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इमरान खान एक से ज्यादा मैदानों में खेलने वाला एक गैम्बलर है


भारतीय उप-महाद्वीप के सबसे महान हरफनमौला क्रिकेटर इमरान खान के जीवन-सफर पर किताब लिखने वाले फ्रैंक हुजुर खुद हरफनमौला हैं, लेकिन कलम के. साहित्य और पत्रकारिता की हर विधा में कलम चलाने वाले इस लेखक ने जानकी पुल से बातचीत में अपने पहले नाटक ‘हिटलर इन लव विथ मडोना’ से लेकर इमरान खान तक पर बड़े विस्तार से बातें की हैं, एकदम दिल से. हाल में ही आई फिल्म ‘गाँधी टू हिटलर’ के बारे में भी जो एक तरह से उनके नाटक के आइडिया से ही उडाया गया है, लेकिन उनको कोई क्रेडिट नहीं दी गई. फ्रैंक मानते हैं कि एक कलमबाज़ को इस तरह के चोटों से निराश नहीं होना चाहिए. यही कारण है कि न उनके कलम की धार कुंद हुई है न ही नए-से-नए आइडिया को लेकर काम करने का जज्बा. पढ़िए एक दिलचस्प बातचीत.


(१) आपने लिखने की शुरुआत नाटकों से की थी. अपने पहले नाटक ‘हिटलर इन लव विथ मडोना’ के बारे में कुछ बताइये?
फ्रैंक हुजुर: लेखन की शुरुआत अंग्रेजी में पोएट्री से हुई. पहली नज़्म १९९३ में रांची में लिखी. अंग्रेजी के रोमांटिक पोएट जॉन कीट्स के नज्मों में जो ‘सेंसुअल इमेज़री’ है उसका गहरा असर मेरे दिल पर है. वर्ड्सवर्थ और वाल्टर स्कॉट की कविताएँ भी नशीला असर पैदा करती रही हैं. मेरे दिल की आवाज़ भी रोमांस ही थी मगर जब तक पाब्लो नेरुदा के नज्मों का एहसास हुआ इस कमबख्त जख्मी दिल ने करीब १०० पोएट्री का बगीचा बना लिया था. अंग्रेजी के अखबार द एशियन एज में जब कुछ नज्में पब्लिश हुई तो जबरदस्त हौसलाअफजाई हुई. एम. जे. अकबर के बाई लाइनका नशा रांची में हर शाम को  टेलीग्राफ के कोलकाता एडिशन से छाता जा रहा था. दिल्ली युनिवर्सिटी के हिन्दू कॉलेज में दाखिला लेने के बाद पोएट्री के साथ साथ प्रोज और ड्रामा का हलचल दिमाग और दिल दोनों को गिरफ्त में लेने लगा. मार्च १९९७ में हमने ‘यूटोपिया’ टाइटल से मंथली न्यूज़ मैगज़ीन का आगाज़ कर दिया. यह एक अनोखा कदम था. हिन्दू होस्टल के कमरा नंबर ३१ से मैंने देश और दुनिया के सियासत और खेल पर अंक निकाले और लिखने वाले सहाफत के बड़े नाम नहीं थे, बल्कि सैंट स्टीफेंस का इतिहास का स्टुडेंट राशिद मेरा एडिटर था, एम. जे. अकबर साहेब की बेटी मुकुलिका भी जुडी, जवाहरलाल युनिवर्सिटी से इम्तिआज़ अहमद जुड़े तो कैम्पस से देवेंदर राणा ने फिनांस करने का जोखिम उठाया. हौसलेका जबरदस्त परचम था ‘यूटोपिया’ और मेरे अन्दर के नाटककार को सियासत की ज्वालामुखी ने ही बाहर निकाला.  
