गीताश्री की कहानी ‘आवाज़ दे कहाँ है!’

आज पुलिस एनकाउंटर को लेकर बहस हो रही है। वरिष्ठ लेखिका गीताश्री की इस कहानी के कथानक में पुलिस एनकाउंटर ही है। राजपाल एंड संज से प्रकाशित उनके कहानी संग्रह ‘लेडीज़ सर्कल’ में शामिल है यह कहानी- मॉडरेटर

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नैंसी के कदम आज फ्लैट से बाहर निकलते समय रुक गए. वैसे तो कल जब से उसने वह पोस्टमार्टम रिपोर्ट बनाई है, तब से ही उसका मूड खराब है, ऐसा लग रहा था उसे जैसे बहुत कुछ खो-सा गया है. उसे कुछ अधूरापन सा लग रहा था. अजीब सी उदासी उसके जी में छाई थी. पर काम पर तो जाना ही था. जैसे ही वह बाहर निकली, और लिफ्ट की तरफ बढ़ी, सामने वाला फ्लैट से मुकेश के गाने की आवाज़ आई… ““एक दिन बिक जाएगा माटी के मोल…””

अरे, आज रफी की जगह मुकेश के गाने………….

ये कैसा रहस्य है ? लिफ्ट से उतरते हुए ये तीन मंजिल भी उसे तीन कोस का सफर लग रही थी. जब से वे लोग यहाँ पर आए हैं तब से यह फ्लैट उसके लिए एक पहेली है. पहेली भी नहीं उसके लिए एक ऐसा रहस्य है जिस पर काले रंग का पर्दा है.

नैंसी को यहां आए हुए कुछ ही महीने हुए हैं. वह अपने बजट में ग्रेटर नोएडा में कम रिहायश वाले इस इलाके में अंतिम मंजिल पर यह फ्लैट खरीद सकी है. जहां एक बार माँ आर्थिक रूप से खोखली हो गयी उसे डॉ. बनाने में, वह खोखली हो गयी, इस फ्लैट को खरीदने में. बहुत मुश्किल से खरीद सकी थी, इतने एकांत कोने में यह फ्लैट.

जब वह आई थी तो माँ ने मना किया था कि इतने सूनसान इलाके में फ्लैट लेना खतरे से खाली नहीं है, पर उसे तो अपना बजट भी देखना था और फिर जिस सरकारी अस्पताल में उसकी नौकरी है वह यहाँ से बहुत पास है. बाकी सोसाइटी उसके अस्पताल से बहुत दूर थीं, और उसकी आधी सैलेरी तो आने जाने में ही खर्च हो जाती, उसके पास बचता क्या? और उस पर माँ की जिद कि कुछ सालों में शादी भी करनी है. तो उसे सबके लिए पैसे चाहिए थे. इन्हीं सब बातों के चलते उसकी तलाश इस सोसाइटी पर ख़त्म हुई थी, पर यहाँ का सन्नाटा?

और यहां की रहस्यमय आवाजें?

उसके कान बचपन से ही कुछ ज्यादा सुनते हैं. जब वह छोटी थी तब छुप्पन-छुपाई में हल्की-सी फुसफुसाहट से ही अपनी सहेलियों को ढूंढ लेती थी. न जाने क्यों उसके कानों को वह सब सुनाई पड़ता था जो और किसी को नहीं सुनाई पड़ता था. ऐसे में कई बार माँ से थप्पड़ भी खाया था. न जाने किस किस की बातें माँ को सुनाती और माँ को लगता कि वह चुगलखोरी कर रही है.

जब से इस फ्लैट में आई है, तब से अजीब-सी फुसफुसाहटें पूरे फ्लोर पर तैरती हुई लगती. उसे ऐसा लगता कि न जाने अजीब-सी आवाजें उसके फ्लैट के चारों तरफ फैली हुई हैं, उसके घर को ध्वनि तरंगे घेरे हुए हैं, फुसफुसाहट, हंसी, बेचैनी, कुंठा, लड़ाई सब कुछ. क्या नहीं था? हर तरह की वायु तरंगे थीं. कभी कभी उसे लगता कि ध्वनि तरंगे उसका पीछा कर रही हों, उसके बिस्तर में! वह चादर ओढ़कर सोने की कोशिश करती, और उसे कोई हंसी उठा देती. यह सब क्या था? वह रात में निकल जाती, उसके सामने वाले घर में से आहटों का साया उसके सामने आ जाता! वह करीब जाती, उसके मैले, जंग लगे ताले को बार बार छूकर देखती, महसूस करके देखती कि आखिर है क्या? आखिर क्यों ये आवाज़े हैं? यह क्या रहस्य है?

