जिंदगी अपनी जब इस रंग से गुजरी ‘ग़ालिब’

मौलाना अल्ताफ हुसैन ‘हाली’ की किताब ‘यादगारे ग़ालिब’ को ग़ालिब के जीवन और उनकी कविता पर लिखी गई आरंभिक किताब में शुमार किया जाता है. हाली ने १८५४ से १८६९ तक यानी उनके जीवन के आखिरी दौर तक को बहुत करीब से देखा था. इसी कारण ‘यादगारे ग़ालिब’ को महत्वपूर्ण किताबों में शुमार किया जाता है. इसी कारण १८९७ में प्रकाशित इस किताब को आज तक याद किया जाता है. आज ग़ालिब की सालगिरह के अवसर पर उसी किताब का एक अंश, जिसका संबंध ग़ालिब के जीवन के अंतिम दिनों से है- जानकी पुल.
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मौत की आरज़ू

मिर्ज़ा या तो इस कारण, कि उनकी जिंदगी मुसीबतों और कठिनाइयों में गुजरी थी, या इसलिए कि उन पर कठोर परिस्थितियों का बहुत ज्यादा असर होता था, आखिरी उम्र में मौत की बहुत आरज़ू किया करते थे. हर साल अपनी मौत की तिथि निकालते और सोचा करते कि इस साल ज़रूर मर जाऊंगा. १२७७ हिजरी में उन्होंने अपने मरने की तारीख यह कही कि – ‘ग़ालिब मुर्द’(यानी ग़ालिब मर गया. ‘ग़ालिब मुर्द’ के अक्षरों का संख्यावाची योग १२७७ होता है.). इससे पहले की अनुमानित तिथियाँ गलत हो चुकी थीं. मुंशी जवाहर सिंह जौहर, जो मिर्ज़ा के खास दोस्तों में थे, उनसे मिर्ज़ा साहब ने इस अनुमानित तिथि का ज़िक्र किया. उन्होंने कहा, ‘हज़रत, इंशाअल्लाह यह अनुमान भी गलत साबित होगा’. मिर्ज़ा ने कहा, ‘देखो साहब, तुम ऐसी बुरी बात मुंह से न निकालो, अगर यह अनुमान सही न निकला तो मैं सर फोड़कर मर जाऊंगा.’
एक दफा शहर में सख्त महामारी पड़ी. मीर मेहदी हुसैन ‘मजरूह’ ने पूछा कि ‘हज़रत, महामारी शहर से भाग गई या अभी तक मौजूद है?’ उसके जवाब में लिखते हैं, ‘भई, कैसी महामारी! जब एक सत्तर बरस के बुड्ढे और एक सत्तर बरस की बुढिया को न मार सके तो ऐसी महामारी पर धिक्कार!’
इसी तरह की और बहुत सी बातें तथा किस्से उनके बारे में मशहूर हैं, जिनसे अंदाजा हो सकता है कि वे आखिरी उम्र में किस कदर मरने के इच्छुक थे!
आखिरी उम्र के हालात
मरने से कई बरस पहले से चलना-फिरना बिलकुल बंद हो गया था. प्रायः चारपाई पर पड़े रहते थे. खाते-पीते कुछ नहीं थे. छः-छः, सात-सात दिनों में पाखाना होता था. पाखाने की चौकी पलंग के पास ही थोड़े से ओट में रखी हुई थी. जब हाजत मालूम होती थी तो पर्दा कर दिया जाता था. वे किसी नौकर-चाकर के सहारे के बिना ही, कपड़े उतार कर, बैठे-बैठे खिसकते हुए चौकी तक पहुँचते थे. पलंग से चौकी तक जाना, चौकी पर चढ़ना, वहां देर तक बैठे रहना और फिर चौकी से उतरकर पलंग तक आना- एक बड़ी मंजिल तय करने के बराबर था. मगर इस हालात में भी पलंग पर पड़े-पड़े ही खतों के जवाब बराबर लखते रहते थे, या किसी दूसरे आदमी को बताते जाते थे, वह लिखता जाता था. मरने से चंद