मैं पुरस्कारों को गम्भीरता से नहीं लेता

हाल में ही युवा कथाकार चंदन पांडे का कहानी संग्रह पेंगुइन से आया है ‘इश्कफरेब’. इस अवसर पर प्रस्तुत है उनसे एक बातचीत. यह बातचीत की है युवा कवि त्रिपुरारि कुमार शर्मा ने- जानकी पुल.
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त्रिपुरारि : चंदन जी, पहले तो आपकी नई किताब इश्क़फ़रेबके लिए बधाई। साथ ही, सवाल यह कि किताब का कवर (कुछ लोग मानते हैं) असाहित्यिक लगता है? कुछ कहेंगे?
चंदन : किताब का कवर अर्थपूर्ण है। प्रचलित किस्म के आवरणों से जरूर यह भिन्न है, पर इसे असाहित्यिक कहना ज्यादती होगी। 
त्रिपुरारि: आपके दोनों संग्रहों की कहानियों की ज़मीन में क्या अंतर है?
चंदन: पहले संग्रह भूलनामें विभिन्न विषयों की कहानियाँ हैं, जबकि दूसरे संग्रह इश्क़फ़रेबमें 1991 (जब वैश्विक पूँजी भारत की ओर अपना रुख करती है ) के बाद के समय में व्यक्तिगत सम्बन्ध जैसे प्रेम, विषय है। उसके जितने शेड्स मैं देख पाया, उसे कहानियों के जरिए व्यक्त करने की कोशिश की है। निहायत आवारा पूँजी के दौर में हमारी भाषा का क्या हुआ, इसे आप इस संग्रह की पहली कहानी में देख सकते हैं। इसके साथ ही रोजगार की तलाश और उस असुरक्षा से उपजी दूरियाँ तथा प्रेम में दूरियों का प्रभाव अन्य कहानियों में देख सकते हैं। साथ रहना, एक शहर में रहना, तो जैसे अब प्रेम की कोई शर्त ही नहीं रह गई हो। साथ ही इन दूरियों से उपजे कठिन विचलन, विकट अकेलापन आदि विषयों को एक तरहदेने की कोशिश की है।       
त्रिपुरारि: आपके लिए व्यतिगत रूप से कहानी लेखन और अन्य विधाओं में लेखन कितना न्यायपूर्ण लगता है?
चंदन: अब तो जान पड़ता है, मेरे सोचने का फर्मा ही कहानियों वाला है। कहानियों की दुनिया से दूर रहने का प्रयास भी सायास करना पड़ता है. मैं जिस तरह की नौकरी और जीवन में हूँ वहाँ कहानियाँ ही मेरी गुफा है। आगे का मेरा (कम से कम काल्पनिक) जीवन है। नए नए शिल्प में कहानियाँ लिखना सीखना इन दिनों अच्छा लगता है। अन्य विधाओं में मुझे स्क्रिप्ट, डायरी, समीक्षाएँ और रिपोर्ताज लिखना पसन्द है।
त्रिपुरारि: क्या कहानी कला, लेखक और समय के साथ पूरी तरह से तालमेल बिठाने में सक्षम है?
चंदन: यकीनन। कहानी ही नहीं, सभी कलाएँ पर्याप्त तालमेल बिठा रही हैं। अब जरुरी है कि तालमेल बिठाने के बजाय समय को तंग किया जाए. काश, कोई विधा ऐसा कर दिखाए।
त्रिपुरारि: कहा जाता है नए कहानीकारों की कहानियों में सबकुछ है, सिवाय कहानीपन के, आप कितना सहमत है?
चंदन: यह ईश्वर और धर्म की तरह झूठी बात है। आप पढ़ कर तो देखिए और सबसे पहले, यह सब बातें कहता कौन है? हाँ, यह तभी सम्भव हो सकता है जब कहानीपन की परिभाषा लचीली हो या दो तीन परिभाषाएँ हो।
त्रिपुरारि: क्या कहानी बौद्धिक दिमाग़ की उपज और भूख बनती जा रही है?
चंदन: भूख तो पता नहीं पर बौद्धिक उपज तो कोई भी कहानी होगी, बशर्ते वह किसी के जीवन या अखबार से टीप न ली गई हो।  
त्रिपुरारि: नए रचनाकारों (जिनकी किताबें 21वीं सदी में प्रकाशित हुई हैं) में, सबसे ज़्यादातर किसका लेखन प्रभावित करता है और क्यों?
