हुआ एलसीडी टीवी जो रात दिन चलता रहता था शायद। होटल का मालिक एदोनिस रिसेप्‍शन पर आ बैठा था। बड़े डील-डौल वाला, पचास पार का कद्दावर यूनानी। रिसेप्‍शन वाली वह यूगोस्‍लावियन महिला वहॉं नहीं दिखी।

एदोनिस ने अपनी भारी आवाज़ में मुझ से पूछा कि ‘आप को नींद ठीक से आई ?’ यह उस की आदत में था शायद क्‍योंकि इस सवाल को वह अपने हर गेस्‍ट से सुबह किया करता। हर वक्‍त अपने गंजे सिर पर  वह हाथ फेरता रहता।

सौजन्‍यतावश मैंने कहा- ‘हॉं’। पर फिर कुछ सोच कर मुस्‍कुराते हुए कह ही बैठा- ‘सिवाय पति-पत्‍नी के उस शोर के जो रात के ढाई बजे रूम नम्‍बर 208 से आ रहा था…मेरी नींद उस ‘उफ आह’  ने तोड़ दी।’

‘208…!!!’ मालिक की आंखों में आश्‍चर्य फैल गया। उस ने रजिस्‍टर उठाया और कुछ चैक करने लगा। ‘कोई गलतफहमी हुई है आप को… वह रूम तो खाली है… कल जो गेस्‍ट थे, वे तो दोपहर में ही चेक आउट कर गए थे और अभी तक उस में किसी ने चैक इन नहीं किया है।’

3

यह सुन कर मैं कुछ अकबका गया। कुछ असहजता भी मेरे व्‍यवहार में आ गई- ‘ऐसा कैसे हो सकता है ?’

एदोनिस हंसते हुए बोला- ‘ज़रूर आप ने कोई मीठा सपना देखा होगा, अभी आप जवान हैं… हम ने भी देखे थे कभी।’

‘नहीं मैंने उठ कर कॉरीडोर में आ कर देखा कि रूम में अंदर लाईट जल रही थी।’

‘लाईट जल्‍दबाज़ी में जली हुई छूट गई होगी।’ कह कर वह फिर हंसा।

कुछ चिढ़ सा गया मैं- ‘आप इसे बहुत हल्‍के ढंग से ले रहे हैं।’

मेरी चिढ़ को अनदेखा कर वह अब भी बहुत प्‍यार से बोला- ‘हॉं क्‍योंकि यह अंसभव है कि कोई वहॉं हो।’

‘एदोनिस, प्‍लीज़ समझो, दो बार फ्लश चलने की आवाज़ भी मैंने सुनी।’ जरूर मेरी आवाज में कुछ घबराहट रही होगी, कुछ सच में और कुछ उसे प्रभावित करने के लिए। इस का उस पर असर भी दिखा।

उसी शांति से वह बोला- ‘बेशक आप ने सुनी होगी। यहॉं कमरों की दीवारे सीमेंट की नहीं है, लकड़ी की हैं और फ्लश कहीं ऊपर, नीचे, दूर या पास के किसी भी रूम में चलेगा तो लगेगा कि पड़ोस वाले रूम में चल रहा है।’ इस बार वह मुस्‍कुराया नहीं बल्कि रजिस्‍टर बंद कर के, उठ गया और लाऊंड्री रूम की तरफ बढ़ गया।

क्‍या वाकई यह मेरा वहम था। एंगेला लिफ्ट से बाहर निकल रही थी। एदोनिस ने उस से कुछ कहा। एंगेला ही ने मेरे लिए यह रूम बुक कराया था, इनीस की चचेरी बहन।

एंगेला ने मेरे पास आते ही एदोनिस की तरफ इशारा करते हुए मुझ से कहा-‘क्‍यों परेशान कर रहे हो फिलोस्‍फर, उस पहलवान को अपनी डरावनी कहानियॉं सुना कर ।’ यह सुन कर एंगेला को रात की सारी घटना ब्‍यौरेवार सुनाने का मेरा जोश ही खत्‍म हो गया।

हम बाहर निकल गए। दिन भर हम पुराने एथेन्‍स में पैदल पैदल घूमते रहे। वहॉ की संकरी

4

परन्‍तु साफ गलियॉं, बिना गंदगी की नालियॉं, कहीं कोई बदबू नहीं, वहॉं के बाज़ार, लोगों से भरे हुए, पर मज़ाल कि किसी की कोहनी भी छू जाए या कोई जरा भी भिड़ जाए, कहीं कोई तेज हॉर्न बजा कर दहलाता नहीं, रोशनी से चमचमाते शोरूम और स्‍टोर। बहुत से बांग्‍लादेशी सड़क किनारे छोटे छोटे कियोस्‍क में सिगरेट, लाइटर, चाकलेट,पेपरमिन्‍ट  जैसी चीजे बेच रहे थे। बहुत बांग्‍लादेशी आ चुके हैं इस शहर में और यूनानी इन से दूरी बना कर रखते हैं। यूनानी सोचते हैं कि ये लोग मटन की जगह कुत्‍ता भी खा जाते हैं और अपने रेस्‍तरां में ग्राहकों को खिला भी देते हैं। इन के कोई एथिक्‍स नहीं। आम यूनानी उन से बचते हैं, उन के रेस्‍तरां से भी, शायद सभी दक्षिण एशियाई लोगों से, यूनानी ही नहीं ज्‍यादातर यूरोपियन। मुझे ये देख कर दिल्‍ली में बिहार से आये मजदूर लोग याद आए और दिल्‍ली वालों का उन के प्रति बर्ताव भी।  हालांकि स्‍टाकहोम के मुकाबले एथेंस में भीड़ और गंदगी दोनों ज्‍़यादा थी, लेकिन भारत से बहुत बहुत कम। एथेंस की दीवारें हर जगह अनाम कलाकारों की ग्रेफिटि से सजी हुई थी। पूरा शहर जैसे कोई आर्ट गैलरी था। जब हम कुछ थक गए तो वहॉं की प्राचीनतम इमारत के अवशेष एकरोपोलिस के पास बने विशाल पार्क में जा कर सुस्‍ताने लगे।

इनीस से एंगेला ने पहले ही पूछ लिया था कि मेरी रूचि किस में है और इनीस बता चुका था कि मेरी दिलचस्‍पी इमारतों में नहीं है, इंसानों में हैं, उन की सहज बातचीत, हाव-भाव और प्रतिक्रियाओं में है, इसलिए वह मुझे बाजार और भीड़-भाड़ वाले इलाकों में घुमा रही थी।

शाम को भरे हुए, चमकते बाज़ारों और उन में हंसते खेलते खाते यूनानियों को देख कर सहसा विश्‍वास ही न होता कि यूनान बैंकरप्‍ट हो चुका है। कहीं कोई आपाधापी, भय, लूटमार और गरीबी दिखाई न देती। भिखारी भी एकाध और वे भी रोमा यानी खानाबदोश किस्‍म के लोग। एंगेला यह सवाल सुन कर बहुत हंसी और बताया कि हम यूनानी लोग मकानों और इमारतों के किराये पर मौज कर रहे हैं। सरकार बैंकरप्‍ट है, नागरिक नहीं। भीतर यहॉ भी बहुत भ्रष्‍टाचार है।

‘इनीस ने मुझे बताया था कि डेव अजीब आदमी है।’ एंगेला ने तिरछी नज़र से देखते हुए मुझे कहा। ‘तुम बेशक सनकी हो पर तुम्‍हारा कल का लेक्‍चर काबिलेतारीफ था। यहॉं भी ऐसे बहुत से लोग हैं जो जीवन से पार के जीवन में विश्‍वास करते हैं। तर्क तुम्‍हारे अच्‍छे थे और उन की व्‍याख्‍या भी … कल तुम्‍हें मैं अपनी एक ऐसी ही दोस्‍त केलिस्‍ता से मिलाऊंगी। तुम्‍हारे बारे में मैंने उसे बताया था, नहीं नहीं बल्कि यह कहना चाहिए कि उस ने ही खुद ही पूछा कि क्‍या तुम्‍हारे यहॉं कोई भारतीय मेहमान आया और मैं हैरान रह गयी कि आखिर उसे कैसे पता चला। वह तुम से मिलने के लिए बहुत उत्‍सुक है, हालांकि सच में वह तुम से भी ज्‍़यादा विचित्र है।’ एंगेला मुस्‍कुरायी। ‘और यकीन मानो उस की हमें सख्‍त ज़रूरत है, उस से ज्‍़यादा उस की कार

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की…बिना कार हम यहॉं टैक्‍सी से घूमेंगे तो बैंकरप्‍ट हो जाएंगें… लुट जाएंगे हम।’ ऑंख मारते हुए वह मज़ाकिया लहजे़ में बोली।

उस की बात सुनते-सुनते मैं कहीं और चला गया, खो गया था कहीं, अपनी आदत से मजबूर , लौटा तो कहा कि ‘मेरा खुद भी अभी तक इस सब में यकीन नहीं है, पर मैं सच को हज़ार मुखों वाला मानता हूँ।’ मैंने एंगेला से कहा । वह मेरे उस व्‍याख्‍यान की तारीफ कर रही थी, जिसे एथेन्‍स की ‘सोसायटी ऑफ फिलोसोफिकल थॉटस’ ने आयोजित किया था और जिस में व्‍याख्‍यान देने के लिए, संस्‍था के खर्चे पर ही मुझे आमंत्रित किया गया था। दो दिन का खर्च उन की तरफ से था पर कार्यक्रम मैंने सात दिन का बनाया ताकि एथेंस और आसपास के शहर घूम सकूं। वह एथेंस के पास ही किसी गॉंव में रहती थी। सात दिन के लिए, वह अपने खर्च पर, मेरे लिए एथेंस में आ रूकी।

