आज प्रस्तुत है भूपेन्द्र बिष्ट की कविताएँ जिनमें से कुछ पहाड़ पर बसे व्यक्तियों के संघर्ष की अभिव्यक्ति है तो कुछ ‘नॉस्टाल्जिक’ स्वर की कविताएँ हैं जो पाठकों को भी वर्तमान में रहते हुए अतीत की ओर ले जाती हैं- अनुरंजनी
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1. कबीर की याद
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अचरज़ में आंखें विस्फारित करने के बजाय
वह कहती — हाय गज़ब
उसके मन का न होता तो कह देती — छी, जाओ तुम
उसकी इसी बोलचाल वाली भाषा से मुझे रहा प्यार
साहित्य की दुनिया में
उसकी कोई पहचान नहीं थी
उसके भीतर कहीं कुछ छपने की ख्वाहिश भी नहीं थी
हिंदी तो उसने ऐसे ही ले ली —
जैसे दुकान में जाकर ले लिया जाए कोई भी सामान
प्रवेश फॉर्म में विषय समाजशास्त्र भरा था
सखियों के कहने पर और एक सर के बताने पर
आग्रह करना पड़ा उसे डीन ऑफिस में
प्लीज हिंदी कर दीजिए मेरा सोशियोलॉजी काट कर
उसे चेताया गया, कर दे रहे हैं अभी
फिर नहीं बदलेगा, नोट कर लो
धीरे-धीरे किताबें भी आईं
आधा गांव, अंधेरे बंद कमरे, कुएं पर चांद, आंसू,
चांद का मुंह टेढ़ा है, बिल्लियों का मुस्कराना
और काटना शमी का वृक्ष पद्मपंखुरी की धार से
इन शीर्षकों पर हंस पड़ती वह
मगर तुरंत सफाई भी देती
मैं इनको पढ़ कर नहीं हंस रही थी सच में
विद्या कसम
फिर चुप हो जाती एकदम और डूब सी जाती
पूछने पर कहती
पांच सदी पुराने कबीर की याद आ गई यार।
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2. ट्रेंड हो रहा है कुछ और
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वैसी फिल्में अब नहीं आती
जिन्हें देखकर युवतियां अपने आंसू पोंछती हुई
निकलती थी सिनेमा हॉल से बाहर
मां के संग
दरअसल वैसा सिनेमा ही अब कहां रचा जाता है
गद्दार जिसमें छोटे बच्चे को अगवा कर ले जाए ग़र
और फिर उसे छुड़ाने धर्मेंद्र के जाने पर
ताली बजाने लगें पर्दे के आगे सयाने भी
होकर मुतमईन
पुरवा सुहानी आयी रे ~ पुरवा, ऋतुओं की रानी आयी रे …..
जब यह गीत बजने लगे अंदर
भारती के मोहक नृत्य के जोरदार छायांकन के साथ
तो किशोर उम्र का भाई उठ आए अपनी सीट छोड़
जो दीदी भी आई हो ‘पूरब और पश्चिम’ देखने उस दिन
बड़ों का यह लिहाज़, आंखों की ऐसी शरम
सिनेमा के झूठे किरदारों के साथ
वह अगाध सच्चा अपनापन
अब स्मृतियों में भी शेष नहीं रहा
बीते दिनों की ऐसी धुंधलाई कहानियों को
हम उकेरने भी लगें मन ही मन लाख फिर से
कुछ नहीं होना
युवक-युवतियों के मोबाइल पर
इधर ट्रेंड जो करता जा रहा है
‘गॉसिप गर्ल’/ ‘द बॉय इज माइन’ का म्यूजिक वीडियो
या इसी तरह का कुछ और।
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3. मुश्किल पहाड़ में सरल प्रेम
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सूखने की कग़ार पर पहुंच चुके नौले* तक
जाती रही वह महीने भर
एक बार दोपहर बाद, फिर शाम को भी दोबारा
जानती थी कि आधी गगरी पानी भी
नहीं मिलेगा अब वहां
