उषा प्रियंवदा को पढ़ना  एक साथ बहुत से  बिंबों में घिर जाना है

रोहिणी अग्रवाल हमारे समय की एक सजग और गंभीर आलोचक हैं. अभी हाल में ही उन्होंने राजकमल प्रकाशन की ‘प्रतिनिधि कहानियां’ सीरीज में उषा प्रियंवदा की कहानियों का संचयन तैयार किया है. एक जमाने में नामवर सिंह ने नई और पुरानी कहानियों के अंतर को स्पष्ट करने के लिए उषा प्रियंवदा की कहानी ‘वापसी’ का उदाहरण दिया था. बहरहाल, फिलहाल उषा जी की कहानियों पर रोहिणी अग्रवाल का यह लेख पढ़िए. बहुत दिनों बाद उषा प्रियंवदा पर इतना विस्तार से पढ़ा है. यह भूमिका है ‘प्रतिनिधि कहानियां’ की- मॉडरेटर

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उषा प्रियंवदा को पढ़ना  एक साथ बहुत से  बिंबों में घिर जाना है। बिंब जो घुमड़ते बादलों की तरह अनायास तैरते चले आते हैं और एक सार्थक संगति में गुंथ कर पहले दृश्य का रूप लेते हैं, फिर एक बृहद परिदृश्य में तब्दील होकर अपनी रचयिता की संवेदनात्मक अंतर्दृष्टि और सरोकारों को बुनते हैं। सबसे पहला बिंब है ‘छुट्टी का दिन’ कहानी से। कॉलेज में पढ़ाने वाली आत्मनिर्भर अविवाहिता स्त्री…. अकेलापन जाड़े की ऋतु की तरह हवाओं में घुला हुआ है . . . और उदासी की शॉल ओढ़ कर वह अपने को बचाने की कोशिश कर रही है। फिर इस दृश्य में आ जुड़ता है ‘कोई नहीं’ कहानी का अक्षय . . . इस एकाकिनी बैरागिन के निरुद्वेगपूर्ण बर्फ से जमे अकेलेपन का रहस्य समझाने।  . .. असफल प्रेम की टीस . . . दोनों ओर। बिछुड़े प्रिय को पाने की अदम्य लालसा और अप्रीतिकर यथार्थ का कटु बोध . . . तीसरा बिंब एक मुकम्मल दृश्य न रच कर दृश्य तक पहुंचने वाली वैकल्पिक वीथियों की रचना करता है। इस बिंब में है अपने भविष्य, विवाह और संबंध से बेहद उदासीन स्त्री – आत्मघाती मानसिकता का प्रत्यक्षीकरण करते-करते जैनेन्द्रीय स्त्री का प्रतिबिंब रचती हुई (‘सुरंग’, ‘प्रसंग’); या फिर पलायन की एक और भंगिमा – हॉण्ट करती स्मृतियों के दंश से बचने के लिए देश की सरजमीं छोड़ विदेश की अजनबियत में मुंह छुपाती कातरता (‘सागर पार का संगीत’ और ‘टूटे हुए’)।

रोमान उषा प्रियंवदा की कहानियों की विशेषता है जो आप्लावित कर देने वाली लहर की तरह उमड़ता है और पाठक के भीतर उदासी की कितनी ही बंदिशों को भर देता है। चूंकि उल्लास की तरह उदासी का भी अपना एक सुनिश्चित आकार और आस्वाद होता है, इसलिए वह अपने को थहाने की क्रमिक अंतर्यात्रा में अपने व्यक्तित्व की बनत को पहचानने, परिवेश के साथ संबंधों की संगति को बैठाने, और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप अपने को अधिक जीवंत और मानवीय बनाने की साधना का नाम भी है। उषा प्रियंवदा की कहानियों में उदासी आत्ममुग्धता का रूप लेकर उपस्थित होती है और आत्मालोचन की तीखी सान पर चढ़ कर अपने को निःसंगतापूर्वक जांचती है, लेकिन मुक्ति का रहस्य नहीं जानती। यह उषा जी सहित नई कहानी आंदोलन की तमाम कहानियों की विशेषता कही जा सकती है। इतनी समरूपा कि उषा प्रियंवदा की नायिकाओं की उदासी के बरक्स यदि निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिंदे’ की लतिका के अलगाव बोध में रची असंलग्नता को रखा जा सकता है तो शेखर जोशी की कहानी ‘कोसी का घटवार’ के गोसांई की अनन्य संलग्नता भरी प्रतीक्षातुरता को भी, और हिरामन-हीराबाई के अंतर्लोक को प्रदीप्त कर किन्हीं आचार-संहिताओं के अमूर्त दबाव में गुम होती हूकों को भी।

