उपासना के उपन्यास ‘डेस्क पर लिखे नाम’ का एक अंश

उपासना समकालीन कथाकारों में सुपरिचित नाम हैं। अभी हाल में ही उनका बाल उपन्यास ‘डेस्क पर लिखे नाम’ प्रकाशित हुआ है. इसे राष्ट्रीय पुस्तक न्यास नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है. उसका एक अंश देखिए-

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घुमक्कड़ी

 टुटु -पुट्टी के कमरे की खिड़की सामने बागान में खुलती है. बागान चारों तरफ़ से झाड़ियों व कंटीले तारों से घिरा है. बाजू वाला क्वार्टर ‘जतिन दास’ का है. दोनों क्वाटर्स के बीच कंटीले तार की बाड़ लगी है. बागान के इस हिस्से में अमरुद व पीले कनेर के पेड़ हैं. आजकल ऱोज ही बारिश हो रही है. आसमान में घने बादलों के बीच से धीरे-धीरे खिलती सूरज की किरणों वाला दिन पुट्टी को बहुत सुन्दर लगता है.

पापा दो दिनों के लिए शहर से बाहर गए हैं. मम्मी बासंती के साथ बैठी चाय पी रही थी. बासंती नदी में जलस्तर बढ़ जाने का किस्सा सुनाने में मगन थी. नदी की लहरों के विषय में बताते वक्त वह चाय का कप नीचे रखकर हाथ से ऊँची और ऊँची लहरें बनाकर दिखाती. पुट्टी ध्यान से उसकी बात सुन रही थी.

  • “क्या लहर बहुत ऊँची होती है बसंती? पुट्टी ने उत्सुकता से पूछा.
  • ‘हाँ, पुट्टी बहुत ऊँची…पुल हिलने लगता है.

पुट्टी सोचने लगी काश वह नदी की ऊँची लहरें देख पाती. बासंती आँगन में बर्तन धोने चली गई. पुट्टी भी आंगन में चली आई. गीले आँगन में जगह-जगह काई जमी थी. चारों तरफ़ पके आम गिरकर फट गए थे. बासंती उन्हें बुहारकर फेंक देगी. आँगन में बायीं तरफ़ बाथरूम था. बाथरूम के बगल में खपरैल की छत वाला कमरा ‘रानी का घर’ है. रानी उनकी दुलारी गाय है. पापा ठण्ड व बारिश के दिनों में उन्हें इस कमरे में बांध देते थे. कमरे के द्वार पर टाट का पर्दा था. गाय-घर के सामने बेहद मोटे तने वाला आम का पेड़ है. उसके पास ही शौचालय था और पानी की टंकी भी थी. पुट्टी संभल-संभल कर चलती टंकी के पास पहुंची. उसने टंकी में झाँक कर देखा. पानी ऊपर तक भरा हुआ था. साफ़ पारदर्शी. पानी पर आम के कुछ पत्ते तैर रहे थे. पुट्टी उन्हें तैरता देखती रही. टंकी के तल में गिरे चार आम चुपचाप बैठे मानों पुट्टी का ही इंतजार कर रहे थे.

पुट्टी ने सोचा आम के पत्ते पानी के ऊपर तैर रहे हैं. पत्ते कितने हल्के होते हैं न! उसने टंकी में हाथ डालकर आम निकालने की कोशिश की. उसकी फ्रॉक भींग गई. लेकिन हाथ छोटे होने की वजह से आम तक नहीं पहुँच पाए. बासंती वहीं बैठी बर्तन माँज रही थी.

  • “बासंती आम निकाल दो न? पुट्टी ने उससे अनुरोध किया. बासंती ने आम निकाल कर पुट्टी को थमा दिये. यह पके हुए मीठे आम थे. आम भारी थे. अब पुट्टी समझ गई कि आम पानी में क्यों डूब गए थे!

आम टेबल पर रखकर वह मम्मी के पास चली गई. मम्मी किचन में पुट्टी के लिए टिफ़िन तैयार कर रही थीं.

  • “मम्मी, नदी में पानी क्यों बढ़ गया है?” इडली की हांड़ी आँच पर रखते हुए मम्मी ने कहा…
  • “क्योंकि कई दिनों से तेज बारिश हो रही है न! इसलिए!”
  • “ओ…हो…!” पुट्टी ने समझदारी से सिर हिलाया.
  • “अच्छा मम्मी, हम नदी देखने कब जायेंगे?”
  • “टुटु को ठीक हो जाने दो. फिर हम सब साथ में चलेंगे. है न? चलो अब तुम स्कूल के लिए तैयार हो जाओ.

पुट्टी जल्दी से नहा-धोकर तैयार हो गई. टिफ़िन बैग में रखकर उसने रेनकोट नहीं पहना. वैसे भी उसे रेनकोट बिल्कुल अच्छा नहीं लगता. पापा तो शहर से बाहर हैं. इसलिए उसने रेनकोट सोफ़े पर ही छोड़ दिया. चुपके से पापा का छाता लेकर वह निकल पड़ी. बारिश की धीमी फुहारें पड़ रही थीं. पुट्टी ने छाता खोल लिया. कितना मज़ेदार होता है न, बारिश में छाता लेना. बड़ा सा छाता जैसे छोटा सा घर हो. घर जो बारिश में पुट्टी के साथ-साथ चल रहा था. आम, नीम, जामुन की पत्तियां गहरे हरे रंग की दिख रही थीं. चारों ओर ढेरों हरी-ताज़ी घास उग आई हैं. पुट्टी को लगता है जैसे सब बारिश में नहा-धोकर खुश हैं. आगे थोड़ी दूरी पर एक सांढ बीच सड़क पर खड़ा, अपनी पूँछ झाड़ रहा था. रह-रहकर उसके रोयें कांप रहे थे, पर फिर भी बारिश में वह मज़े से भीगता रहा.