यूरोप की तथाकथित व्‍यक्तिवादी और स्‍वार्थी जि़न्‍दगी के बारे में जैसा हम भारतीयों को बताया जाता है, यह सब उस के उलट था। यहॉं अनेक मददगार और परदुखकातर व्‍यक्ति और परिवार देख रहा था मैं । बस वे अपनी निजता चाहते थे, इस से अधिक कुछ नहीं…मनचाहा एकांत… यही चीज जो सब से दुर्लभ है भारत में ।

दोपहर ग्‍यारह बजे से एंगेला और मैं साथ थे और सच में भूल ही गया था मैं  कि कल रात को क्‍या कुछ हुआ था, पर जब हम रात को होटल लौटे, तो कल रात की सारी घटनाएं सामने घूमने लगी। एंगेला अपने कमरे में चली गयी। उस का कमरा पहले पड़ा। फिर मैं अपने कमरे के पास आया। कौतुहलवश, कुछ आगे बढ़ा और देखा कि रूम नम्‍बर 208 की लाइटें बंद हैं। वापस आ कर मैं बेमकसद अपने कमरे के दरवाजे पर खड़ा रहा। तभी सामने से एक विचित्र सा बूढ़ा कॉरीडोर में धीमे-धीमे चलते हुए मेरे पास से निकल गया। उस के जूतों से चर्र मर्र की ऐसी आवाज़ आ रही थी जैसे उन में पानी भरा हो। अजीबोगरीब बूढ़ा था वह, उस के खिचड़ी बाल बेतरतीब थे और वह ऐसे चल रहा था जैसे नींद में हो। वह पास से गुज़रा तो मरी मछलियों की सी गंध आई।

अपने कमरे के ताले में ज्‍यों ही मैंने चाभी लगाई, दरवाजा खुलने की आवाज आई, तो मैं झटके से कुछ पीछे हो गया। ‘मैं कुछ ज्‍़यादा ही सतर्क हो गया हूँ शायद।’ खुद को समझाया मैंने। कुछ दस कदम दूर से आई थी यह आवाज । दबे पॉंव मैं  उस आवाज की दिशा में बढ़ा।

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वहॉं से स्‍त्री-पुरूष के हंसने की आवाजें आ रही थीं। कमरा नम्‍बर 210 के सामने से अनजान बन कर गुज़रते वक्‍त, कमरे के खुले दरवाजे़ पर मैंने एक अधेड़ पुरूष और एक नवयुवती को एक दूसरे को चूमने में इस कदर मग्‍न पाया कि मैं मुस्‍कुरा गया। मेरी भी इच्‍छा हुई कि काश कोई दोस्‍त मेरे साथ भी इस तरह यहॉं होती। एंगेला ने एक दोस्‍त से अधिक कोई रूचि अब तक नहीं दिखाई। एंगेला बहुत आकर्षक और सुन्‍दर यूनानी युवती थी पर बहुत शांत। उस का अस्‍वाभाविक गोरा सुनहरा रंग, उसे मानो किसी जीवंत कांस्‍य प्रतिमा में बदल देता…एक-एक अंग नपा-तुला तराशा हुआ, लम्‍बी नाक और बड़ी बड़ी आँखें। आवाज़ भी उस की ऐसी कि जैसे कोई मद की आगोश में हो, धीमी और रसीली। उस ने बताया था कि वह अब अकेली है, कोई ब्‍वायफ्रेन्‍ड नहीं, पर तब भी उस ने कोई पहलकदमी नहीं की।

गलियारे में मैं कुछ आगे बढ़ा परन्‍तु आगे डैड एंड था सो वापस लौटने के‍ अलावा कोई रास्‍ता नहीं था और लौटने के लिए वही रास्‍ता था। अपने कमरे की तरफ मैं वापस लौट आया। वे दोनों अब भी दुनिया जहान से बेखबर थे। पुरूष काफी लम्‍बा और हट्टा-कट्टा था और लड़की उस से कुछ अधिक ही छोटी और पतली, लगभग वह पंजों के बल थी और पुरूष की गर्दन झुकी हुई। मेरे आने-जाने का नोटिस भी दोनों ने नहीं लिया।कहीं दुनिया के पार की दुनिया में वे दोनों । मैं किसी आम भारतीय की ही तरह व्‍यवहार कर रहा हूँ… किसी के एकांत में ताक-झांक…मुझ से भला तो वह बूढ़ा था जो अनजान बन निकल गया, देखा तक नहीं। मुझे अपराध-बोध हुआ।

कमरे में आ कर कपड़े बदले और लेट गया। कुछ देर मोबाइल फोन पर यूट्यूब चलाया और अपनी पसंदीदा ठुमरी याद पिया की आए, हाय राम, ये दुख सहा नहीं जाए…सुनने लगा, बेगम अख्‍तर की आवाज़ में यह मुझे सब से अच्‍छी  लगती। यहॉं वाइ-फाई की सुविधा थी। फिर बड़े गुलाम अली, शोभा गुर्टु से राशिद खान तक सब को सुनता रहा। बडी बहन नर्मदा और पॉंच साल की भांजी माही का मीठा उलाहना भी जैसे ठुमरी में साथ-साथ बजता रहा। ‘भाभी कब लाओगे भैया…मामी कब लाओगे मामा जी? ‘कोई मिले तो जो मेरे मन मुताबिक हो और जिस का मैं मनचाहा होऊं।’ मैं कह रहा हूँ। ‘तब तो हो लिया ब्‍याह!’ रूआंसी हो गयी दीदी।

दीदी को मैंने समझाना चाहा कि रिश्‍ता सिर्फ वही नहीं होता, जो हम मानते हैं या अपनी तरफ से जीते हैं, वह भी होता है जिसे दूसरा पक्ष जीता है और अहम यही है कि क्‍या वह उसे उसी शिद्दत से जीता है। नर्मदा दीदी की दुखी आवाज़ निकली-‘देव उसे रिश्‍ता नहीं किस्‍मत कहते हैं।’ खामोशी आ बैठी इस के बाद हम दोनों के बीच। सोचा कि देखें कब तक ऐसे ही निभा सकती हैं ये सॉंसे, इस जीवन को।

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दिन भर का थका होने के कारण मैं जाने कब सो गया।

‘ऊं ऊं ऊं… ओ माइ गॉड ओ माइ गॉड…चर्र मर्र चर्र मर्र…हुफ हुफ…यू डेविल।

मेरी नींद फिर टूट गई। घड़ी देखी, दो बज रहे थे। मैंने तुरंत टेबल लैम्‍प जलाया। आवाज़ अब भी आ रही थी, किसी के रोने की…लगातार… जैसे कोई किसी को पीट रहा हो…हा हा हा…अचानक हँसने की आवाजें आने लगी…यह भी किसी स्‍त्री की आवाज़ थी… मैं खड़ा हो गया और कमरा नम्‍बर 208 की दीवार से कान लगा कर खड़ा हो गया। मेरा सिरहाना उसी तरफ था। आवाज़ें साथ वाले रूम से ही आ रही थी…लगभग दस मिनट तक कभी रोने और कभी हंसने की आवाज़ें आती रही तो मैं धीमे कदमों से बाहर निकला और कमरा नम्‍बर 208 के दरवाजे के सामने जा खड़ा हुआ। वहॉं भीतर रोशनी थी। आवाजें अब भी वैसे ही आ रही थी, जैसे कमरे में आ रही थीं।

अब मन कुछ शांत हुआ कि आखिर खोज ही लिया। सोचा कि दरवाज़ा खटखटा दूं और सारे रहस्‍य से पर्दा उठा दूं पर फिर सोचा कि कहीं कोई गेस्‍ट आज ही आ गया हो तो बहुत बदतमीजी और बेइज्‍जती हो जाएगी। आखिर एथेन्‍स एक टूरिस्‍ट स्‍पॉट है। कुछ देर मैं वहीं खड़ा रहा और बेशर्म बन कर उन आवाज़ों का लुत्‍फ लेता रहा। जब आवाजें आना बंद हो गई तो मैं दबे पॉंव अपने कमरे में आ लेटा। मेरी बाल्‍कनी से मुझे पूरा चॉंद दिख रहा था, चॉंदी सा चमकता हुआ। टेबल लैम्‍प जलता ही छोड़, मैं सोने की कोशिश करने लगा। बार-बार वो मदमाती आवाज़ें मेरी एकाग्रता तोड़ देती, जो अब मेरे मन में बज रही थीं-कैसी होगी वह लड़की… कमबख्‍त राक्षस होगा ज़रूर… फिर वह हंस क्‍यों रही थी… हो सकता है कि कोई पेशेवर हो, उसे खुश कर रही हो।

कुछ देर बाद जाने कब मुझे नींद आ गई। नहीं जानता कि मैं कितनी देर सो सका, कि किसी ने जैसे मेरे पॉंव के अंगूठे को पकड़ कर मुझे हिलाया। मैंने ऑंखें खोली तो सामने एक अपूर्व सुन्‍दर युवती खड़ी थी, जिस की नीली ऑंखें मेरी तरफ बहुत प्‍यार से देख रही थी। मैं निश्‍चेष्‍ट हो गया, सोने का अभिनय किया मैंने, अब कुछ कदम आगे बढ़ कर वह मेरे सिरहाने आ खड़ी हुई।

