मुस्कुराइए कि आपके आ गए दिन अच्छे

नीलिमा चौहान को हम सब भाषा आन्दोलन की एक मुखर आवाज के रूप में जानते-पहचानते रहे हैं. लेकिन उनके अंदर एक संवेदनशील कवि-मन भी है इस बात को हम कम जानते हैं. उनकी चार कविताएँ आज हम सब के लिए- मॉडरेटर 
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स्माइल  अंडर  सर्विलेंस
मुस्कुराइए कि आप
अंडर सर्विलेंस हैं
मुस्कुराइए कि आपके नहीं
पड़ोस में पड़ा है डाका
मुस्कुराइए कि आज नहीं
कम से आज नहीं होगा फाका
मुस्कुराइए कि आज भी बेटी
ठीक ठाक लौट आई है घर
मुस्कुराइए कि कानून की आप पर
अभी पड़ी नहीं है नज़र
मुस्कुराइए कि आपके साथ
अभी नहीं हुई कोई ट्रैजेडी नीच
मुस्कुराइए कि आपके
हैं नेता आपके बीच
मुस्कुराइए कि बगल का नामी लठैत
संसद में विराजमान है
मुस्कुराइए कि एक पुर्जे पर ‘आधारित’
आपका सम्मान है
मुस्कुराइए कि आप
नागरिक हैं सच्चे
मुस्कुराइए कि आपके
आ गए दिन अच्छे
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देवता के विरुद्ध

मेरी आस्था ने गढ़े देवता
विश्वासों ने उनको किया अलंकृत
मेरी लाचारगी के ताप से
पकती गई उनकी मिट्टी
मेरे स्मरण से मिली ताकत से वे
जमते गए चौराहों पर
मैंने जब जब उनका किया आह्वान
आहूत किया यज्ञ किये
रक्तबीज से उग आए वे यहां वहां
काठ में, पत्थर में,  पहाड़ में,  कंदराओं में
मेरे वहम ने उनकी लकीरों को
धिस धिस कर किया गाढ़ा
मेरे अहं ने भर दिया
असीम बल उसके बाहुओं में,
मुझे दूसरे के देवता पर हँसी आती
मुझे हर तीसरे की किस्मत पे आता रोना
मुझे सुकून मिलता अपने देवता के
पैदा किए आतंक से

एक देवता क्या गढ़ा मैंने
मैं इंसान से शैतान हो गया
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मैंने नहीं चुना

मैंने अपना देश नहीं चुना
मैंने अपना राज्य नहीं चुना
,मैंने नहीं चुनी अपनी जाति,
मैंने अपना रंग-रूप नहीं चुना,
मैंने नहीं चुना अपना वर्ग ,
मैंने नहीं चुनी अपनी माँ,
मैंने नहीं चुना अपना धर्म अपना देवता
और मैंने अपना नेता भी नहीं चुना।

मैं चुना जाता रहा
जबकि मैंने अपना
होना या न होना तक नहीं चुना
जैसे चुनने का अधिकार
सिरे से नहीं था पास मेरे 
वैसे ही न चुनने की भी सहूलियत
कभी नहीं थी पास मेरे
मेरा  मैं एक भुलावा
मेरा सच बस चयनहीनता 
मैं सच के समीकरणों का
एक  संज्ञाहीन झूठा परिणाम
तयशुदा नितयि  का
हास्यास्पद अंजाम
दुनिया  के सब सचों  की फेहरिस्त में
एक चीज़ जो थी बेमानी और नामहीन
थी अपवाद्ग्रस्त और थी झूठ
वो मैं ही तो था,  मैं ही तो वह था
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एक  पुड़िया  आजादी  फ्री
और एक  पुड़िया  आजादी 
मिलना जैसे
चकलाघर से  छूटी लड़कियां
लौटी हों अपने गांव
मांगना जैसे
ऊपरवाले से वरदान
खोजना तलाशना जैसे
खोयी हुई बच्चियों का इश्तिहार
खरीदना  कुछ  न  कुछ  बेचकर
जैसे गरीब का ज़ेवर
उधार लेना 
जैसे कर्ज
संभलकर बरतना
जैसे  हो फर्ज
लूटना

जैसे ईमान
एस ओ एस इस्तेमाल
जैसे हो दवा
हाथ कहां  आती  है
जैसे हो हवा

कागज नारों में सभाओं  में
बोलने में सुनने  में 
भारततंत्र में कॉपीराइट मुक्त शब्द
गरीब गंवार आवाम के लिए

एकदम फ्री फ्री फ्री!!!

संपर्क- neelimasayshi@gmail.com

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