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  • सत्यानंद निरुपम से बातचीत

    सत्यानंद निरुपम से आप असहमत हो सकते हैं, उससे लड़ सकते हैं लेकिन आप उसको खारिज नहीं कर सकते. वह हिंदी संपादन में न्यू एज का प्रतिनिधि है, कुछ लोग नायक भी कहते हैं. लेकिन हिंदी पुस्तकों की दुनिया की बंद गली के आखिरी मकान का दरवाजा खोलने और ताजा हवा का झोंका लाने में उसकी भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता है. राजकमल प्रकाशन ने उनके लिए स्पेस बनाया है और वे उस स्पेस में अच्छी तरह से फिट भी हुए हैं. उनकी यह बातचीत किसी समाचारपत्र में प्रकाशित हुई थी. अविकल रूप से जानकी पुल के लिए- मॉडरेटर 
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    ·         समकालीन हिन्दी साहित्य सृजन के क्षेत्र में युवा हस्तक्षेप बढ़ा है। इनमें कैसी संभावनाएं देखते हैं?
    साहित्य की दुनिया में फ़िलहाल जो युवा लेखक सक्रिय हुए हैं, उनमें विविधता बहुत है. नया करने और नए तरह से करने का जज्बा बहुत है. उनमें से कई बहुत धैर्यवान और आत्म-परिष्कार को लेकर सचेत भी हैं. वैसे युवाओं से ज्यादा उम्मीदें हैं. जिनमें उतावलापन है, अपने लिखे में जिनको सुधार-परिष्कार की जरूरत महसूस नहीं होती- उनको लेकर सतर्कता का भाव अधिक है. लेकिन हिंदी पाठकीयता का जो परिदृश्य है, उसमें अलग-अलग विषयों पर, कथेतर विधाओं में तैयारी से लिखने वालों की बहुत जरूरत है. कहानी और उपन्यास में बदलते समय के नए जीवन-प्रसंगों को, सामाजिक जटिलताओं को और ज्यादा सामने लाने की जरूरत है. विज्ञान, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान जैसे विषयों पर मूल हिंदी में गहन अध्ययन और अच्छी तैयारी से लिखने वाले युवाओं की भी जरूरत है. समसामयिक मसलों पर भी उम्दा लेखन की जरूरत है. पीएचडी के शोध को पुस्तकाकार छपवाने या पुस्तक-समीक्षाओं, लेखों को किताब बनाने की आतुरता से बच कर साहित्य पर अच्छी आलोचनात्मक पुस्तक लिखने वाले और ज्यादा युवा लेखकों की जरूरत है. जानकारीपरक, जीवनोपयोगी पुस्तके हिंदी में आती रही हैं, लेकिन उनमें नयेपन और बेहतरी की बहुत गुंजाइश है. युवा पीढ़ी में ऐसे लेखन के लिए भी कुछ लोग सामने आयें तो और अच्छा. सबसे बड़ी जरूरत है बच्चों और किशोरों के लिए अच्छे लेखकों की. ऐसे में जो युवा हस्तक्षेप बढ़ा है, उसको मैं नाकाफी मान रहा हूँ. और ज्यादा बढे, एक सम्पादक के रूप में इसकी तरफ ध्यान दे रहा हूँ.
    ·         साहित्य भी अब बाजारोन्मुख होते जा रहा है। ऐसी स्थिति में लेखक की ब्रांडिंग और पीआर दो पक्ष दिख रहे हैं। इसे आप किस रूप में देख रहे हैं?
