जनतंत्र में नायक कौन होता है?

कवि बद्रीनारायण का नाम देश के ‘सबाल्टर्न’ इतिहास-धारा में बहुत आदर से लिया जाता है. दलित समाज के किस्सों-कहानियों के आधार पर उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण स्थापनाएं की हैं. हमारे समाज में नायकत्व की अवधारणा को लेकर उनका एक दिलचस्प लेख- जानकी पुल.
      



बचपन में मेरी माँ एक कहानी सुनाती थी, जिसमें कहानी जितना कही जाये वह उतनी ही आगे बढ़ती जाये, अर्थात् वह कथा कभी खत्म नही होती थी। वैसी ही है जनतंत्र की लोककथा। जितना कहते जाइए, उतना ही बढ़ती जाएगी।
       आज मैं यहाँ जन एवं जनतंत्र में नायकत्व की कथा कहता हूँ। जनतंत्र में नायक कौन होता है? इस प्रश्न पर विचार करने के पहले हमें सोचना चाहिए कि जनतंत्र में नायक होना भी चाहिए कि नही? यूं तो आधुनिक जनतंत्र सतत रुप से एक गहरी आलोचनात्मकता पर टिका होता है, जिसमें नायकत्व, करिश्मा इत्यादि जनता की आलोचनात्मक आँखों से स्कैन होते रहते हैं। अतः जनतंत्र में नायकत्व एक क्षणभंगुर अवस्थिति है। पर जनतंत्र में नायकत्व सामाजिक संस्कृति से उद्भूत होता है, अतः उसके ढाँचे में दीर्घजीवी होते हैं और अनेको बार उन ढांचों में फिट नायक भी। हर समाज में जनता के मन में आदर्श के कुछ पैमाने बन जाते हैं। ये पैमाने  उस समाज की संस्कृति एवं ऐतिहासिक रुप में विकसित  मूल्य जगत  से बने होते हैं। अगर उसका ‘नायक’ उन आदर्शो पर खरा नही उतरता है तो जनता के मन में बने नायकत्व के पद से वह च्युत हो जाता है। जनता के मन में नायकत्व सिर्फ आदर्शों  से निर्मित नही होता है। जनता के दैनन्दिन जीवन के सुख-दुख में नायक की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष उपस्थिति  भी नायकत्व निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। नायकत्व का यह फलक 5060 के दशक में चम्बल घाटी के दस्यु सुल्ताना डाकू, मास्टर माधो सिंह, मान सिंह, से लेकर गाँधी, नेहरु, इन्दिरा, कांशीराम, मायावती से लेकर एकदम नयों में राहुल गाँधी तक फैला है। लोगों के मन में सामाजिक बुराईयों का प्रतिरोध करने वाला दस्यु  जिसे प्रसिद्ध इतिहाकार एरिक हॉब्सबाम ‘सोशल बैन्डिट’ कहते हैं, न केवल भारत में पूरी दुनिया में नायक का पद पा गया। नायकत्व की अवधारणा में सत्ता एवं शक्ति बहुत महत्वपूर्ण नहीं होते। लोक गाथाओं में राजा से ज्यादा राजपाट छोड़कर जोगी बन गए सोरठी-बिरजाभार एवं भरथरी का गुण गाया जाता है। अगर नायकत्व में सत्ता का जोग ज्यादा होता तो भारत का हर प्रधानमंत्री को नायकत्व प्राप्त होता। जयप्रकाश नारायण एवं अन्ना हजारे नायक नही बन पाते। नेहरु का अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध प्रतिकार, इन्दिरा का स्त्री होने के बावजूद तरह-तरह के करिश्माई निर्णय लेना, कांशीराम एवं मायावती  का आधित्यशाली राजनीति का प्रतिरोध सोनिया एवं राहुल का सत्ता से थोड़ी दूरी ही शायद उनकी छवि में नायकत्व के कुछ तत्व भर देते हैं। हमारा नायक हमारे मिथक से सच एवं सच से मिथक में आता जाता रहता है। आज जनता के मन में नायकत्व की कल्पना की और हम बौद्धिक जिस जनतांत्रिक समाज को संकलिप्त करना चाह रहे हैं, में नायकत्व के परिकल्पना कई बार एक हो सकते हैं, पर कई बार अलग-अलग भी। सम्भव है 60 के दशक के एक बुजुर्ग गवई आदमी  के मन में एक ही साथ सुल्ताना डाकू और नेहरु दोनों ही नायक हों। अन्ना हजारे के लिए भगत सिंह जैसा हिंसा में विश्वास करने वाला क्रान्तिकारी एवं अहिंसक महात्मा गाँधी दोनों ही एक साथ नायक हैं। अन्ना के लिए और उस बुजुर्ग गवई के लिए इन दोनों प्रतीकों के विरोधी चरित्र होने के बावजूद भी इनमें अन्तर्विरोध नही है।
