मलाला की कहानी से प्रेरणा मिलती है

मलाला युसुफजई की आत्मकथा ‘आई एम मलाला: द गर्ल हू स्टुड अप फॉर एजुकेशन एंड वाज शॉट बाय तालिबान’ पर यह टिप्पणी लेखिका सरिता शर्मा की है- मॉडरेटर 
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   मलाला यूसुफजई 2014 में कैलाश सत्यार्थी के साथ संयुक्त रूप से शांति के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित की जाने वाली सबसे कम आयु की नोबेल पुरस्कार विजेता है. मलाला उस वक्त ख़बरों में आई थी, जब पाकिस्तान के स्वात घाटी इलाके में उस पर तालिबानी हमलावर ने गोली चलाई थी. मलाला ने अपनी आत्मकथा ‘आई एम मलाला: द गर्ल हू स्टुड अप फॉर एजुकेशन एंड वाज शॉट बाय तालिबान ब्रिटिश पत्रकार क्रिस्टीना लैम्ब के साथ मिलकर लिखी है. यह किताब बीते दशक के मध्य में तालिबान के क्रूर शासन वाले उत्तर पश्चिमी पाकिस्तान की स्वात घाटी में मलाला की जिंदगी बयान करती है. मलाला ने इस पुस्तक के बारे में कहा है मैं अपनी कहानी कहना चाहती हूं, लेकिन यह उन 61 मिलियन बच्चों की कहानी भी होगी, जो शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते हैं. मैं इसे प्रत्येक लड़के-लड़की के स्कूल जाने के अधिकार के अभियान का एक हिस्सा बनाना चाहती हूं. यह उनका मूलभूत अधिकार है. मुझे आशा है कि यह पुस्तक दुनिया भर के लोगों तक पहुंचेगी, उन्हें पता चलेगा कि कुछ बच्चों के लिए शिक्षा प्राप्त करना कितना कठिन है.

   इस किताब में मलाला की संघर्ष गाथा है. मलाला के स्कूल, पढ़ाई, स्कूल में उसके द्वारा की गई गतिविधियों को भी दिखाया गया है.मलाला ने अहिंसा का पाठ गांधीजी, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान और मदर टेरेसा से सीखा है. पुस्तक में लड़कियों की शिक्षा की वकालत की गई है और उन्हें शिक्षा के प्रति जागरूक किया गया है. मलाला के बचपन के भी कुछ दृश्य हैं तथा उसका पूरा परिवार दिखाया गया है. उसके पिता जियाउद्दीन युसुफजई ने खुद का स्कूल खोला और तालिबान के खिलाफ बोलकर अपनी जिंदगी खतरे में डाली. वह शिक्षा के अधिकारों के लिए सक्रिय रहे हैं. मलाला के जन्म के वक्त स्वात घाटी में स्थिति शांतिपूर्ण थी. तालिबान ने 2007 में उनके स्कूल पर कब्जा कर लिया था. मलाला ने स्थानीय स्कूलों पर बमबारी करने और महिलाओं की शिक्षा पर रोक लगाने के खिलाफ आवाज उठाई. तालिबानी आतंकवादियों के साये में स्वात घाटी की खौफनाक जिंदगी के बीच मलाला संघर्ष का प्रतीक बन कर उभरी. स्थानीय तालिबान नेताओं ने चेतावनी जारी की कि महिलाओं की पढ़ाई पूरी तरह बंद हो जानी चाहिए और अगर ऐसा नहीं हुआ तो स्कूलों को इसके नतीजे भुगतने होंगे. मलाला और उसके पिता ने स्वात में तालिबान की धमकियों के बाद भी लड़कियों की शिक्षा के लिए मुहिम जारीरखी थी.
  वर्ष 2009 में मलाला ने बीबीसी के उर्दू ब्लॉग पर गुल मकई नाम से स्वात घाटी पर डायरी ऑफ ए पाकिस्तानी स्कूल गर्लशीर्षक से एक ब्लॉग लिखना शुरू किया. इसमें स्वात घाटी की घटनाओं और वहां की दर्दनाक स्थितियों का जिक्र किया था. यह ब्लॉग लड़कियों की शिक्षा के अधिकारों के संघर्ष की एक उम्मीद बन गया था. मलाला का ब्लॉग विश्व स्तर पर चर्चा में तब आया, जब 2010 के अंत तक स्वात में पाकिस्तान सरकार का नियंत्रण हो गया और वहां देशी-विदेशी मीडिया का दखल बढ़ा. उस दौरान तालिबान क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे, क्रूर सार्वजनिक न्याय कर रहे थे और लड़कियों के स्कूल जाने पर भी प्रतिबंध लगाते थे. मलाला के विद्रोह से बौखला कर तालिबान ने उस पर जानलेवा हमला कराया था. मलाला ने यह भी बताया है कि गोली मारने के कई महीने पहले से ही उसे धमकियां मिल रहीं थीं. ‘रात को मैं तब तक इंतजार करती जब तक कि सारे सो न जाएं, उसके बाद मैंहर दरवाजा और खिड़की चैक करती. मैं नहीं जानती क्यों, लेकिन मैं निशाने पर हूं यह जानने के बाद भी मुझे डर नहीं लगा. मुझे ऐसा लगता कि हर कोई जानता है कि मुझे एक दिन मरना है. इसलिए मुझे वह करना चाहिए जो मैं चाहती हूं.’