फिर भी जाती रही
पिछले बरस मिलिट्री में भर्ती हुआ रंगरूट
आया था महीने भर की छुट्टी
वह भी उसी नौले, वहीं इष्ट देवता के मंदिर के पास
मंडराता रहा दिन भर
शाम देर झुटपुटे तक भी
एक हरी बेंत को फटकारते
गोपुली के पानी प्रबंधन का वह बहाना
हवाखोरी के नाम पर हरिया का वह जतन
दरअसल यह सब इक दूजे से मिलन का जाल था
गांव में सबको दिखाई देता रहा
पर किसी ने नहीं देखा
साथ में जीने मरने की
उन दोनों के कसम खाने की भनक सबको थी
पर मानो किसी को जरा भी ख़बर नहीं
मंगसीर-पूस की खामोशी के दिनों में भी
दूब की तरह पंगुरता रहा ऐसा प्रेम
यादों के सहारे
बैशाख-जेठ की उदासी में भी
पल्लवित होता रहा
बांज के जंगलों में पानी के सोते की तरह
उम्मीद के सहारे
साल दो साल बाद हरिया की अगली छुट्टी तक
गर गोपुली का ब्याह नहीं हुआ
दोनों फिर मिलेंगे वहीं
नौला यदि सूख भी गया तो क्या
इष्ट का मंदिर तो हुआ ही वहां।
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* बावड़ी
4. हाय शरमाऊं
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हाय शरमाऊं किस किस को बताऊं …..
लक्ष्मी छाया* गाती – नाचती
डाकू जब्बार सिंह की पहचान कराती है
मेले में नायक धर्मेंद्र को उसकी निशानियां बताती है
मु’आशरा से कुछ सरोकार
या गांव वालों को
खौफ़ से निजात दिलाने के लिए
अपने गिरोह के खिलाफ़
की गई कोई मुख़बिरी नहीं है यह
यह तो किसी पर जां छिड़कने की खातिर
अपनी जान की परवाह न करने जैसा है
सिनेमा के किरदार
हमारे जीवन से ही निकलते हैं
परदे की कहानी के लोग मेल खाने लगें
जब जिंदगी से
तो ऐसे ही लोग बनते जाते हैं हमारे हमनवा
चाहे न मिल पाए हमें हू-ब-हू
वैसी कद काठी और असल में वैसा रंग रूप
खयालों में पर हमारे साथ होते हैं
वे अदाकार।
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* 60 – 70 के दशक में हिंदी सिनेमा की चरित्र अभिनेत्री।
5. फ्रेम में जड़ा इतिहास
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शहर का कितना ही हो विकास
उसके साथ नत्थी ऐतिहासिकता का पलस्तर
पूरी तरह से झड़ता नहीं
सदैव बना रहता है वह
जो बसर करते हैं वहां, उनके मन में
बाहरी लोगों के जूतों के तलवे पर
बतौर सुर्खी चूना लगा रहता है थेगली की मानिंद वह
जितने दिन भी रहते हैं वे वहां
दो चार दिन के लिए इस शहर में घूमने आए
प्रेमी जनों को इससे यद्यपि कुछ लेना नहीं
तथापि टहलते, खाते-पीते एक बार वे भी
कहते सुने जाते हैं
वास्तव में शहर हुआ यह आलम टाइप ही
लखनऊ का ही उदाहरण लीजिए
सड़कें वाजिद अली शाह के जमाने में
शायद न रहीं हों यहां इतनी चौड़ी
पर कदीमी जमाने की वह नफ़ासत
अब भी देखी जा सकती है टपकती सी
फेंसिंग के उस तरफ
हज़ार रंग रोगन के बाद भी
हजरतगंज से एक चमचमाती सड़क
जो जाती है बेगम सिकंदर महल के बाग की जानिब
उस पर सुस्त कदमों से चलो और
ठहर भी जाओ कुछ पल चलते चलते
तुम्हें सुनाई दे जा सकती है
बांदी से महल बनने की सारी कहानी
सिकंदर बीबी की