वह सिर्फ मुझे देखे जा रही थी। एक शब्‍द भी अब तक वह मुझ से न बोली। वह किसी खानाबदोश लडकी की तरह कपड़े पहने हुई थी। पूरी तरह स्थिर नहीं थी वह, हल्‍के हल्‍के हिल

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रही थी, जैसे धीमी हवा में भारी पर्दा हिलता है। ये एंगेला हर्गिज़ नहीं थी। वह मुझे एकटक देख रही थी और मैं आधी से भी कम ऑंखें खोले उसे। ‘डर रहे हो मुझसे…डरो मत।’ भय के मारे सच में मेरे रोंगटे खडे हो गए, पर मैंने गुस्‍सा दर्शाया …‘तुम जाओ यहॉं से, मुझे तुम से कुछ भी नहीं चाहिए।’

वह उसी तरह अपलक मुझे देखती रही… उन नीली ऑंखों में गजब सम्‍मोहन। उस की तीखी नाक, तिकोना चेहरा, सुनहले बाल, दरम्‍याना कद और पतली सी काठी, उस की सुन्‍दरता को और बढ़ा रही थी। ‘तुम जाओ यहॉं से, मैं उस तरह का आदमी नहीं।’ आखिर में यही कहा मैंने।

‘यहॉं से ले जाओ मुझे वापस वहीं।’ बिना मुड़े ही, मुझे देखते हुए वह पीछे हटती चली गई। ज्‍यों ही वह मुझे दिखना बंद हुई, मैं लपक कर दरवाजे की तरफ भागा। मेरी हैरानी की कोई सीमा न रही कि दरवाज़ा खुला था। पर दरवाजा तो मैंने बंद किया था, यह मुझे अच्‍छी तरह याद था। मैंने याद करने की कोशिश की। क्‍या दरवाज़ा खोलने या बंद होने की आवाज़ मुझे आई। नहीं मुझे पक्‍का याद है कि कोई आवाज नहीं सुनी थी मैंने।

कुछ पल मैं दरवाज़े पर ठिठका रहा, फिर धीमे से दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था। एंगेला के दरवाजे तक गया, वहॉं भीतर आश्‍चर्यजनक रूप से रोशनी थी। धीमे कदमों से रूम नम्‍बर 208 के पास गया, वहॉं भी अंदर अंधेरा था। आवाज भी नहीं थी कोई। मैं कमरे में लौट आया और घड़ी देखी, तीन बज रहे थे। नींद उड़ चुकी थी। पूरी रात ऑंखों में ही कट गई। सुबह जब उजाला दिखने लगा, तब मैं जाने कब सो गया। ग्‍यारह बजे, एंगेला के फोन से ही मेरी नींद टूटी। ‘गुड मार्निंग’ कह कर मैंने फोन काट दिया।

अब मैं फिर रात की घटना में डूबने-उतराने लगा। दरवाजे पर जो ताला था, वह आटोमेटिक था यानी जो भीतर से बंद करने पर अपने आप लॉक हो जाता था। कोई उसे बाहर से तभी खोल सकता था, जब उस के पास दूसरी चाभी हो। तब कोई भीतर कैसे आ सकता है? कहीं मुझ से दरवाज़ा खुला ही तो नहीं रह गया था! एक्‍सट्रा चाबी तो नीचे रिसेप्‍शन पर भी रहती है। मैं तैयार हो कर नीचे लॉबी में जा बैठा। सामने रिसेप्‍शन पर एदोनिस बैठा था। पहले

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तो मेरी हिम्‍मत न हुई कि उस से कुछ पूछूं पर उत्‍सुकता और भय ने मुझे बेलिहाज़ कर दिया।

‘गुड मार्निंग…।’ मेरे अभिवादन के जवाब में उस ने अनमनेपन से जवाब दिया। इस बेरूखी ने साफ कर दिया कि उस की बात करने में कोई दिलचस्‍पी नहीं है क्‍योंकि आज उस ने अपनी आदत के हिसाब से नींद के बारे में भी कुछ नहीं पूछा।

‘क्‍या रूम नम्‍बर 208 में कोई गेस्‍ट आ गए हैं?’ पूछ ही लिया मैंने।

‘क्‍यों… फिर कुछ हुआ क्‍या?’ एदोनिस के स्‍वर में तल्‍खी थी।

शिष्‍टता से मैंने पूछा- ‘हॉं…क्‍या कृपया आप मुझे यह बताएंगे ?’

उस ने लापरवाही से रजिस्‍टर उठाया और देख कर बोला -‘नहीं…वह अभी खाली है।’

उस का इतना कहना मेरे भीतर तूफान मचा गया। आखिर वह सब क्‍या था, जो कल रात मेरे साथ घटा। क्‍या मैं वाकई ख्‍वाब में था, ख्‍वाब के भीतर ख्‍वाब…ऐसा होता है, मैं जानता था या फिर मैं किसी मनोवैज्ञानिक समस्‍या से जूझ रहा हूँ…क्‍या यह मेरी कोई साइको-सेक्‍सुअल परेशानी है या वाकई जो देखा, वह सब सच था। अनेक सवाल मुझे मथने लगे। ‘कौन थी वह, कोई जीती-जागती लड़की, ख्‍वाब या कोई आत्‍मा.. उस ने मुझे ये क्‍यों कहा कि उसे वापस ले जाओ वहीं… वहॉं…पर आखिर कहॉं?’

अपनी उंगलियों को उंगलियों के बीच कसते हुए मैंने पूछा- ‘सान्‍या कहॉं है?’

एदोनिस के स्‍वर में अब खालिस उपेक्षा थी- ‘उस की ड्यूटी सिर्फ रात नौ से सुबह नौ तक होती है।’ इस उपेक्षा की ऑंच भी मुझ तक आ गई।

सामने से एंगेला आती दिखी तो मैं वापस सोफे पर जा बैठा। वह एदोनिस से बातें करने लगी। उस के चेहरे के उतरते-चढ़ते हाव-भाव मुझे दिख रहे थे। वह बार-बार हाथ उठा कर उसे कुछ समझा रही थी। एदोनिस के चेहरे पर उद्विग्‍नता थी।

‘आज फिर उसे परेशान किया!’ वह मेरे पास आ कर बोली। ‘क्‍या तुम्‍हारी कोई समस्‍या है?’

एंगेला को कोई जवाब मैंने नहीं दिया। हम दोनों होटल से बाहर निकले तो मैंने उस से कहा-‘शायद मुझे अपना कमरा बदल लेना चाहिए।’ एंगेला ने ‘हम्‍म’ कहा और सिर हिलाया। उस ने 10

अपना फोन निकाला और किसी से यूनानी भाषा में बातें करने लगी। ‘ कमरा अभी नहीं बदला जा सकता…होटल में सिर्फ वही कमरा खाली है…कमरा नम्‍बर 208 …जाओगे ?’एंगेला ने शायद एदोनिस से ही बात की थी।  ‘मामला क्‍या है… कुछ बताओगे?’

‘कुछ नहीं…वहॉं रात को किसी स्‍त्री के रोने, चिल्‍लाने, हंसने और कुछ कुछ बोलने की आवाज़ें आती हैं, रात दो बजे के बाद।’ एंगेला को अब बताना, मैंने उचित समझा।

‘हुम्‍म… देखो यहॉं कुछ गड़बड़ भी हो सकती है… मुझे पक्‍का तो पता नहीं पर हो सकता है कि

सान्‍या रात को कुछ और भी….।’

हैरान हो कर मैंने उस की तरफ देखा -‘मतलब?’

‘एदोनिस के जाने के बाद…शायद एदोनिस भी इस में शामिल हो या फिर उस की ये व्‍यावसायिक मजबूरी भी हो सकती है। एथेंस में टूरिस्‍ट बहुत आते हैं, मंदी है और होटल का बिजनेस…तुम समझ रहे हो न।’ एंगेला ने कंधे उचकाए, उस की बड़ी-बड़ी ऑंखों में चमक उभरी फिर छिप गई।

सान्‍या वाली बात मुझे जंची नहीं, कुछ दूसरी फि़जूल बातों पर ध्‍यान जाता रहा। ‘पर रात उस कमरे में अंधेरा था…कुछ और है यह।’ आखिर मेरे मुंह से निकल ही गया।

‘कुछ नहीं कह सकती…मेरा इन चीजों में विश्‍वास नहीं…पर केलिस्‍ता का है। मैंने बताया था न तुम्‍हें।  तुम्‍हारे बारे में भी बताया था मैंने उसे। हॉं उस ने तुम्‍हारा कमरा नम्‍बर भी पूछा था… वह कुछ जादू वगैरह में विश्‍वास करती है।’ यह कहते हुए एंगेला कहीं खो गई और बताती चली गई कि वह एक ज़हीन लड़की है। ग्रेजुएशन और पोस्‍ट-ग्रेजुएशन में टॉप किया था उस ने  …दर्शनशास्‍त्र में। फिर वह पढ़ाई छोड़ कर एक ऐसे ही समूह से जुड़ गई जो इन जादू-टोनों की प्रेक्टिस किया करता था। मरे हुए लोगों की आत्‍माओं को बुलाते थे वे लोग और उन से जाने क्‍या क्‍या पूछते थे, ऐसा मुझे पता लगा, जैसे हम कहॉं से आए हैं, मरने के बाद क्‍या होता है, कहॉं जाते हैं… आदि आदि। अब वह कुछ नहीं करती, हॉं इधर उस ने बांसुरी बजाना ज़रूर सीखा और अब दो साल से वही कर रही है। ‘अजीबोगरीब है वह…और तुम भी …आज शाम को मिलोगे?___पूछ लेना यह सब।’

