मोदी के तिलिस्म के आगे और पीछे

 ब्रांड मोदी का तिलिस्म: बदलाव की बानगीधर्मेन्द्र कुमार सिंह की यह कितान बहुत सही टाइम पर आई है. मोदी सरकार के दो साल पूरे होने का जश्न मनाया जाने वाला है. दूसरी तरफ अभी पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे आये हैं. भाजपा ने असम में पहली बार बहुमत हासिल किया है. इन नतीजों को एक तरफ चार राज्यों में भाजपा की हार के रूप में देखा जा रहा है तो दूसरी तरफ भाजपा समर्थक असम में भाजपा की जीत को ब्रांड मोदी के जादू को बरकरार रहने के रूप में देख रहे हैं. 2014 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा की दिल्ली और बिहार के विधानसभा चुनावों में हुई हार के बाद असम की यह जीत निश्चित रूप से भाजपा के लिए सकारात्मक है.
बहरहाल, धर्मेन्द्र कुमार सिंह की यह किताब मूल रूप से 2014 में भाजपा को मिली भारी जीत के कारणों और उसके परिणामों के विश्लेषण की एक बेहतर कोशिश है. जबसे भाजपा की सरकार केंद्र में आई है उसके कारणों के विश्लेषण को लेकर काफी कुछ लिखा जा चुका है. धर्मेन्द्र कुमार सिंह ने लिखा है कि मोदी के नेतृत्व ने भाजपा को पहली बार न केवल पूर्ण बहुमत दिलवाया बल्कि भाजपा के आधार को भी ब्राह्मण, बनिया, पंजाबी से आगे निकलकर पिछड़ी जातियों, आदिवासी और दलित जातियों तक में फैलाया है. लेकिन यह सवाल है कि यह आधार कितने दिन तक टिका रहेगा? लेखक का यह कहना वाजिब है कि पहले भी चमत्कारिक चुनावी सफलता हासिल करने वाली सरकारें अपने आधे कार्यकाल में जाकर लोगों की नजरों से उतरने लगी हैं. 1984 में राजीव गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को इससे भी भारी सफलता मिली. लेकिन दो-ढाई साल में ही जनता का उससे बुरी तरह से मोहभंग होने लगा था. जो सरकारें बहुत उम्मीदों को जगाकर आती हैं, वह अक्सर सबकी उम्मीदों को पूरा नहीं कर पाती हैं.
लेखक ने इस पुस्तक में उस पृष्ठभूमि को भी समझने-समझाने की कोशिश की है कि 2014 में इतना बड़ा बदलाव आखिर क्यों हुआ? उसके क्या कारण थे? कांग्रेस सरकार के दस साल के कामकाज को जनता ने इतनी बुरी तरह क्यों नकारा? लेखक ने लिखा है कि देश के हर मतदाता वर्ग का कांग्रेस से मोहभंग हो चुका था. देश की जनता भ्रष्टाचार, महंगाई से त्रस्त थी. यही कारण है कि आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी की पहली बार इतनी बुरी हार हुई. दूसरी तरह, देश में 65 प्रतिशत युवा मतदाता थे जिनको मोदी की निर्णायक नेता की छवि आकर्षित कर रही थी.
पुस्तक बिहार चुनावों में भाजपा की बुरी तरह हुई हार के विश्लेषण के साथ समाप्त हो जाती है. हालाँकि अभी जब मैं यह समीक्षा लिख रहा हूँ तो असम की जीत के बाद यह नहीं कहा जा सकता है कि मोदी का तिलस्म पूरी तरह से टूट चुका है. इस जीत से उनको एक संजीवनी मिल गई है. वे अभी भी भाजपा के पोस्टर बॉय बने हुए हैं और इस जीत से उनको और मजबूती ही मिलेगी.
बहरहाल, इस किताब में कोई भी बात नई नहीं है. जब से मोदी केंद्र की सत्ता में काबिज हुए हैं उनको लेकर किसी न किसी रूप में इस तरह के विश्लेषण किये जाते रहे हैं. लेकिन इस किताब की टाइमिंग सही है. कम से कम इस किताब ने एक काम तो किया ही है कि मोदी के करिश्मे को लेकर लोगों को पुनर्विचार के लिए प्रेरित करेगा.

वाणी प्रकाशन से आई इस किताब का गेटअप बहुत आकर्षक है. हिंदी के प्रकाशक अब पैकेजिंग का महत्व समझने लगे हैं. इसके लिए लेखक के साथ साथ प्रकाशक को भी साधुवाद! 

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