2010 की जनवरी में बनारस में रविदास मेला लगा था। जिसमें लगभग 10 लाख के आसपास मात्र जाटव-चमार बिरादरी के भाई देश-विदेश से इकट्ठे हुए थे। वहां कई लोक साहित्य, फोटो एवं कैलेण्डर के फुटपाथी  दुकानें लगी थी। इन दुकानों पर दलित नायकों के बारे में साहित्य एवं उनके फोटो, कैलेण्डर बिक रहे थे। वहां जो पोस्टर, कैलेण्डर एवं फोटो बिक रहे थे, उनमें बुद्ध, सन्त रविदास, अम्बेडकर, कांशीराम, मायावती के साथ-साथ राहुल गाँधी का कैलेण्डर एवं फोटो भी बिक रहे थे। कैलेण्डर बेचने वाले दुकानों पर किए सर्वेक्षण से एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आया। चमार-जाटव बिरादरी जिन्हें आज मायावती एवं बी0एस0पी0 का बोट बैंक  बताया जाता है, उनमें राहुल गाँधी का कैलेण्डर एवं फोटो  मायावती के फोटो एवं कैलेण्डर से थोड़ा ही कम बिका। ये लोग जो प्रायः रविदास भक्त थे, और कहीं से बौद्ध नही थे, वे बुद्ध की तस्वीरें भी खरीद रहे थे। बुद्ध के साथ सरस्वती जी के फोटो भी यहाँ बिक रहे थे। इस प्रकार जिस दलित जाति का राजनीतिक एवं सांस्कृतिक अर्थ करते हुए हम उसे किसी खास नेता एवं राजनीतिक दल एवं अस्मिता संस्कृति से जोड़ कर रुढि़बद्ध धारणा बना देते है, उसके मन में एक ही साथ अनेक आकर्षण जी रहे होते है। एक को वोट देते हुए भी वह दूसरे नेता एवं राजनीतिक दल की जनोपयोगी नीतियों की तारीफ करता आपको मिल जायेगा। इलाहाबाद के पास एक गांव हैं सहाबपुर। वहां के चमार जाति के श्री भुल्लर का हम लोग एक लम्बा साक्षात्कार कर रहे थे। भुल्लर से हम कह रहे थे कि मायावती के आने के बाद दलितों के प्रति छुआछूत की भावना कम हुई है। उन्होने तपाक से बीच में मेरी बात काटते हुए कहा ‘छुआछूत’ तो कांग्रेस के जमाने में ही खत्म हो गई थी। लेकिन इससे आप भ्रम में न पड़े कि भुल्लर कांग्रेसी है। वे पहले कांग्रेस को वोट देते थे, पर वे कहते हैं कि वोट बहन जी को ही देगें। क्यों? क्योकि अपनी जाति -बिरादरी का अब नेता आ गया है तो दूसरे को क्यों वोट दें? मैं यहाँ सिर्फ यह इशारा करना चाहता हूँ कि जनता के मन का अर्थ सिर्फ वोट देने में उसकी पक्षधरता से ही नही लगाया जाना चाहिए। वोट देने वाले क्षण के अतिरिक्त उसके जीवन  मुक्ति एवं दैनंदिन संघर्ष की अपनी राजनीति होती है। जिसके लिए उसके मन में एक ही साथ कई विकल्प मौजूद होते हैं। इनमें से जो अपने इमेज को उसके सपनों से जोड़ने में सफल हो जाता है, वह उसके नायकों में पहली पसन्द बन जाता है। लेकिन यह पसन्द कोई जरुरी नहीं कि हमेशा बनी रहे। हो सकता है थोड़े दिनों बाद जनता का उस नायक से मोहभंग हो जाए और उसके मन में पड़े अनेक विकल्पों में से कोई और उभर कर आगे आ जाए। जिसकी भाषा एवं प्रतीक जनता के सुखों, दुखों एवं सपनों से जुड़ जाता है। वह उसके राजनीतिक नायक के रुप में उभर आता है।
जनता के मन में नायकों के अनेक प्रकार होते हैं- सामाजिक नायक, धार्मिक नायक, राजनीतिक नायक। प्रायः जनता इनमें घालमेल नही करती। किन्तु चूँकि  इन सबमें नायकत्व के स्रोत लगभग एक से होते हैं। अतः सम्भव है सामाजिक एवं धार्मिक नायक राजनीतिक नायक की जगह ले लें। क्योंकि सामाजिक एवं धार्मिक नायकत्व के निर्माण में आदर्श का तत्व ज्यादा होता है। जनता अनेकों बार अपने दैनन्दिन जीवन में आदर्श का पालन न करते हुए भी आदर्श के प्रति आकर्षित रहती है। हो सकता है अपने दैनन्दिन  जीवन में भ्रष्टाचार करने वाले भी भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन में सक्रिय हो। क्योंकि भ्रष्टाचार मुक्ति की नैतिकता उसे भी प्रभावित करती है। जब राजनीतिक नायकत्व अनैतिक हो जाता है तो सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक नायकों के लिए स्पेस  बन जाता है। नायकों की इस गैर राजनीतिक परम्परा में निहित आदर्श एवं नैतिकता के तत्व इतने प्रभावी होते हैं कि जनता हमेशा से खींची चली आती है।

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