सत्य दरबारियों का शगल है

हमारी पीढ़ी में सबसे अलग मुहावरे वाले कवि तुषार धवल की कुछ नई कविताएँ. तुषार की कविताओं में मुझे कभी-कभी अकविता की सी झलक दिखाई देती है, कभी अपने प्रिय कवि श्रीकांत वर्मा की आहट सुनाई देती है, लेकिन उनका स्वर एकदम समकालीन है. इन नई कविताओं को पढकर देखिये- जानकी पुल. 

वह आया था 
उसकी आहटें सिर में दरार भरती हैं
दूर किसी कोलाहल की लय पर 
धीमे सधे क़दमों से 
वह आता है 
हमारी पीठ पर खरोंचों से कुछ लिख कर 
चला जाता है
वह आया था 
वह फिर आएगा 
वही मंज़र होगा 
तैरती किसी लाश पर स्वर हो 
जो किनारे पहुँच सके 
वही बैठ कर लिखेगा इतिहास 
उस समय का 
यह और बात है कि 
इतिहास की समझ उसे नहीं
वह आया था
वह फिर आएगा
उसकी आहटें सुनो —
भाव भरा निर्भाव सा
देह में देह से परे
समझ में समझ से परे
अक्सर अपने गुजर जाने के वर्षों बाद
उद्घाटित होता है वह
हमारी पीठ पर उसके नक़्शे होते हैं
पर
हमारे हाथों में आईना नहीं होता
तुम 
जिसे कहने कहा गया है
कहो.
तुम्हारी बातों में सम्पूर्णता नहीं होगी. 
एक दिन लौटोगे
तुम भी वहीँ पर.
अब सब खारिज है.
सत्य
दरबारियों का शगल है.
मैं लौटता हूँ
लाल कालीनों के गलियारों से
गूंजते संगमरमरी स्तंभों से
कि जैसे अनजाने ही भटक आया था
इस बाज़ार में
स्वाधीन होना अपनी रीढ़ पर
सम्राटों के बदले जाने से कहीं बेहतर है
कहीं बेहतर है
कि मतों की गिनती छोड़ कर
हम लौटें ज़मीन पर
जहाँ अब भी अपार सम्भावना है
जीवन को भरा पूरा अर्थ देने की
यह नियति का संकट नहीं
यह धीर का संकट है
मैं चाहता हूँ
सब्र से पके धरती
उगे हर कण से पूरा आदमी.
बेसब्र है माहौल.
तुम्हारी फेहरिस्त से खारिज हुआ.
मै आता हूँ जहाँ से
एक दिन लौटोगे
तुम भी वहीँ पर.
युद्ध कहीं भी लड़ा गया हो
वे आये
वे लड़े
वे चले गए
हम कंकाल गिनने बैठे हैं
युद्ध वह किसके लिए था ?
तलाश हमारी हमें
अपनी खोज से भटका भी सकती है
वह जो नहीं लड़ा
वह भी लड़ रहा था बिना लड़े
उस घटाटोप में वहीँ एक रोशनी भी थी
हमें जिस पर अब भी शक है
वह जो नहीं लड़ा
हम में से ही एक था
वह सिर्फ सच के लिए खड़ा था
मार खाता हुआ.
हम लड़ रहे थे.
हम पा नहीं सके
उसका सच
क्योंकि हमें तो कुछ और ही
चाहिए था.
हम कंकाल गिनने बैठे हैं —
ये हमारे ही कंकाल हैं.
वह जो मार खा कर भी नहीं लड़ा
वह अब भी जिंदा है
और अभी भी अकेला ही है
पहले  ही की  तरह
हम रोज़ रोज़ मरते हैं
वह बुदबुदाता रहता है —
युद्ध कहीं भी लड़ा गया हो
ज़मीन वही होती है हमेशा ! 
इंसान जहाँ बेच दिया गया
क़त्ल होते हुए
कितना चीखा होगा
वह आदमी
किस किस को उसने पुकारा होगा
क़त्ल हुई आबादियाँ खामोश हैं
शहर का शहर श्मशान है
किसकी महत्वाकांक्षा की चपेट में आ गए सब?
कब तक युद्ध
ऐसे ही जीते जायेंगे
युद्ध में हमने किसे जीत लिया?
वह जो ताज की तरफ लपक रहा है
इस वक़्त
वही सबसे हारा हुआ आदमी है
इस दरकते तंत्र में
मैं एक एक कर भीड़ हुआ जाता हूँ
मेरे स्वर में
लाख स्वर पूछते  हैं
इन सिर कटी बोरियों से क्या कहोगे ?
इंसान जहाँ बेच दिया गया
वहां बाज़ार नहीं था
वहां सिर्फ बेलगाम सपने थे.

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