  • “तुम नहा रहे हो क्या?” पुट्टी ने चिल्लाकर पूछा. हालाँकि वह सांढ से डरती है. इसलिए थोड़ी दूर ही खड़ी रही. सांढ ने एक नज़र पुट्टी को देखा फिर उपेक्षा से नजरें फेर लीं.

कोई जवाब न मिलने पर भी पुट्टी निराश नहीं हुई. मज़े से उछलती-कूदती वह आगे बढ़. सड़क पर एक कुत्ता था. झबरी पूँछ वाला भूरा कुत्ता. कुत्ता जीभ निकाले भींग रहा था. पुट्टी ने उसके पास पहुँचकर छाता उसके ऊपर तान दिया. अब पुट्टी और वह कुत्ता दोनों छाते के नीचे थे.

  • “अब तुम नहीं भीगोगे!” पुट्टी ने कुत्ते को थपथपाकर कहा.

कुत्ता जीभ निकाले बस उसे देखता रहा.

  • “चलो!” पुट्टी बोली. पर कुत्ता टस से मस न हुआ.

पुट्टी ने अपने घुटनों से उसे धकेला तो कुत्ता उल्टी दिशा में भागा. तब पुट्टी उसके कान पकड़कर खींचने लगी.”

  • “बुद्दू इधर आओ, इधर! बाहर भीग जाओगे.

लेकिन कुत्ता पूरा बुद्धू था. उसने पुट्टी की बात नहीं मानी उल्टे वह उस पर गुर्राने लगा. पुट्टी उसे छोड़कर आगे बढ़ गई…

  • “टुटु की तरह बीमार पड़ोगे तब समझ में आएगा. वह भी ऐसे ही बारिश में भीगा था.”

वैसे तो पुट्टी का स्कूल घर से अधिक दूर नहीं. पापा ने रास्ता भी ठीक से समझा दिया है. पर पुट्टी कभी सीधे रास्ते स्कूल नहीं जाती. मानिक की गुमटी वाले चौराहे से वह स्कूल की तरफ़ न बढ़कर विपरीत दिशा में बढ़ गई. दायीं तरफ़ एक चौड़ा गड्ढे जैसा था. गर्मी के दिनों में यह बड़ी-बड़ी झाड़ियों से भरा सूखा रहता था. पर आजकल इसमें पानी भर गया है. सड़क पर ठहरे पानी में फच-फच उछलती पुट्टी की नजर अचानक उस चौड़े गड्ढे पर गई. वह ठिठक गयी. बहुत सारे पीले मेढ़क गड्ढे के किनारे नर्म घास पर बैठे टर्रा रहे थे.

  • “टर्र…टर्र…टर्र…टर्र…”

पीले मेंढक?? पुट्टी हैरान थी. वह अपनी गोल-गोल आँखों को फैलाए उन्हें देखे जा रही थी. कितने सुन्दर दिख रहे थे वे पीले मेंढ़क. उनका रंग हल्दी सा पीला है. पुट्टी दौड़कर उनतक पहुंची, ताकि उन्हें नजदीक से देख सकें. लेकिन पुट्टी की आहट पाकर वे सब बारी-बारी गड्ढे में उछलकर कहीं दुबक गए. पुट्टी उदास हो गई. कुछ पल खड़ी वह उनका इंतजार करती रहीं, पर वे बाहर नहीं आए. तभी एक धीमी टर्र-टर्र सुनाई पड़ी. वह चौंक कर मुड़ी. एक नन्हा पीला मेढ़क धीमे-धीमे उछलता गड्ढे की तरफ़ बढ़ा जा रहा था. वह पुट्टी के पास रुका और उसे अपनी चमकदार आँखों से देखने लगा मानों वह पुट्टी देखकर मुस्कुराया हो. पुट्टी ने हाथ हाथ हिलाकर कहा- “टा…टा”.

नन्हा मेढ़क बोला- “टर्र…टर्र…!” और पानी में कूद गया.

स्ट्रीट नंबर- 56 में पूजा का घर था. पूजा को साथ लेकर कई गलियों और तंग रास्तों से गुजरती पुट्टी स्कूल पहुंची. पाँच-सात मिनट का रास्ता आधे घंटे से अधिक का हो गया था. ऐसा नहीं है कि पुट्टी रास्ता भूल गयी थी. सच्चाई तो यह है कि पुट्टी को घूमना और बातें करना बहुत-बहुत पसंद है. पुट्टी और पूजा अक्सर बातें करती हुई अलग-अलग गलियों में चल पड़तीं. कभी इमली की तलाश करते हुए कॉलोनी के अंतिम छोर पर चली जातीं तो कभी उनका मन होता कि होमियोपैथ की मीठी गोलियाँ देने वाले डॉक्टर मंडल के नन्हें गार्डन की सैर की जाए. डॉक्टर मंडल के बागीचे में ढेर सारे सुन्दर-सुन्दर फूल थे…गुलाब, डहेलिया, गेंदा, रातरानी. कभी-कभी मिसेज टोप्पो के अल्शेशियन कुत्ते को देखने भी. गेट के भीतर चेन से बंधा अल्सेशियन डॉग टोनी अलसाया सा सुस्त पड़ा रहता. वे उसे छेड़तीं. पर जैसे ही टोनी आलस छोड़कर जोरों से भूंकना शुरू करता वे भाग खड़ी होतीं.

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