    ‘साहित्य भी अब बाजारोन्मुख होते जा रहा है’– इसका मतलब हुआ कि ‘तब’ नहीं था! ऐसा नहीं है. जो रचना बिक्री के लिए छप गई, वह तो बाजार में ही बिकेगी न! फिर वह बाजारोन्मुख हुई या नहीं हुई? इसलिए यह कहना ठीक नहीं कि ‘अब’ बाजारोन्मुख होते जा रहा है. “मैं गाऊं तुम सो जाओ” के भाव से साहित्य की पाठकीयता का विस्तार नहीं होता. और अगर पाठकीयता का विस्तार नहीं होगा तो लेखक को आने वाले समय में फिर से राज्याश्रयी होकर लेखन करना पड़ेगा. लेखक की रचना राजा के दरबार से निकल कर जब श्रोता और फिर पाठक समाज के बीच गयी, तभी अलिखित तौर पर यह सुनिश्चित हो गया कि अब लेखक का भरण-पोषण राजा नहीं करेगा, उस लेखक का पाठक-समाज करेगा. ऐसे में जरूरी है कि जो किताबें छपें उनका कायदे से प्रचार-प्रसार हो, लोग उसके बारे में जानें. जाने बगैर कैसे कोई खरीद या पढ़ लेगा? पहले कवि मंच पर भी कविता पढने जाते थे. लोगों के बीच जाते थे. लोग उनको आमने-सामने सुनते थे. उनकी रचना से जो लोग प्रभावित होते थे, वे उनकी किताबें खरीद कर पढ़ते थे, दूसरों को भी पढने को कहते थे. वह भी प्रचार ही था. तरीका अलग था. अब तरीके और हैं. ऐसा कोई समय नहीं रहा, जब लेखक की ब्रांडिंग न हुई हो, उसका पीआर न हुआ हो. तरीका कुछ और रहा, लेकिन हुआ तो तब भी है. और खास बात यह है कि अगर कंटेंट में दम न हो तो ब्रांडिंग और पीआर से किसी का कोई फायदा नहीं होने वाला.  
    ·         आज का साहित्य ग्लोबलाइजेशन और लोकलाइजेशन दोनों ही ओर विस्तार पा रहा है। क्या इससे कथ्य और भाष-शिल्प को लेकर विसंगति की स्थिति बन रही है या साहित्य दोहरा विस्तार पा रहा है?
    जो पेड़ जितना जमीन के ऊपर की ओर बढ़ता है, उसको जमीन के नीचे भी उतना ही पसरना पड़ता है. अपनी जमीन से जुड़े रह कर जितना भी बाहर की ओर फैला जाए, अच्छा ही है. लेकिन दिक्कत वाली बात मुझे जो लगती है, वह बताऊँ आपको. हिंदी कहानी और उपन्यास में आप देखिये कि कितनी तेजी से शिल्प को लेकर बदलाव हुए हैं. पाठक पीछे छूट गया है निर्मल वर्मा, रेणु, भीष्म साहनी की पीढ़ी की दहलीज पर और लेखक उससे आगे बढ़ कर कहाँ से कहाँ आ गए हैं! ऐसा होना कितना वाजिब है? लेखक पाठक को अपने साथ लाने में कामयाब नहीं हुए तो इसका सारा दोष केवल प्रकाशक का नहीं. हिंदी कथा साहित्य का पाठक अब भी किस्सागोई चाहता है. लेखक सबसे तेजी से उसी से हाथ धो बैठे शिल्प के चक्कर में. क्या किस्सागोई को बरकरार रखते हुए शिल्प में अनूठापन लाने के प्रयोग मुमकिन नहीं? अन्य भारतीय भाषाओँ में तो ऐसी स्थिति नहीं दिख रही. वहां अभी भी किस्सा कहने का मिजाज बचा हुआ है. फिर हिंदी में छंद की तरह किस्सागोई भी क्या गए जमाने की बात हो जायेगी? हालाँकि इसी बीच कुछ कथाकार किस्सापन बचाए हुए भी हैं. परन्तु किस्सापन और शिल्प के अनूठेपन- दोनों के संतुलित मेल वाले कथा साहित्य की दरकार अधिक है.   
    ·         आप विभिन्न शहरों में किताबों से रिश्तों को लेकर काम करते रहे हैं। या यूं कहें पाठकीयता को धार देने में लगे हुए हैं। क्या संभावना दिख रही है?