सन १९९८ के जुलाई के आखिरी हफ्ते में ‘हिटलर इन लव विथ मडोना’ का जनम होता है. कहानी बहुत ही सिंपल फंतासी है. हिटलर बर्लिन के बादशाह है, बर्लिन का रुतबा १९३९ में वाशिंगटन से काफी ज्यादा हमने पेश किया है. दुसरे आलिमी जंग के ठीक पहले हमारे जमाने की पॉप म्युजिक की मल्लिका मडोना को हमने रोम की गलियों में अवतरित कर दिया. अडोल्फ़ हिटलर रोम में मुसोलिनी से मुलाकात के बाद जब सड़क की सैर कर रहे तो उनका दीदार मडोना से होता है. जंग और यहूदियों के खून का प्यासा हिटलर के ऊपर मडोना के वर्जिन मोहब्बत को हासिल करने का सुरूर छाने लगता है. मगर मडोना अपनी नफरत को अडोल्फ़ से खुलकर बयान करती है और मोहब्बत का ऐतबार करने के लिए हिटलर को जंग और यहूदियों के कत्लेआम को कुर्बान करने के लिए उकसाती है. हिटलर अमन का सिपाही बन जाता है, मडोना उसकी महबूब हो जाती है. आखिरी सीन में हिटलर के सिपहसलार गोरिंग, हिमलर और गोएब्बेल्स उसका खून कर देते है क्योंकि बर्लिन उनकी नज़रों में जंग से भाग नहीं सकता, क्योंकि नाजियों को पुरे दुनिया को फतह कर आर्यन सुप्रीमेसी को कायम करना है. हिंदुस्तान में जम्हूरिअत के सियासत का पहिया उस दौर में बाबरी मस्जिद के शहीद होने के बाद अजीब अंगारे फेक रही थी. सेकुलरिज्म और साम्प्रादायिकता और फिरकापरस्ती तब दहशतगर्दी से बड़े मसले थे. हमने अपने ज़मीन के सियासत का आइना दिखने के लिए नौ सीन में एक सीन को हिटलर के दरबार में लाल हरी, लाल बिहारी,  महाजन और ठाकरे जैसे पात्रों को हाज़िर किया जहाँ गुहार ये लगायी जा रही है की हिंदुस्तान के गलियों में भी बहोत सारे यहूदी हैं और उनको यहाँ लाल हरी साहेब मियां-मुस्लिम कहते हैं. यही सीन विवादों में आने की वजह बनी और नाटक को तब के प्रशासन ने रिहर्सल में ही तहश-नहश कर डाला. प्रेस ने कहा की लाल हरी तो लालकृष्ण अडवाणी साहेब हैं जो उस वक़्त देश के गृह मंत्री थे और भाजपा को सत्ता का स्वाद चखाने के एकमात्र सिकंदर थे. मेरा ये नाटक छपा भी मगर पाठकों के लिए लोकार्पित नहीं हो पाया. अफ़सोस होता है उस वक़्त को याद कर के. मेरी ज़िन्दगी का टर्निंग पॉइंट है ये ड्रामा. दिल्ली का साथ ही नहीं छूटा,  दोस्तों से अलग हो चला, तालीम पे असर पड़ी, यूटोपिया बंद होने के कगार पे आ गयी. चारो तरफ अँधेरा ही अँधेरा था. करीब तीन साल का वक़्त जवानी के कीमती समय को ऐसा लगा जैसे जंग लग गयी. हौसला हमने नहीं हरा, कुछ नए दोस्त बने, अफ्सानो को क़ैद करता गया जेहन और डायरी में.
(२) अभी हाल में ही एक हिंदी फिल्म आई गाँधी टू हिटलर‘. आपने देखी? क्या आपके नाटक से इसकी कुछ  समानता है?  
