ग़ैरपाठकों को भी पाठक बनाना मेरा उद्देश्य है- पंकज दुबे

बिहार-यूपी के किसी छोटे गाँव से सत्तू-अचार भरी पेटी लिए, अपने पिता से पाए गए आईएएस बनने के सपने के साथ अधिकतर लोग दिल्ली यूनिवर्सिटी पढ़ाई करने आते हैं। इनमें से बहुतों का एक निज़ी सपना होता है: एक दूधिया गोरी पंजाबी लड़की के साथ सोना। इसी प्लॉट पर लिखे गए उपन्यास के लेखक हैं पंकज दुबे, जो अपनी पहली ही किताब लूज़र कहीं का से ग़ैरपाठकों को भी पाठक बनाने की इच्छा रखते हैं। किताब का लोकार्पण आज यानी 19 जनवरी ‘14 को पिंक सिटी प्रेस क्लब, जयपुर में और 29 जनवरी 2014 को दिल्ली में होना है। पंकज को उनकी मुखौटा कहानी के लिए हिंदी अकादमी का नवोदित लेखक पुरस्कार भी मिल चुका है। फिलहाल, प्रस्तुत है पंकज दुबे से त्रिपुरारि कुमार शर्मा की बातचीत: जानकीपुल
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त्रिपुरारि कुमार शर्मा: लूज़र से लेखक तक का सफ़र कैसा रहा?
पंकज दुबे: मैं बड़ा कमजोर क़िस्म का स्टूडेंट रहा हूँ, लेकिन सपने बहुत देखता था। मुझे अपना नाम भी ऑर्डिनरी लगता था और इसीलिए मैं अपनी ज़िंदगी में सबकुछ एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी करना चाहता था। दिल्ली यूनिवर्सिटी (सत्यवती ईवनिंग) से ग्रेजुएशन करने के बाद मास्टर्स करने के लिए लंदन गया। वहाँ मैंने बीबीसी के काम किया। एक रात, घर लौटते हुए मैंने भीड़ देखी। पूछताछ करने पर पता चला कि हैरी पॉर्टर की नई सीरिज़ खरीदने के लिए लोग जमा हैं। दुकान तो सुबह 9 बजे खुलती है लेकिन किताबें जल्दी बिक जाती हैं, इसीलिए लोग रात के 2 बजे से ही लाइन लगाकर खड़े हो जाते हैं। यह बात सुनकर महसूस हुआ कि लेखक होना इतना भी बुरा नहीं है। फिर मैंने इस नॉवेल पर काम करना शुरू किया। …और इस तरह एक लूज़र, लेखक बन गया। (हाहाहाहा) 

त्रिपुरारि: यूनिवर्सिटी लाइफ़ पर ही किताब लिखने की कैसे सूझी?
पंकज: दिल्ली यूनिवर्सिटी का नॉर्थ कैम्पस एक ऐसी जगह है, जिसके हर एक कोने-कोने और ज़र्रे-ज़र्रे में मैं जवान हुआ। पहली बार आज़ादी का एहसास हुआ, सही मायने में। कोई रोक-टोक नहीं, जो मर्ज़ी हो करो। किसी को भी छेड़ सकते हैं। दोस्त भी बने। ऐसा लगा कि पुनर्जन्म हुआ है। यहाँ आकर आप ख़ुद अपना परिवार बनाते हैं और उसके सदस्य भी ख़ुद चुनते हैं। यही वो समय होता है, जब आपका व्यक्तित्व बनता है। आप भले यूनिवर्सिटी से निकल जाएँ, लेकिन यूनिवर्सिटी आपसे नहीं निकलती। हमलोग अभी मुम्बई में बैठे हैं, मगर मुमकिन है हम यहाँ नहीं हो। हम कॉलेज में हों, जो हमारी ज़िंदगी का ऐसा हिस्सा है, जिससे हम बाहर निकलना भी नहीं चाहते। इसीलिए मैंने सोचा कि क्यों न यूनिवर्सिटी लाइफ़ पर किताब लिखी जाए।

त्रिपुरारि: अपने लेखन को दूसरे लेखक से कैसे अलग मानते हैं?
पंकज: मुझे पढ़ना बिल्कुल पसंद नहीं है…और बचपन में जाने कहाँ से एक बात मेरे मन में घर कर गई। बात यह थी कि दूसरों को पढ़ने से प्रभावित होने का खतरा रहता है। मैं कुछ भी पढ़ता था, बहुत बोर फील होता था। अकादमिक पढ़ाई में भी मैं उतना ही पढ़ता था ताकि पास हो सकूँ, अगली क्लास में जा सकूँ। मोहम्मद अज़हरुद्दीन की तरह, जिनका प्रदर्शन बहुत अच्छा तो नहीं होता था मगर हर मैच में इतना रन बना लेते थे कि उन्हें अगले मैच में खेलने दिया जाता था। मेरी दिलचस्पी वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ,पब्लिक मीटिंग, क्रिएटिव रायटिंग आदि में थी। …अब मैंने कभी पढ़ाई तो की नहीं…तो यह भी नहीं पता कि दूसरे लेखक कैसा लिखते थे या हैं?