एंगेला की इन सब बातों के बीच रह-रह कर मुझे आरबरो याद आ रहा था, इनीस के साथ

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बिताया दिन…वह रोमा बुढिया और उस की विस्मित कर देने वाली बातें। इनीस भी मुझे एक सनकी और अजीबोगरीब आदमी ही समझता था और यह उस की मेरे बारे में पक्‍की धारणा बन गई थी। अक्‍सर ही वह मुझ से अजीब अजीब सवाल करता और उस की आंखें हमेशा ऐसे चमकती, जैसे वह किसी दूसरे ग्रह के आदमी से बात कर रहा हो। इस बीच वह मुझे कई बार अजीबोगरीब कह भी चुका था। उस के ज्‍यादातर सवाल भविष्‍य से जुड़े होते और वह हमेशा मुझ से भविष्‍यवाणी जैसा ही कुछ सुनना चाहता था। सवाल के जवाब का इंतज़ार करते हुए उस की ऑंख में आश्‍चर्य खड़ा रहता, जैसे कोई सतर्क सिपाही लाठी के सहारे टेढ़ा खड़ा हो कर भी आराम कर लेता है।

उस से मुझे सुविधा थी क्‍योंकि सालभर स्‍टॉकहोम में रहने के बावजूद मुझे अभी तक स्‍वीडिश भाषा बहुत कम आती थी और इनीस इस में मेरी सहायता करता। जब मुझे बाज़ार जाना होता तो मैं उसे फोन कर देता और वह जवाब में तुरंत कहता- ‘अभी आऊं डेव।’ मैं उसे शाम को आने को कहता।

मुझ से लगभग दस साल छोटा था वह और लम्‍बाई में मुझ से लगभग एक फुट ऊंचा। अभी वह ग्रेजुएशन कर रहा था और साथ ही किसी रेस्‍तरां में पार्ट-टाइम काम भी करता। सभी लड़के-लड़कियॉं यहॉं पार्ट-टाइम जॉब करते और हैरानी की बात कोई किसी काम को छोटा नहीं मानता और न इस वजह से किसी के साथ भेदभाव करता, उलटे इस आत्‍मनिर्भरता को अच्‍छा माना जाता। निठल्‍ले पढ़ने वालों का मज़ाक बनाया जाता तरह-तरह से। बहुसंख्‍यक कैसे राज करते हैं, मैं सोच कर मुस्‍कुराता… सोचने, समझने और देखने का नज़रिया या मानसिकता तक बदल देते हैं।

इनीस को मेरे भारतीय होने ने आकर्षित किया । यह उस ने मुझ से कहा भी कि मुझे भारत जाने का बहुत मन है, कभी मैं सांपों और जादुई संतों के उस देश में ज़रूर जाऊंगा। मुझे गर्व होता कि मैं भारतीय हूँ, बेशक मैं यूरोप में रह रहा हूँ पर बसना मैं भारत में ही चाहता हूँ, पर क्‍यों ? क्‍यों है यह उत्‍कट लगाव? क्‍यों है आखिर यह भावुकता?

यह बड़ी हैरत की बात थी… सच में अजब संयोग… आज से दस साल पहले जब मैं बीस साल का था तब मेरी भी ऐसी ही प्रबल इच्‍छा यूनान को ले कर थी। उन दिनों, मैं दर्शनशास्‍त्र में ग्रेजुएशन कर रहा था।

इनीस बुद्ध, गोसाल, महावीर, अजित केशकम्‍बली, कबीर, गुरू नानक, रविदास की धरती देखना चाहता

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था। उसे ताजमहल, तमिलनाडु के मंदिर और केरल का पहला चर्च देखना था और मैं सुकरात, प्लेटो, अरस्‍तू, सिकंदर और महान चिकित्‍सक हिप्‍पोक्रेट की मिट्टी को अपने माथे से लगाना चाहता था।

बहुत बाद में मुझे पता चला कि इनीस मूल रूप से यूनानी था परंतु उस का जन्‍म स्‍वीडन में हुआ … आरबरो शहर में।  यूनानी पिता और स्विस मॉं की इकलौती संतान था वह । उस के बहुत से रिश्‍तेदार थे अब भी यूनान के कई शहरों में । यह संयोग ही था कि हम दोनों इस तरह आ मिले, वरना हमारे मिलने का कोई कारण न था। हॉस्‍टल में मुझे अपार्टमेंट अलॉट हुआ था और इनीस का तो अपना घर स्‍टॉकहोम में था। रास्‍ते एक-दूसरे को कहीं काटते-जोड़ते नहीं थे।

सच में, अपने जीवन में घटने वाले संयोगों से मुझे असीम अनुराग है। ये मुझे हमेशा जीवन ऊर्जा से भरे रखते हैं और निराशा से कोसों दूर …हमेशा कुछ नया, मददगार, सार्थक, स्‍फूर्तिदायक और दिलचस्‍प होने या घटने का हौंसला या उम्‍मीद देते हैं।

पोलैंड के वारसा एयरपोर्ट से जिस फ्लाइट से मैं स्‍टॉकहोम लौट रहा था, वह किन्‍हीं तकनीकी कारणों से रद्द हो गयी। ऐसे में निजी विमान सेवा ने एक नयी व्‍यवस्‍था की। इस के तहत पहले मुझे जर्मनी के फ्रेंकफुर्त एयरपोर्ट पर उतरना था और वहॉं से दूसरी फ्लाइट से स्‍टॉकहोम पहुँचना था। फ्रेंकफुर्त से स्‍टॉकहोम की इसी फ्लाइट में साथ वाली सीट पर यह साढ़े छह फुटा इनीस मुझे मिला। कुछ नीलापन लिए बड़ी-बड़ी ऑंखें, लम्‍बी-लम्‍बी पलकें, मासूमियत से भरा तीखी नाक वाला लम्‍बूतरा चेहरा, लम्‍बी गर्दन और अच्‍छे चौड़े कंधे। एक सुंदर-सजीले यूनानी देवदूत जैसा था, जो एक ही नज़र में किसी को भी अपनी तरफ आकर्षित कर ले… एंगेला से काफी मिलता-जुलता चेहरा, आखिर एक ही परिवार था… रक्‍त-सम्‍बन्‍ध । वह विंडो सीट पर था। फ्रेंकफुर्त से फ्लाइट में बैठते वक्‍त जो हमारी औपचारिक बातचीत शुरू हुई, वह स्‍टॉकहोम में उतरते-उतरते एक अच्‍छी दोस्‍ती में बदल गई । हम दोनों ने ही एक-दूसरे को पसंद किया।

उस ने देव दत्‍त की जगह मुझे डेव बुलाना शुरू कर दिया क्‍योंकि बहुत मेहनत के बाद भी वह देव नहीं बोल सका और मैं उसे अब एन बुला रहा था, जो कि उस का प्‍यार का नाम था। उस के यूनानी मूल का होना मुझे बहुत बाद में पता चला, शायद तीन महीने बाद, जबकि हम हर 13

वीकेंड पर मिल ही लेते थे। अपने स्‍वभाव के अनुसार मैंने एन से भी कुछ निजी नहीं पूछा था… किसी के भी निजी या पारिवारिक दायरों में कूदना-फॉंदना पसंद मैं नहीं करता। कोई खुद बताना चाहे तो अलग बात है।

अभी तक बर्फ गिरना शुरू नहीं हुई थी जबकि अक्‍तूबर का महीना शुरू हो गया था। भारत में गरीबी, अशिक्षा, स्‍वास्‍थ्‍य, जातिवाद, भ्रष्‍टाचार और साम्‍प्रदायिकता जैसी समस्‍याएं बड़ी थीं तो यहॉं की राजनीति में ग्‍लोबल वार्मिंग ही उफान पर थी। सभी नागरिक इस बात से चिंति‍त थे कि बर्फ इस बार भी आने में देर कर रही है। अक्‍सर मैं लोगों को बातें करते सुनता कि यह ठीक नहीं हो रहा है और जब तक दुनिया के बाकी देश भी पर्यावरण के इस संकट को नहीं समझेंगे त‍ब तक कुछ ठीक नहीं होगा। अखबार भी बलात्‍कार, हत्‍या और लूटमार की घटनाओं की जगह बर्फ और पर्यावरण की चिन्‍ताओं से भरे रहते। इनीस से मैं ज़रूर मज़ाक करते हुए कहता ‘और भी ग़म हैं ज़माने में, एक बर्फ के सिवा।’ क्‍योंकि वह हर वक्‍त बर्फ के देर से आने को ही सब समस्‍याओं का मूल बताता। ट्रेन देर से आयी क्‍योंकि बर्फ अभी तक नहीं पड़ी, सब्जियों के भाव चढ़ गए हैं क्‍योंकि बर्फ अभी तक नहीं गिरी आदि आदि। मैं ऐसे ही उसे छेड़ता रहता, तो वह टीसती हंसते हुए कहता, डेव तुम इसे समझ नहीं पाओगे अभी। तब मुझे भारत की जाति-व्‍यवस्‍था याद हो आती। पापा अक्‍सर कहा करते थे कि यूरोपीय लोग कभी जाति को नहीं समझ सकते, ये उन की समझ से परे की चीज है।

सुबह की ट्रेन से हम स्‍टॉकहोम से आरबरो के लिए निकले थे। मैंने रिटर्न टिकट भी ले लिया, जो कुल मिला कर कुछ अड़तीस यूरो का हुआ। एन की जेब में रेल का कार्ड था, जिसे वह बाज़रूरत रिचार्ज करा लिया करता ।

