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  • गीताश्री के उपन्यास ‘वाया मीडिया-एक रोमिंग कोरेस्पोंडेंट की डायरी’ का एक अंश

     

    गीताश्री को वरिष्ठ लेखिका कहूँ या युवा लेखिका? उनके लेखन का कैरियर लम्बा है और उनके अंदर युवाओं सा उत्साह है। उपन्यास लिखने की शुरुआत उन्होंने हाल में ही की है। ‘वाया मीडिया‘ उनका दूसरा उपन्यास है। लेकिन इस बार विषय ऐसा है जिसके ऊपर हिंदी में कम लिखा गया है। महिला पत्रकारों के जीवन और पेशे कर द्वंद्व की कहानी इस उपन्यास में कही गई है, जो ज़ाहिर है इस पेशे को, इसकी चुनौतियों को अधिक क़रीब से देखने का मौक़ा देती है। ‘वाया मीडिया’ आपको उनकी तमाम रचनाओं की तरह शुरू से अंत तक पढ़वा ले जाएगा। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित रोचकता प्रसंगों से भरपूर इस उपन्यास का फ़िलहाल एक अंश पढ़िए- मॉडरेटर

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    -गीताश्री

    क्रबिस्तान में जिंदा औरत की डायरी

    यह नवंबर की अंधेरी रात थी। पहाड़ी इलाके से सटे होने के कारण ठंड यहां आ चुकी थी। खासकर रात को, वो भी वीराने में ठंड ज्यादा लगती है। खुली हवा और खुला आसमान। उपर से घना अंधेरा। जेहन में रोशनी हो तो बाहर के अंधेरे उतना नहीं डराते। मेरे भीतर किसी उदास गीत की तरह अंधेरे भर रहे थे। मैं गेट पर खड़ी थी। जिस गेट को अब तक फिल्मों में देखा था। चररररर…करके खुलते हुए। वो कौन थी फिल्म की नायिका साधना की याद आ गई। अंधेरे में गेट पर खड़ी, तेज हवा में सफेद साड़ी का लहराता आंचल. मैंने अपनी टी-शर्ट और जींस की तरफ देखा। गले में छोटा सा स्टाल पड़ा था। कंधे पर बैग। ड्राइवर मुझे गेट के बाहर उतार कर निर्मम भाव से चला गया जैसे कल मुझसे मिलना ना हो। मैं थोड़ी देर हतप्रभ गेट के बाहर खड़ी रही। अंदर जाने से पहले मुआयना लेना चाहती थी। क्या आज रात कुछ घटित होने वाला है। क्यो मैंने स्वीकारा यह चैलेंज। न मिलती नौकरी…कौन सा भूखी मर जाती। मैं उन मनहूस घड़ी को कोस रही थी जब मैने पत्रकारिता करने का फैसला किया था। तब मुझे क्या मालूम था कि इस पेशे में आगे इम्तहां और भी हैं। कितने क्रबिस्तानों में रातें और दिन गुजरने वाले हैं…क्या पता। इतना तो तय है कि किसी पत्रकार के करियर की इतनी भयानक शुरुआत कभी न हुई होगी। अगर आज रात बच गई तो इस विषय पर शोध करुंगी।

    मन में तरह तरह के खयाल उठ रहे थे। पैर गेट की तरफ बढ ही नहीं रहे थे। मैं कुछ भी नहीं जानती थी कि अंदर कौन होगा, किससे बात करुंगी। क्या करुंगी। सिर्फ अंधेरे की छवि ही भीतर कौंध रही थी। अंधेरो की कतरने मेरे पूरे वजूद पर फैली हुईं।

    गेट पर खट खट करने से पहले मैंने अंधेरी सड़क को देखा। कोई गाड़ी दूर दूर तक नहीं। देर रात कोई त इधर आएगा ही क्यों। गेट के अंदर हल्की रौशनी दिखी। मैंने खट खटा ही दिया। गेट खुला था। मेरा दिल इतनी जोर से धड़क रहा था कि दूर से आवाज सुनी जा सकती थी। चुनौती साथ थी सो मंत्र बुदबुदाई…”भूत पिशाच निकट नहीं आवे…”

    कभी कभी मां कहा करती थी कि ईसाईयो के क्रबिस्तान के भूत नुकसान नहीं पहुंचाते हैं। भटकते इनके भूत भी हैं, लेकिन शांति से। मन में कहीं यह खामोश सा विश्वास था कि मां का कहा सच भी हो सकता है।

    “कौन…??”

    इस समय कौन आया भई…??

    स्त्री आवाज थी। डर के मारे मेरे पैर वही जम गए। इतनी रात गए, क्रबिस्तान में कोई स्त्री आवाज…ओह..कहीं..

    सामने की झोपड़ीनुमा घर में हल्की लाइट थी। कोई अंधेरे में झपटता हुआ चला आ रहा था। हाथ में टार्च। मेरे मुंह पर रौशनी पड़ी, मेरी आंखें मूंद गई। छाया जैसे ही मेरे करीब आई, बाहर की सारी बत्तियां जल गईं। हम दोनों ने एक दूसरे को ऐसे देखा जैसे “एलिस इन वंडरलैंड” पहुंच गई हो।

    मेरा हाथ पकड़ कर जब वह अपनी झोपड़ी की तरफ बढ रही थी तो मैं लगातार उसके पैर पर निगाहें गड़ाए हुए थी। ऐसा मैंने सारी रात किया। जब जब मौका मिलता, उसके पांव की ओर देख लेती। कहीं पांव उल्टे तो नहीं। मैं यकीन हीं नहीं कर सकती थी कि कोई बूढी औरत क्रबिस्तान में मिलेगी। वो भी इतनी रात को। यही हाल उसका भी था, वह हैरानी से देखे जा रही थी। उसकी आंखों में अनगिन सवाल थे। बाद में उन आंखों में मैंने अपने संपादक के लिए गुस्सा देखा।

    जूडी-एंग्लो इंडियन औरत। उसने पूछा-“तुम दिन में क्यो नहीं आई ? दिन में ज्यादा अच्छा लगता है यहां। कई लोग अपने रिश्तेदारो की क्रब पर फूल चढाने आते हैं। मेला जैसा लगा रहता है यहां। रात को कोई नहीं आता यहां।“

    “मैंने बॉस को कहा था कि मैं दिन में कर लेती हूं तो सनकी बास ने कहा कि ये क्या स्टोरी हुई..गुनगुनी धूप में क्या सनसनी मिलेगी। जाओ..रात गुजारो..हिम्मत दिखाओ,,कुछ नया खोज कर लाओ..फिर तो कोई बात हो।“

    मेरी हालत वह समझ रही थी और मैं उसे और उसे सीधे पांव देखकर राहत महसूस करने लगी थी कि कोई औरत ही मिली मुझे यहां। कोई और होता तो क्या मैं क्या करती। बैग में रखा छोटा चाकू जो कभी कभी अमरुद काटने के काम आता है, उससे मक्खी भी शायद ही मरे। मुझे लगा कि कल सब लोग मुझे क्या क्या नसीहते देंगे..गई क्यों थी, पागल कुत्ते ने काटा था..अकेली क्यों गई..किसी को साथ ले जाती..कुछ हथियार ले जाती..बला बला बला,,,,उफ्फफ..

    खयालो में गोता लगाते हुए मैंने सुना कि वह औरत अपनी कहानी सुना रही थी…हम एक खिड़की के पास बैठे थे। उसने फिर से अलाव जला लिया था। केतली में दूध पानी मिला कर उसी पर रख दिया। रात भर चाय पीएंगे और बाते करेंगे। मुझे सुबह निकलना था। जूडी ने कहा कि वह भी जागेगी। जब वह इतनी हिम्मत करके यहां तक आ सकती है तो मैं क्यों नहीं..। खिड़की के थोड़ी दूर पर कब्रे शुरु हो जाती हैं। यहां से दिखता है सब कुछ।

    “मुझे यहां रहते हुए बीस साल हो गए। एडम की डेथ के बाद मेरा यहां से लौट कर जाने का मन ही नहीं हुआ। हम दोनों मैक्लूस्कीगंज में रहते थे। वहां हमारा प्ले स्कूल था। कुछ विवाद हुए, इलाके में डिस्टरबेंस बढी तो हम काम की तलाश में यहां आ गए। बीस साल पहले अचानक एडम चल बसा। हमारा कोई नहीं था। न घर न हमारी कौम। किराए के घर में रहती थी। अमदनी का जरिया भी खत्म..। एडम के जनाजे के साथ यहां आई और यहीं रह गई। चर्च ने मुझे यही रहने और देखरेख की जिम्मेवारी दे दी है…एडम भी यही है मेरे साथ…लगता नहीं कि वह चला गया है…रोज उसकी कब्र पर उससे बात करने जाती हूं…बहुत सकून है यहां…