उषा प्रियंवदा की कहानियों में परंपरा के निर्वहण की अभ्यस्तता और उसे तोड़ देने की सजगता एक साथ गुंथी हुई मिलती है। आज की इक्कीसवीं सदी में हालांकि प्रेम अनेक विधि-निषेधों से गुजर कर कभी अपने को नितांत उपभोक्तावादी रूप में प्रस्तुत कर रहा है और कभी सामंतवादी पजैसिव चरित्र लेकर स्त्री को देह के पार नहीं देख पा रहा है, लेकिन हिंदी कथा-परंपरा में प्रेम त्याग, समर्पण और औदात्य की ऐसी जमीन रहा है जहां बिछोह नियति का और मानसिक आराधन मनुष्यता का प्रतीक बन कर प्रेम को अलौकिक आनंद की वस्तु बनाता रहा है। भारतीय परिवार और समाज का ढांचा जितना अपरिभाषेय प्रेम का दमन करता है, मन के गुह्य कोनों में प्रेम की चाह उतनी ही तीव्रतर होती चलती है। इसलिए आश्चर्य नहीं कि हिंदी की अधिकांश प्रारंभिक कहानियों में प्रेमोन्मत्तता और प्रेम की पुकार ही दिखाई देती है जो प्रसाद, जैनेन्द्र, अज्ञेय आदि दिग्गज कथाकारों के हाथ से गुजरते हुए नई कहानी आंदोलन तक पहुंचती है।यह ठीक है कि प्रेमकेंद्रित कहानियां समाज में होने वाली भीतरी-बाहरी हलचलों की थाह उस प्रामाणिकता और गहनता में नहीं ले पातीं, लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सत्य है कि प्रेम के इर्द गिर्द बुनी कहानियां प्रिय के द्वंद्व, मानसिकता, ऊहापोहों के जरिए समाज की वैचारिक-नैतिक मान्यताओं, सामाजिक संस्थाओं के भीतर गुपचुप आकार लेने वाली हिलोरों, देशी-विदेशी प्रभावों तले बनती एक नई संस्कृति को भी प्रकाश में लाती हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं कि उषा प्रियंवदा की कहानियां में उभरने वाली बिंबात्मकता प्रेम समर्पिता स्त्री तक जाकर समाप्त नहीं होती; वह ‘मछलियां’ का बिंब बन कर मूक समर्पण को कांइयां प्रतिशोध तक ले जाती है। कम से कम हिंदी साहित्य के लिए यह एक चौंकाने वाली परिघटना है – त्याग की प्रतिमूर्ति को प्रतिशोध की चिंगारी में तब्दील कर डालने की साहसिकता भर नहीं, ‘भारतीयता’ के इर्द गिर्द बुनी ‘आदर्श स्त्री’ की अवधारणा को ध्वस्त कर डालने की पाखंडविहीन निर्भीकता। इसलिए भी कि पुरुष से जिस कर्त्ताभाव की अपेक्षा की जाती है, और स्त्री को निष्क्रिय छवि में रूढ़ कर परिणामों को भोगने की अपेक्षा की जाती है, अब वही स्त्री स्वयं स्थितियों की नियंता होकर घटनाओं को अंजाम देने और दूसरों की भाग्य-लिपि लिखने का जोखिम उठाने लगी है।