‘एथेना तुम्‍हारा इंतजार कर रहा है प्रिय…।’ कह कर सामने बैठी वह बुढि़या हंसी। उस के गोरे झुर्रियोंदार चेहरे पर जादुई चमक फैल गई। ‘किस्‍मत तुम्‍हारे घर खुद चल कर आएगी इंदियानो, इंतज़ार करना।’ उस की भूरी स्‍लेटी ऑंखों में ऐसी चमक थी, जैसे किसी ने उन्‍हें खूब तपा कर चमका दिया हो। शायद संघर्षों ने या शायद अनुभवों की ऑंच ने। उस वक्‍त हम कॉफी पी कर आरबरो के एक बाज़ार में घूम रहे थे ।

जो कुछ वह बोली, मुझे एक शब्‍द के अलावा उस में से कुछ भी समझ नहीं आया। वह शब्‍द था- इन्दियानो मतलब भारतीय। वह स्‍वीडिश भाषा भी नहीं थी, कुछ ज़रूर उस में स्‍वीडिश थी, यह मैंने जान लिया । रोड़ पर बहुत कम लोग थे, लगभग खाली, एक दुकान थी, जिस के पास वह बैठी थी, पॉंव पसारे, कहीं अनंत में देखती। उस के सिर पर एक बहुत ही रंग-बिरंगा और चटकीला स्‍कार्फ बंधा था और हाथों में ऊनी दस्‍ताने, पॉंवों में मोटी ऊनी चुस्‍त काली शलवार जैसा कुछ जिसे ऊपर गले से नीचे घुटनों तक आया एक मोटा लबादा ढके हुए था। 14

भवें आश्‍चर्यजनक रूप से काफी बड़ी और फैली हुई थी, बर्फ की तरह सफेद। माथा चौड़ा था जिस पर फन उठाए एक छोटा सा नाग और कई बिन्‍दु  गुदवाए हुए थे। नाक तीखी और होंठ पतले थे, जैसे यूरोपियन लोगों के होते हैं।

जैसा कि मैं अक्‍सर ही करता था, मैंने ज़ेब में हाथ डाला और क्रोनर के जितने भी सिक्‍के थे, निकाल कर उस के सामने बिछे रूमाल पर रख दिये। सिर्फ बूढ़े लोगों और युवा स्त्रियों की ही इस तरह मदद करता था मैं। यह सोच कर कि बूढ़े लोग मेहनत कर के कुछ कमा नहीं सकते और युवा स्‍त्री को इसलिए कि कम से कम वह भीख मॉंग कर ही अपना जीवन चला ले, जिस्‍म बेचने की नौबत उन के सामने न आए।

बुढि़या की बातें सुन कर हम दोनों आगे बढ़ आए थे। कुछ दुकानों के बाद हम बाएं मुड़े। यह एक गली जैसी थी। गली में भी हम कुछ आगे बढ़ आए थे, तभी मैंने एन से पूछा कि वह क्‍या कह रही थी। उस ने बताया कि वह कह रही थी कि तुम्‍हें एथेन्‍स यानी यूनान की राजधानी बुला रही है और वहॉं तुम्‍हें तुम्‍हारी किस्‍मत मिलेगी। सुन कर मैं हंस पड़ा। एन नहीं हंसा। वह गंभीर था और उस की आंखों में वही आश्‍चर्य का भाव था, जो हमेशा मेरे साथ होने पर होता था। ‘उसे कैसे पता चला कि तुम्‍हें यूनान घूमने की उत्‍कट इच्‍छा है।’ उस की आवाज खोई खोई थी। ‘उस ने यूनान का ही नाम क्‍यों लिया?’ वह भुनभुनाया।

अब मेरा ध्‍यान भी इस तरफ गया और मैं लपक कर पीछे की तरफ भागा, जिस तरफ वह बुढि़या बैठी थी। एन दौड़ते हुए पीछे से चिल्‍लाया- डेव डेव। पर मैं रूका वहीं, उसी दुकान के पास जा कर, वह अब वहॉं नहीं थी। एन भी आ पहुँचा। अब हम दोनों भाग रहे थे, इस गली से उस गली, इस रोड़ से उस रोड़ । आश्‍चर्य हमें दौड़ा दौड़ा कर थका रहा था। तभी तेज़ हवाएं चलने लगीं। एन ने चिल्‍ला कर कहा कि डेव अब वापस चलो, तूफान आने वाला है, तेज बारिश होगी, यहॉं इसी तरह मौसम बदलता है, एकदम अप्रत्‍याशित। पर जैसे मैंने कुछ नहीं सुना…मेरे भीतर दूसरा ही तूफान चल रहा था।

मुझे उस बुढि़या को खोज लेना था बस किसी तरह, किसी भी कीमत पर, आखिर उस की ज़बान पर यूनान का ही नाम क्‍यों आया। साथ दौड़ते हुए एन मुझे बार बार समझा रहा था कि वह जादूगरनी होगी ज़रूर, रोमा है वह…जिप्‍सी… तंत्र-मंत्र जानते हैं, हमें नुकसान पहुँचा सकती है… 15

उस के पीछे भागना ठीक नहीं। दस-पन्‍द्रह मिनट दौड़ने के बाद हम दोनों ही थक गए और एक दुकान के बाहर लगी कुर्सियों पर बैठ गए। कुर्सियॉं खाली पड़ी थीं। दुकानों के बंद शीशों के भीतर कुछ लोग खरीदारी करते दिखाई दे रहे थे। यहॉं सभी बाज़ारों में दुकानों के बाहर तक पक्‍के छज्‍जे बने होते हैं जो बर्फबारी और बारिश के वक्‍त बचाव करते हैं।

हवाएं और तेज हो गई। तभी एन चिल्‍लाया-‘वह रही वहॉं।’ उस की उठी हुई ऊंगली की दिशा में मैंने देखा, एक दुकान की ओट में वह वैसे ही पॉंव फैलाए, धीरे-धीरे ग्रिल्‍ड सैंडविच खा रही थी। वहॉं हवा और बारिश से वह पूरी तरह सुरक्षित थी। कुछ क्षण सांस संयत कर अब हम उस के सामने खड़े थे। उस ने पहले ही की तरह इस बार भी कोई तवज्‍जो नहीं दी।

‘कब जाऊंगा मैं…वहॉं एथेना ?’

उस ने मेरे सवाल को जैसे सुना ही नहीं। वह उसी शांति से अपना सैंडविच खाती रही, जैसे वह हमारे वहॉं होने से अनभिज्ञ हो। मैंने दो बार सवाल दोहराया पर वह उसी में तल्‍लीन रही। ज़ेब से दस क्रोनर का नोट तुरंत निकाल कर मैंने उस के फैले हुए पांवों पर रख दिया। इस बार उस ने ऑंख उठाई, सिर्फ ऑंखें, गर्दन अब भी नहीं और मेरी ऑंखों में पल भर को झांका। उस हैम सैंडविच को काटते और चबाते हुए उस की ऑंखें बंद हो जाती। सैंडविच खा कर रूमाल से उस ने अपने हाथ और मुंह साफ किये। नोट उठा कर उस ने उसे मेरी तरफ बढ़ाया। मैंने कहा रख लो। पर उस ने हाथ पीछे नहीं किया। हार कर मुझे नोट वापस लेना पड़ा।

‘मैं कब जाऊंगा?’ मैंने एन से कहा कि वह उस की भाषा में उस से पूछे। पर उस ने मेरा सवाल सुन कर, एन के बोलने से पहले, सीधे मुझे जवाब दिया- ‘जब किस्‍मत बुलाएगी।’ व‍ह अब स्‍वीडिश भाषा में बोल रही थी। एन मुझे अंग्रेजी में बताए जा रहा था। ‘तुम्‍हारी यूनान जाने की इच्‍छा पूरी होने वाली है…ऐसे ही नहीं जा रहे हो, तुम्‍हें बुलाया जा रहा है।’

‘तुम्‍हें कैसे पता चला यह…कौन बुला रहा है मुझे!!!’

इस सवाल पर चुप्‍पी खींच गई वह, फिर आसमान की तरफ देख कर बोली-‘अब जाओ…अब बारिश होगी।’ दो-तीन क्षण बाद ही तेज बारिश शुरू हो गई। ‘मैं उतना ही बोल पाती हूँ, जितना 16

मेरी आत्‍मा का मुझे आदेश होता है।’

‘पर मुझे किस्‍मत में कोई भरोसा नहीं…।’ एन से मैंने कहा ताकि वह उस से कहे। जवाब में वही बोली, कुछ हिकारत और उपहास से. ‘किस्‍मत को तुम्‍हारे भरोसे से कुछ लेना-देना नहीं है…अपनी लय में चलती है वह, जैसे जवानी में मैं चला करती थी कभी।’ आखिरी अल्‍फ़ाज़ कहते हुए वह ज़रा सी मुस्‍कुराई। शायद वह अंग्रेजी भी कुछ समझती थी।

एन ने भी अपने बारे में कुछेक सवाल पूछे लेकिन एन के चेहरे से पता नहीं चला कि वह क्‍या पूछ रहा है और क्‍या उसे वाकई संतोषजनक उत्‍तर मिले? मैं सिर्फ यह जानना चाहता था कि उस ने यूनान का ही नाम क्‍यों लिया पर उस ने मेरे ऐसे किसी सवाल का जवाब नहीं दिया।

एन के बार-बार सवाल पूछने से वह चिढ़कर चिल्‍लाई-‘जाओ दफा हो जाओ यहॉं से अब…और तुम…।’ मेरी तरफ देख कर वह मुलायम स्‍वर में बोली- ‘नवम्‍बर में यहीं मिलना मुझे… फिर शायद हमारा मिलना हो, न हो…प्‍लीज़ रिविजिट, इफ यू वान्‍ट टू नो मोर।’

