अशोक कुमार, उत्पल दत्त से होते हुए रुस्तम के अक्षय कुमार तक आ पहुंचा है

अक्षय जब से उत्कृष्ट अभिनय के लिए राष्टीय पुरस्कार के विजेता घोषित हुए हैं तब से लोग ताज्जुब में हैं. तरह-तरह के कयास लगाये जा रहे हैं कि उन्हें यह पुरस्कार मिला तो आखिर क्यों मिला? उनके प्रशंसक उनका पक्ष लेते हुए कहते हैं कि अक्षय बहुत मेहनती हैं. इसमें कोई दो राय नहीं कि अक्षय अपने काम के प्रति ईमानदार और परिश्रमी हैं लेकिन क्या यही राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान करने का मापदंड होता है. यूँ यह पहली बार नहीं है कि निर्णायक समिति अपने निर्णय को लेकर विवादों में है. २००४ में सैफ को ‘हम-तुम’ के लिए मिले इस पुरस्कार ने लगभग ऐसे ही प्रश्न खड़े किये थे जबकि उसी वर्ष उनकी ओमकारा भी प्रदर्शित हुई थी जो हर लिहाज़ से हम-तुम जैसी बचकानी फिल्म से बेहतर थी, विषय वस्तु के आधार पर भी और अभिनय के आधार पर भी.

कई लोगों को ‘रुस्तम’ जैसी औसत फिल्म के लिए पुरस्कार दिया जाने पर आपत्ति है और यह चयनकर्ताओं को कटघरे में खड़ा करता है. सीधी अंगुली राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के अध्यक्ष प्रियदर्शन के ऊपर उठती है जिन्होंने अक्षय को छह फिल्मों में निर्देशित किया है.  प्रियदर्शन इन इल्जामों का जवाब देते हुए कहते हैं कि अक्षय की अदाकारी को दो फिल्मों में आँका गया. पहली रुस्तम और दूसरी एयरलिफ्ट. चूँकि नियमों के अनुसार मात्र एक फिल्म का नाम दिया जा सकता है इसलिए रुस्तम का उल्लेख किया गया. हालांकि एयरलिफ्ट में अक्षय का प्रदर्शन बेहतर है परन्तु क्या फिर भी वह राष्ट्रीय पुरस्कार के हकदार माने जा सकते हैं. जबकि गए साल और बेहतर फिल्मों में अक्षय से ज्यादा अच्छे अभिनय के उदाहरण हमारे सामने हैं.

प्रियदर्शन परोक्ष रूप से अलीगढ की ओर इशारा करते हुए कहते हैं कि पिछले साल समलैंगिकता पर काफी फ़िल्में आई हैं मगर वे फ़िल्में सामाजिक सन्देश नहीं देतीं. क्या समलैंगिकता हमारे ही समाज का मसला नहीं है? अगर यह आपकी समस्या नहीं है तो क्या आप उसे खारिज कर देंगे? शैक्षिक संस्थान द्वारा बहिष्कार झेलते प्रोफेसर श्रीनिवास रामचंद्र सिरस की झुकी गर्दन और कातर आँखें, भयाकुल भाव-भंगिमा क्या सिनेमा हाल के बाहर आने के बाद कई दिनों तक पीछा नहीं करतीं. मगर क्योंकि उनकी नज़रों में वह फिल्म कोई सन्देश नहीं देती इसलिए पुरस्कार लायक नहीं! बहरहाल, रुस्तम समाज का कौन सा भला करती है यह मेरी समझ के तो परे है. देशभक्ति का सतही कोण डाल देने भर से न तो फिल्म अच्छी हो जाती है न अभिनय उत्कृष्ट. हाँ, यह दीगर बात है कि अक्षय ने अपनी अगली फिल्म ‘टॉयलेट- एक प्रेम कथा’ में मोदीजी के स्वच्छ भारत अभियान का प्रचार किया है. यह भी किसी से छिपा नहीं है कि जो सरकार फिलवक्त सत्ता में है अक्षय उसके कितने बड़े समर्थक हैं.

कठोर मगर भावुक पिता के संवेदनशील किरदार में दंगल के आमिर खान सबको याद होंगे. कई बहसों को इस फिल्म ने जन्म दिया था. फेमिनिज्म को नए अर्थ में लोगों ने देखा था. लेकिन बकौल प्रियदर्शन, आमिर की दंगल में भी कोई सामजिक मुद्दा नहीं है.

फ़िल्में समाज को कोई सन्देश दे सकें यह उनका सकारात्मक बिंदु है परन्तु अगर ऐसा नहीं है तो क्या हम उनकी गणना नहीं करेंगे? किस बुनियाद पर फिल्मों का चयन होता है यह स्पष्ट होना ही चाहिए. उनके अनुसार प्रादेशिक सिनेमा ज्यादा अर्थपूर्ण है तो क्या उन्हें उस सार्थकता में सर्वश्रेष्ठ अभिनय का कोई उम्मीदवार नहीं दिखा? वह सवाल उठाते हैं रमेश सिप्पी जब निर्णायक समिति के अध्यक्ष थे तब अमिताभ को और प्रकाश झा के वक़्त अजय देवगन को यह सम्मान मिला तब किसी ने आपत्ति दर्ज नहीं की तो अब क्यूँ? क्या यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से इन निर्णयों के पीछे की राजनीति स्पष्ट नहीं करता?

१९६७ से आरम्भ हुआ सर्वश्रेष्ठ अभिनेताओं का यह सिलसिला उत्तम कुमार, अशोक कुमार, उत्पल दत्त से होते हुए रुस्तम के अक्षय कुमार तक आ पहुंचा है. तुलना बेमानी है मगर फिर भी…!

बहरहाल अक्षय को बधाई!

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