माँ के बुढ़ापे और कमजोरी को ध्यान में रखते हुए नैंसी ने उनसे कुछ नहीं कहा.

हालांकि वह कहना चाहती थी. पर कह न सकी. वह माँ से कहना चाहती थी कि आवाजें उसका पीछा करती हैं, और कभी कभी उन आवाजों में उसे एक निराशा दिखती. जीवन से निराशा,और कभी कभी वीभत्सता. वीभत्सता में वह डर जाती. उसे भयानक लगता, और वह जब उस भयानकता को महसूस करती तो अन्दर तक सिहर जाती.

उफ, वे आवाजें…!!

लिफ्ट रुक गयी थी नीचे.

वह वहीं बैठी रही. अभी गाड़ी अस्पताल से आई नहीं थी. वह रोज़ ही इस समय इन आवाजों को महसूस करती थी. आज वहां पर हलचल में कुछ उदासी-सी थी. रोज़ तो उसे सामने वाले फ्लैट में ताजगी वाली हलचल थी. आज न जाने क्यों उसे हलचलों में कुछ कमी लग रही थी.

जब वह इस फ्लैट में आई थी तो उसे डर लगने लगा था.

क्या रहस्य था ताले में बंद उस फ्लैट का? आखिर उसमें जो उठापटक होती थी वह किसी को सुनाई क्यों नहीं पड़ती थी? गार्ड से उसने कई बार इन हलचलों के बारे में  बात की. पर वह हंस पड़ा था. उसे लगा कि जैसे उसने कोई वाकई में हंसने वाली बात कर दी थी. रात में जब उसकी रात की रानी महका करती तो उसे लगता कि उसके सामने वाले फ्लैट में उसकी खुशबू का स्वागत किया जाता था. वह उस उपस्थिति की कल्पना से ही सिहर उठती थी. आखिर कौन था? और ताले में बंद हलचलों से वह हलकान हो जाती थी. कई बार उसने दरवाजे पर दस्तक दी “कौन है?, कौन है अंदर?”

पर उसे जबाव कुछ नहीं मिलता. उसे ऐसा लगता कि जो भी कोई था, वह तितर बितर हो गया. आहटें बंद हो गईं, हलचलें बंद हो गईं.

एक असहज-सी शांति छा गयी.

रात के अंधेरे का साम्राज्य छा गया.

पर सुबह होते ही हलचलें जिंदा हो गईं. वे हलचलें उसके जीवन का हिस्सा बन गईं थीं. वे हलचलें उसे डराती थीं, पर वे उसके साथ रहती थीं, रसोई में काम करते समय, फ्रिज से पानी निकालते समय उसे लगता था कोई हलके-हलके बात कर रहा है.

कोई जीवन की नश्वरता के बारे में बात कर रहा हो, कोई गाने गा रहा हो.

कोई अपने साथ हुए अत्याचारों की बात कर रहा हो. कोई बड़ाबड़ा रहा है…ले के रहेंगे..ले के रहेंगे…पता क्या लेके रहेंगे..आवाज बुझ जाती है। मानो कोई आवाज आजाद होने को छटपटा रही हो.

कोई हत्याओं को जस्टिफाई कर रहा हो। कैसे कुछ हत्याएं जायज होती हैं।

कोई पहेली बुझा रहा हो.

वह पहेलियों की सीढ़ी चढ़ न पाती. वह वहीं गुंथ कर रह जाती. वह आटा गूंधते- गूंधते उन आवाजों को अपने अन्दर महसूस करती रहती. रात को पानी पीते हुए वह उन आवाजों को पीती.

ऐसा क्या था उस घर में? रात हो या दिन, कुछ आहटों के सन्नाटे उसे सुनाई देते. न जाने क्यों वह ठिठक जाती.

