रेगिस्तान, नदी, समुद्र, पर्वतों को पार करने वाले मेरे सफर कहाँ हैं?

आर्थर रैंबो 19वीं शताब्दी फ़्रेंच कविता के उन कवियों में हैं जिनकी कविताओं ने आधुनिक कविता को कई रूपों में प्रभावित किया, महज़ 37 साल की आयु में दुनिया छोड़ कर जाने वाले इस लेखक का जीवन भी एक मिथक याँ किंवदंती की तरह बन गई। मदन पाल सिंह ने ‘एक मदहोश नौका’ नामक एक किताब लिखी है, जिसमें रैंबो के जीवन, उनकी कविताओं पर टिप्पणियाँ तो हैं ही, मूल फ़्रेंच से उनकी कुछ कविताओं का अनुवाद भी किया है। इसी किताब का एक अध्याय पढ़िए. किताब सेतु प्रकाशन से प्रकाशित है।

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                                    1891 के शुरुआती महीनो से ही रैम्बो के दाहिने घुटने में दर्द बढ़ने लगा। यायावरी तो रैम्बो के जीवन जीने की जैसे पहली शर्त थी, परन्तु अब नौबत यहाँ तक आ गयी कि चलना-फिरना भी दूभर हो गया। लेकिन यात्राओं से रैम्बो को मुक्ति कहाँ मिलने वाली थी! रैम्बो  ने अपनी पीड़ा और बिखरते स्वास्थ्य से लाचार होकर अदन  के यूरोपियन अस्पताल जाने का निर्णय ले  लिया।  करीब 300 किलोमीटर की यह रेगिस्तानी यात्रा ग्यारह दिनों  में पूरी हुई। सोलह कहारों ने बारी-बारी से पालकी को कन्धा दिया। गर्मी, मर्मांतक पीड़ा, तूफ़ान  और कहारों की झल्लाहट को झेलते हुए रैम्बो का काफिला जेलहा पहुँचा। इससे आगे की यात्रा तीन दिनों में नौका द्वारा पूरी हुई। अदन पहुंचने पर रैम्बो की सेहत और भी बिगड़ चुकी थी। अस्पताल के अंग्रेज  चिकित्सक ने घुटने की श्लेष्मा झिल्ली में बहुत ज्यादा सूजन पाया और तस्दीक करा  कि रोग अपनी चरम अवस्था में है। चिकित्सक ने अंग- विच्छेदन की सलाह दी, जिसके लिए कवि का वापस फ्रांस लौटना जरुरी था। रैम्बो  का अपने व्यापार और व्यापारिक सहायक से विदा लेने का समय आ गया। अंतिम वर्षों में जब व्यापार जमने लगा था, रैम्बो ने मजबूर होकर अफ्रीका  को अलविदा कह दिया।

अगला पड़ाव मार्सेई था, जहाँ रैम्बो की शल्य-चिकित्सा होनी थी। बीस मई को रैम्बो अस्पताल में दाखिल हुए। उन्होंने बीमारी के दौरान अपनी माँ  को  लिखा: “मैं बहुत ज्यादा बीमार हूँ और सूखकर एक कंकाल भर रह गया हूँ। मेरा दायाँ  घुटना सूजन के कारण फूल गया है और एक कद्दू की तरह दिखता है। मै हर तरह से असहाय – अपंग हो जाऊँगा। में अपने बिस्तर से बाहर नहीं आ सकूँगा। मैं  क्या करूँ! क्या बर्बाद जिंदगी है!! क्या आप मेरी सहायता नहीं कर सकतीं?” दो दिन बाद कवि की माता अपने बीमार पुत्र को देखने आयी। लेकिन अफ़सोस ! ग्यारह वर्ष से एक दूसरे से दूर रहने के बाद भी अभी तक माँ की ममता जागी नहीं। उस पर तो एक परत पहले से ही जमा थी, उपर सिर्फ तथाकथित सबंध दिखते थे। ममता की ऊष्मा तो पहले ही माँ के अंतस में स्वम के कठोर दक़ियानूसी विचारों के ताबूत में दफन थी। वह जल्दी ही अपने पुत्र को अस्पताल में छोड़कर चली गयी।