बाग वाले चौराहे से जरा पहले एक गली है
नरही सब्ज़ी मंडी वाली
सब्जियां ताज़ा मिल जाती हैं वहां
पर गुजरा हुआ जमाना कुछ फीसदी अब भी
दिख जाता है — बोलने बरतने के अंदाज में
जमीन पर बैठा मुंकसिर सब्ज़ी वाला
पीठ किए टीवी की तरफ़
बड़े अखलाक से कर रहा है सौदा
आप एक रुपै कम दे जाओ बाबू, और क्या
यह है नखलव्वा तहज़ीब और शाइस्तगी
अशक्त और बूढ़े पिता के लिए
पाव भर परवल लेता सचिवालय कर्मी भी
हो रहता है इससे भाव विभोर।
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6. अक्टूबर में मां-बेटी
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खिलने लग गए जगह जगह हजारी के फूल
इससे बेपरवाह ईजा*
इस असोज* के महीने की एक घड़ी को भी
जाया नहीं करती
पहाड़ में कामकाज के दिन हुए ये
ऊंची पढ़ाई के लिए कोलकता गई बेटी
बड़े भोर शिउली के झरे हुए एक एक फूल को चुनती है
सुबह की धूप अब गुनगुनी और भली होने लगी
दुर्गा पूजा में कॉलेज – क्लास सब बंद
न ईजा को फुरसत याद करे लड़की को
बेटी के पास भी अवसर नहीं
कि गांव के ही सुर-फाम* में लगी रहे ज्यादा
दीया बाती के टैम बाखली* की दूसरी औरतों के साथ
ईजा शाम को जरा हँस बोल लेती है, बस
उधर बेटी भी एक सीनियर लड़के के साथ
कॉफी पीने चली जाती है कैंपस कैंटीन तक।
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* मां, आश्विन, ख़याल, घरों के समुच्चय का साझा आंगन
7. चांद फूल है चांदनी का
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नहीं देखा किसी ने कल चांद भूले से भी
विवाहिताओं ने तो अपने कमरे की खिड़कियों पर
झीना पर्दा भी डाल दिया था
खूब रस लेकर बांच गए थे पंडित जी
भादो के शुक्ल पक्ष की यह चतुर्थी
आखिर क्यों कहलाई गई कलंक चतुर्थी
और बता भी गए थे
क्यों चांद देखना है निषिद्ध आज की रात
अब भोर से ही लीपा जा रहा है तुलसी चौरा
आंगन की क्यारी में भी कर दी गई हल्की निराई
पूजा अर्चना के उपरांत जौ-सरसों के बीज
और तिरोहित पुष्पदल से अंकुरित
कुछ ललछोंह कुछ धानी पत्तियां सहमी सी हैं
निबेड़े जाने की आशंका से
हालांकि कोई फेहरिस्त नहीं बनती
पहाड़ में रोजमर्रा के कामों की
लेकिन पूजा के अगले दिन
फुर्ती से जुट जाते हैं काम काज में सभी जन
नई बहू पूछ रही है दबी जुबान से
मां आज रात तो देख सकते हैं न चंद्रमा को।
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8. मुंशियाना
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चंदन तिवारी गा रही हैं :
झूर झूर बहे बयार ~ गमक गेंदा की आवे …..
जिन स्त्रियों को सुनाई पड़ रहे हैं यह बोल
सब की सब करुणा से भरी जा रही हैं
करुणा भी भरपूर प्रीति से
उमगी हुई
विकल हुए जा रहे हैं
संजीदा और चिंतनशील कुछ युवक
पढ़ते हुए नीम रोशनी में
देवीप्रसाद मिश्र की ‘मुसलमान’ कविता का यह अंश :
वे मुसलमान थे
वे न होते तो लखनऊ न होता
आधा इलाहाबाद न होता
मेहरांबें न होती गुंबद न होता
आदाब न होता
मीर मोमिन मक़दूम न होते
शबाना न होती …….
