बाल दिवस और बच्चों की चिंता

बाल दिवस पर युवा लेखक विमलेन्दु का यह लेख- मॉडरेटर

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मनुष्य का सबसे सुन्दर रूप तब तक होता है जब वह बच्चा होता है. बच्चों की उपमा जब फूलों से दी जाती है, तो यह प्रकृति की सबसे खूबसूरत कृतियों का तादात्म्य दिखाने भर की कोशिश नहीं होती, बल्कि इसका छुपा अभिप्रेत भी होता है कि फूल जैसे कोमल बच्चों को तेज़ हवा, धूप और बारिश से कैसे बचाना चाहिए. दुनिया की निष्ठुरताओं के बीच कैसे इन्हें सहेजना चाहिए. ये बच्चे, जिन्हें दुनिया का भविष्य होना है, इनका वर्तमान कैसा है और कैसा होना चाहिए ! भविष्य, वर्तमान की कोख से ही लिकलता है. भविष्य का एक अनिवार्य जैनेटिक संबन्ध अतीत और वर्तमान के साथ होता है.

आज बाल दिवस है. यह दिन प्रत्यक्षत: बच्चों के उल्लास का दिन होता है. यह दिन उनकी उमंग में विभोर हो जाने और उनकी उड़ान को निरखने का होता है. अप्रत्यक्षत: यह दिन बड़ी चिन्ता का का दिन होता है. यह दिन दुनिया के भविष्य-दृष्टाओं को थोड़ा असहज और परेशान कर देता है. बच्चों की किलकारी और उछाह से जैसे ही नज़र हटती है, कुछ स्याह मंज़र नज़र आने लगते हैं. और नज़र है कि बार-बार हटती है. बच्चों की यह बेलौस हँसी, हमें आशंका के भँवर में बार-बार क्यों फँसा देती है ?

हमारे देश में बाल दिवस, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन से जुड़ा हुआ है. 14 नवंबर को नेहरू जी का जन्मदिन है और 1956 से ही इस दिन को बाल दिवस के रूप में मनाया जा रहा है. बच्चों के प्रति नेहरू जी का प्यार और चिन्ता जगजाहिर है. किस्से भी बहुत हैं. उनकी शेरवानी में खुँसा हुआ गुलाब का फूल उनके इसी प्यार का प्रतीक माना जाता है. सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में बाल दिवस मनाया जाता है. कहना न होगा कि अमेरिकी और यूरोपीय देशों में बचपन को सहेजने का काम अधिक सचेत होकर और ज़िम्मेदारी से किया जाता है. जबकि भारत में सारी संवैधानिक व्यवस्थाओं के बावजूद बच्चों की स्थिति चिन्ताजनक है.

बच्चे दुनिया के समाज की कितनी महत्वपूर्ण इकाई हैं, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1925 में जिनेवा में हुई विश्व कांफ्रेन्स में बच्चों के समुचित विकास के लिए बाल दिवस मनाने की घोषणा की गई और बच्चों की समस्याओं को चिन्ता के केन्द्र में रखा गया. इस कांफ्रेन्स में 54 देशों ने भाग लिया था. तब संयुक्त राष्ट्र संघ ने 20 नवंबर की तारीख को बाल दिवस के रूप में मनाने के लिए तय किया था. 1950 से बाल संरक्षण दिवस(1 जून) को ही कई देशों में बाल दिवस के रूप में मनाया जाने लगा था. आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि कुछ देशों ने बच्चों के अधिकारों की निगरानी के लिए अलग से लोकपाल की नियुक्ति कर रखी है. सबसे पहले नार्वे ने 1981 में लोकपाल नियुक्त किया. बाद में आस्ट्रेलिया, कोस्टारिका, स्वीडन, स्पेन, फिनलैण्ड आदि देशों में भी बच्चों के लिए लोकपाल नियुक्त किए गए. अपने देश में बच्चों के सर्वांगीण और समुचित विकास के लिए सरकारी स्तर पर योजनाएँ और नीतियाँ कम नहीं हैं. सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अंतर्गत ‘राष्ट्रीय बाल भवन’ नाम की एक स्वायत्त संस्था कार्यरत है. देश भर में 68 बाल भवन और 10 बाल केन्द्र संचालित हैं. यह संस्था बच्चों की रचनात्मक क्षमता को प्रोत्साहित करने, निखारने और उन्हें शोषण से मुक्त रखने के लिए सरकारी किस्म के प्रयास करती है. इसीलिए इसके नतीज़े बहुत उत्साहवर्धक और आश्वस्तकारी नहीं दिखते.