त्रिपुरारि: …जब आपको पढ़ना पसंद नहीं, तो लोगों से अपनी किताब पढ़ने की उम्मीद कैसे?
पंकज: जब मैंने लिखना शुरू किया तो बस एक बात मन में थी कि आख़िर मैं क्यूँ नहीं पढ़ता था। मुझे लगा, वे किताबें बहुत बोझिल थीं। इसीलिए भी ख़ुद लिखते समय मैंने बहुत साधारण भाषा का प्रयोग किया। जो दिल में आया, लिखता गया। मैं चाहता हूँ कि दुनिया भर में लोग सिलेबस से इतर जो पहली किताब पढ़ें, मेरी किताब पढ़ें। ऐसे लोग,जो नहीं पढ़ते। जिन्हें मेरी तरह प्रभावित होने का खतरा लगता है। समाज का ऐसा वर्ग है, जो बोझिल होने के कारण किताबें नहीं पढ़ता। मैंने उनके लिए लिखा। मेरा ही एक ही उद्देश्य है— ग़ैरपाठकों को भी पाठक बनाना।

त्रिपुरारि: हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में एक साथ किताब प्रकाशित होने के पीछे क्या कारण है?
पंकज: मेरी स्थिति एक ऐसे आदमी की तरह है, जिसे दो लड़कियों से बराबर का प्यार हो गया है। दोनों उतनी ही ख़ूबसूरत लगती हैं। इंटेलिजेंट, ब्यूटिफुल, सेक्सी। लेकिन हमारे यहाँ एक शादी करने की परम्परा है। यह अच्छा है कि साहित्य में ऐसा नहीं है। मुझे दोनों भाषाओं से प्यार है। मेरी पढ़ाई की भाषा अंग्रेज़ी है, पर सोचने की भाषा हिंदी है। मेरे सपने में अगर एंजेलिना जोली आती है, तो वो भी हिंदी में बात करती है। काम हिंदी में करता हूँ, पैसे अंग्रेज़ी में माँगता हूँ। बाज़ार में काम की भाषा हिंदी है,पर निगोसिएशन की भाषा अंग्रेज़ी है। दोनों भाषाओं में मेरे बहुत से दोस्त हैं। हिंदी भाषा बोलने वाली लड़कियाँ भी अंग्रेज़ी बोलने वाली की तरह हॉट एण्ड हैप्निंग हैं। इसीलिए दोनों भाषाओं में किताब आई।

त्रिपुरारि: …तो आपका टारगेट रीडर कौन है?
पंकज: बहुत से लेखक हैं, जिनकी किताब एक भाषा में आती है और फिर दूसरी भाषाओं में ट्रांस्लेशन होता है। इस दौरान भाषा का लुत्फ़ कहीं न कहीं खो जाता है। क्योंकि जो हास्य और व्यंग्य है, उसको आप अनुवाद में नहीं ढाल सकते। मैं हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में लिख पाने में सक्षम हूँ, इसलिए दोनों भाषाओं में लिखता हूँ। आगे भी लिखता रहूंगा। इसी किताब की बात करें, तो दोनों भाषाओं में शिल्प अलग है। इससे मेरे रीडर्स का दायरा बढ़ जाता है। हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं के रीडर मुझे ऑरिजनल पढ़ सकते हैं।
  
त्रिपुरारि: आगे की योजना?
पंकज: लूज़र की यात्रा अभी ख़त्म नहीं हुई है। लूज़र कहीं का: पार्ट—2 और पार्ट—3 आना है। उन किताबों में कुछ नए कैरेक्टर्स जुड़ेंगे। आगे की कहानी होगी।

त्रिपुरारि: सुना है इस नॉवेल पर आप फ़िल्म भी बना रहे हैं? तो क्या इस तरह के सब्जेक्ट पर फ़िल्म कॉमर्सियल हिट होगी?
पंकज: हिट ही नहीं, सुपर हिट होगी। दरअसल, मैं फ़िल्म बनाने से पहले यह देखना चाहता था कि लोग इस विषय पर लिखी गई किताब को कितना पसंद करते हैं। अब तक 8000 कॉपियाँ बिक चुकी हैं। रोहित सेठ्ठी की फ़िल्म की तरह यह किताब बिक रही है। मैं बहुत उत्साहित हूँ। फ़िल्म की पटकथा पूरी हो चुकी है। मार्च तक किताब का प्रोमोशन कम्पेन ख़्त्म होगा फिर फ़िल्म में लग जाऊँगा।

त्रिपुरारि: पुरस्कार आदि के बारे में क्या सोचते हैं?

पंकज: पुरस्कार हमेशा तकलीफ देता है। क्योंकि कुछ सीमित संस्थाएँ हैं जो पुरस्कार देती हैं और उसके पीछे भी एक अलग राजनीति है। जितनी ऊर्जा मैं एक पुरस्कार पाने में लगाता हूँ, उतनी ऊर्जा और उतने समय में एक नई किताब मैं लिख सकता हूँ। भारत रत्न पाकर भी मुझे वो खुशी नहीं होगी, जो सत्यवती ईवनिंग कॉलेज में पढ़ते हुए 912 नम्बर की बस में स्टॉफ चलाकर हासिल थी। पुरस्कार मिले तो स्वागत, नहीं मिले तो भी अच्छा। दरअसल, मुझे यह यात्रा पसंद है। आप एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं। लोगों से मिलते हैं। आसली पुरस्कार आपको पाठक ही देते हैं। मुझे खुशी है कि लोग मेरी किताब खरीद रहे हैं। यही मेरा पुरस्कार है।  

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