   सबसे मार्मिक चित्रण उन पलों का है जब 9 अक्टूबर 2012 को दो बंदूकधारी स्कूल बस में सवार हुए और मलाला के सिर में गोली मारी. मलाला ने लिखा है, ‘मेरे दोस्तों ने कहा कि उसने एक के बाद एक तीन गोलियां मारी. जब तक हम अस्पताल पहुंचे, मेरा सिर और मोनीबा की गोद खून से भर चुकी थी.’ किताब में आगे उसकी जिंदगी बचाने के लिए डॉक्टरों की आपाधापी और इसी बीच घर से दूर जाने की दास्तान है. मलाला ने तालिबान के घातक हमले के बाद अस्पातल में बिताये गये अपने दिनों का ब्यौरा देते हुए कहा, ‘गोली लगने के एक सप्ताह बाद 16 अक्तूबर को मुझे होश आया. वहां सबसे पहले मेरे मन में विचार आया, ‘खुदा का शुक्र है, मैं मरी नहीं.’ मेरे मन में कई तरह के सवाल उठ रहे थे: मैं कहां हूं? मुझे यहां कौन लेकर आया? मेरे माता पिता कहां हैं? क्या मेरे पिता जीवित हैं? मैं डरी हुई थी. मुझे सिर्फ यही पता था कि अल्लाह ने मुझे एक नई जिंदगी से नवाजा है. मलाला पर गोली चलाने की घटना की निंदा पूरी दुनिया में हुई और इसके बाद मलाला की जिंदगी बदल गई. मलाला यूसुफजई से एक बार पत्रकारों ने पूछा था कि जिन्होंने उन पर हमला किया उनके बारे में वह क्या सोचती हैं, इस पर मलाला ने कहा था, ‘मैं सोचती हूं कि उन्हें मलाला पर हमला करने का अफसोस होगा. अब उसकी आवाज दुनिया के हर कोने में सुनी जाती है.