फ्रैंक हुजुर: मेरे नाटकहिटलर इन लव विथ मडोना’ का अभी आई फिल्म, गाँधी टू हिटलरमें एक जबरदस्त समानता तो है ही. हिटलर के दरबार में मेरे नाटक में आज के हिंदुस्तान के सियासत के सिकंदर है जबकि फिल्मवालों ने मेरे नाटक के सीन को अपने तरीके से अडजस्ट कर लिया है. हिटलर के ज़िन्दगी के और किरदार जैसे उनकी रात और दिन की मलिक्का एवा ब्राउन और गोएब्बेल्स को अपने तरीके से फूहड़ कॉमेडी बना दिया और गाँधी के चरित्र का भी अपमान किया है. गाँधी को ले आये. एक साहेब जो इस फिल्म के स्क्रीन राईटर की हैसियत रखते है ये वही हैं जिन्होंने सितम्बर १९९८ में मेरे नाटक का निर्देशन किया था. अमर्त्य बनर्जी साहेब भी थे. हिन्दू होस्टल के ये साहेब हमारे हरदिल अज़ीज़ सिनियर रहे हैं. पूरी दुनिया में ओरिजिनल आईडिया जो बीजहै, कॉन्सेप्ट है उसका खैरमकदम किया जाता है. जब बीज का इस्तेकबाल हम नहीं करेंगे तब एक दरख़्त में स्टेमऔर टहनियां और फूल कहाँ से खिलेंगे. पहली बार हिंदुस्तान की सरज़मीन पे हमने एक नाटक की रचना की जहाँ एक हिटलर का दरबार है और उसमे  हिटलर के नफरत और खून-खराबे के मंसूबों में यकीन करने वाले हिन्दुस्तानी सिपहसालारों को पेश किया. हमारे साहित्य में एक तो मूल कृति नाटकों में इतनी कम आ रही है, महेश दत्तानी के अलावा मोहन राकेश के बाद एक तरह से सूखा पड़ा हुआ है. ऊपर से असली प्लाट और आईडिया को मानने में इतनी दिक्कत. ये फिल्म इंडस्ट्री की पुरानी बीमारी है हिन्दुस्तान में. साहित्य के साथ हमेशा नाइंसाफी हुई है और इसका खामियाजा दोयम दर्जे की फिल्मों की सौगात है. पूरे मुल्क के दर्शकों का मानसिक विकास करने में बौलीवुड नाकामयाब रहा है. सिनेमा के आशिक सिनेमा बनाने के वक़्त सिर्फ चंद पैसों को लेकर अपने को हिचकॉक और स्टानले कुब्रिस और होवार्ड हघ समझने लगते है. जितना नुकसान बोलीवुड अपनी फूहड़ कहानियों से हिन्दुस्तानी समाज का करता आया है, खासकर औरत की जो उसने एक बाजारू कमोडिटी की तरह दोहन करने की ठान रखी  है, उसके लिए साहित्य और कला जगत के सिर्फ खातून ही नहीं आम दर्शक को सड़क पर आना चाहिए और एक आन्दोलन का रूप देना चाहिए. मैंने सिर्फ आईडिया के क्रेडिट की दरख्वास्त की थी मगर मुझे भरोसा देकर दगाबाजी की गयी. मुझे और किसी बात का क्षोभ नहीं है. मैं तो उम्मीद कर रहा था की फिल्म अच्छी बनेगी मगर आप सबके सामने है कि क्या होता है जब हम अपने सीडके साथ इन्साफ नहीं करते. अगर नाटक के स्क्रिप्ट को तरजीह दी गयी होती तो बोलीवुड एक दूसरा मुग़ल-ए-आज़म बना सकता है.  मेरे नाटक में मोहब्बत की पोएट्री है, सियासत का एक सफ़र है जिसमे पैगाम मोहब्बत और अमन का है और नशीली म्युजिक की रवानी है.
 
(३) इमरान खान पर आपकी किताब बहुत चर्चा में है. अगर एक लाइन में इमरान खान के व्यक्तित्व को डिफाइन करना हो तो आप क्या कहेंगे?
फ्रैंक हुजुर: इमरान खान की कहानी भी मेरे लिए एक अफसाना ही है जिसमे किरदार एक अज़ीम क्रिकेटर का है जो लड़कियों के दिलो पे दुनिया के हर कोने में राज करता रहा है. उसी खूबसूरती को प्लेबॉय इमरान अपना हथियार बनाकर खूब फंड की उगाही करता है और उसका उपयोग गरीबों के लिए अस्पताल और नयी पीढ़ी के लिए कॉलेज और युनिवर्सिटी बनाने में करता है. सियासत के मैदान में इमरान खान वो खिलाडी है जो अपने मायुस अवाम को जन्नत का ख्वाब दिखलाता है जब वो अमेरिका और वेस्ट के कल्चर को बुरा कहता है, मगर निकाह गोरी लड़की से ही करता है. एक लाइन में इमरान को मैं एक गेम्बलरकहूँगा, क्योंकि वो बाज़ीगर की तरह एक से ज्यादा मैदान में खेलता रहा है.