बच्चों के विकास और उन्हें शोषण से मुक्त रखने की चिन्ता हमारे देश के संविधान निर्माताओं को भी थी. इसीलिए उन्होने एकाधिक अनुच्छेदों में बच्चों से संबन्धित प्रावधान रखे हैं. संविधान के अनुच्छेद 15(3) में बच्चों और महिलाओं के सशक्तिकरण से यह चिन्ता शुरू होती है. अनु. 21(A) में 6-14 वर्ष के बच्चों को अनिवार्य एवं मुफ्त शिक्षा का प्रावधान है. सरकार को यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि 6-14 वर्ष का कोई बच्चा शिक्षा से वंचित न रहने पाए. इसी तरह अनुच्छेद 24 साफ और कड़े तौर पर बालश्रम पर रोक लगाने की घोषणा करता है. बच्चों के स्वास्थ्य और रक्षा के लिए अनुच्छेद 39(E) में निर्देशित किया गया है. और आख़ीर में अनुच्छेद 39(F) में संविधान यह भी कह देता है कि राज्य बच्चों के सर्वांगीण और गरिमामय विकास के लिए सभी आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध कराए.

अब यह कहने की ज़रूरत नहीं है कि संविधान के उपरोक्त प्रावधान बहुत सकारात्मक और पर्याप्त हैं. लेकिन हमारे देश में बच्चों की स्थिति देख कर साफ पता चलता है कि संविधान की मंशा इस पवित्र ग्रन्थ में ही कहीं घुट कर रह गई है. यह हम नहीं, केन्द्र सरकार के सर्वेक्षण कहते हैं कि देश के 53.22 प्रतिशत बच्चे यौन शोषण के शिकार हैं. आश्चर्यजनक रूप से इनमे 53 प्रतिशत लड़के हैं, और लड़कियाँ 47 प्रतिशत. यौन शोषण करने वाले लोग कोई गैर नहीं बल्कि 50 प्रतिशत लोग इन बच्चों के नजदीकी रिश्तेदार या मित्र ही होते हैं. इसीतरह देश में लगभग पाँच करोड़ बालश्रमिक हैं, जो होटलों, खदानों, ट्रांसपोर्ट या अन्य खतरनाक जगहों में काम पर लगे हुए हैं. ऐसा नहीं है कि ये बालश्रमिक दिखाई नहीं पड़ते. लेकिन व्यवस्था की कमजोरियों के चलते बालश्रम धड़ल्ले से जारी है. ‘पढ़ना बढ़ना’ और ‘स्कूल चलें हम’ जैसे सरकारी आन्दोलनों के बावजूद देश में लाखों बच्चे स्कूल तक नहीं पहुँच पा रहे हैं.

इसमें कोई दो राय नहीं कि शिक्षा ही जीवन की दिशा और दशा तय करती हैय दुनिया भर में इस बात पर विमर्श हुए हैं कि बच्चों की शिक्षा कैसी होनी चाहिए. अलग-अलग विधियाँ अपनाई गईं. हमारे देश में भी महात्मा गाँधी से लेकर गिज्जूभाई बधेका तक ने बच्चों की शिक्षा को लेकर कुछ मौलिक विचार दिए. अधिकतर विमर्शों का निष्कर्ष यही रहा कि बच्चों को क्रियात्मक ज्ञान दिया जाना चाहिए. शिक्षा ऐसी हो जो बच्चों का व्यक्तित्व बनाए. जो उनमें कुछ हुनर पैदा करे. साफ है कि हम उन बच्चों की बात कर हैं जो प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के विद्यार्थी हैं. यही सबसे नाजुक अवस्था होती है. एक बच्चे का पूरा भविष्य इसी बात पर निर्भर करता है कि उसे प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर  कैसी शिक्षा मिली है. हम उस सुप्रसिद्ध रूपक का इसतेमाल करते हुए कहें तो प्राथमिक स्तर के बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं. उन्हें जैसा आकार दे दिया जाय उसी में ढल जाते हैं. आपने देखा होगा कि ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा तक पहुँचते पहुँचते बच्चों में एक व्यक्तित्व आकार लेने लगता है.