1952 से 1989 तक के कालखंड में फैली उषा प्रियंवदा की कहानियों का अधिकांश साठ के दशक में उनके विदेश प्रवास के बाद आया है। जाहिर है डायस्पोरा मनोविज्ञान रिवर्स कल्चरल शॉक से उबरने की क्रमिक प्रक्रिया को नॉस्टेल्जिया में तब्दील कर देता है। इसलिए उषा जी की कहानियां की जमीन भले ही विदेशी हो गई हो, वहां की खुली संस्कृति और उदार वर्जनामुक्त माहौल से संबंधों में सहजता और कुंठाहीनता पनपी हो, लेकिन उनकी नायिका स्वयं को भारतीयता के संस्कारों से मुक्त नहीं कर पाई है। यही वजह है कि दांपत्येतर प्रेम संबंध बनाते हुए भी वह अपराध बोध और लोकापवाद के भय से ग्रस्त रहती है। सरपट दौड़ते हुए अचानक ठिठक कर खड़े हो जाना, और फिर बिना कुछ कहे अपनी खोह में दुबक जाना उनकी स्त्री की विशेषता है। उषा जी बेहद महीन और कलात्मक पच्चीकारी के साथ उसके चारों ओर रहस्यात्मकता का वातावरण बुनती हैं, जो एक सम्मोहक तिलिस्म का रूप धर कर पाठक के भीतर सीढ़ी-दर-सीढ़ी उतरता चला जाता है, ठीक कृष्णा सोबती की लंबी कहानी ‘तिन पहाड़’ की जया की तरह। मैनरिज्म उषा प्रियंवदा की नायिकाओं की खास पहचान है जो उन्हें आभिजात्यपूर्ण गरिमा देने के साथ-साथ ठहराव भरा व्यक्तित्व भी देता है। शिक्षिता एवं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नायिकाओं का यह उदासी भरा ठहराव चूंकि संबंधों की जमीन से परे उनके कार्यक्षेत्र, गार्हस्थिक सरोकारों या सामाजिक संलग्नताओं में दिखाई नहीं पड़ता, इसलिए अपनी अंतिम परिणति में जड़ फ्रेम में विघटित होने को अभिशप्त होता है।

ठीक यहीं पाठक की बेचैनी उसे तदयुगीन अमेरिकी समाज के भीतरी चरित्र की शिनाख्त करने को प्रेरित करती है। उषा प्रियंवदा की कहानियों का पाठ करते हुए यह ध्यान रखा जाना बेहद जरूरी हो जाता है कि साठ के दशक में भारत छोड़ कर विदेश प्रवास के लिए जब वे अमेरिका गईं, उस समय भारत और अमेरिका की सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक परिस्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर था। लगभग एक सदी के अनथक संघर्ष के बाद स्वतंत्रता प्राप्त कर भारत सामंतवाद और साम्राज्यवाद के चंगुल से मुक्त होकर लोकतांत्रिक परिवेश में आधुनिकता का ‘सुख’ पा रहा था; और अमेरिका सहित पूरा पश्चिम युद्धोत्तर समय में आधुनिकता को उत्तर आधुनिकता की बहसों में ढाल कर पूरी तरह से उपभोक्तावादी समाज में तब्दील हो गया था। ब्रांड संस्कृति, लालसाओं को जगाने वाली वस्तुओं से भरे जगर मगर मॉल; जेब में क्रेडिट कार्ड के रूप में दास की तरह सिर नवा कर पड़ी बेशुमार दौलत; टी वी द्वारा परोसे गए विचारों (विज्ञापनों) से चेतन होने का ‘आत्मविश्वास’ – इक्कीसवीं सदी के आज के दौर में भारतीय समाज जिस आत्मप्रवंनात्मक यथार्थ को जी रहा है, वह उस समय के पाश्चात्य समाज का अलौकिक लगने वाला सच था जिसकी तद्युगीन भारतीय द्वारा एक सुरक्षित दूरी के साथ कामना तो की जा सकती थी, लेकिन स्वयं को उसके बीच पाकर तत्पर अनुकूलन नहीं किया जा सकता था। जाहिर है इसीलिए उषा प्रियंवदा की कहानियां इस परिवेश में अनुकूलन नहीं करतीं, एक गहरी असुविधापूर्ण भंगिमा के साथ तकनीक-विज्ञापन द्वारा रची उपभोक्तावाद की मायावी संस्कृति की संश्लिष्ट तहें खोलने लगती हैं। विदेश-प्रवास के दौरान