    शहरों और किताबों का अपना एक अलग नाता होता है. हिंदी में ‘बहती गंगा’ और ‘काशी का अस्सी’ जैसी किताबें बेमिसाल हैं. साहित्य के जरिये बनारस को जानना है तो इनको पढना जरूरी है. साथ ही यह भी जरूरी है कि शिवप्रसाद सिंह की उपन्यास-त्रयी ‘गली आगे मुड़ती है’, ‘नीला चाँद’ और ‘वैश्वानर’ को भी पढ़ा जाए. डॉ तुलसीराम की ‘मणिकर्णिका’ को पढ़ा जाए. सत्या व्यास के ‘बनारस टाकिज’ को पढ़ना भी वहां के बदलाव के एक नए आयाम से जुड़ना है. और कुछ न भी पढ़ें तो ये किताबें पढ़ कर भी कोई बनारस को बहुत गहरे अर्थों में समझ जाएगा. लेकिन अगर मुझे पटना को जानना है तो? अभी पटना पर साहित्य में काम की बहुत गुंजाइश है. 2010 में जब मैं पेंगुइन बुक्स में सम्पादक था, तब प्रभात रंजन को मुज़फ्फ़रपुर के चतुर्भुज स्थान पर मुकम्मल किताब लिखने के लिए आमंत्रित किया था और उनके साथ अनुबंध भी किया था. उन्होंने खोजबीन और लेखन शुरू भी कर दिया था. दरअसल उससे कुछ साल पहले ‘तद्भव’ में मैंने वहां के बारे में उनका लेखन पढ़ा था, जो बाद में एक कहानी के रूप में उनके कहानी संग्रह में आया. उसी पर विस्तार से लिखने की बात थी. बदली परिस्थियों में अब वह किताब अन्यत्र से ‘कोठागोई’ नाम से छप गयी है. प्रशंसा पा रही है. बात उससे आगे की यह है कि अब मुजफ्फरपुर को देखने-समझने के बारे में कुछ अलग भी तो साहित्य में आया. दिल्ली पर काफी कुछ लिखा गया है. लेकिन दिल्ली के मिजाज को समझने में ‘लप्रेक’ श्रृंखला की ‘इश्क़ में शहर होना’ और ‘इश्क़ कोई न्यूज़ नहीं’ जैसी किताबें नया मोड़ लेकर आई हैं. शायद यही वजह है कि इसके दिल्ली-केन्द्रित पाठकों की संख्या बहुत ज्यादा है. ठीक इससे उलट यह देखिए कि पूर्णिया के अंचल को समझने के लिए रेणु का साहित्य पर्याप्त है. बावजूद इसके लप्रेक सीरिज की ‘इश्क़ में माटी सोना’ वहाँ के नए आलम की किताब बन पड़ी है. और उस अंचल में उसके पाठक बहुत ज्यादा हैं. कुछ लोगों से ऐसे और भी काम करा रहा हूँ. धीरे-धीरे सब रचनाएँ सामने आएँगी.  
    ·         आप बिहार से हैं और बिहार में लेखक और गंभीर पाठकों की काफी संख्या है। यहां के साहित्यिक-सांस्कृतिक माहौल को और बेहतर    बनाने के लिए क्या सुझाव देना चाहेंगे?
    बिहार में एक समय में पुस्तकालय आन्दोलन चला था, जिसके तहत गाँव-गाँव में पुस्तकालय खुलने लगे थे. उस मुहिम को नए तरह से नए समय में कैसे खड़ा किया जा सकता है, इस पर भी सोचना चाहिए. बिहार में साहित्य, कला, समाज और राजनीति पर लोगों में परस्पर संवाद का माहौल बहुत अच्छा रहा है. जिसका अब क्षरण हुआ है. उसे स्वस्थ तरीके से कैसे पुनर्जीवन दिया जा सकता है, इस पर भी मिल बैठ कर बात करनी चाहिए. अभी हाल ही में मेरे गृह-जिला सिवान में जीरादेई के पास संजीव कुमार जी ने अपने गाँव में लेखकों के शिविर का आयोजन किया था. वहां लेखक ग्रामीणों से मिले, गाँवों में घूमे-रमे, कहानियां सुनाई- यह सकारात्मक पहल है. साहित्य और कला को राजधानी और बड़े शहरों की सुविधा से निकल कर छोटे शहरों और गाँवों की तरफ जाना होगा. तभी समाज में रचनात्मक वातावरण बनेगा.

     

    5 जून, 2016 को दैनिक जागरण अख़बार के पटना संस्करण में प्रकाशित बातचीत का असंपादित पाठ. 

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