उपासना नीरव के बाल उपन्यास “डेस्क पर लिखे नाम” का एक अंश

समकालीन कथा साहित्य में उपासना नीरव की कहानियों का अपना स्पष्ट रंग है. हाल के वर्षों में बिना किसी शोर शराबे के उन्होंने कई अच्छी कहानियां लिखी हैं. अभी हाल में ही उन्होंने एक बाल-उपन्यास लिखा है. उसका एक रोचक अंश आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर

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प्लानचिट

टुटु-पुट्टी को जासूसी और हॉरर शोज़ बहुत पसंद थे. जब भी रात में ‘इंस्पेक्टर भारत’ और हॉरर शोज़ आते, वे टेलीविजन के सामने से हिलते तक नहीं. हालाँकि मम्मी- पापा उन्हें हॉरर शोज़ देखने से हमेशा मना करते थे. लेकिन उनके सो जाने के बाद बच्चे उनकी बात भूलकर सीरियल्स देखते. टुटु तो इंस्पेक्टर भारत के तेज दिमाग और साहस से विशेष प्रभावित था. जिस तरह चुटकी बजाते ही इंस्पेक्टर भारत अपराध की गुत्थियाँ सुलझाकर अपराधियों को जेल में पहुँचा देता था वह टुटु के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं होता. हालाँकि हॉरर शोज़ और जासूसी नाटकों के प्रेमी यह दोनों बच्चे शो ख़त्म होने के बाद भी उसके असर से नहीं निकल पाते. उन्हें अकेले आँगन में जाने तक से डर लगता था. मम्मी-पापा को उठाने से डांट पड़ती, सो अलग, टी०वी० देखना भी बंद करा दिया जाएगा. फिर बहुत सोचने के बाद बच्चों ने इस डर से बचने का एक तरीका ढूँढ निकाला. दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े हुए ही कमरे की लाईट ऑफ करते. लेकिन असली समस्या तो तब आती जब दोनों सू-सू करने के लिए जाते. सोने से पहले सू-सू जाने की आदत दोनों की थी. दोनों एक साथ तो जा नहीं सकते थे. लेकिन अकेले जाने का ख्याल भी डरावना था. फिर इसका भी एक हल दोनों ने निकाला. पुट्टी पहले आँगन में जायेगी और टुटु बरामदे में खड़ा एक से सौ तक गिनती गिनेगा या गाने गायेगा. आवाज़ उतनी ही ऊँची रहे कि मम्मी-पापा की नींद भी डिस्टर्ब न हो और पुट्टी को उसकी आवाज भी सुनाई देती रहे. इस तरह दोनों बेईमानी और अकेलेपन के भय से बचे रहेंगे. पुट्टी के सू-सू करने के बाद टुटु आंगन में गया. पुट्टी गिनती गिन रही थी …सात…आठ…नौ…दस. सहसा वह चुप हो गई.

  • “दीदी! दीदी!” टुटु तुरंत ही भय से चीखा.
  • “मच्छर काट रहे हैं मुझे टुटु. जल्दी करो!” जोरों से पैर खुजलाती पुट्टी ने चिढ़कर कहा.

टुटु फ़ौरन ही वापस आ गया था. दोनों ग्रिल में ताला बंद करके सोने चले गए. बिस्तर पर लेटकर पुट्टी सोच रही थी…

  • “टुटु तो हमेशा पुट्टी कहता है, आज कैसे डर के मारे दीदी-दीदी चिल्ला रहा था.” सोचते हुए वह मुस्कुरा पड़ी.

अगले दिन स्कूल से आने के बाद टुटु-पुट्टी बहुत खुश थे. उन्हें टुटु के दोस्त की बर्थ डे पार्टी में जाना था. शाम होते ही दोनों ने नए कपड़े पहने. कुर्ता-पाजामा पहने टुटु नवाबों की तरह एक कमरे से दूसरे कमरे में टहल रहा था, तो पुट्टी परी वाला फ्रॉक पहने इठला रही थी. इतने सुन्दर कपड़ों पर वे स्वेटर पहनना तो कतई नहीं चाहते थे, पर माँ से डांट खाकर मजबूरन उन्हें स्वेटर पहनना पड़ा. थोड़ी देर बाद माँ उन्हें अर्णव के घर छोड़ आई थीं.