मैं जब अपने देश के आज के बच्चों को देखता हूँ तो मेरी चिन्ता इसी बिन्दु से शुरू होती है. मुझे सभी बच्चों के व्यक्तित्व एक जैसे नज़र आते हैं. उनमें कोई विलक्षणता नहीं दिखती. कोई निजता नहीं होती. इन बच्चों को देख कर मुझे अपने बचपन के वो दृश्य याद आते हैं, जब हमारे घरों में ईटें बनवाई जाती थीं. कुम्हार आते थे और घर के सामने के समतल दुआर में ईटें पारते थे. शाम होते होते पूरा दुआर एक जैसी ईटों से भर जाता था. मुझे आज के बच्चे इन्हीं ईटों की तरह दिखते हैं. जैसे सब के सब एक ही सांचे से निकल कर आए हों. मैं यह कतई नहीं कह रहा हूँ कि आज के बच्चे बुद्धिमान नहीं होते. बल्कि सच तो है कि ज्ञान के विविध क्षेत्रों के प्रकाशन से आज के बच्चों का बौद्धिक विकास, पहले के बच्चों से अधिक अधिक स्तर पर होता है. लेकिन व्यावहारिक समझ के मामले में ये बच्चे पीछे रह जाते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि बच्चों में क्रियात्मकता घट रही है. हमारे मोहल्लों से खेल के मैदान गायब हो गए तो बच्चों के जीवन से खेल-कूद गायब होते गए. खेत और बगीचों में कॉलोनियाँ बन गईं तो बच्चों का प्रकृति से रिश्ता टूट गया. प्रकृति को देखने के लिए उन्हें अब शिमला, मसूरी और कश्मीर जाना पड़ता है. साल दो साल में एक दो दिन के लिए. यह भी सम्पन्न घरों में ही संभव है. बच्चे प्रकृति के प्रेमी नहीं बन पाते. वे सिर्फ प्रकृति के पर्यटक रह गए हैं. जो खेल मैदानों में खेले जाते थे, उनकी जगह वीडियोगेम और कम्प्यूटर ने ले ली है.

मेरे जब स्कूल के दिन थे उस समय प्राथमिक स्तर पर चार विषय और माध्यमिक स्तर पर छ: विषय पढ़ाए जाते थे. पहली से पांचवी तक चार किताबें, चार कापियाँ और एक स्लेट. कापियाँ भी रोज़ लेकर नहीं जानी होती थीं. बहुत हल्का सा स्कूल बैग होता था. खेलने-कूदने-लड़ने-झगड़ने-गिरने-पड़ने के लिए इतना समय होता था कि अक्सर खपाए नहीं खपता था. आज की हालत देखिए. तीन-चार साल के बच्चे पचीस किलो का स्कूल बैग पीठ पर लादे दोहरे हुए जाते हैं. हम गौर करें तो दिखेगा कि हमारे ज़माने और अब के समय में ज्ञान के विषयों में कोई खास फर्क नहीं आया है. माध्यमिक स्तर तक जो शिक्षा बच्चों को दी जानी चाहिए, उसके विषय अब भी वही हैं जो पहले थे. बस कम्प्यूटर की शिक्षा अतिरिक्त बढ़ गई है. इस बीच जो विज्ञान का विकास हुआ है वो उच्चशिक्षा का मसला है, स्कूल शिक्षा का नहीं. फिर मेरी समझ में यह नहीं आता कि मेरे बेटे के स्कूल बैग का वज़न, मेरे स्कूल बैग से पचीस गुना ज्यादा क्यों हो गया ? मुझे यह भी बड़ा विचित्र लगता है कि इन बच्चों की साल भर परीक्षाएं ही चलती रहती हैं. हमारे समय में सिर्फ दो बार ही परीक्षा होती थी, अर्धवार्षिक और वार्षिक. इन बच्चों के पास इतना होमवर्क होता है किसी और काम के लिए अवकाश ही नहीं. मुझे बहुत शिद्दत से यह लगता है की हमारी शिक्षा प्रणाली बच्चों का आदमी नहीं, रोबोट बना रही है. और मैं डर जाता हूँ यह सोचकर कि रोबोटों से भरी, आगे आने वाली दुनिया, कैसी दुनिया होगी !

सम्पर्क सूत्र– 8435968893

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