कुछ दिनों के बाद उसने सोचा था कि वह मकान मालिक से बात करेगी, वह उन आहटों के बारे में बताएगी. वह बताएगी कैसे कुछ हलचलें रात में उसे सोने नहीं देती हैं.

गार्ड उसकी बात सुनकर हंसा था, सोसाइटी का सुरवाइजर भी उसकी बात सुनकर हंस पड़ा. उसकी जमकर खिल्ली उड़ाई गयी. उसकी बातों को खिलखिलाहट में उड़ा दिया गया. मानो सब उसे वहमी ठहराने की कोशिश कर रहे हों। हलचलें भी उस हंसी में सहम गईं. और वह परेशान होकर अपने फ्लैट में वापस चली गयी. माँ को हिदायत दे दी कि घर का दरवाजा जब तक वह नहीं आ जाती, खोलेंगी नहीं.

हालांकि उस दिन के बाद हलचलें कम हुईं.

जब जब यहां हलचलें होती, उसे बचपन की वह कोठरी याद आ जाती, जिसमें अजीब हलचलें होती थीं और उस हलचलों के बीच होती थीं, तमाम कहानियां.

उन कहानियों में चीखें जो उन सहपाठियों के गले से निकलती थीं, जब भी वे स्कूल की उस कोठरी से होकर गुजरती थीं. स्कूल की उस कोठरी में एक अनजान औरत की कहानी थी, उस कहानी में बहुत कुछ था. न जाने कितनी फुसफुसाहटें थीं, कोई कहता, कहीं से आई थी, कोई कहता किसी ने मार कर यहाँ डाल दिया था, तो कोई कहता था कि अपने बेटे के प्यार में यहीं चली आई थी और बेटे को लेकर इसी कमरे में मर गयी.

कुछ भी कहानी हो, पर सच तो यही था कि वह एक अभिशप्त कमरा था.

लड़कियों के हाथ से चाट का दोना छीन कर फ़ेंक दिया जाता था. कहते थे कि उस कमरे में औरत को साफ सफाई बहुत पसंद थी. उसके स्कूल में उस कोने को बहुत साफ रखा जाता था. हर समय अगरबत्ती जलती रहती थी. हर रोज़ उस कमरे में कुछ न कुछ खाने के लिए रख दिया जाता था और आश्चर्य कि दिन भर में दोने का खाना गायब हो जाता था. उस स्कूल में हवन होता था और हर बार उस आत्मा की शान्ति के लिए प्रार्थना की जाती. आत्माएं भी कितनी बेचैन होती हैं जीवित मनुष्यों की तरह जो बिना मान मनौव्वल के शांत नहीं होतीं।

उस कमरे के आसापास जाने से स्कूल की लडकियां डरने लगी थी और उस कमरे के आसपास लोहे का जाल लगा दिया था. एक दिन उसे उत्सुकता हुई सच जानने की, उसके पास से गुजर रही थी कि अजीब अजीब आवाजें सुनाई देने लगीं। करुण चीत्कारें थीं जिनमें पुकार थी। उसे कुछ समझ में नहीं आया, बस किसी तरह गिरते पड़ते भागती चली गई।

वह उस दिन जिस डर से गुजरी, उसके बाद तो वह कल्पना ही नहीं कर सकती थी कि वह कोई ऐसा दुस्साहस कर सके.

यही कारण था कि वह इस हलचल से दूर थी, जैसे ही वह उस फ्लैट के पास पहुँचती, उसे स्कूल का वह अभिशप्त कमरा याद आ जाता। वह डर जाती, सहम जाती और भूत भगाने के लिए जो उसकी उंगली में लोहे का छल्ला पड़ा था, उसे घुमाने लगती. वह फ्लैट भी उसे अभिशप्त लगता.

वह अपने डर को काबू में रखने की कोशिश करती पर किशोर मन में जो डर की नींव पड़ी थी, उस पर इतनी बड़ी इमारत बन चुकी थी कि वह चाह कर भी उसे गिरा नहीं सकती थी. उसे गिराने के लिए साहस की सुनामी चाहिए थी, जो हो नहीं सकती थी. वह डर की चारदीवारी में फंस चुकी थी. वह चाह कर भी निकल नहीं पाती, यही कारण था कि जब वो हलचलें उसे परेशान करती वह उस फ्लैट के सामने जाकर वही सब कुछ करती जो उसके स्कूल में प्रबंधक किया करते थे. वह उन आत्माओं के लिए मुक्ति की कामना करती और सोचती कि जो भी वहां भटक रहे हैं, उन्हें मुक्ति मिले. पर उस पूजा के बाद भी हलचलें कम होने का नाम नहीं ले रही थीं.

