अनुराग अन्वेषी की नई कविताएँ

अनुराग अन्वेषी मूलतः पत्रकार रहे हैं, लेकिन उनके अंदर एक संवेदनशील कवि भी है जो समाज की विसंगतियों पर समय समय टिप्पणी के रूप में प्रकट होता रहता है। इस बार लम्बे अंतराल के बाद उनकी कुछ कविताएँ पढ़िए- मॉडरेटर

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बेटे का डर

ओ मां,
आशंकाओं का घेरा बड़ा है
इसीलिए नहीं पता
कि कब मारा जाऊं
बगैर कोई गुनाह।
बस एक गुजारिश है
कि अपराधी समझने से पहले
मुझे देखना जरूर गौर से
और तब तुम्हें
जो लगे
तय कर लेना।
क्योंकि जानता हूं
तेरी आंखें मुझे पढ़ती हैं
सच सच।
कम से कम
एक निगाह में तो मैं फख्र के साथ जिंदा रहूंगा।

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बेटी का डर

ओ मां,
तुम्हें अपनी बेटी की गहरी आंखों में
बेशुमार प्यार दिखता है।
ढेर सारे सपनों का अंकुरन
दिखता है।
पर क्यों हर बार
मैं जब आलिया को
या जोहरा को घर बुला कर
खेलना चाहती हूं,
तुम्हारी निगाहें कातर हो जाती हैं।
तुम मुझे मिश्रा चाचा या
शुक्ला चाचा के घर
खेलने जाने को कहती हो।

ओ मां,
तुम्हारे तमाम प्यार के बाद भी
मैं बागी होती जा रही हूं।
मिश्रा चाचा की बातें
वहां के बच्चों का सलिका
मुझे नहीं लगता अच्छा।
मैं तुम्हें कैसे समझाऊं
कि वह कहते हैं गाय हमारी माता है
पर अपनी गऊ जैसी मां को भी
नहीं देते भरपेट खाना।
उनकी मां को जब देखती हूं
उनकी आंखों से रिसते आंसू दिखते हैं।
कांपते हैं उनके होठ
जब मैं तुम्हारी रसोई से चुराई रोटी
चोरी छिपे गिरा आती हूं
उनके आंचल में।

ओ मां,
मुझे आलिया अच्छी लगती है।
जोहरा तो है और भी अच्छी।
ये दोनों कभी नहीं करतीं
किसी की शिकायत।
मुझसे सुनती हैं राम की कहानी,
कृष्ण का प्रेम।
मुझे बताती हैं अजान का मतलब।
अल्लाह की इबादत का तरीका।
तुम्हें पता है मां
कि उनका कुरान भी
है हिंसा के खिलाफ।
वहां भी प्रेम का संदेश है उतना ही गहरा
जितनी गहरी दिखती हैं तुम्हें मेरी आंखें।
पर मां,
आज बताओ मुझे
कि क्यों मेरी इन बातों से घबरा जाती हो तुम?
क्यों तुम्हारी गहरी आंखें हो जाती हैं उथली?
क्यों तुम्हारे बहते आंसुओं में प्रेम की जगह
डर तैर रहा होता है।
ओ मां, तुम्हें ऐसे देख कर डर जाती है
तुम्हारी बेटी।

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पिता से शिकायत

मुझे तुमसे शिकायत है
मेरे पिता
कि तुमने मेरी परवरिश
किसी राजनीतिक परिवेश में क्यों नहीं की।
क्यों नहीं कभी कहा मुझसे
कि बेटे जान ले
दो और दो पांच होते हैं।
क्यों सिखाया था मुझे
कि ईमानदारी, मेहनत, सचाई और प्रेमराग
होते हैं जीवन के जोड़-घटाओ, गुणा-भाग।
काश मेरे पिता,
तुमने सुझाया होता मुझे
कि जीवन इतना सरल नहीं होता।
यहां जोड़-तोड़ अनिवार्य है।
तो कम से कम अपनी मासूमियत
तो मैं छुपा कर तो रखता।
कोई मेरी मासूमियत को संदेह से देखे
तो सचमुच दुख होता है मेरे पिता।
कोई मेरी सचाई पर ऊंगली उठाए
तो मेरे भीतर दरकता है कुछ।
तुम्हें तो पता भी नहीं होगा
कि मैंने अपने को बेगुनाह बताने के लिए किया गुनाह।
पर नहीं साबित कर सका खुद को बेगुनाह।
बल्कि मुझे तो ब्लैकमेलर कहा गया।
पिता मुझे माफ करना
मेरे भीतर नकारात्मकता पसर रही है
एक अपराधी सिर उठा रहा है
सब कुछ तीन तेरह कर देने की इच्छा हो रही है।
कर भी दूं
पर पिता
तुम्हारा चेहरा मेरे सामने आता है
और मैं जानवर होने से बच जाता हूं।
बस पिता,
अब एक गुजारिश है तुमसे
कि कभी मत मरना मेरे भीतर से तुम।
तुमसे मुझे ताकत मिलती है
बल मिलता है कि बचाए रखूं अपनी इनसानियत।