ऑरबरो से वापस स्‍टॉकहोम पहुँचने के तीसरे दिन ही मेरे ईमेल बॉक्‍स में एथेंस से आया आमंत्रण था।

अक्‍तूबर के आखिरी हफ्ते में एथेंस में था मैं। बारिश अचानक इतनी तेज़ हो गई कि मुझे और एंगेला को टैक्‍सी से उतर कर बहुत तेजी से होटल की तरफ भागना पड़ा। होटल जिस गली में था, वहॉं टैक्‍सी नहीं जा पाती थी क्‍योंकि यह वन-वे रोड़ था। डिनर कर के लौट रहे थे हम ।  डिनर बहुत शानदार था। सावास रेस्‍तरां के तीसरे फ्लोर पर हम थे। वहॉं से सीधे एकरोपोलिस दिख रहा था, जगमगाता हुआ, रोशनी से नहाया हुआ। संयोग से एकरोपोलिस के ऊपर पूरा चॉंद भी चमक रहा था, हल्‍का पीला, इस का मतलब कल पूर्णिमा थी।

केलिस्‍ता आज विशेष रूप से मुझ से मिलने आई थी। वह कवयित्री भी थी, उस ने बताया। रेस्‍तरां खाली था। हम लोग सब से पहले गेस्‍ट थे। बांसुरी बजाने के मेरे अनुरोध पर केलिस्‍ता ने बांसुरी सामने मेज से उठाई और बिना किसी हील-हुज्‍जत के बजाना शुरू कर दिया। लगभग दस मिनट तक वह बांसुरी बजाती रही और हम तीनों ही उन क्षणों में भूल गए कि हम कहॉं बैठे

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हैं…एक मादक सम्‍मोहन, एक नशा था जो हम पर छा गया।

केलिस्‍ता ने जब बांसुरी बजाना बंद किया तो रेस्‍तरां के वेटर्स ने सब से पहले तालियॉं बजाई। फिर हम दोनों भी बजाने लगे। इस बीच रेस्‍तरां में चार-पॉंच और भी गेस्‍ट आ चुके थे। हमारे ठीक पीछे एक नवविवाहित पंजाबी जोड़ा था। वे सब भी तालियॉं बजा कर अपनी खुशी प्रकट कर रहे थे।

‘डेव, तुम केलिस्‍ता का मतलब जानते हो?’ एंगेला ने मुझ से पूछा तो मैंने ना में सिर हिला दिया। ‘मोस्‍ट ब्‍यूटीफुल…जादुई खूबसूरती।’ एंगेला ने गंभीर और रहस्‍यमयी आवाज़ में कहा। वाकई केलिस्‍ता थी भी गजब सुन्‍दर और शांत भी, जैसे स्थिर लौ का कोई दिया हो। मैंने एंगेला की तरफ देखते हुए पूछा- ‘और एंगेला का?’

‘वही जो तुम हो देव…देवकन्‍या, देवस्‍त्री …देवप्रिया।’ एंगेला की जगह केलिस्‍ता ने गंभीर आवाज़ में जवाब दिया। आश्‍चर्यजनक रूप से केलिस्‍ता ने मुझे देव ही पुकारा, डेव नहीं।

केलिस्‍ता मुझे जाने क्‍यों बहुत पहचानी सी लग रही थी, जैसे मैं उसे पहले भी कहीं मिल चुका हूँ, कहीं देख चुका हूँ। तिकोने चेहरे और छोटी नीली ऑंखों वाली केलिस्‍ता ऐसी खूबसूरत और मासूम थी कि जिस पर कोई भी युवक आसानी से रीझ सकता था, उस के प्रेम में पागल हो सकता था, वह किसी  स्‍वप्‍नसुंदरी जैसी थी। उस शाम वह ज्‍यादातर वक्‍त खामोश रही परन्‍तु जब वह बोलती तो लगता कि कोई नदी धीमी लय में बहे जा रही है। इस डेढ़-दो घंटे की मुलाकात में मैंने जान लिया कि वह हर बात में विशिष्‍ट है। वह बहुत कम लोगों से मिलना-जुलना पसंद करती थी। ज्‍यादातर वक्‍त वह अपने पढ़ने-लिखने और बांसुरी बजाने में व्‍यस्‍त रहती थी। उस के पिता अब इस दुनिया में नहीं थे और उस की मॉं के पास एथेन्‍स में लगभग पचास मकान थे जिन का हर महीने का किराया ही लाखों यूरो में था।

‘डेव, अगर केलिस्‍ता को किसी खानाबदोश की पोशाक पहना दी जाए तो वह किसी खानाबदोश की ही तरह लगेगी…क्‍यों?’ एंगेला ने रेस्‍तरां की लिफ्ट से उतरते हुए अचानक कहा। यह सुन  कर केलिस्‍ता मुस्‍कुरा गई- ‘खून का असर है न।’

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‘मतलब?’ हम दोनों के ही मुंह से बेसाख्‍ता निकला पर केलिस्‍ता ने आगे इस पर कुछ नहीं कहा। बस मुस्‍कुरा कर रह गई।

मेरी ऑंखों के सामने रात वाली लड़की का चेहरा, उस की आंखें, उस की नाक, उस के सुनहले बाल, उस के कपड़े घूमने लगे। बेशक वह लड़की लगभग ऐसी ही थी।

लॉबी में पहुँच कर हम ने सॉस ली। एंगेला गेट के पास खड़े हो कर ही अपने कोट से बारिश का पानी झाड़ रही थी। रिसेप्‍शन पर एदोनिस नहीं था। सामने दीवार पर टेलिविजन चल रहा था। सोफे पर बैठे दो पुरूष शराब पीते हुए अज्ञात में जाने क्‍या देख रहे थे, टेलिविजन की तरफ दोनों में से कोई भी नहीं देख रहा था। हम लिफ्ट की तरफ बढ़े ही थे कि सामने लाऊंड्री रूम से सान्‍या आती दिखी। उस ने मुझ से नजरें बचाते हुए एंगेला को हेलो कहा। ऊपर आने के बाद एंगेला ने गुड नाइट कहा और अपने कमरे में चली गई।

अब मैं फिर उसी जगह खड़ा था, जहॉं कल खड़ा था। कुछ पल मैं वहॉं खड़ा रहा। आखिर जब सब कमरे भरे हैं तो यहॉं कोई शोर क्‍यों नहीं होता, जरा सा भी शोर नहीं और रात को चीखना चिल्‍लाना शुरू । कुछ कदम आगे बढ़ कर मैं वहीं तक गया, जहॉं डैड एंड था…कहीं कोई आवाज़ नहीं थी, न चूमता जोड़ा और न वह बूढ़ा। मुझे शरारत सूझी और मैंने कमरा नम्‍बर 210 की डोरबैल बजा दी। दो-एक पल बाद दरवाज़ा खुला, देखा कि दरवाजे पर वही पतली सी लड़की खड़ी थी। उस की ऑंखों में सवाल था ।

‘माफी चाहता हूँ क्‍या आप के पास लाइटर होगा।’ अचानक मुझे कुछ न सूझा।

उस लड़की की ऑंखों में कोई भाव नहीं आया। ‘इंतजार कीजिए…’ कह कर उस ने दरवाजा बंद किया और कुछ ही पल बाद वह लाइटर ले कर दरवाजे पर खड़ी थी। अब मैं अपनी सब जेबें टटोल रहा था, पर वहॉं कहीं सिगरेट नहीं थी क्‍योंकि मैं सिगरेट पीता ही नहीं था।

‘माफी चाहता हूँ सिगरेट शायद रूम में भूल आया हूँ।’ कह कर मैं लौटने लगा तो उस ने कहा- ‘रख लीजिए इसे।’ उस ने लाइटर आगे बढ़ा दिया। ‘धन्‍यवाद’ कहते हुए मैंने उसे ले लिया।

लगभग आधे घंटे बाद दरवाजे को किसी ने खटखटाया तो मैंने घड़ी देखी, साढ़े दस बज रहे थे। मैं उठा, दरवाजा खोला तो सामने सान्‍या खड़ी थी। मुझे अचानक लगा कि शायद उस लड़की ने 19

मेरी शिकायत कर दी।

‘क्‍या मैं अंदर आ सकती हूँ डेव?’ दरवाजे से कमरे के भीतर बेलिहाज हो घुसते हुए उस ने कहा। वह भीतर आ कर कुर्सी पर बैठ गई। उस की छोटी स्‍कर्ट से खूबसूरत जॉंघें चमक रही थी। अपने छोटे से कोट की जेब से उस ने सिगरेट का पैकेट निकाला और पूछा –‘लाइटर?’ वही लाइटर उठा कर मैंने उसे दे दिया। उस ने सिगरेट जलाई और अपना छोटा कोट उतार कर सामने वाली मेज पर रख दिया। नीचे बादामी रंग का छोटा और कुछ चुस्‍त ब्‍लाउज जैसा था जिस की सांसे नाभि से ऊपर तक ही आ कर खत्‍म हो गयी थी।

‘एदोनिस ने मुझे बताया कि आप को यहॉं रात को कुछ परेशानी होती है। यह सुन कर मुझे दुख हुआ कि हमारे होटल में आप को कष्‍ट पहुँच रहा है। एदोनिस से मैंने परमिशन ले ली है, अगर आप चाहें तो मैं रात को यहॉं आप के साथ सो सकती हूँ…सिर्फ सोना ।’ कह कर वह पहली बार मुस्‍कुराई। ‘कई बार शायद अकेलापन भी दुखी कर देता है।’