अर्णव के घर पर खूब हंगामा मचा था. कमरा बैलून और रंग-बिरंगे कंदीलों से सजा था. धीमा संगीत बज रहा था. बच्चे बर्थ-डे हैट्स पहने म्यूजिक पर डांस कर रहे थे. टुटु ने आगे बढ़कर अर्णव को बर्थ डे विश करते हुए गिफ्ट थमाया. अर्णव ने टुटु -पुट्टी को भी बर्थ डे हैट्स पहना दी. सब मिलकर नाचने लगे थे. पूरा कमरा संगीत और बच्चों की थिरकन से झूम रहा था. अर्णव के भैया और उनके दोस्त भी बच्चों के साथ नाचने लगे. वे लोग दसवीं में पढ़ते थे. बच्चों की खिलखिलाहट के साथ रंग-बिरंगी कंदीलें भी टिमटिम-टिमटिम मुस्कुरा रही थीं. पंखे की हवा में बैलून भी मानों डांस कर रहे थे. तभी यकायक लाईट गुल हो गई. कमरे में घुप्प अंधकार छा गया. म्यूजिक भी ख़ुद ब ख़ुद बंद हो गया. किसी ने इमरजेंसी लाईट जलाकर बच्चों को धीरे-धीरे जगह पर बिठाया. अँधेरे में बच्चे शोर करने लगे थे. अर्णव निराश हो गया. बर्थ डे के दिन अँधेरे में चुपचाप बैठना कितना बोरिंग होता है. पर आख़िर किया क्या जा सकता था. तभी उसकी मम्मी ने यह सुझाया कि पहले केक काट लेते हैं. नाश्ता बिजली के आने बाद किया जा सकता है.

अँधेरे में टेबल  पर केक रखकर मोमबत्तियाँ जलाई गईं. अर्णव ने फूंक मारकर छः मोमबत्तियाँ बुझाईं तो टुटु -पुट्टी समेत सारे बच्चे तालियाँ बजाने लगे. ‘हैप्पी बर्थ डे टू यू’ बधाई गीत से कमरा गूँज उठा. अर्णव ने सभी दोस्तों को केक का टुकड़ा दिया. उसके बाद बड़े लोग नाश्ते की तैयारी करने लगे. अँधेरे कमरे में बच्चों के साथ अर्णव के भैया और उनके कुछ दोस्त ही रह गए थे. भैया और उनके दोस्त बच्चों की भोली-भाली बातें सुनकर हँस कर रहे थे. अर्णव ने टुटु -पुट्टी को बताया कि इस बार खूब सारे गिफ्ट उसे मिले हैं. कल स्कूल में वह बताएगा कि पैकेट्स के अन्दर क्या-क्या था?

  • “वैसे भैया के पैकेट में क्या है, वो तो मुझे पहले से पता है!” अर्णव ने मुस्कुराते हुए कहा.
  • “क्या है?” टुटु ने उत्साहित होकर पूछा.
  • “इसमें डेमोन वाला वीडियो गेम है! आई एम द घोस्ट हंटर.”

टुटु चुप हो गया. उसे अर्णव से ईर्ष्या महसूस हुई. उसके पास अभी तक वही सीढ़ियाँ चढ़कर दौड़ते-उछलते-कूदते पॉइंट जमा करने वाला पुराना ‘सुपर मारियो’ है. पर वह अर्णव से पीछे रहना भी नहीं चाहता था. उसने तुरंत कहा…

  • “पता है, मैंने तो सचमुच में एक घोस्ट को मारा है!”
  • “सच??” अर्णव की आँखें आश्चर्य व उत्तेजना से चौड़ी हो गईं.

अर्णव को हैरान देखकर टुटु बहुत खुश था.

