वे साहित्येतर दबाव क्या थे आखिर?


युवा लेखिका ज्योति कुमारी का ईमेल मुझे कल प्राप्त हुआ. मैंने इसके बारे में राजकमल प्रकाशन से स्पष्टीकरण लेने की कोशिश की जो देर रात तक मुझे नहीं मिल पाया. मुझे लगा कि एक लड़की साहस के साथ सामने आकर कुछ ऐसी बातें कह रही है जो लेखन-प्रकाशन जगत के लिए अशोभनीय हैं. मैं बार-बार यह सोचता रहा कि आखिर वे साहित्येतर दबाव क्या थे जिनकी वह अपने इस छोटे से पत्र में बार-बार चर्चा कर रही है. यह हिंदी प्रकाशन जगत का अँधेरा कोना है. इसके ऊपर कोई चर्चा करना चाहे तो हम उसका स्वागत करेंगे. राजकमल प्रकाशन की ओर से स्पष्टीकरण आए तो उसका भी स्वागत. फिलहाल, ज्योति कुमारी का पत्र- प्रभात रंजन
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आज दिनांक (7 फरवरी 2013)के जनसत्ताअखबार के कॉलम दिल्ली में  सभा-संगोष्ठी के अंतर्गत छपा है कि राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित तीन लेखिकाओं की किताब का लोकार्पण शाम छह बजे होना है। इन तीन लेखिकाओं मे मेरा भी नाम है। जो गलत है।
मेरी किताब राजकमल प्रकाशन से नहीं बल्कि वाणी प्रकाशन से प्रकाशित हुई है और इसका लोकार्पण आज नहीं,कल आठ फरवरी २०१३ को है। वह भी वाणी प्रकाशन के स्टाल पर। राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशन समाचार में भी पेज नं.-10 पर तीन युवा लेखिकाओं के कहानी संग्रह के अंतर्गत ‘शरीफ लड़की’ नाम से मेरी किताब का नाम और मेरी किताब के लिए राजेन्द्र यादव जी द्वारा लिखी गई भूमिका छापी है।

मैं स्पष्ट कर दूँ। कि मेरे किताब जो कहानी संग्रह है का नाम शरीफ लड़की न हो कर ‘दस्तख़त और अन्य कहानियाँ’ है। शरीफ लड़की इस संग्रह की पहली कहानी है। राजकमल प्रकाशन मेरी किताब प्रकाशन करने को तत्पर थे। परन्तु पुस्तक के नाम तथा निम्नलिखित मुद्दो के कारण मैने किताब प्रकाशित करने की उन्हें अनुमति नहीं दी। जिन मुद्दों पर हमारी सहमति नहीं बन पा रही थी उनमें प्रमुख हैं- श्री अशोक माहेश्वरी का कहना था कि ज्योति कुमारी नाम बहुत पुराने स्टाईल का है। इसे मॉडर्न टच देने के लिए ज्योति श्री नाम रखा जाए।

कहानी संग्रह का नाम दस्तख़त और अन्य कहानियां की जगह शरीफ लड़की रखा जाए। राजेन्द्र यादव की भूमिका से चार-पाँच पंक्तियां और नामवर जी की लिखी भूमिका से एक पंक्ति ही छापी जाए। नामवर जी की पंक्ति फ्रंट कवर व राजेन्द्र यादव जी की बैक कवर पर।

कुछ अन्य साहित्येतर दबाव- मेरा नाम ज्योति कुमारी है। मैं नाम को नया आयाम देने के बजाय अपनी सोच,और अपने लेखन को नया आयाम देने में यकीन रखती हूँ। दूसरी अहम बात, अशोक माहेश्वरी जी का कहना था यह नाम लोगों की जुबान पर नहीं चढ़ता। एकदम से मेमोराइज नहीं होता। मेरा मानना है कि मेरा लेखन लोगों की जुबान पर चढ़े। मन-मस्तिष्क पर छा जाए तो मेरी सफलता है। नाम याद रहे,न रहे…।

तीसरी बात,शादी के बाद हमारे यहाँ लड़की को नाम बदलना पड़ता है। अब कुछ लड़कियाँ इस तरह पहचान बदलने या खोने का विरोध कर रही हैं। हम लेखन के जरिये अपने ऐसे ही विरोधों को वाणी दे रही हैं जो हमारे सामने पहचान का संकट खड़ा करती हैं। अब यहाँ भी वही सब। यह मुझे मंजूर नहीं। शरीफ लड़की भी मेरी ही लिखी कहानी है और दस्तख़तभी। मुझे दोनों में से किसी भी कहानी से गुरेज नहीं है। लेकिन शरीफ लड़कीनाम रखने के पीछे जो राजकमल के तर्क था। उससे मैं बिल्कुल सहमत नहीं थी। राजकमल का कहना था कि शरीफ लड़की नाम सेलेबल है। मेरा लेखन हमेशा उस बाजारवाद के खिलाफ रहा है जो जरूरत नहीं,जेब देखकर तय होता है। जो औरत को एक उत्पाद,एक प्रेजेंटेशन की तरह पेश करता है,अपने लाभ के लिए। तो सिर्फ इसलिए कि किताब की बिक्री में यह नाम सहायक होगा या इस नाम हो सेंसेशन फैलेगा जो बाजार के दृष्टिकोण से लाभदायक है, मैं संग्रह के इस नाम पर सहमत नहीं हो सकी। सिर्फ सेंसेशन फैलाना नहीं,मौन विद्रोह को मुखर अभिव्यक्ति देना मेरे लेखन का मकसद है।

राजेन्द्र यादव जी और नामवर जी की मेरी कहानियों को लेकर प्रतिक्रिया मेरे लिए बहुत महत्व रखता है और मैं चाहती थी कि ये किताब में छपें। अन्य साहित्येतर दबाव तो मुझे कतई मंजूर नहीं थे। न हैं-। इसलिए मैंने राजकमल से किताब न छपवाने का निर्णय लिया।

लेकिन मेरे द्वारा किताब वापस लेने के बावजूद राजकमल प्रकाशन द्वारा इस तरह जनसत्ता अखबार और प्रकाशन समाचार में इस सूचना के छापने से मेरी छवि पर बुरा असर पड़ रहा है। लोगों में किताब को लेकर कंफ्यूजन पैदा हो रहा है, जो नवोदित लेखक के लिए बहुत नुकसानदेह है। यह मेरा पहला कहानी-संग्रह है। उम्मीद है,मेरे इस अनुरोध को वरिष्ठ और युवा लेखक जरूर समझेंगे।

मैं अपने वक्तव्य द्वारा सभी वरिष्ठ व समकालीन लेखक लेखिकाओं, आलोचकों,संगठनों से आग्रह करती हूं कि साहित्य में भी अपनाए जा रहे इस तरह के अनैतिक हथकंडे के खिलाफ विरोध में मेरा साथ दें,क्योंकि यह न पहली बार हो रहा है और अंतिम है। इसके नतीजे भी हम हाल-फिलहाल के विवादों,, बहस-मुबाहिसे में देख चुके हैं। इसलिए यह मौका है हम सब एकजुट होकर इस कृत्य की भर्त्सना करें,ताकि एक स्त्री को इस तरह की अप्रिय स्थिति का सामना न करना पड़े और वह हतोत्साहित होकर फिर अपने दायरे में न सिमट जाए। दूसरा बाजार के दबाव में किसी को किसी के अनाप-शनाप मांगों को स्वीकार न करना पड़े।

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