गाना बजाना चल ही रहा है
पढ़ना लिखना भी है जारी
मग़र बुजुर्ग अवाक हैं हालात-ए-हाज़िरा पर
कविजन ज़लालत महसूस कर रहे हैं
और लगा रहे हैं मुंशियाना —
कविता ! तुम्हारे लिए हमने क्या कुछ नहीं किया
वह लफ्ज़ दिए जिनसे खुश्बू भी मिलती रही
शब्द कोशों के हेमंत में और वसंत में भी
कई रूपसी तो इन शब्दों पर इसीलिए रीझ रीझ गई
इस जुनूनी फ़नकारी के चलते कभी कभार
अपने किस्म की एक रोशनी तक फूटती दिखी
कविता संग्रहों से
हमने ऐसी जानदार भंगिमाएं भी दी
अपने कहन को
फिर भी उतना सध नहीं सक रहा
वह, जो ज़रूरी है अगले दौर के लिए।
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9. बादल फटने के बाद
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नदी-नाले, गाड़-गधेरे, पोखर, चुपटॉल—
सब उसके साथी रहे
स्कूल आते-जाते वह घंटों निहारता
उनकी लहरों की हंसी, उछाल की शरारत
रफ़ कापी के पन्नों से नाव बनाकर
छोड़ देता बहाव में
ठहरे हुए पानी को हथेली से सहलाता
बरसात में पानी बढ़ जाने की मौसमी हरकत
उसे किंचित भी न डराती
बल्कि और भी रोमांच से भर देती—
गझिन हरितिमा, पंगुरती हरियाली
चारों ओर जीवन की अभिवृद्धि
फिर न जाने क्या हुआ, एक रात—
सुबह सुना
आपदा में बह गया चाचा का परिवार, घर समेत
पड़ोस के ताऊ जी भी मय दुकान के
गायब हो गए जल प्रलय में
कई बकरियों का कुछ पता नहीं चला
मामा की दुधारू गाय नदी किनारे
पत्थरों पर पड़ी मिली अधमरी तीसरे दिन
स्कूल बंद, बाजार सुनसान, बाख़ली निर्जन
और जंगलात वालों के डेरे निचाट
हफ्ते भर बाद स्कूल के टीचर आए गांव
उन्होंने बताया “यह सब अनहोनी बादल फटने से हुई”
बादल फटने की बात बालक ने पूरी तरह समझी
जब कहा उन्होंने पहाड़ों में ही फटते हैं बादल
तो उसने बार-बार मास्साब से पूछा इस बाबत
उसके मन में यह भी आया कि पूछूं पिता से
तो फिर तुमने क्यों बनाया पहाड़ में घर ?
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10. रास्ते
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रास्ते बने हुए हों या बना लिए जाएं
उन पर चलना ही तो होता है कहीं जाने के लिए
या कहीं से वापस लौटते हुए
बात इतनी सी ही होती
तो ज्यादा मुश्किल न होता
छूटे हुए रास्तों का बखान
चलते चलते थक जाने से हम रास्तों पर
बैठ भी गए अक्सर
कई मर्तबा ठहरकर खड़े खड़े उसकी प्रतीक्षा करते रहे
साथी, जो बोझिल कदमों से आ रहा था क्लांत
कभी रास्ते में पड़ी हुई माचिस की डिब्बी मिल गई हमें
उसकी उपयोगिता का खयाल, अरे वाह!
कि धूप दिखाई जाएगी इसे तो सीलन जाती रहेगी
इस तरह छुटपन में गांव-घर के रास्ते
हमारे खिलंदड़ापन वाले रास्ते थे
और बाद में कामकाजी दुनिया के रास्ते
बगैर हमनवा वाले
कुछ रास्ते ऐसे भी थे जो शायद हमें बुलाते रहे
पर हो न सका उन रास्तों पर फिर से हमारा आना
उन रास्तों का खयाल मगर हमें बराबर रहा
एक निश्चल हंसी जैसा, कुछ कसमे-वादे जैसा
या किसी हर्बेरियम में सहेजे शुष्क पुष्प दलों जैसा भी
और कभी तो नए मौसम की पत्तियों का
पीताभ हरापन जैसा
इस मलाल को काफी हद तक कम कर देता है
इंदीवर का लिखा यह गीत सुनना —
हंसते हंसते कट जाए रस्ते
जिदंगी यूं ही चलती रहे। …….