       मलाला फिलहाल ब्रिटेन के बर्मिंघम शहर में रहती है. गोलीबारी के बाद उसे इलाज के लिए यहां लाया गया. मलाला ने माना है कि उनके पिता की तरह उसकी भी पाकिस्तान में काफी आलोचना हुई और बहुत से लोग मानते थे कि वह पश्चिमी देशों की कठपुतली हैं. मलाला ने बर्मिंघम की जिंदगी में खुद को ढालने का भी जिक्र किया है. वह स्काइप का इस्तेमाल कर स्वात घाटी के अपने दोस्तों के साथ अब भी घंटों बात करती है. तालिबान के हमले का शिकार होने के बाद भी मलाला लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के प्रयासों में लगी हुई है. वह पाकिस्तान लौटना और अपने देश के लोगों की मदद करना चाहती है. वह पाकिस्तान में हर उस लड़की को शिक्षित करना चाहती है, जो निरक्षर है. इस उद्देश्य के लिए मलाला फंड के स्थापना की गयी है. आज मलाला एक सिलेब्रिटी बन गई है. उसके जीवन पर आधारित व़ृत्तचित्र ही नेम्ड मी मलालाको जियोग्राफिक चैनल पर 171 देशों और 45 भाषाओं में नेशनल प्रसारित किया जाएगा.आर्चबिशप डेसमॉडन्ड टूटू ने मलाला को अंतर्राष्ट्रीय बाल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित किया और उसे पाकिस्तान का पहला राष्ट्रीय युवा शांति पुरस्कार मिला. मलाला को टाइमपत्रिका ने 100 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों में एक नामित किया. मलाला को संयुक्त राष्ट्र में संबोधित करने का मौका मिला और संयुक्त राष्ट्र ने 12 जुलाई के दिन को मलाला दिवसघोषित किया है. इस मौके पर मलाला ने कहा था, ‘एक बच्चा, एक अध्यापक, एक किताब, एक पेन इस दुनिया को बदल सकते हैं.मलाला यूसुफजई  की किताब आई एम मलाला : हाउ वन गर्ल स्टुड अप फॉर एजुकेशन एंड चेंज्ड द वर्ल्डके ऑडियो संस्करण को 57वें एनुअल ग्रैमी अवार्ड्स में बेस्ट चिल्ड्रन्स एलब पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 2010 में मिले क्षुद्र ग्रह 316201 का नामकरण मलाला के नाम पर किया है. पाकिस्तानी बैंड ने उस पर दो गाने भी बनाये हैं.

    चूंकि पुस्तक एक पत्रकार की मदद से लिखी गयी है, कहीं- कहीं आभास होता है कि पुस्तक को प्रभावशाली बनाने के लिए इसमें कुछ जोड़ा गया है. पूर्वार्ध सुस्त गति से चलता है मगर उत्तरार्ध तेजी से चलने वाले घटनाक्रम की वजह से पठनीय है. इन्टरनेट और समाचार चैनलों में तालिबान के अत्याचारों से पाठक पहले ही अवगत हैं. यह पुस्तक बेस्टसेलर बन गयी है जिसकी ऑडियोबुक भी खूब बिक रही है जबकि पाकिस्तान में इस किताब को प्रतिबंधित किया गया है. मलाला की आत्मकथा को अमेरिका की जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी तथा विश्व भर के अन्य स्कूलों और विश्वविद्यालयों ने अपने पाठ्यक्रम में शामिल किया है. अब भी पाकिस्तान में हालात में विशेष सुधार नहीं आया है. प्रेमी जोड़ों को परिवार द्वारा ही जहर देकर या कोई और तरीका अपनाकर मार दिया जाता है. एक परम्परा के अनुसार झगड़ा निपटाने के लिए एक जनजाति की लड़की को दूसरी जनजाति को सौंप दिया जाता है. तालिबानी कहते हैं मलाला को मिलते ही फिर से गोली मारेंगे. पाकिस्तान के कई स्कूलों में ‘आई एम नॉट मलाला’ डे मनाया गया है. मलाला की कहानी के अंत में लगता है- काश मलाला जैसी ख्याति और न्याय विश्वभर की अन्य पीड़ित और साहसी महिलाओं को भी मिल सके.

 ईमेल: sarita12aug @hotmail.com
लेखक: मलाला यूसुफजई और क्रिस्टीना लैम्ब
प्रकाशक ओरियन पब्लिशिंग ग्रुप
पृष्ठ : 288
मूल्य: 399

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