शायद हलचलों के साथ मुलाक़ात अभी होनी थी उसकी!

उस दिन, बहुत ही आम दिन था जब वह अपना फोन लेकर सीढ़ियों पर बैठ गयी. उस दिन बहुत ही ठंडी हवा चल रही थी और अंतिम, तेरहवीं मंजिल पर बहुत ही मजेदार हवा आ रही थी. उसके अन्दर तक सब कुछ तृप्त-सा होता जा रहा था.

उसके अन्दर ठंडक समाती जा रही थी. वह अनजानी ठंडक आने वाली किसी घटना का सूत्र रच रही थी।

वह बहुत दिनों के बाद अपने दोस्तों के साथ व्हाट्सएप अन्ताक्षरी खेल रही थी. एक एक अक्षर पर सभी फँस रहे थे, और उसे मज़ा आ रहा था फंसने में. तभी गाना फंस गया. गाना फँस गया च अक्षर से, च, च, ओह, च से कौन सा गाना गाऊँ?कौन सा गाना गाऊँ?ये तो फंस गयी मैं? क्या करूं?

माँ से पूछूं क्या? वह जैसे अपने आपसे बात करती हुई जा रही थी.

“अरे, इतने छोटे से काम के लिए माँ से क्या पूछना?” कहीं से आवाज़ आई. ये कौन बोला?” वह एकदम से चौंक गयी!

“”अरे, ये आवाज़ कहाँ से आई?””

“”हेलो, कौन है? कौन है यहाँ?””

वह पागलो की तरह भागने लगी. “कौन है यहाँ? कौन है? हेलो, कौन है? क्या कोई मेरी आवाज़ सुन रहा है? आखिर कौन है?”

“” च से…“चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे, फिर भी मगर कभी नाम को तेरे आवाज़ मैं न दूंगा”…”

“”कौन हो तुम ?, कहाँ हो? मैं देख क्यों नहीं पा रही तुम्हें?””

वह चीखती रही, और अन्दर से आवाज़ आती रही,

“”चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे, फिर भी मगर कभी नाम को तेरे आवाज़ मैं न दूंगा…””

उधर से सन्नाटा खींच गया। भयभीत-सी वह भाग कर घर में घुस गई।

उस मखमली आवाज़ का दर्द उसके अंदर तक बींध गया. अंदर तक कचोट उठी. वह क्यों गा रहा था? और कौन गा रहा था? क्या इस घर में भी उस कमरे जैसा ही कोई रहस्य है? अगर है तो क्या? अब उसे यकीन हो चला था कि या तो कोई अंदर है या कोई भूत है.

उस रात वह नींद में चिहुंक कर उठ गई.पसीने से तरबतर। नींद में वह जोर से चीखना चाहती थी पर आवाज घोंघियाने लगी थी। वह चीखना चाहती थी- “बचाओ बचाओ…” थोड़ी देर संघर्ष करती है, हाथ पांव हिलाना चाहती है, दोनों नहीं हिलते जैसे किसी ने बांध रखा हो। ये नींद में क्या हो रहा था? मां हमेशा कहती कि चित्त न लेटा करो, एकदम चित्त लेटने से कोई चढ़ जाता है, शरीर पर! पहले तो उसे लगता था कि माँ ऐसा क्यों कहती है? चित्त न लेटा करो, चित्त न लेटा करो, और वह थी कि उसे करवट लेने पर नींद ही नहीं आती थी. आज भी एकदम चित्त लेटकर सो रही थी.

उसे लगा उसके कानों में कोई गा रहा है…

“”चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे, फिर भी मगर अब नाम को तेरे आवाज़ मैं न दूंगा”

“कौन है?…….कौन है?……..सामने आओ!, तुम कौन हो” ?”

कहते हुए वह चीखते हुए उठी.

“”क्या हुआ, कितनी बार बोला है, एकदम चित न सोया करो, पर तुम बात मानो तब न!” उसके बगल में सो रही उसकी माँ ने कहा.