    वह रुकी कुछ पल के लिए…आंखें दूर कहीं टिकी थी। जैसे कुछ खोज रही हों। होठ अधखुले थे..कुछ शब्द अटके थे, जैसे कई बार बूंदें ठिठक जाती हैं, पत्तो पर। ढुलकती नहीं।

    ”ये आखिरी जगह थी धरती पर, मेरे लिए। मैंने एडम के बगल में अपनी जगह भी बुक करा ली है…”

    लंबी सांस बाहर निकली..हल्की भाप लिए।

    वह बता रही थी और मैं सिहर रही थी। आग चटकती तो उसका गोरा चेहरा और दमकने लगता। चाय की गरम प्याली ने जो राहत दी, वह अकल्पनीय थी। अकल्पनीय कुछ और भी घटा जब उसने मुझे अचानक पूछा…एडम की कब्र देखना चाहोगी ?

    मुझे काटो तो खून नहीं। इतनी मुश्किल से तो एक सुरक्षित जगह मिली थी, जहां मैं बैठ कर रात काट सकती थी। कर बेटा..कर पत्रकारिता…कुछ सनसनीखेज स्टोरी बना…नौकरी पक्की..जिंदगी का भरोसा नहीं..

    वह उठी, अपनी सूती नाइटी समेटती हुई..मैंने उसके पांव देखे। पांव उल्टे। मेरी चीख निकली और जूडी भी चीखी। दो स्त्रियों की चीख ने कब्रो की शांति भंग कर दी होगी। रात के परिंदो के पर फड़फड़ाने की आवाज आई थी। दूर कहीं उल्लू चीखा। कुत्तों के रोने की आवाजें रात के गहरे सन्नाटे में और तेज हो गई थी।

    “क्या हुआ…ओ माई गॉड..???”

    मैं लगातार उसे पांव की तरफ देख रही थी…वह सीधी हो चुकी थी। वह मेरी नजर पकड़ चुकी थी।

    “मैं भूत नहीं हूं मैन…मेरे पांव मुड़ गए थे..मैड वुमेन..डरा दिया। इतना डर तो मुझे किसी रात नहीं लगा। क्या है….?” वह खीझ गई थी।

    मेरी तो आंखें फटी हुई थी..भूत क्या कहेगा कि वह भूत है..मुझे लगा अभी नुकीले दांत निकल आएंगे और उसके पंजे मेरे गले पर…औह..

    “ कककक को.. कोई औरत यहां…अकेली..कैसे रह सकती है?

    मैंने कंपकंपाते हुए पूछा था।

    “वैसे ही जैसे कोई लड़की सारी रात कब्रों के साथ गुजारने आ जाती है…”

    स्मित-तल्खी थी उसकी आवाज में। अब मुझमें थोड़ी हिम्मत आ गई थी।

    “अच्छा एक बात बताइए…कभी रात में यहां कोई आवाज आती है। आप इतने सालों से यहां अकेली रहती हैं। कोई दिखता है..कोई आत्मा..? “

    मैंने जानबूझ कर “भूत” शब्द उच्चरित नहीं किया।

    “हां, आती है…पर कोई दिखता नहीं। कभी कभी दर्द भरी आवाजें आती हैं। जैसे किसी को दबोचा जा रहा हो या गला रेता जा रहा हो। बताते हैं, सालो पहले किसी लड़की का रेप हुआ और फिर उसका किसी ने मर्डर कर दिया। वह दिखती है कभी कभी यहां। मैं जाती हूं उस आवाज के पीछे, वह गायब हो जाती है।“

    मेरे प्राण सूख गए। मैंने घड़ी देखनी चाही। मुश्किल से मेरी कलाई उठ पाई। जड़वत मैं। भोर होने में थोड़ी देर थी। मुझे भोर के अंधेरे-उजाले का इंतजार था। सुना है कि चार बजे से पृथ्वी पर देवताओं का समय शुरु होता है। उनके सामने भूत ठहर नहीं सकते। मन ही मन प्रार्थना गा रही थी। हे भगवान..वक्त काटो जल्दी…