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11. बारिश में बोगेनवेलिया
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हस्बे मामूल मैं देर से जगा
मुझे नहीं पता कि बारिश कब शुरू हुई
रात तीसरे पहर तक तो उनींदा था मैं भी
तब घटाओं का बवंडर तो था
पर बारिश नहीं
पेपर वाला भीगा हुआ अख़बार डाल गया
बच्चे स्कूल नहीं गए
दूध वाला अब तक नहीं आया
माने बारिश अल सुबह से ही हो रही है
बारिश में तरबतर और हर्षाता बोगेनवेलिया
पुष्ट कर रहा है भिनसार – भोर से बारिश होने की ख़बर
देर रात से होने के किंचित अंदाजे को भी कुछ कुछ
बावजूद इसके ठीक से कहा नहीं जा सकता
बारिश ढाई बजे शुरू हुई कि पौ फटने के आसपास
हां, घर की घरनी को बिल्कुल सही पता होगा
जब उसने मेरी रात वाली चाय का कप हटाया होगा
मेज़ पर से पौने तीन पर
बाद में मेरे सिरहाने से मेरा चश्मा उठाकर संभाला होगा
सवा तीन के लगभग
और फिर बत्ती भी बुझाई होगी चार बजे
अब क्या पूछूं उससे
थक जाती है बेचारी दिन भर गृहस्थी के खटर पटर में
बारिश का क्या है
चाहे रक्षाबंधन का चंद्रमा क्षीण हो चुका
और सावन भी बीत गया
लेकिन पहाड़ों में तो बारिश आश्विन तक होती है
इसलिए रिमझिम मिलती ही रहेगी आगे भी
हो सकता है ज़ोरदार बौछारें भी मिलें
पूरा भाद्रपद जो शेष है अभी।
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12. ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया
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कस्बे भर में मशहूर है साकिर से ज्यादा बढ़िया आम
और कहीं नहीं मिलते
फ़ज़ल ही जानता है
सुस्वादु आलू-टिकिया का असल हुनर
पेट भरा होने के बाद भी बचपन का वह चटकारा
बूढ़े की तलब और आशिक़ की अफ़तारी जैसा कुछ
ठोंक दो उनके ठिए पर तख्ती उनके नाम की
या चस्पां कर दो उनके ठेले पर उनकी पहचान
लोग फिर भी आयेंगे वहीं
जैसे लौटते हैं परिंदे अपने पुराने घोंसलों में
भाईजान की दुकान से
सिर्फ़ सौदा नहीं मिलता
मिलती है एक चाशनी-सी ज़ुबां
एक मुस्कान जो दिल की परतों में घुल जाती है
गुड़ की तरह
और मोहब्बत… मोहब्बत वहाँ अब भी बिकती है
तौल कर नहीं, नाप कर नहीं, बस बातों में…
और वो महक जो किसी इत्र की नहीं
एक रिश्ते की होती है।
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13. धान लग रहे हैं
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धान लग रहे हैं हमारे यहां
हर जने के अपने सवाल हैं
छोटे चाचा बड़े से कह रहे हैं
दाज्यू ये अमूष भी बीत गई आषाढ़ी
बारिश हो नहीं रही खास
स्कूल जाता किशन पूछ रहा है मुन्नी से
तुझे मालूम है सीधे बीज बोने के बजाय
धान के पौंध की रोपाई क्यों करते हैं
खेतों के ढीक से संभल कर चलते हुए युवा
वीडियो बना रहे हैं हुड़किया बौल की
हुड़किया थाप देता है लंबे आलाप के बाद
जैसे किसी ने भीतर ही भीतर
एक पुराने वादे को फिर से जगा दिया हो
हूक सी उठती है मन में
श्रृंगार के बगैर भी स्त्रियाँ गीतों का बंद बन गई हैं
धान की क्यारियों में अब उनके पाँव नहीं
कहानियाँ डूबी हुई हैं भुलाई हुई
प्रत्येक सुर में छुपा है कोई प्रेम, कोई रूठा साजन
विवाहिता का ‘मान’ जैसा भी कुछ
और किसी बीते सावन की छाया
पार्वती नहीं आई अभी तक रोटी लेकर
शायद वह पीछे वाली क्यारी में अटकी हो कहीं