“”तुम्हें कितनी बार मना किया है कि शाम होने पर जे फिस.. फिस.. नहीं लगाया करो, न जाने कौन घुस जाएगा. तुम्हें पता नहीं कि जे आत्माएं भटकती रहतीं हैं और जिसका शरीर पसंद आता है, उसमें घुस जाती हैं!, अब तुम लोग ठहरे पढ़े लिखे, तो तुम लोग कहां बात मानोगे?””

“”नहीं मां, ऐसी बात नहीं है. मुझे नहाने के बाद डियो चाहिए ही चाहिए. मैं नहीं रह सकती उसके बिना!””

“”तो अब भुगतो जे, चलो सोय जाओ! नहीं तो अगर तुम्हाओ हाल तुम्हाई चाची जैसो न होय जाओ” ”

“”माँ, अब डराओ न!””

“”लो, जामें डराने जैसी कौन सी बात है” ?”

माँ उसका माथा दबा रही थी, पर उसके कानों में चल रहा था….

“”आवाज़ मैं न दूंगा”… ”

और यह आवाज़ उसके कलेजे को चीर रही है. ओह, कहीं वह भी तो अपनी चाची जैसी ही नहीं हो जाएगी? उसकी चाची का राज़ क्या था? मां ने कभी खुल कर कुछ नहीं बताया पर बेटी के मामले में कई सावधानियां बरतीं जिनमें शाम को इत्र लगाने की मनाही थी, चित्त सोने पर सख्त पाबंदी थी। कभी चित्त सोई मिलती तो मां आकर नींद में ही करवट लिटा देतीं। सोते समय मां आशिक जिन्न का किस्सा सुनातीं तो उसे रात में अजीब अजीब आवाजें सुनाई देतीं. उसे लगता कोई है जो उसकी चादर खींच रहा है, कोई है जो उसकी चप्पलें उठा रहा है. और वह पूरी रात न सो पाती.

उसके बाद जब तब मेडिकल में नहीं आ गयी, तब तक न तो उसने शाम को इत्र लगाया और न ही चित सोई. मां ने ऐसा करने ही नहीं दिया था। कहती कि जिन्न जवान लड़कियों का आशिक होता है। चित्त सोने पर काबू कर लेता है और इत्र लगाने पर खींचा चला आता है।

मां के इन किस्सों और वर्जनाओं से उसे मुक्ति तब मिली जब फीजियोथेरेपिस्ट की पढ़ाई के लिए शहर आई। इतनी मुश्किल से उसे डर से मुक्ति मिली थी कि ये आवाजें…

कोई अंदर है तो दो तीन दिन के बाद भी जबाव आएगा. वह उस दिन उस आवाज़ को ओढ़ कर सोई. हालांकि उसने चाहा था कि वह उसे उतार दे, पर उतार न सकी. दो तीन दिन बाद, उस मखमली आवाज़ को सुनने के लिए फिर से जा बैठी वह उन्हीं सीढ़ियों पर.

उसने गाना शुरू किया–

“साथी न समझ, कोई बात नहीं, कोई बात नहीं मुझे पास तो आने दे…””

कोई गुनगुना रहा है। फिर वही सन्नाटा पसर गया।

उसने अगरबत्ती लगाई, सुलगाई, उसने उस देहरी की सफाई की, अगर आत्मा होगी तो इस सफाई से जरूर खुश हो जाएगी, और अगर आदमी है कोई तो जरूर ही जबाव आएगा.

कोई आवाज़ नहीं आई, कोई सुगबुगाहट नहीं, कोई हलचल नहीं! वह निराश-सी होने लगी,

अरे! शायद कोई नहीं है, वहम ही था उसका!

“”अरे, आप सुन सकते हैं मुझे? मुझे सुनिए, मुझसे बात करिए! मैं आपकी मदद कर सकती हूँ, प्लीज़ मेरी बात सुनिए”…”

“कुछ तो बोलिए, आप कौन हैं? मैं इस हलचल में फंसती जा रही हूँ! आप कौन हैं? आप क्यों नहीं जबाव देते?””

फिर चुप्पी! एकदम चुप्पी वहां पर! उस फ्लैट में एकदम चुप्पी!