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पत्रकारों के नाम तीन पैगाम

1

हम पत्रकार हैं
सूचना देना हमारा पहला काम है
कोई अपनी बीवी की लाश
ढोता हो अपने कंधे पर
या कर रहा हो कोई खुदकुशी
हमारे लिए वह
महज जलती हुई बिकाऊ खबर है।
इसलिए अलग-अलग कोणों से
खींचेंगे हम खूबसूरत तस्वीर
तलाशेंगे उसके चेहरे पर
वह रुदन या करूण भाव
जो पिघला दे आपका कलेजा।
ऐसे मौकों पर हम
पिघल गए तो कहां से देंगे आपको खबर।
कैसे बनेगा हमारा करिअर?
हमें पता है अपना दाय
इसलिए स्वीकार है
आपकी लानत, आपकी हाय।

2

सोए प्रशासन को जगा दिया
हमारे भीतर जगे पत्रकार ने।
वह ढोता रहा अपने कंधे पर
अपनी बीवी की लाश
नहीं दिया हमने उसे अपना कंधा
नहीं रखा हमने
उसके कंधे पर अपना हाथ।
खींचते रहे हम फोटो
बनाते रहे वीडियो
दिन-रात खूब बिकी खबर।
प्रशासन में मच गया हड़कंप
कालाहांडी को देख
दिल्ली के ललाट पर बल दिखे।
साथियों के फोन आए
इस लाजवाब कवरेज के लिए।
आज का दिन अच्छा बीता
अच्छी इन्क्रिमेंट की उम्मीद जगी।

3
रात के अंधेरे में
एक जलते सच ने घेरा है मुझे
आंखों के सामने नाच रहा है
कालाहांडी के उस शख्स का बेबस चेहरा
जो किसी मजदूर की बहंगी की तरह
ढो रहा था अपने कंधे
अपनी बीवी की लाश।
रो-रो कर सूर्ख थीं उसकी बेटी की आंखें।
उस वक्त
हमारी आंखों में पेशेवर चमक थी।
हम बड़े पत्रकार हैं
सजग और संजिदा।
इसलिए ताकीद कर रहे थे
अपने से छोटे पत्रकारों को
कि एजंसी पर न आई हो तो
इंटरनेट से निकालो फोटो
रह न जाएं हम पीछे।
ध्यान रखना
कि कॉपीराइट का मामला न हो।
सचमुच, इतने बड़े हो गए हैं हम
कि हमें अपना छोटापन नहीं दिखता।
हम कॉपीराइट का ध्यान रखते हैं
पर कर्तव्य भूल जाते हैं इंसानों के।
हम खबर सामने लाते हैं
पर पीछे रह जाते हैं मदद के लिए आगे आने से।
सचमुच हम बड़े पत्रकार होते जा रहे हैं
इंसानियत छोटी होती जा रही है हमारी।

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पाश के नाम

पाश,
तुम्हारी कविताएं बहुत मजबूत हैं
इतनी कि तुम्हारी लीक से उलट चलते कुछ लोग
इससे तैयार करते हैं अपने लिए सुरक्षा घेरा
और फिर तुम्हारी लीक पर चलते लोग भी
नहीं तोड़ पाते उस घेरे को
जहां छुप कर बैठे होते हैं ये छद्मी।

तुम्हारी कविताएं
विरोध की अगुआई करती हैं पाश।
तनाशाहों की घिग्घी बंध जाती है
जब वे गलती से सुन लेते हैं
तुम्हारी कविताओं का पाठ।
पर मैं देख रहा हूं इन दिनों
उनमें से कई शातिर लोग
तुम्हारी कविताओं को
नकाब की तरह लगा कर
छुपा ले रहे हैं अपना दागदार चेहरा।

तुमने अपनी कविताओं में गुर्राहट बोई थी
मिमियाने से तुम्हें थी सख्त नफरत
बादलों के पार जाकर
तुम करते थे मेघगर्जन
तुम पाश थे, पर थे हर बंधनों से मुक्त।
तुम्हारी कविताएं लहलहाते खेतों से उड़ कर
आसमान छूती थीं।

पर दिखता है इन दिनों
कि शातिर लोगों की टोली ने
बड़ी सावधानी के साथ
तुम्हारी कविताओं को अपना ढाल बना रखा है
तलवे चाटती अपनी जबान से
तुम्हारी कविताओं का पाठ कर
अपना छद्म गढ़ रहे हैं।

तुम खरे थे पाश
इसलिए तुम्हें भरोसा था
कि शैतानों के झंडे से ऊंचा लहराओगे।
पर अफसोस,
कि शैतानों ने तुम्हारी कविताओं को
झंडे सा लहराना शुरू कर दिया है
जी-हजूरी के लिए
अब वे करते हैं तुम्हारी कविताओं का इस्तेमाल।
और जब-जब वे ऐसा करते हैं
मैंने महसूसा है
कि तुम्हारी क्रांति की धुन को
बेहद लड़खड़ाते हुए गाते हैं
जैसे गा रहे हों कोई मातमी राग।

हां पाश,
बरगद सी तुम्हारी कविताओं को
ये लोग गमले में बोने की
नाकाम कोशिश कर रहे हैं।
पर आश्वस्त हूं मैं
कि तुम्हारी कविताओं की धार
कुंद नहीं कर पाएंगे ये तानाशाह
तुम्हारी कविताओं से फूटते रहेंगे जंग के स्वर
जंग लगाने की हर कोशिश
होती रहेगी नाकाम।

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