रोज पहले बेहोशी तारी हो गई थी. पहर-पहर, दो-दो पहर के बाद चंद मिनट के लिए होश आ जाता था, फिर बेहोश हो जाते थे. मृत्यु से शायद एक दिन पहले मैं उनको देखने के लिए गया था; उस वक्त कई पहर के बाद होश आया था और वे नवाब अलाउद्दीन अहमद खान के खत का जवाब लिखवा रहे थे. उन्होंने लोहारू(जगह का नाम) से हाल पूछा था, उसके जवाब में एक फिक्र और एक फ़ारसी शेर, जो संभवतः शेख सादी का था, लिखवाया. फिकरा यह था कि ‘मेरा हाल मुझसे क्या पूछते हो, एकाध रोज में दोस्तों से पूछना.’ और शेर का पहला मिसरा मुझे याद नहीं रहा, दूसरा मिसरा यह था-
न कर्द-हिज्र मदारा बमन सरे तू सलामत’ अर्थात वियोग ने मेरे टुकड़े कर दिए हैं, तेरा सिर सलामत रहे.
आखिर जीकाद हिजरी १२८५ की दूसरी और फरवरी १८९६९ की पंद्रहवीं तारीख को ७३ बरस और चार महीने की उम्र में वे दुनिया से कूच कर गए और दरगाह हजरत सुलतान निजामुद्दीन कुद्सुस्सरा में, अपने ससुर के मज़ार की बगल में दफ़न किये गए. उनकी मृत्यु की तारीखें, जो मुद्दत तक हिन्दुस्तान के उर्दू अखबारों में छपती रही, वे गिनती के बाहर हैं. सिर्फ एक तारीख, जिस पर दस-बारह लोग सहमत हुए, याद रखने के काबिल है. यानी ‘आह ग़ालिब बमुर्द’(१२८५ हिजरी) जिसको विभिन्न लोगों ने अलग-अलग ढंग से कतओं में व्यक्त किया था. तारीखों के अलावा मिर्ज़ा कुर्बान अली बेग ‘सालिक’, मीर मेंहदी हुसैन ‘मजरूह’ और इस किताब के लेखक ने उर्दू में तथा मुंशी हरगोपाल ‘तुफ्ता’ ने फ़ारसी में मिर्ज़ा के मर्सिये भी लिखे थे, जो उसी ज़माने में छपकर प्रकाशित हो गए थे.
जनाजे की नमाज़
मिर्ज़ा के जनाजे पर, जबकि देहली दरवाज़े के बाहर नमाज़ पढ़ी गई, इस किताब का लेखक भी मौजूद था, तथा शहर के अधिकांश प्रतिष्ठित और गणमान्य लोग भी- जैसे, नवाब जियाउद्दीन अहमद खान, नवाब मोहम्मद मुस्तफा खान, हकीम अहसानुल्लाह खान, आदि-आदि और बहुत से अहले सुन्नत तथा इमामिया दोनों संप्रदाय के लोग उनकी अंतिम यात्रा में सम्मिलित हुए थे.
बख्शी महमूद खान के पौत्र सैयद सफ़दर सुलतान ने नवाब जियाउद्दीन अहमद खान से कहा कि ‘मिर्ज़ा साहब शिया थे; हमको इसकी इजाजत हो कि हम अपने तरीके के अनुसार उनका कफ़न-दफ़न करें.’ मगर नवाब साहब नहीं माने और तमाम रस्में अहले-सुन्नत के अनुसार अदा की गईं. इसमें शक नहीं कि नवाब साहब से ज्यादा अन्य कोई भी व्यक्ति उनके वास्तविक धार्मिक विचारों से परिचित नहीं हो सकता था, मगर हमारे ख़याल से बेहतर यह होता कि शिया और सुन्नी दोनों मिलकर या फिर अलग-अलग उनके जनाजे की नमाज़ पढते और जिस तरह से जिंदगी में उनका बर्ताव सुन्नी और शिया दोनों के साथ समान रहा था, उसी तरह मरने के बाद भी दोनों संप्रदाय अपने-अपने ढंग से उनकी अंतिम रस्में अदा करते.           

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