  • “हाँ सच में. मैं एक बार रात को सो रहा था. है न! तो मैंने बगीचे में जोर-जोर से हँसने की आवाज सुनी. वह बड़े-बड़े दांतों वाला घोस्ट था. उसके नाखून भी बहुत बड़े थे. मैं अपने बिस्तर से उठा और उसके पास चला गया. वहाँ जाकर मैंने उसे दो मुक्के जमा दिये…ढिशुम…ढिशुम… बस घोस्ट डरकर आसमान में भाग गया. मैं हूँ ‘इंस्पेक्टर भारत’…’पृथ्वी का रक्षक’…याआआआ…टुटु ने मुट्ठियाँ बांधकर आसमान में लहराते हुए कहा.

टुटु को डींगें हांकने की बुरी आदत है. यह बात पुट्टी को बिल्कुल भी पसंद नहीं. मम्मी ने कई बार समझाया था कि यह ठीक आदत नहीं. टुटु को इससे बचना चाहिए. पर टुटु इतना शैतान है न! किसी की बात नहीं मानता. अर्णव के भैया दूर से यह कौतुक देख रहे थे. वे उनके पास चले आए थे. उन्होंने बच्चों से पूछा

  • “तुममें से किस-किस को अंधरे से डर लगता है?”

कुछ बच्चों ने ‘हाँ’ में सिर हिलाया.

  • “और घोस्ट से?…. क्या तुम लोगों ने आत्मा को देखा है?”

भैया के इस सवाल पर ज्यादातर बच्चे खामोश रह गए. पुट्टी कुछ कहना चाहती थी कि टुटु और अर्णव ने एक साथ कहा – “नहीं, हमें डर नहीं लगता.”

  • “पक्का?” भैया के एक दोस्त ने दुबारा पूछ लिया.
  • “हाँ, पक्का.” बच्चों ने उसी दृढ़ता के साथ जवाब दिया.
  • “अच्छा तो चलो ‘प्लेन चिट’ करते हैं!”
  • ‘प्लानचिट क्या होता है?” छोटे बच्चों के लिए नई बात थी.
  • “प्लेन चिट यानि स्पीरिट कॉलिंग. आत्माओं को बुलाना…हम किसी अच्छी आत्मा को बुलायेंगे.”

बच्चे तैयार हो गए. टुटु-पुट्टी भी. जल्द ही अँधेरे कमरे में एक चौकोर बोर्ड रख दिया गया. उसके चारों कोनों पर मोमबत्तियाँ जला दी गईं. टुटु -पुट्टी अर्णव और उसके भैया आमने-सामने बैठ गए. सच बात तो यह थी कि टुटु -पुट्टी भीतर ही भीतर बहुत डरे हुए थे. लेकिन यहाँ सबके सामने डरपोक कहलाना उन्हें मंजूर नहीं. बोर्ड पर ‘ए से जेड’ तक अक्षर लिखे हुए थे. बीच में एक कप था. भैया ने समझाया कि जिसकी आत्मा को बुलाना हो, उसकी तस्वीर के सामने आँखें बंदकर पूछते हैं – ‘कोई आत्मा आस –पास है क्या? ऐसा करने से आत्मा आ जाती है. पर सवाल यह था कि किसकी आत्मा बुलाई जाए? अर्णव ने कहा कि दादाजी को बुलाते हैं. क्योंकि मैं उनसे मिलना चाहता हूँ. अर्णव के भैया इस बात से सहमत हो गए. वे बेडरूम से अपने दादाजी की तस्वीर उतार कर ले आये. टेबल पर उस तस्वीर को चौकोर बोर्ड के बीच में रखा गया. मोमबत्ती उसके सामने जल रही थी. उसके चारों ओर प्लानचिट  प्लेयर्स ने एक-दूसरे का हाथ थाम कर बोर्ड की घेराबंदी कर दी. सभी से आँखें बंद करके दादाजी की आत्मा को बुलाने के लिए कहा गया. बाकी बच्चे टेबल से दूर अपनी-अपनी कुर्सियों पर जमे थे. टेबल पर जलती मोमबत्तियों को छोड़ शेष कमरे में अँधेरा था. प्लानचिट  प्लेयर्स आत्मा को बुला रहे थे. कमरे में धीरे-धीरे ख़ामोशी पसरने लगी थी. कमरे के बाहर हवाओं का शोर बढ़ने लगा था. अचानक खिड़की के पल्लों के खड़खड़ाने की आवाज आने लगी. प्लेयर्स ने आँखें बंद की हुई थीं. उनकी हथेलियाँ एक दूसरे के साथ भींच गई थीं. आवाज़ बढ़ती ही जा रही थी