(४)  इमरान खान पर किताब का विचार कैसे बना?
फ्रैंक हुजुर: इमरान खान के क्रिकेट मैदान के कारनामों से मैं बचपन से ही हैरान था और जब उन्होंने सियासत में कदम बढ़ाये तब हमने लिखने के सफ़र का आगाज कर दिया था. उनके अदाओं का जलवा मेरे ऊपर हावी होता जब भी ख़बरों को मैं खूब शिद्दत से निहारता और तस्वीर बनाता हर उस वक़्त का जिसको इमरान जी रहे होते है. मैं हैरान होने लगता कि एक शख्स के ज़िन्दगी में कितने शेड्स है, कितने रंग है,  रेनबो की माफिक उसकी ज़िन्दगी के और हर रंग में कितनी रौशनी होती रही है. एक दिन और रात में वो शख्स हर मौसम को जी रहा होता. एक पोलिमाथ की तरह वो क्रिकेट पे भी बातें करता,  हॉस्पिटल में डॉक्टर और मरीजों के बीच होलीवुड और बॉलीवुड की हस्तियों को लेकर आता, प्रिंसेस डायना को लेकर फंड जमा करता है फिर भी उसे दुनिया में एक रंगीन-मिजाज़ प्लेबॉय कहा जाता. सियासत के मैदान में आने पे उसके नाजायज़ बेटी के होने की बात की जाती. मुझे लगा की मैं उसके ज़िन्दगी का एक स्टुडेंट हूँ और उसकी हर एक तारिख के लम्हों में जो अफ़साने है उसको दिलचस्पी से मैं अपने अल्फाजों में बयां कर सकता हूँ. सियासत की इमरान की पारी दमदार नहीं थी मगर मैंने सबसे कहा की उसकी गर्दिश के किस्से भी किस्से है और दुनिया को जानने का हक है. किताब का टाइटल इमरान वर्सेस इमरान- द अनटोल्ड स्टोरी  दिया गया क्योंकि मैं इमरान के अन्दर के इमरान की तफ्तीश कर रहा हूँ जहाँ उसकी अपनी ही एक छवि उसकी दुश्मन है, प्रतिद्वंदी है.
(५)  एक राज़ की बात बताइए आपने इमरान खान को इस किताब के लिए तैयार कैसे किया?
फ्रैंक हुजुर: इमरान खान को राज़ी करने का सफ़र एक अलहदा सफरनामा है और इस किताब को लिखने की कहानी अपने आप में खूब दिलचस्प गाथा है. इमरान को मैंने उनके अपनी ज़िन्दगी के छोटी से बड़ी अफसानों की बातें करके हैरान कर दिया. उनके और उनके कुछ दोस्तों और बहनोई जिनका नाम हाफिज़ है यकीं नहीं हो रहा था की पटना और बक्सर और रांची की गलियों में जवान हुआ एक हिन्दुस्तानी इतनी महारत रखता है इमरान के क्रिकेट के बाहर की ज़िन्दगी में. मैंने साफ़ लफ़्ज़ों में कहा की मैं एक सियासी सफ़र का गाथा लिखने आया हूँ,  न कि गोरी और बॉलीवुड की लड़कियों की आगोश में सरगोशी कर रहे एक प्लेबॉय की. ये अंदाज़ इमरान को भा गया तभी जाकर उन्होंने जेमिमा गोल्डस्मिथ तक को हिदायत दी की फ्रैंक से बात करनी है. जेमिमा ने अभी तक किसी भी हिन्दुस्तानी या पाकिस्तानी सहाफी या लेखक से अपने पाकिस्तान में बिताए ९ साल की ज़िन्दगी को शेयर नहीं किया था. इस किताब की वो एक जबरदस्त कड़ी बन गयी. इमरान के दिल में हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच के सियासी रंजिश का मैंने कोई असर नहीं देखा. उन्होंने मुझे खूब उत्साहित किया और फर्स्ट ड्राफ्ट के आने के बाद एक टीचर की तरह टिप्स दिए और अपने अमरीकी दोस्त तक को लिटररी गाइड करने को कहा. मैं जब आज इमरान को कहता हूँ की आपने अभी तक फास्ट गोलंदाज़ पैदा किये अपने मुल्क में, अपने एक लेखक को हिंदुस्तान में पैदा भी कर दिया है, तब वो खूब मुस्कुराते हैं. इमरान शायद ही कभी दिल खोल के ठहाके लगाके हँसते हैं. सीता वाईट वाले सिलसिले में उन्होंने मुझे कभी नहीं कहा की ये मत लिखो वो मत लिखो. कभी कभी मजाक में कहते की तू मेरे को मेरे सियासी दुश्मनों से मरवाएगा.  मैं कहता, ‘जनाब, आपको ब सीता वाईट के घोस्ट से खौफ नहीं होना चाहिए. पब्लिक मेमोरी इज शोर्ट इन हिंदुस्तान-पाकिस्तान. लोग-बाग़ आपके गोरी लड़कियों के साथ क़ी गयी जवानी के खेल पे खूब फक्र से बातें करते है और फिर आपने अब तो सारे मजहबी तंजीमो, जमात-इ-इस्लामी–से इत्तेहाद कर रखा है.