    जूडी को लगा मैं ठंड से कांप रही हूं। वो किसी और दुनिया में जा चुकी थी। उसने मेरा हाथ पकड़ा। आग सेंकने के बावजूद बेहद ठंडे हाथ। मेरी नसों में सुईयां सी चुभीं. मेरे पास कोई चारा नहीं था। एडम की कब्र मुझे बुला रही थी या उसे, पता नहीं। मैं आधी रात को असंख्य छोटे बड़े कब्रो से टकराती एडम की कब्र की तरफ जा रही थी। अंधेरे में पेड़ हिलते हुए कंपकंपा देने के लिए काफी थे। पत्तो पर पैरो की आहट मुझे उपन्यासो की रुमानियत की याद दिला रही थी। लेकिन वहां रस-भंग नहीं हुआ होगा। यहां रुमानी अंधेरा तो है पर असंख्य आत्माओं के कोरस और उनकी मिली जुली छायाएं मेरे जेहन में पर अंधेरे से ज्यादा हावी हो रही है। वह निर्भय थी। जैसे अंधेरी रात में कोई विरहिणी अपने प्रेमी से मिलने जा रही हो, निडर और निश्चिंत। मेरे पांव की तरह उसके पांव नहीं पड़ रहे थे..डगमग डगमग। अपने खयालो के जगंल में मैं तन्हा नहीं थी क्योंकि मुझे अनेक भूतहा फिल्मों की याद आ रही थी। चलते चलते ये औरत गायब हो गई तो…इन कब्रो से कोई निकल आया तो…कोई भूत सामने आ गया तो…उस घड़ी मेरा मन ये मानने को तैयार नहीं था कि भूत जैसी कोई चीज नहीं होती। काफी सालों तक मेरी यही हालत रही।

    “देखो…एडम यहां सो रहा है…उसे ताजा फूल पसंद हैं। रोज मैं ताजा फूल उसे देती हूं..वह खुशबू का दीवाना था। इत्र छिड़क देती हूं और यहां की हवा महक उठती है। लगता है एडम ने अभी अभी सांसे लीं हो…”

    जमीन से ऊपर उठी हुई कब्र पर फूल चढे थे। साफ सुथरी। वह झुकी और कुछ फूल चुन लिए। मैंने दुआ के लिए हाथ ऊपर उठाया। रात का परिंदा टींटींटी करता हुआ ऊपर से गुजर गया।

    टींटीटींईई….आवाज हुई…

    मैं तेज आवाज में चीख मार कर उठ गई। मैं सोफे से नीचे गिरी पड़ी थी। मां मुझे उठा रही थी। हवा में अब भी खूशबू थी, पर वैसी नहीं। मां ने जर्जर हो चुकी मिक्सी बंद किया और धनिया पत्ता लगे हाथों से ही मुझे उठा रही थीं।

    हाय ओ रब्बा…ये कुड़ी, कहां से होकर आई। तुझे पता भी है, क्या टाइम हो रहा है। देख, शाम हो गई। दिन भर क्या क्या बड़बड़ाती रही है, पता भी है तुझे। हकलान कर दिया हमारी जान को..

    मां का प्रलाप जारी था। उसी से मुझे पता चला कि मैं दिन भर सोती रही और नींद में बड़बड़ाती रही…भूत..औरत..जूडी..एडम..छोड़ो छोड़ो..बचाओ बचाओ…और भी पता नहीं क्या क्या..। मां बता रही हैं और मैं सुन रही हूं। मैं घर में हूं…सेफ । चैन आया। सच में, मैं घर में हूं। मैं लौट आई, मैंने चुनौती पूरी कर ली…वाह। अब देखती हूं, जान की बाजी लगा कर शायद ही किसी ने नौकरी पाई हो। मुझे कैसे नहीं देता है। हुंह…देना तो पड़ेगा बेटा…नहीं तो वहीं पहुंचा दूंगी..समझ लेना। मन ही मन प्रण करती हुई मैं उठी और लैपटौप लेकर बैठ गई। लिखते समय मन की हालत बयान कर पाना बेहद मुश्किल। फिर भी लिखा।

    फोटो तो लाई नहीं। कोई रेखांकन बनवा लेंगे। स्टोरी लेकर मैं संपादक के सामने थी और संपादक। बल्लियों उछल रहे थे।

    “हंगामा हो जाएगा हंगामा…तुम नहीं जानती, तुमने क्या खोजा…वेल डन गर्ल वेलडन…”

    अगले दिन अखबार में ये खबर बौटम छपी….कब्रिस्तान में जिंदा स्त्री और आत्माओं का कोरस।  कब्रिस्तान से लाइव रिपोर्टिंग।

    बाईलाइन-अनुराधा, हमारे संवाददाता।

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