  • “ठक…ठक…ठक”

बच्चे भयभीत हो गए. इसे अब बीच में छोड़ा भी नहीं जा सकता था.

अचानक कमरे के किसी कोने से एक लड़की की महीन डरावनी आवाज आई थी…

  • “मुझे क्यों बुलाया है?”
  • “कौन हो तुम? हमने तुम्हें नहीं बुलाया.” भैया आँखें बंद किए बोल रहे थे.

प्लेयर्स को घेरकर बैठे बच्चे भय से चीखने वाले थे कि भैया ने चुप रहने का इशारा किया. वे एक दूसरे से एकदम सट कर बैठ गए. भयभीत बच्चे अँधेरे कोने की तरफ़ देख रहे थे. अचानक टेबल के चौकोर बोर्ड पर रखा कप हिला. अब वह अंग्रेजी के S” अक्षर पर ठहरा था.

  • “दादाजी का नाम मदन मोहन था न भैया.” अर्णव ने पूछा.
  • “हाँ.” भैया ने सहमति दी.
  • “मतलब इस कप को ‘M’ पर होना था…” अर्णव परेशान हो उठा था.
  • “फिर इस “S” का क्या मतलब है?” भैया ने चौंककर पूछा.
  • S” …मतलब सीमा तो नहीं. जिसने पिछले साल गोलघर के पास वाले क्वार्टर में फांसी लगा लिया था. जिसकी आत्मा आज भी रात में गोलघर में भटकती है.” भैया के दोस्त बोल उठे.
  • “अरे हाँ! दसवीं बोर्ड में कम मार्क्स आए थे न उसके. इसलिए.” भैया बोल उठे.

कमरे में बिल्कुल सन्नाटा छा गया. हर बच्चा किसी न किसी की हाथ थामे हुए था. कोई भी अकेला नहीं होना चाहता था.

  • “इसका मतलब कि ये तुम्हारे दादा जी की आत्मा नहीं है अर्णव!” टुटु बोल उठा. वह इस ठंढ में पसीने-पसीने हो रहा था.
  • “ये गलत आत्मा आ गयी है. बंद करो इसे बुलाना.” भैया ने कहा. सबने अपनी आँखें खोल दी. बीते हुए कुछ मिनटों ने बच्चों की सिट्टी-पिट्टी गुम कर दी थी. वे यह भी नहीं देख पाये कि अर्णव के भैया और उनके दोस्त बिना आवाज धीमे-धीमे हँस रहे थे.

अचानक बिजली भी आ गयी. बच्चों की जान में जान आई. रंग-बिरंगी कंदीलें फिर से रोशन हो गयी थीं. मिठाइयाँ और नमकीन देखकर वे अभी गुजरे डरावने क्षण भूल गए. माहौल में हंसी ठहाके फिर गूंजने लगे. म्यूजिक फिर बजने लगा था.