1871 में लिखी गयी कविता `सात वर्षीय कवि` की आरंभिक  पंक्तियाँ अभी भी प्रामाणिक एवं ताजा थीं: पवित्र -कर्तव्य और निष्ठा भरे ग्रन्थ का परायण करने के बाद उसे बंद कर गर्वित और संतुष्ट हो, माँ जाने लगी थी अपने पुत्र की नीली आँखों में झाँके बिना,

और भरे-पूरे मस्तिष्क के नीचे घृणा, विद्रोह, अरुचि भरे अपने शिशु के मानस पर

उसने कभी ध्यान दिया नहीं।

27 मई को रैम्बो की रान शल्य चिकित्सा द्वारा अलग कर दी गयी। बाद में चलने के लिए बैसाखी मिली। लेकिन कवि  को  कुछ भी रास नहीं आ रहा था। सरीर शिथिल था पर आत्मा बैचेन। यूरोप और अफ्रीका को नापने वाला बहेतू अपने आपसे लाचार जो था। मरीज की इस मनस्थिति को पत्रों के माध्यम से देखा जा सकता है। कवि ने अपनी बहिन इज़ाबेल को लिखा : ‘`प्यारी बहन, तुमने मुझे लिखा नहीं की सब कैसा चल रहा है ?  हम सब जैसे एक ही समय में सारे दुख झेलने के लिए विवश हैं। और मैं तो केवल रात-दिन रोता ही रहता हूँ। मेरा जीवन ख़त्म हो गया हैं। मैं जीवन भर के लिए अपंग हो गया हूँ। एक पखवाड़े पहले तक मैं सोचता था कि सही हो जाऊँगा लेकिन मैं बैसाखियों के बिना नहीं चल सकता।…मैंने कभी किसी को दुःख-दर्द  नहीं पहुँचाया। इतने काम करने का मुझे यह दुखदायी सिला मिला !…जब मैं अपने करीब पांच महीने पुराने सक्रिय जीवन और सभी यात्राओं को याद करता हूँ तो कड़वाहट, दुख और थकान से भर जाता हूँ। रेगिस्तान, नदी,समुद्र, पर्वतों को पार करने वाले  मेरे सफर कहाँ हैं ? कहाँ हैं मेरी पदयात्राएँ और घोड़ों के काफिलों का जूनून? लेकिन अब तो यह जिंदगी एक असहाय-अपंग की हो गई है। बैसाखी, लकड़ी और नकली टांग से चलने की  कोशिस करना तो सिर्फ एक मजाक भर है। और इनके साथ तो हम केवल कर्महीन, असहाय दरिद्र बन कर खिचड सकते हैं।।।विवाह की मधुर इच्छा, परिवार और भविष्य के सुनहरे सपनों को अंतिम विदा। मेरी जीवन यात्रा समाप्त हो गई है और मैं एक स्थिर-गतिहीन बक्से से अधिक और कुछ नहीं हूँ।’`

इसी मनस्ताप  की स्थिति में रैम्बो  ने अस्पताल छोड़ दिया और ट्रेन  लेकर अकेले ही रोश की राह ली। वहाँ  रैम्बो की बहन ने अपने बीमार भाई की बड़े ही मनोयोग से सेवा -सुश्रषा  की। दर्द की अवस्था में पोस्त की चाय से  कुछ रहत मिलने लगी। लेकिन दर्द भूलने का यह एक फौरी उपाय था। यहाँ एक महीने के प्रवास में हालत और बिगड़ने लगे। अब दायीं भुजा ने भी काम करना बंद कर दिया। ऐसी हालत में इज़ाबेल ही अपने भाई को खाना खिलाती। यही नहीं, रैम्बो की भुजा को एलेक्ट्रोथेरेपी भी दी जाती थी।

इसी दौरान रैम्बो के प्रेमी और कवि मित्र वरलेन  भी अपने  स्वास्थ्य  के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे थे। ह्रदयरोग, मधुमेह, गठिया और सिफलिस उनके शरीर  को खाये जा रही थी। ऐसी परिस्थिति में भी वरलेन ने  मित्रवत रैम्बो पर  लिखना जारी रखा।