‘कितने यूरो ?’ इस राज़ को और ज्‍यादा जानने के लिए मैं आगे बढ़ गया।

‘शायद आप समझे नहीं,  कुछ भी नहीं…यह सिर्फ सहायता भर है। मैं ऐसा कुछ नहीं करती। ’

मैं अचरज में पड़ गया। क्‍या इस हद तक भी कोई मदद कर सकता है। मैंने आजमाना चाहा और कहा ठीक है, अब मैं सोना चाहूंगा। उस ने दस मिनट का वक्‍त मॉंगा और ठीक दस मिनट बाद वह अपने गाउन को हाथ में लिये हाजिर हो गई। बाथरूम में जा कर उस ने कपड़े बदल लिये। मुझे यह सब गुदगुदा रहा था। अब हम दोनों एक ही बिस्‍तर में थे, एक ही कम्‍बल के अन्‍दर।

‘क्‍या मैं तुम्‍हारे ऊपर अपना हाथ और पॉंव रख सकता हूँ ?’ पॉंच मिनट बाद ही मैंने पूछा।

वह मुस्‍कुराई- ‘सिर्फ हाथ और पॉंव पर उस के पचास यूरो लूंगी, मेरी नींद डिस्‍टर्ब होगी थोड़ी।’

मैं बढ़ कर उस से चिपक गया। कुछ देर बाद मैंने उस से उस का वास्‍तविक मूल्‍य जानना चाहा तो वह मुस्‍कुरा कर बोली, शायद आप भूल गए, मैंने आप को उस के लिए मना किया था, आप से कहा था कि यह सिर्फ सहायता भर है। अच्‍छा हो कि अब आप इसे ठीक से समझ लें। अब 20

मैंने इसे यूरोपीय अंदाज में समझ लिया कि जितना कहा गया है, उतना भर ही। इंकार का मतलब आगे मत बढ़ो। मैं उस से लिपट कर सो गया और वाकई उस रात बहुत अच्‍छी नींद आई। सुबह छह बजे सान्‍या उठ गई। उस ने कपड़े बदले और मेरी तरफ देखा।

 ‘धन्‍यवाद’- मैंने उसे कहा। उस ने पलट कर कहा- ‘उम्‍मीद करती हूँ कि आप को अच्‍छी नींद आई होगी।’ मैंने कृतज्ञता से सिर हिलाया और उठ कर उस की तरफ पचास यूरो बढ़ाए। वह बहुत विनम्रता से बोली- ‘नहीं डेव, वह सिर्फ एक मजाक था और यकीन मानो सच में मुझे पैसों की ज़रूरत है पर वह सिर्फ सहायता थी।’ उस के प्रति मैं और अधिक आभार से भर उठा- ‘मैं चाहता हूँ आप को कुछ देना।’ सान्‍या ने कुछ पल सोच कर कहा- ‘ठीक है, तब आप केवल बीस यूरो दे दें।’ यह साफगोई मुझे अच्‍छी लगी।

अगली दो रातें भी बहुत सुकून से कटी…बिना किसी शोर और व्‍यवधान के। मैं खूब गाढ़ी नींद सोया और बहुत ताज़ादम उठा। इन चार दिनों में एंगेला, केलिस्‍ता और मैं खूब घूमे। एथेंस के अलावा हम केप सोनियन और डेल्‍फिस तक गए। केलिस्‍ता मेरे बहुत नज़दीक आती चली गई। ज्‍यादातर वक्‍त वह मेरा हा‍थ पकड़े घूमती। उसे न जाने मुझ में कोई रूचि थी या मेरे भारतीय होने में- नहीं कह सकता…शायद दोनों में ही और मुझे वह इतनी अपनी लगने लगी थी कि एंगेला की उपस्थिति भी मुझे अखरने लगी। यह बात मेरे व्‍यवहार से दिखने लगी तो एंगेला जान-बूझ कर हमें समय देने लगी। ज्‍यादातर वक्‍त वह कोशिश करती कि केलिस्‍ता और मैं ही घूमने चले जाएं। किसी न किसी काम के बहाने से वह हमारे साथ जाने से बचने लगी।

डेल्फिस में एक दोपहर, जब एंगेला होटल में अपने कमरे में सो रही थी, त‍ब केलिस्‍ता ने मुझे बताया कि उस की परदादी भारत से आई एक जिप्‍सी थी। यहॉं यह बात मैं किसी को नही बताती, पर तुम्‍हारी और मेरी पहचान लगभग एक है। उसे अपने बारे में तफ़सील से बता चुका था मैं। रोमा लोगों की यहॉं वही हालत है, जो भारत में ज्‍यादातर गरीब दलित-पिछड़ी जातियों और जनजातियों की हैं। इस पहचान के साझा होने के बाद जाने कितनी बातें इन चार दिनों में हम ने की।

एक दिन बहुत सुबह हम मिरतोस बीच निकल गए, केलिस्‍ता लगातार कार चला रही थी।

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एथेन्‍स से यह लगभग 340 कि.मी. दूर था और वहॉं पहुँचने में हमें तकरीबन 7 घंटे लगे। पातरम सामी होते हुए, हालांकि यह काफी थका देने वाली यात्रा थी, पर यह वाकई विचित्र था कि हम दोनों ही एकदम खिले हुए थे, किन्‍हीं किशोरों की तरह । मेरी बिल्‍कुल इच्‍छा नहीं थी कि इस यात्रा में एंगेला हमारे साथ रहे पर जानता था कि इतनी लम्‍बी ड्राईव केलिस्‍ता के लिए काफी तकलीफदेह होगी, पर इस के बावजूद मैं मन की बात उस से कह बैठा और वह भी मुस्‍कुरा कर बोली- ‘मैं सच में नहीं थकूंगी, मैंने अमृत पी लिया है।’ जवाब में मैंने कहा-‘मैंने भी।’ नहीं जान पा रहा था कि हर पल उस के साथ होने की यह दुर्दमनीय इच्‍छा क्‍यों रहती!

मिरतोस बीच बहुत ही खूबसूरत था । हम चलते-चलते ऐसे छोर पर पहुँच गए, जहॉं दूर तक कोई आदमी नहीं था। वैसे भी अक्‍तूबर के आखिरी और सर्द दिन होने के कारण बीच पर बहुत लोग नहीं थे। अब हम जहॉं थे, वहॉं छोटी-छोटी चट्टानें थी। ‘आओ कुछ देर सुस्‍ता लें।’ दो चट्टानों की ओट में जंगली झाडि़यों के बीच सीमेंट की एक बेंच लगी थी। हम दोनों बैठ गए और बहुत देर ऐसे ही बैठे रहे, जाने कितनी देर, एक दूसरे से बिना कुछ बोले, पर क्‍या वाकई हम चुप थे। समुद्र का नीला पानी कभी छोटी और कभी तेज़ लहरों में किनारे तक आ आ कर थम जाता।

तभी केलिस्‍ता सिर ऊपर कर के हवा में कुछ सूंघने लगी। उस के चेहरे पर तनाव दिखने लगा। मैंने कुछ पूछना चाहा तो उस ने मुँह पर ऊंगली रख कर मुझे चुप रहने को कहा। अचानक वह बिजली की तेजी से उठी और लपक मेरे ऊपर चढ़ गई। मैं भौचक्‍का सा कुछ समझ नहीं पाया। उस का एक हाथ मेरे कंधे पर था और छाती बिल्‍कुल मेरे मुंह के पास। दूसरे हाथ से उस ने दूर कुछ फेंका। उधर देख कर मैं कुछ पल को सच में घबरा गया। एक छोटा काला-भूरा नाग वहॉं पड़ा था, एकबारगी उस ने फन उठाया और हमारी तरफ देखा और फिर सरसराते हुए जंगली घास में खो गया, लगभग तीन फुट का रहा होगा वह। उस ने बताया कि यह बहुत जहरीला वाइपर था, हालांकि यह वक्‍त नहीं है इस के निकलने का, अक्‍सर ये गर्मियों में बाहर आते हैं। ‘तुमने कैसे जाना कि वाइपर मेरे सिर के पीछे चट्टान पर है?’ यह सुन कर वह मुस्‍कुरा कर बोली -‘सूंघ कर।’ फिर वह बोली ’अब तुम चलो यहॉं से…शाम को आएंगे यहॉं, शाम को इस

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समुद्र का पानी बहुत सारे और अनोखे रंग बदलता है।’ उस रात हम वहीं होटल में रूक गए, एक ही रूम में पर हम दोनों में से कोई भी आगे न बढ़ सका। मेरी हिचक यह थी कि वह भारतीयों के बारे में कोई गलत धारणा न बना ले पर उस की क्‍या दुविधा थी-मैं समझ नहीं सका। उस ने कोई इशारा भी नहीं दिया कि मैं आगे बढ़ पाता। एक ही बिस्‍तर पर हम दोनों ने अलग अलग टापूओं की तरह रात गुज़ार दी।

एथेन्‍स को छोड़ने का वक्‍त नजदीक आ गया। आज यहॉं आखिरी रात थी। कल सुबह नौ बजे की उड़ान से वापस स्‍टॉकहोम। रात आठ बजे ही खाना खा कर हम होटल आए। रिसेप्‍शन पर एदोनिस था।

‘सब ठीक है? ’ उस ने मुस्‍कुराते हुए पूछा तो मैंने जवाब दिया –‘बस आप की मेहरबानी से।’ सुन कर वह मुस्‍कुरा गया तो मैंने मज़ाकिया अंदाज़ में ही पूछा-‘दो सौ आठ में कोई मेहमान आया?’ उस ने उसी तरह मुसकुरा कर जवाब दिया- ‘अभी तक तो कोई नहीं, दुआ कीजिए।’ एंगेला और मैं अपने अपने कमरे कमरे में चले गए।