चंदन: आपने समय सीमा बाँध कर और सुपरलेटिव डिग्रीमें पूछ कर मुझे अपने प्रिय रचनाकारों का नाम लेने से रोक दिया है। हू-ब-हू आपके सवाल का जवाब देना हो तो कहूँगा योगेन्द्र आहुजा। इनका पहला संग्रह अन्धेरे में हँसीबेहतरीन है. क्या कहानियाँ हैं! समकालीनता से नोक बराबर जमीन लेते हुए, जीवन को समग्रता में उठाते हुए, जो कहानियाँ आहुजा ने पहले संग्रह मे रखी हैं, वह हिन्दी में इस संग्रह को सर्वाधिक ऊंचाई पर रखता है। कहानियों का शायद ही कोई एक संग्रह हो जो इतना शानदार होगा।
त्रिपुरारि: एक कहानीकार होने के नाते, आप ख़ुद को समाज के लिए कितना ज़रूरी समझते हैं?
चंदन: बेहद। कहानीकार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण काम होता है, दी गई स्थितियों, पात्रों, जीवन को नए और फॉर्मुला-विहीन तरीके से दर्शाना। मैं वह काम करता हूँ। यह सवाल ही कुछ कुछ आत्मजयी जैसे उत्तर की माँग करता है इसलिए ही जरा विश्वास से कहना पड़ रहा है।
त्रिपुरारि: आपकी पीढ़ी के लेखकों में पुरस्कारों के प्रति क्या नज़रिया है और कितना संतोषजनक है?
चंदन: काश मैं अपनी पीढ़ी का वकील होता तो इस सवाल का आधिकारिक जवाब देता। मैं अपना नजरिया बताता हूँ। मैं पुरस्कारों को गम्भीरता से नहीं लेता। पुरस्कार समितियाँ, सीमित लोकतंत्र की नजीर हैं। वैसे यह माँग अनुचित है कि तमाम पुरस्कारों के निर्णयकर्ता, हिन्दी में छपी सारी कहानियाँ पढ़े। इसलिए ही, शायद, पुरस्कार देने वाले लोग / समूह, उन्हीं लेखकों को लायक समझते हैं जिन्हें वो जानते हैं। वो जानना, कहानी या व्यक्ति, किसी भी माध्यम से हो सकता है। इस तरह दावेदार सीमित हो जाते हैं। पुरस्कार, खानापूर्ति अधिक है। यहाँ अंग्रेजी की तरह नहीं होता जहाँ पचाससौ रचनाओं की सूची जारी की जाए, फिर उनकी सकारात्मक और सार्थक छँटाई हो और अंतिम फैसला पाँच या दस चुनिन्दा रचनाओं के बीच से हो। मेरी तमन्ना है कि वैसी संस्थाएँ जो राजभाषा के नाम पर रोटी तोड़ रही हैं उन्हें यह तरीका हिन्दी में शुरु करना चाहिए।
मौजूद गुटबन्दी और इन गुटबन्दियों की तथाकथित पुरस्कार बाँटू शक्तियाँ ऐसी बातें मुझे इतनी हास्यास्पद लगती हैं कि मनोरंजन हो जाता है। ऐसे पुरस्कार बाँटकों के पास बैठिए, वो शेख-चिल्लीपने में मजेदार बातें करते हैं, उन्हें लगता है कि हिन्दी उनके इशारे पर चल रही है।
दूसरे, यह पुरस्कार लेखकों की सीमित मदद ही करते हैं। मसलन, उनका सिर गर्व से कुछ दिन तना रहता है। कुछ पाठक जो सिर्फ साहित्य के सामान्यज्ञान से मतलब रखते हैं, उन लेखकों को जानने लगते हैं। वरना, पुरस्कार राशि इतनी कम होती है कि लेखक उसे बताते हुए भी हिचकिचाता है। भूलगलती से अगर बता भी दिया, तो पता नहीं किस को, खुद को या सामने वाले मित्र को, यह सांत्वना भी देता है जाने दो यार, नहीं से भला कुछ।
लेखक भी शायद पुरस्कार की गरिमा को नहीं समझते। उन्हें यह नहीं सोचना चाहिए कि पुरस्कार क्यों और कैसे मिला, जब तक कि खुद उन्होने ही फील्डिंग (लामबन्दी) न की हो। लेखको को चाहिए कि पुरस्कार/सम्मान आदि के मौकों पर गम्भीर तैयारी के साथ सारगर्भित पर्चे पढ़े. उन्हें हर वक्त यह कोशिश करना चाहिए कि कैसे हम अधिकाधिक लोगों तक अपनी बात पहुँचा सकें। लेखकों को यह पर्चे प्रकाशित भी कराने चाहिए ताकि चर्चा विस्तृत हो।
त्रिपुरारि: नई सदी में नए पाठकजैसे जुमले से आप क्या आशय लेते हैं?
चंदन: नए पाठक से अगर नए किस्म का पाठक समझा जा रहा है तो मैं कहना चाहूँगा कि यह नए किस्म के लेखन के द्वारा सम्भव है। नई सदी में चूँकि सब कुछ नया और तेज हो रहा है, तो हमें लग सकता है कि नए पाठक जुड़ रहे हैं।
त्रिपुरारि: क्या कारण है कि हिंदी के लेखक अपनी किताबों के प्रचार-प्रसार से ज़रा दूर ही रहते हैं?