ठीक एक महीने अपनी बहन के सानिध्य में बिताने के बाद, 23 अगस्त को रैम्बो  ने अपनी बहिन के साथ पुनः मार्सेई के अस्पताल की शरण  ली। इस बार चिकित्स्कों ने बीमारी को  कैंसर घोषित  कर दिया। इस हालत में भी कवि के अन्तस् से हरार  और अदन  नहीं निकल पाये। वहाँ वापस लौटने  के मनसूबे  फिर अपना सिर उठाने लगे। तपता सूर्य, खिले हुए उष्ण दिन वापस खींच रहे थे। प्रिय सेवक ज़ामी  की यादें  भी अफ्रीका के इस तिजारती को उद्देलित करने लगीं, जिसे वह अपने पीछे  छोड़ आए थे।

9 नवंबर को रैम्बो ने अपनी बहिन को बोलकर मार्सेई की एक जहाज कम्पनी के निदेशक के नाम पत्र लिखवाया। पत्र के मज़मून अनुसार उन्हें  पूरी तरह  पक्षाघात हो गया था। इसके  बावजूद रैम्बो  ने  जहाज का समय जानने की दरयाफ़्त की थी, जिससे कि वह बंदरगाह पर अपनी रवानगी के लिए समय पर पहुँच सके। लेकिन इस बार अनवरत यात्रा के पथिक की मंजिल कुछ और थी। दूसरे दिन,10  नवंबर की  सुबह 10 बजे कवि ने अंतिम सॉंस ली।

रैम्बो को शार्लवील के कब्रिस्तान में दफना दिया गया। वही स्थान जहाँ से वह अन्यमयस्क होकर अनगिनत बार पलायन कर चुके थे। इस तरह कवि अपनी मिटटी के आलिंगन में न चाहते हुए भी समा गया। और ऐसा ही हुआ जैसा कि इस पथिक ने  अपने पत्र में लिखा था : ‘`हम वहाँ पहुँच जाते हैं, जहाँ संभवतः पहुँचना नहीं चाहते!’`

कहते हैं कि इज़ाबेल ने अपने भाई की इच्छानुसार, अपने पति की मदद से उसके विश्वासपात्र सेवक के परिवार को 750 तालारी के सिक्के पहुँचा दिये। ज़ामी तो संभवतः पहले ही हरारे  में पड़ी भुखमरी का ग्रास बनकर दम तोड़ चुका था।

जीवन की  रंगशाला के कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों  में सह अभिनेता, पोषक, प्रेमी और विनाशक की भूमिका निभाने वाले  जर्जर और अकेलेपन से बेजार वेरलेन ने अपने मित्र का  इस तरह अनुस्मरण किया:

तुम मृत, निष्प्राण, प्रयाणी ! लेकिन कम से कम

 जैसा तुमने चाहा, वैसा ही तुम्हे मृत्यु का उपहार मिला है

निरंकुश स्वेत, एक अक्खड़-अल्हड़ भव्यता में शिष्ट हुए, भले ही लापरवाही से…

ओह मृत ! पवित्र आदर, उमड़ती यादों की हजारों ज्वालाओं का क्रंदन लिए

जीवित हो मेरे अंतर में।

किसी भी प्रकाश पुंज से कहीं ज्यादा उज्ज्वल भव्य!

प्रेम सदभाव, उच्चपद की स्वीकृति,प्रशंसा लिये

हजारों लपटें सतत दहक रही हैं, सचमुच।

तुम हो वह कवि जिसे मौत ने लिया है अपने आगोश में जैसा चाहा था तुमने

कम से कम पेरिस और लंदन के उन भद्देपन और शोर शराबे  से बाहर,

मैं तुम्हे श्रद्धा सुमन अर्पित करता हूँ

इस रेखाचित्र की सरल रेखाओ में जहाँ तुम ठहर गये हो।

एक हाथ जिसने रची सादगी भरी कला–हमारी संपत्ति

एक अमूल्य उपहार, दूर तक पीढ़ियों के लिए,

रैम्बो! रहो शांति में अब हो प्रभुवासी।

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