दस बजते-बजते मैं सब सामान बॉंध कर सो गया। ‘उफ्फ उफ्फ, हम्‍फ हम्‍फ , ओ मामा, ओ माई गॉड, प्‍लीज प्‍लीज़… आह आह ओह मामा….हाहाहा…।’ उसी शोर से मेरी नींद टूट गई। मैंने सोचा कोई सपना है यह, पर नहीं, आवाजें लगातार आ रही थीं। मुझे एदोनिस की बात ध्‍यान आई कि अभी तक इस कमरे में कोई नहीं आया। मन पक्‍का कर लिया कि आखिर कल तो होटल छोड़ ही देना है, देखा जाएगा। अपना दरवाज़ा खोलकर मैं दो सौ आठ के दरवाज़े के सामने खडा था। आवाजें भीतर से ही आ रही थीं पर भीतर अंधेरा था। कुछ पल विचार किया और दरवाज़ा खटखटा दिया। पर वहॉं कोई हलचल नहीं हुई और आवाजें लगातार आती रहीं। मैंने लगभग पागलों की तरह दरवाज़ा खटखटाया पर भीतर से आवाजों का सिलसिला वैसा ही रहा।

कुछ सोच कर मैं आगे बढ़ा और दो सौ नौ के दरवाज़े पर खड़ा हो गया, वही आवाज़ें, वैसी ही मादकता और आगे बढ़ा, अब मैं उसी दो सौ दस के आगे खड़ा था, जहॉं से मैंने लाइटर लिया था। मेरे आश्‍चर्य की सीमा नहीं रही कि वहॉं भी उसी तरह रोने और हंसने की आवाजें बदस्‍तूर आ रही थीं। मैं वापस अपने कमरे की तरफ भागा और एंगेला के दरवाजे के सामने जा खड़ा हुआ। उस के कमरे 23

में भीतर रोशनी थी और यहॉं वही आवाजें और भी तेज़ आ रही थीं। मैंने एंगेला का दरवाज़ा लगभग पीट दिया पर दरवाज़ा नहीं खुला और न ही आवाजें बंद हुईं…यहॉं आवाज़ें पूरे कॉरीडोर में गूँज रही थीं…हुम्‍फ हुम्‍फ आह उफ्फ लीव मी प्‍लीज़, आई लव यू । एंगेला का कमरा सीढियों के बिल्‍कुल नजदीक था। मैं सीढि़यों से नीचे की तरफ भागा और सीधा रिसेप्‍शन पर आ कर रूका।

होटल का सदर दरवाजा भीतर से बंद था और सामने बार के पास पड़े एक सोफे पर सान्‍या बैठी-बैठी सो रही थी। मैं दबे पॉंव, उस के सामने वाले सोफे पर बैठ गया। कुछ देर तो सतर्क रहा, पर यहॉं कोई आवाजें नहीं थीं, जाने कब मुझे नींद ने आ दबोचा और सुबह जब नींद टूटी तो छह बज रहे थे। मैं लपक कर अपने कमरे में पहुँचा। सारा का सारा सामान ज्‍यों का त्‍यों रखा था। तुरंत तैयार होने लगा । कुछ देर बाद दरवाज़े पर दस्‍तक हुई। दरवाज़ा खोला तो सामने एंगेला खड़ी थी। ‘हमें सात बजे तक निकल जाना चाहिए।’ उस ने

बिना ऑंखे मिलाए कहा। मैंने ‘हॉं’ में सिर हिलाया और दरवाज़ा बंद करने लगा तभी वह बुदबुदायी- ‘माफी चाहती हूँ रात को मैं दरवाज़ा नहीं खोल सकती थी… मैं रात को कुछ दवा लेती हूँ और फिर गहरी नींद ।’ मैंने दरवाज़ा बंद कर लिया और बाथरूम में घुस गया।

दिन पंख लगा कर उड़ते हैं। ये भी उड़ गए। इन रिविजि़ट होटल से निकलते वक्‍त सवाल आया कि क्‍या वाकई ये दुनिया एक सराय जैसी ही है, जहॉं लोग आते-जाते रहते हैं, किसी का कोई मालिकाना हक नहीं, बस मुसाफिर हैं सब। इस आने-जाने के बीच ही जाने कितनी तरह के शोर

हैं। जब मैं नीचे लॉबी में उतरा तो देखा कि वहॉं केलिस्‍ता पहले से बैठी थी। एंगेला के साथ केलिस्‍ता भी एयरपोर्ट तक आई । एंगेला कुछ सोच कर या भांप कर थोड़ा पीछे ही रूक गई। केलिस्‍ता साथ चलते-चलते उस जगह तक आ गई जहॉं से आगे सिर्फ यात्री ही जा सकते थे। इस आखिरी पल में उस ने लपक कर मुझे बाहों में भर लिया। मैं भी उसे प्‍यार करने लगा था । मैंने उस के गाल पर हल्‍के से चूम लिया। बदले में उस ने कस कर मेरे होंठो को चूम लिया।

‘मुझे यहॉं से ले जाओ वापस भारत।’ केलिस्‍ता के ये आखिरी शब्‍द थे, उस रात वाली खानाबदोश लडकी के भी यही शब्‍द थे…हूबहू । ‘जल्‍द ही मैं तुम्‍हें ले जाऊंगा प्रिय।’ कह कर मैंने उसे कस 24

कर अपने सीने में भींच लिया। उस का गला रूंध गया। आंखों में नमी झलकने लगी। वह मुड़ कर तेजी से वहॉं चली गई, जहॉं एंगेला खड़ी थी। अब वहॉं से दोनों हाथ हिला कर मुझे विदा कर रही थीं और मैं सोच रहा था कि उस रात कमरे में आने वाली लड़की कौन थी…एंगेला ने रात दरवाज़ा क्‍यों नहीं खोला…रात को रोने-हंसने वाली आवाज़ें किस की थीं… क्‍या ऑरबरो वाली उस खानाबदोश बुढि़या का इशारा इसी किस्‍मत की तरफ था?

सिर झटक कर मैंने उन सब विचारों को एक तरफ किया और अपने गंतव्‍य की तरफ बढ़ने लगा, पर तभी मुझे लगा कि जैसे सब तरफ केलिस्‍ता ही खड़ी है। अकबका कर मैंने पलट कर एंगेला और केलिस्‍ता की तरफ देखा। वहॉं एंगेला खड़ी मुस्‍कुरा रही थी। केलिस्‍ता वहॉं नहीं थी। इतनी जल्‍दी लौट गई ? कहॉं गई ? अपनी उत्‍सुकता और व्‍यग्रता को छिपाते और बैगपैक को पीठ पर सम्‍भालते हुए मैं वापस एंगेला के पास आया। उस का चेहरा खिल गया। ‘क्‍या हुआ?’ एक फूल सा खिला, उस के होंठो के पास।

मैं हैरान-परेशान अब भी उस के आसपास देख रहा था, जैसे एंगेला ने उसे अपने पीछे छिपा लिया हो और एकदम से निकल कर वह सामने आ खड़ी होगी।

‘बोलो न देव….कुछ बोलो, क्‍या कहना चाहते हो !!!’ एंगेला ने बढ़ कर बहुत अधिकार से मेरे कंधों पर हाथ रख दिये।

‘केलिस्‍ता … केलिस्‍ता कहॉं चली गयी ?’ शायद मेरी ऑंखों में निरीहता उतर आयी होगी, इस की इबारत मैंने एंगेला की आँखो में पढ़ी।

उस ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए सहानुभूति से देखा। इस देखने में ना जाने करूणा थी कि आत्‍मीयता पर चिन्‍ता ज़रूर थी।

मैंने प्रश्‍न फिर दोहराया- ‘केलिस्‍ता कहॉं है ? ’ एंगेला प्रश्‍न को पुन: सुन कर हिचकिचाई, फिर धीमे से बोली- ‘कौन केलिस्‍ता !!! तुम केलिस्‍ता को कब मिले!!!… हमारे साथ कोई केलिस्‍ता नहीं थी देव।’ वह कुछ समझ कर बोली- ‘जाओ वरना फ्लाईट छूट जाएगी, हम फोन पर बात करेंगे, अकेलापन छोड़ दो देव, किसी को अपना बना लो तुम ।’ मैंने सब तरफ नज़र दौड़ाई पर केलिस्‍ता कहीं नहीं थी। मैं फिर आगे बढ़ने लगा तो हर तरफ केलिस्‍ता की ही छवि थी। मुझे लगा कि किसी ने मेरे कान के पास आ कर फुसफुसाते हुए कहा हो – ‘मुझे वापस ले चलो वहीं ।’ ठीक इसी क्षण में एंगेला के शब्‍द मेरी चेतना में बजे- ‘केलिस्‍ता ने कुछ जादू वगैरह भी सीखा था, बहुत अजीबोगरीब है वह।’

‘बकवास…मैं इस पर भरोसा नहीं करता ।’ अपने ध्‍यान और वहम को व्‍यवस्थित करते हुए मैं आगे बढ़ गया। मुझे अपने इस विखडन पर अब कुछ ज्‍यादा ध्‍यान देना होगा, ज्‍यादा सजग रहना होगा, चलते-चलते, मैंने खुद को समझाया।

(हंस’ के फरवरी अंक में प्रकाशित)

संपर्क: एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्‍दी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्‍लामिया, नई दिल्‍ली-110025 फोन- 9910827330 Email idajay.navaria@gmail.com

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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