चंदन: इस प्रश्न का जवाब देना भी आ बैल मुझे मारवाली स्थिति में पड़ने जैसा है। मैं नहीं मानता कि एकाध लेखकों को छोड़ कर कभी कोई प्रचार प्रसार से दूर रहा हो। जब हिन्दी का जागरुक पाठक संसार सिमटने लगा तो अच्छे लेखकों ने लघु पत्रिकाओं का रास्ता अपनाया। वह आन्दोलन एक खास किस्म की ऑडियेंस से सम्बन्धित था। तमाम अच्छी रचनाओं के अलावा हिन्दी के ढेरों मठ मन्दिर इसी की देन है। पर यह सभी भाषाओं में हुआ. बाद के दिनों में, शहीद ग्रंथि का प्रचार अधिक था. इसका एक खराब संस्करण फेसबुक पर आज भी पसरा हुआ है।
इस लघु पत्रिका वाले आन्दोलन की सफलताएँ अधिक और बहुआयामी हैं पर एक बात जो रह गई पाठक लोग। वे ही लोग जुड़े जो येन केन प्रकारेण समय निकाल सकते थे। आप पायेंगे कि हिन्दी का संसार आज भी मास्टर-बहुल है, जो, सौभाग्य से, देश दुनिया के अपने सारे काम निबटा कर, और हाँ, पढ़ा कर भी, साहित्य सृजन / सेवा के लिए समय निकाल लेते हैं। यह अच्छी बात तो है पर यह सबके साथ सम्भव नहीं था इसलिए लोग दूर-ब-दूर होते गए। यह तो रही पाठक कम होने की एक बात। जरा उन माध्यमों पर भी गौर करना चाहिए जो लेखकों को प्रचार प्रसार का मौका दे सकते थे।
आज के जमाने में कोई भी अखबार जब किसी नामाकूल सम्पादक के पास जाता है, तो वह अपने मन माफिक रचे रचाए सर्वे का तर्क देकर सबसे पहले साहित्यिक पन्ने की कुर्बानी लेता है। ये जो सर्वे हैं इनका क्या हश्र है, यह आप आऊटलुक के उस अंक से लगा सकते हैं जिसमें अम्बेदकर को गान्धी के बाद का सर्वाधिक प्रभावशाली भारतीय बताया गया था। यह तो आम जनता की राय थी वरना इस तथाकथित सर्वे, जो दिल्ली की कुछ कॉपियों पर होता है, का यकीन करे तो गान्धी के बाद सर्वधिक महत्वपूर्ण भारतीय टाटा या सचिन हैं। और सोचिए कि इनके सर्वे का यकीन कर कोई काम किया जाए तो कैसा रहेगा?
मेरे कहने का अर्थ है कि वजह जो भी रही हो, मीडिया / मंचों ने भी गम्भीर लेखकों से दूरी बनाना शुरु कर दिया। इससे लेखकों के पास अपनी किताबों के प्रचार-प्रसार का मौका कम मिला। मुझसे प्रकाशक ने बताया कि वो अखबारों में समीक्षार्थ मेरी किताब भेजना चाहते हैं। मैने उन्हें अपने हिसाब से काम करने की सलाह दी पर अपनी राय भी जता दी कि कोई मतलब नहीं। आज की तारीख में अखबारी सूचनाओं / समीक्षाओं का स्पेस इस कदर कम है कि पाठक शायद ही निगाह भी लगाए। इसलिए वहाँ किताब भेज कर बर्बाद करने की जरुरत नहीं।
अधिकतर प्रकाशकों को, संस्थाओं से मोटा माल कमा लेने के बाद, इसकी जरूरत ही नहीं पड़ती कि वो पाठकों तक लेखक/किताब को ले जाने की जहमत उठाएँ।  
इस तरह हिन्दी लेखक के पास पाठकों तक पहुँचने और प्रचार प्रसार के मौके बेहद कम हैं। न के बराबर या उससे ही कम। वरना कौन लेखक होगा जो पाठकों से या स्वस्थ किस्म के प्रचार प्रसार से दूर रहना चाहेगा।
त्रिपुरारि: एक आख़िरी सवाल, चंदन पाण्डेय कितने इश्क़िया हैं और कितने फ़रेबी?
चंदन: पहले जरा हँस लूँ – हा.हा..हा…। किताब का नाम इश्कफरेबहै। इसमें फरेबी किसी इंसान को नहीं कहा जा रहा। इसे दिलफरेबकी तरह समझना होगा। जैसे कोई लुभावनी चीज कभी कभी दिलफरेब होती है वैसे ही कौन सी ऐसी बात है जो इश्कफरेब है। इश्क को छलने वाली/वाला? इस प्रश्न का उत्तर किताब के आभार वाले पन्ने पर देखा जा सकता है। 

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