या ओसारे में ही ठिठकी हो अब तक सास से लड़कर
और सोच रही हो ‘आज मन नहीं है खेत आने का’
यह लिख कर रोटियों के संग पहुंचा दूं
छुट्टी आये फौजी देवर के नाम
जो उतरा है बरसों बाद पाटे हुए खेत में।
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14. जिंदगानी
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पहाड़ में शिखरों पर जो अशब्दित
हा – हा, हा – हा, सर – सर, सर – सर है
दरअसल वह नीचे बहती नदी की कलकल के साथ
एक अन्योन्य बातों का सिलसिला है पहाड़ का
जिसे हम सुन नहीं पाते
पानी के लिए अपनी जब तब वाली पुकार में
और पहाड़ के दुश्वार व दुस्साध्य भूत भाव के चलते।
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15. असल रास्ता
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मैं तिब्बत नहीं गया
मैं धर्मशाला भी नहीं गया
धर्मवीर भारती तीन बार चीन हो आए थे
उनके वे यात्रा संस्मरण अलबत्ता मैंने पढ़े हैं
बामियान में जब बुद्ध प्रतिमा तोड़ी गई
अखबारों – पत्रिकाओं में छपी वह रपट और फोटो
मैं सहेज कर रखे रहा बहुत दिनों तक
अपनी एक कविता में मैंने लिखा
वृद्ध जन यहां शताब्दियों से धूप सेंक रहे हैं
और कुछ स्त्रियां हैं
जिन्हें सोता हुआ छोड़ गए शिशु समेत
उनके पति बुद्ध के मानिंद
बुद्ध, बुद्ध की मेरी यह रट इसलिए
कि बुद्ध ने मैत्री को प्रेम से बड़ा माना है
और बुद्ध की धारा के च्युत अवतारी गेंदुन चोफेल
अपनी किताब की प्रस्तावना में कह गए :
“मैं स्त्रियों से प्रेम करता हूं
और ऐसा कहते हुए लज्जा का अनुभव नहीं करता।”
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भूपेन्द्र बिष्ट : परिचय
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अल्मोड़ा ( उत्तराखंड ) के गांव किरड़ा में जन्म. नैनीताल एवं बी. एच. यू. वाराणसी से उच्च शिक्षा. बैचलर ऑफ जर्नलिज्म की डिग्री, “स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता में अभिव्यक्त जीवन मूल्य” विषय पर पी-एच. डी.
धर्मयुग, दिनमान, रविवार, साप्ताहिक हिंदुस्तान, पराग, कादम्बिनी, सरिता, इंडिया टुडे, जनसत्ता सबरंग, जनसत्ता वार्षिकी, हंस, वागर्थ, बया, कथादेश, पाखी, अहा! जिंदगी, वर्तमान साहित्य, व्यंग्य यात्रा, पहल, उत्कर्ष, कृति बहुमत, अन्विति, समकालीन तीसरी दुनिया, दशकारंभ, पुनश्च:, संवेद, लमही, शब्द सत्ता तथा उत्तरा व पहाड़ आदि पत्रिकाओं समेत विविध अखबारों में रचनाएं प्रकाशित.
‘पहचान’ तथा ‘सिनेमाहॉल’ ऑनलाइन मैगज़ीन में आलेख.
“समालोचन”, “जानकीपुल”, “हौसला”, “अनुनाद” “गोलचक्कर” वेब पत्रिकाओं में कवितायें और आलेख.
‘कविता – सविता’ के प्लेटफॉर्म पर कविता एवं उस पर विमर्श.
पोएट्री सोसाइटी (इंडिया) प्रतियोगिता 1983 में कविता चयनित तथा ‘सार्थक कविता की तलाश’ संग्रह में संकलित. पंजाबी भाषा में कवितायें अनूदित-प्रकाशित. आकाशवाणी केंद्रों से प्रसारण.
एक कविता संग्रह “गोठ में बाघ” ( अंतिका प्रकाशन ) प्रकाशित.
उ. प्र. सरकार में यू पी शुगर केन सर्विस (प्रथम श्रेणी) से निवृत.
नैनीताल में रहना.
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• डॉ. भूपेन्द्र बिष्ट
महेश नगर, नवाबी रोड
हल्द्वानी ( नैनीताल )
उत्तराखंड – 263139
मोबा : 6306664684
cpo.cane@gmail.com