(६) आपने उनके जीवन से जुड़े विवादों के बारे में उनसे बात की थी?  मसलन यह कि उनके बारे में सरफराज नवाज़ ने बार-बार कहा कि वे पाकिस्तान क्रिकेट में ड्रग्स लेकर आये, उन्होंने कभी मानहानि का दावा नहीं किया?
फ्रैंक हुजुर: जब भी आप सरफराज का नाम इमरान के सामने गिराएंगे, उनके होठों में मुस्कराहट छा जाती है. उन्होंने मेरे को कहा की सरफराज के लिए उनके पास एक ही शब्द है, और वो है, ‘बेगैरत–जबकि वो सरफराज ही थे जिन्होंने इमरान को रिवर्स स्विंगकी रहस्मय कला में ट्रेन किया और तो और इमरान को लाहौर में बड़े होने के बाद भी पंजाबी जबान पे उतनी पकड़ नहीं थी. वो सरफराज ही है जिनकी मसालेदार पंजाबी को वो खूब सराहते है और कहते है कि सरफराज के पंजाबी चुटकुलों और मजेदार बातों को सुनकर ही उन्हें पंजाबी जबान में दिलचस्पी पैदा हुई. ड्रग्स की बातें इमरान के मुत्तालिक खूब इस्तेमाल करते रहे है, और ये हकीक़त भी है कि ये पठान अपने उरूज पे पोट स्मोकिंगका शौकीन रहा है जैसे बोथम करते रहे है और भी कुछ प्लेबॉय खिलाडी. मिरंजानी पहाड़ों के आगोश में वो खूब शूटिंगकरने के लिए बेताब रहे है और पेशावर के इन वादियों में अफीम का इश्क वैसी ही है जैसे हम लन्दन की सर्दियों में वाइन का सहारा लेते है या फिर थोडा कुछ और करने की कोशिश करते है. खेल के दौरान ड्रेसिंग रूम में धुंए उड़ने क़ी कई गाथाएँ तो खूब है. इमरान क़ी कप्तानी के दिनों में उनके होटल के कमरों में यूँही दाखिल नहीं हो सकता था. कोई न कोई गोरी हसीना उनके बाहों में उसी धुंए का दीदार कर रही होती और जब भी वो पाकिस्तान लौटे उन दौर में तो वो गोरी लड़की बदल जाती. रॉक स्टार मिक जैगर और बोन जोवी क़ी सोहबत में इमरान जैसे सितारे से सिर्फ दूध पीने क़ी उम्मीद रखके हम अपने साथ ज्यादती करेंगे. इल्जामों का कहर टूटता रहा है इमरान पे. कुछ साल पहले एक अमेरिकन लेखन ने दावा कर डाला था क़ी ऑक्सफोर्ड के दिन में इमरान और बेनजीर भुट्टो में सेक्स सम्बन्ध थे. इमरान ने मेरी किताब में उसे पूरी तरह काल्पनिक बताया. जब मैं उनके पार्टी के लड़कों से लाहौर में मिलत

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