क्यों राज्यसभा में ऐसी निष्क्रियता छाई है?

महान आधुनिक ग्रीक कवि कॉन्स्टेनटीन कवाफी की कविताओं के सम्मोहक आकर्षण ने यायावर कवि, ‘कलाबाज़’ पीयूष दईया को अपनी ओर खींचा. उन्होंने उनका हिंदी में अनुवाद किया. यात्रा बुक्स ने उसे संकलन का रूप देकर प्रकाशित किया. इस तरह एक सुन्दर पुस्तक आई- ‘माशूक’. प्रस्तुत हैं उसी संकलन से कुछ कविताएँ- जानकी पुल.
१.
जाहिलों-जालिमों के इंतज़ार में
सभाचौक में इकठ्ठा हुए, हम किसका इंतज़ार कर रहे हैं?
जाहिलों-जालिमों को आज हाज़िर-नाज़िर होना है यहां.
क्यों राज्यसभा में ऐसी निष्क्रियता छाई है?
वहां सब यों ही बैठे हैं, क्यों नहीं बना रहे कोई क़ानून?
आज आने वाले हैं जाहिल-ज़ालिम क्योंकि.
अब सभासदों के क़ानून बनाने की झंझट मोल लेने में क्या तुक?
एकबार आ जाएँ जाहिल-ज़ालिम यहां, वे बना लेंगे क़ानून भी.
आज हमारे बादशाह इतने मुँह अँधेरे कैसे उठ गए,
और वे सिंहासनारूढ़ क्यों हैं नगर के मुख्यद्वार पर,
तिलक लगाये, पहने मुकुट?
क्योंकि आज आने वाले हैं जाहिल-ज़ालिम
और बादशाह इंतज़ार में हैं उनके सरदार को लिवाने 
तैयार किया गया एक खरीता भी है उनके पास
बतौर अभिनंदन-पत्र: हर तरह की उपाधियों
और ऊंचे सम्मानों से विभूषित.
क्यों आज हमारे दो राजदूत और अंगरक्षक बाहर आये हैं
लाल जरी के काम वाली अपनी राजसी वेशभूषा धारे?
क्यों उन्होंने इतने याकूत परतदार कड़े पहने हैं,
और पन्नों जड़ी हीरे की अंगूठियां?
क्यों वे सोने-चांदी के मूठ वाली लुभाती कीमती छडियां लिए हैं?
क्योंकि आज आने वाले हैं जाहिल-ज़ालिम
और उन्हें इस तरह की चीज़ें सचमुच चौंधिया देती हैं.
क्यों नहीं हमारे माननीय भाषनकर्ता आगे आ कर
भाषण देते हमेशा जैसे, बोलते वह जो उन्हें बोलना है?
क्योंकि आज आने वाले हैं जाहिल-ज़ालिम
और उन्हें सार्वजनिक बोझिल भाषणबाजी से ऊब लगती है.
क्यों यह भगदड़ सहसा, असमंजस यह?
(कितने संजीदा हो उठे हैं लोगों के चेहरे)
क्यों सड़कों और चौराहे खाली होने लगे हैं इतनी तेज़ी से,
हर कोई चल पड़ा है अपने घर मुँह लटकाए?
क्योंकि रात उतर आई है पर जाहिल ज़ालिम नहीं आये
और सरहद से आये अभी कुछ लोग हमारे दावा करते हैं
कि नहीं है वहां कोई जाहिल-ज़ालिम विद्यमान.
अब हमारा क्या बनेगा बिना जाहिलों-जालिमों के?
वे होते, लोग वे, एक तरह का निदान.
२.
जनवरी: 1904
आह, ये जनवरी की रातें
जब मैं बैठकर रचता हूँ फिर से
उन घड़ियों को जिनमें मैं मिला तुमसे,
और सुनता हूँ हमारे आखिरी शब्द और शुरु के.
ये जनवरी की रातें लाइलाज
जब मैं नयनहीन और अकेला होता हूँ
कितने अधीर हो यह बिछडती है, चांप लेती
सारे पेड़, सारी गलियां, सारे मकान, सारी रोशनियाँ;
तुम्हारा कामुक रूप मिटा हुआ और खोया हुआ.
3.
उकताहट
एक ऊबाने वाला दिन लाता है दूसरा
बिलकुल वैसा ही उबाऊ. एक सी चीज़ें
घटेंगी- वे घटेंगी फिर-
वही घड़ियाँ हमें पाती हैं और छोड़ देती हमें.
गुजरता है महीना एक और दूसरे में आता.
कोई भी सरलता से भांप ले सकता है घटनाएँ आने वाली;
वे वही हैं बीते दिन की बोझिल वाली.
और खत्म होता है आने वाला दिन बिना एक आने वाला कल लगे.
4.
आवाजें
मुकम्मल और महबूब आवाजें
उनकी जो मर चुके हैं, या उनकी
जो खो गए हैं मृतकों जैसे हमारे लिए.
कभी-कभार ख्वाबों में वे हमसे बोलते हैं,
कभी-कभार ख्यालों में मं उन्हें सुनता है.
और उनके स्वर से क्षण भर को लौटते हैं
दूसरे स्वर हमारे जीवन के पहले काव्य से—-
संगीत जैसे जो बुझा देता है दूर पड़ी रात.
5.
जिस्म, याद करो
जिस्म, याद करो न केवल यह कि कितना भोग गया तुम्हें
न केवल उन शय्यायों को जिन पर तुम सोये,
बल्कि उन रागदीप्त इच्छाओं को भी जो बिंदास थीं उन
आँखों में जिन्होंने तुम्हें देखा,
लरजती तुम्हारे लिए आवाजों में—
फकत कुछ अनपेक्षित अडचनों ने उन्हें फलने नहीं दिया.
कि अब यह सब ज़माना पहले में है,
ऐसा मालूम पड़ता है गोया नज़र कर दिया था तुमने
अपने को लगभग उन हसरतों में- कैसे वे हुई थीं दीप्त,
याद करो, निगाहों में जिन्होंने लिया था तुम्हें,
याद करो जिस्म, कैसे वे थरथराई थीं तुम्हारे लिए उन आवाजों में.
6.
काम-विलास से
मेरे जीवन की खुशी और खुशबू: उन घड़ियों की याद
जब मैंने पाया और भोगा काम-विलास बिलकुल वैसे जैसे चाहा था मैंने.
मेरे जीवन की खुशी और खुशबू: कि मैंने खारिज कर दिया
रोजमर्रे की सारी दस्तूरी उल्फतों को.

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