पर टुटु -पुट्टी के लिए यह सब आसान नहीं था. दरसल उनके क्वार्टर का रास्तागोल घर से होकर जाता था. साढ़े आठ बजने को आये थे. नाश्ता करते हुए भी टुटु -पुट्टी चुप ही रहे. वास्तव में वे बुरी तरह परेशान थे. कुछ देर बाद मम्मी उन्हें लेने आ गई थीं. थोड़ी जिद और मनुहार के बाद वे उस रास्ते से घर चलने को तैयार हो गयी जो थोड़ा लम्बा था. पर टुटु-पुट्टी को इस बात की संतुष्टि थी कि वे गोलघर वाले रास्ते से नहीं जा रहे. ठंडी हवाएं तीर की तरह चुभने लगी थीं. वे डैम के पास से बातें करते हुए गुजर रहे थे. सर्दियों की सन्नाटे भरी रात थी. सड़क पर इक्का-दुक्का लोग ही दिख रहे थे. माँ का हाथ थामे बच्चे चुपचाप चले जा रहे थे. टुटु को मानों बार-बार वही आवाज सुनाई पड़ती…

  • “मुझे क्यों बुलाया है?

मम्मी के हाथ पर टुटु की पकड़ मजबूत हो गयी थी. उस वक्त वह बहुत डर गया था. पर अब उसे डर नहीं लग रहा. मम्मी के साथ होने पर वह आश्वस्त था. उसकी नजरें डैम के पानी में झिलमिलाती अनगिनत रोशनियों में उलझी हुई थी. डैम के किनारे सड़क पर एक कतार से स्ट्रीट लाइट्स जगमगा रही थी.

  • “मम्मा, डैम में बत्ती कैसे जल रही है?”  टुटु असमंजस में था. यह किसी जादू जैसा दिख रहा था.
  • “डैम में रौशनी नहीं जल रही. बल्कि सड़क किनारे लगी स्ट्रीट लाइट्स की छाया डैम के पानी पर झलक रही है.” मम्मी ने हँसते हुए कहा. उनकी बात सुनकर टुटु ने अजीब सा चेहरा बनाया. मानों  यह बात उसे नहीं जंची हो. उसने सोचा कि मम्मा को तो पता ही नहीं. बत्ती तो डैम के अन्दर ही जल रही है . जरूर उनपर पोलीथिन लपेटकर डैम के अंदर जलाया गया होगा. तभी तो कितनी रंग-बिरंगी रोशनियाँ  हैं डैम के अन्दर…और बल्ब भी भींगते नहीं. टुटु को अपना यह विचार बहुत पसंद आया.

पुट्टी मम्मी और टुटु की बातें सुन जरूर रही थी. पर उसके मन में कुछ और ही चल रहा था. मम्मी काफ़ी देर से उसका अनमनापन भांप रही थीं.

  • “क्या हुआ बेटा? इतनी चुप-चुप क्यों हो?”
  • “ऊँ-हूँ” पुट्टी ने ना में सिर हिला दिया.
  • “कुछ तो है.” उन्होंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा.
  • “ क्या परीक्षा में फर्स्ट आना जरूरी होता है मम्मा?”

पुट्टी की बात सुनकर मम्मी चौंकी जरूर पर प्रकट रूप में मुस्कुरा कर उन्होंने कहा.

  • “नहीं! ऐसा बिल्कुल जरूरी नहीं होता.”
  • “फिर सीमा दीदी…?”

 अब उन्हें पूरी बात समझ में आ गयी थी.  उन्होंने पुट्टी को प्यार से देखते हुए कहा

  • “क्या है न बेटा! अपने जीवन में बहुत सारे एग्जाम देने होते हैं. कभी पुट्टी फर्स्ट आएगी, कभी टुटु… तो कभी कोई और….हमें एक्जाम की बस तैयारी पूरी रखनी चाहिए.”

पुट्टी के साथ-साथ टुटु भी चलते-चलते मम्मी की बात समझने की कोशिश कर रहा था.

सड़क के किनारे एक कतार से लगे खम्भों पर टंगी बत्तियां सुन्दर दिख रही थीं. एकाध खम्भों के नीचे अँधेरा था. बेशक बच्चे अभी सबकुछ न समझ पाए हों. पर ये बातें यदि उन्हें बड़े होने तक याद रह जायें तो वे समझ पाएंगे कि बत्तियों का जलते रहना बहुत जरूरी है… ताकि प्रकाश बना रहे.

 

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