रची गई कहानियां हालांकि सतही तौर पर प्रेम की द्वंद्वात्मकता के बीच उन्मुक्त यौन संबंध की ओर बढ़ती आधुनिका भारतीय स्त्री की बदलती (बोल्ड) छवि को सामने लाती हैं, लेकिन असल में इन कहानियों में उषा प्रियंवदा खुद अपने से दो स्तरों पर जूझते हुए दिखाई देती हैं। एक, आत्मसार्थकता की तलाश में निकली भारतीय स्त्री के सपनों का पीछा करते हुए उसके पर कतरने वाली संस्थाओं की क्रमिक शिनाख्त; और दूसरे, पश्चिम की समृद्धि, विकास और उन्मुक्त माहौल के पीछे की जड़ताओं-जकड़बंदियों को अनुभव के स्तर पर झेलना। वे देखती हैं कि स्त्री को ‘वस्तु’ रूप में देखने का आदी भारत का सामंती समाज स्त्री की मानवीय इयत्ता को लेकर इतना अधिक असंवेदनशील हो गया है कि स्वयं स्त्री भी अपनी जीवंतता के प्रति संदेही हो उठी है। ठीक वैसे ही जैसे वस्तुओं-सुविधाओं-ऐश्वर्यों के बीच जन्नत का लुत्फ लूटता पश्चिम का उपभोक्ता समाज इतना अधिक वस्तु-संवेदी (ब्रंड कांशस) हो गया है कि स्वयं वस्तु में तब्दील हो अपनी ऐहिक भूख को हवा देते-देते मनुष्य की अस्मिता और मानवीय संबंधों की गरिमा के प्रति असंवेदनशील हो गया है। कहने को पूर्व और पश्चिम की परिस्थितियां दो ध्रुवों की तरह एक-दूसरे के ठीक विपरीत हैं, लेकिन परिणम-जन्य स्थितियां बिल्कुल एक सी हैं- वही असंवेदनशीलता और अ-हार्दिकता – एक जगह स्त्री के प्रति, दूसरी जगह मनुष्य मात्र के प्रति।

समानता के बाहरी ढांचे को तैयार करने में कितनी मशक्कत क्यों न की जाए, इतना तय है कि भारतीय परिवेश में रहकर रचना करने वाली लेखिकाओं और उषा प्रियंवदा की वैचारिक यात्रा में समय के साथ.साथ मूलभूत अंतर गाढा होता गया है ।1971 को हिंदी स्त्री कथा लेखन का महत्वपूर्ण मोड़ मानें तो कहा जा सकता सकता है कि इस समय एक द्वंदहीन निर्भीकता, वैचारिक प्रखरता और मौन को जहरीले शब्दों में बोलने वाली औरत का जन्म हो चुका था। मृदुला गर्ग, ममता कालिया और नासिरा शर्मा ने प्रेम और पारिवारिक-सामाजिक संबंधों के वर्तमान स्वरूप के औचित्य पर सवाल उठाना शुरू कर दिया था। परिधि पर अकारथ घूमती स्त्री को केंद्र में लाने की, और व्यवस्थाजनित आचार-संहिताओं के दबाव को झटक कर अपनी रीढ़ के सहारे खड़े होने की कोशिशें समय का नया सुर-ताल रचने लगी थीं। उल्लेखनीय है कि मोहभंग की प्रचारित उद्घोषणाओं के बावजूद भारतीय समाज मूल्यों-प्रतिबद्धताओं और सांप्रदायिकता की भावना में डूब उतरा रहा था। तकनीकी और सूचना क्रांति दूर-दूर तक नहीं थीं। विकास की गति मंथर थी, सबको साथ ले चलने की धीरर शालीनता और दायित्वशीलता के साथ। संवाद मनुष्य को मनुष्य से, मनुष्य को संबंधों की गर्माहट से और समूचे समय-समाज से जोड़े रखने वाली अविच्छिन्न कड़ी था। संवाद समय को पलटने की ताकत ही नहीं होता, मिल बैठकर परिवर्तन का साझा ड्राफ्ट बनाने की वैचारिक समृद्धि का द्वार भी खोलता है। उषा प्रियंवदा की कहानियों के अमेरिकी परिवेश में तमाम भौतिक समृद्धि के बीच मनुष्य के अंतरतम को रंक कर देने वाली यह विपन्नता (संवादहीनता) साफ देखी जा सकती है। इसलिए वे 1984 में ‘आधा शहर’ की रचना करें या 1989 में ‘प्रसंग’ की, उनकी स्त्री की आकांक्षा कोई एक ऐसा कंधा पा लेने की है जिस पर सिर टिकाकर वह वर्षों से संचित हृदय का बोझ उंडेल सके। तब पितृसत्तात्मक व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह का झंडा उठाकर चलती अन्य हिंदी कहानीकारों की अपेक्षा उषा प्रियंवदा की कहानियां एक ऐसे बिंब को रचती है जहां मातृत्व के सहारे आत्मसार्थकता और निष्कलुष निस्वार्थ संवाद पाने की बेचैनियां हैं। चूंकि उषा प्रियंवदा की कहानियां भारतीय परिवेश से भिन्न एक अति विकसित समाज के बीच पनपी परिस्थितियों की कहानियां हैं, इसलिए तत्कालीन भारतीय पाठक की दृष्टि और अपेक्षाओं के लिए वह समय से आगे की रचनाएं तथा 21वीं सदी के दूसरे दशक के पाठक के लिए समकालीन रचनाएं कही जा सकती हैं। ”पुनरावृति” कहानी को निसंकोच उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। उषा जी की खासियत है कि रोमानी प्रेमकथा का भ्रम रखते हुए वे अपनी कहानियों में समाज के यांत्रिकीकरण की घोर अमानवीय स्थिति को केंद्र में ले आती हैं। ‘पैरंबुलेटर’ जैसा संवेदनात्मक आवेग उनकी कहानियों में क्रमशः छीजता चलता है क्योंकि मानवीय संवेगों-संबंधों को वस्तुओं द्वारा प्रतिस्थापित करने की मुहिम कोे विकास का नाम देकर समय ने चकाचौंध भरी रोशनियों के पिछवाड़े खड़े अंधेरे और खोखलेपन को समाज का सच बना दिया है। उषा प्रियंवदा की कहानियां एक स्तर पर स्त्री की तरल आकांक्षाओं का प्रगीतात्मक आरोह हैं, तो दूसरे स्तर पर समय की विभीषिकाओं की स्तब्ध पड़ताल भी। बड़बोलेपन को मौन प्रतिरोध; संघर्ष को चिंतन, और जीने की लालसा को जीवन के विश्लेषण की अपरिहार्यता में ढालकर उषा प्रियंवदा अपनी अलग पांत बनाती हैं। वैश्विक धरातल पर घटनाओं और स्थितियों में भारी उथल.पुथल के बावजूद उनकी स्त्री अपनी उन्हीं बुनियादी अभिलाषाओं और सपनों के साथ एक अनुत्तरित सवाल बन कर खड़ी है। उत्तर तक न पहुंच पाना लेखक की सृजनात्मक क्षमता की चूक नहीं, भौतिक परिवर्तनों के हिंडोले पर झूलते समाज की आत्मरतिग्रस्तता का प्रत्यक्षीकरण है जो स्त्री (पुरुष), संबंध और समाज की गरिमा पर पुनर्विचार किए बिना लीक पीटने को ही आगे बढ़ना मानता है। प्रेम कर सकने की क्षमता को उषा प्रियंवदा स्त्री-पुरुष,  समय और समाज के ‘मनुष्य’ हो जाने का मूलमंत्र मानती हैं क्योंकि प्रेम किसी को पा लेने, या ना पा सकने की स्थिति में उसी-उसी एक बिंदु के वृत्त में क्षरित होते चले जाने का नाम नहीं है। प्रेम एक्सटसी के एक ‘रियल’ प्रगाढ़ पल को जीवन भर की थाती समझकर समय के अनुरूप अपने को ढालने जीते जाने की परिपक्वता भी है। कोहरे की तरह अंकवार करती उदासी और आग के दरिया सरीखे दैनंदिन दायित्वों में गुम हो जाने की ‘तत्परता’ में अपने को बार-बार अन्वेषित और विस्तृत करता प्रेम उनकी कहानियों के अंतिम बिंब की तरह पाठक की चेतना को आवेष्टित कर लेता है।

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