फिर बोझिल क़दमों से वह निकली!

तभी–

“”कोई दर्दभरी आवाज़ में गुनगुना रहा है!

कौन है जो न तो देहरी लांघ सकता है, और न वह उसे देख सकती है! वह उसके मखमलीपन में फंसी जा रही है! आखिर क्यों? क्या और कौन है अंदर?

अब वह इधर उधर से गुजरते समय कुछ न कुछ गुनगुनाती हुई निकलती, कि शायद कोई जबाव दे!  उधर से जबाव आता.

वह लता के गाने गाती, उधर से रफी के गानों की बरसात होती. अब वह समझ गयी थी, कि कोई तो है अंदर! एक दिन हिम्मत करके उसने फिर से गार्ड से बात की.

गार्ड ने उससे बेहद ही कड़े शब्दों में कहा- ““देखिये मैडम जी, आपकी बात मैं मकान मालिक से करा चुका हूँ, और आप चाहें तो या तो पुलिस की मदद लें या फिर कहीं और चली जाएं.” ”

ओह, वह कहाँ चली जाए? बहुत मुश्किल से तो इस घर में आ पाई है! इतने पैसे कहाँ है उसके पास.

वह क्या करे? उसकी नसों में चटकन होने लगती. दो दिन से वह अस्पताल नहीं गयी थी क्योंकि वह खुद को रफी के नगमों में बंधी हुई महसूस कर रही थी.

अब वह दिन में सीढ़ियों पर बैठकर गाना गाती और वहां से जबाव आता. वह आवाज़ लगाती, पर गानों के अलावा कोई और जबाव नहीं आता!

न जाने क्यों वह खुद को अलग नहीं कर पा रही थी. पर उसकी बात पर कोई भरोसा नहीं कर सकता था, कि कोई है अन्दर! कोई तो है!

यह सिलसिला लगभग दस दिन चला! दस दिनों में रफी के गानों से वह भीग गयी. उसका मन भीग गया. उसे लगता था कि कोई तो है अंदर जो उससे बात करता है, कोई तो है जो अपने दिल का हाल सुनाता है! कोई तो है जो चाहता है कि वह उससे बात करे! वह शायद अपना रहस्य बताना चाहता है! पर क्या है रहस्य? क्या है उसके दिल की बात?

दस दिनों में उसने हर तरह के गाने गाए, रोमांटिक, ज़िन्दगी से जुड़े हुए.

एक दिन उसने शरारत के मूड में एक ठुमरी गाई-

“”लट उलझी, सुलझा जा बालम…”

उसे लगा, आज तो उलझ गया, दो मिनट के बाद फुसफुसाहट और फिर वही आवाज़ आई…

“”कल तेरे बज्म से दीवाना चला जाएगा, समां रह जाएगी, परवाना चला जाएगा…””

उसकी आँखों से आंसू बह निकले. अंदर जो भी है, साधारण इंसान नहीं है. जो है, अद्भुत है, जो है अनोखा है, वह चाहती है वह बात करे, पर वह बात नहीं करता! वह चाहती है वह रहस्य बताए पर वह चुप है! कोई तो है! और जो है, वह अब उसके दिल के एकदम करीब आ चुका है. उसकी दर्दभरी गायकी ने उसे मोहपाश में बांध लिया है।

अब जब वह उन आवाजों को ओढ़ती है, तब वह अजनबी नहीं होती, वह उसकी अपनी हो चुकी हैं. वह एकदम करीब आ चुकी हैं.

वह उस मखमली आवाज़ के खोखलेपन को महसूस कर रही थी. पिछले कुछ दिनों से वह आवाज़ एकदम निराशावाले गाने गा रही थी. जैसे बहुत कुछ छूट रहा है उसका. जैसे बहुत कुछ वह खोने जा रही है. वह उसे लग रहा था कि वह आवाज़ उससे बिछड़ने वाली है.

अब एक और आवाज़ आने लगी थी. अब कोई मुकेश के भी गाने को गाने लगा था. दोनों की जुगलबंदी शुरू हो जाती.

ओह, उसकी आवाज़ उस दरवाजे पर जाकर वापस आ जाती. वह दस्तक देकर लौट आती. वह चाहती थी, कि उसकी आवाज़ उस मोटे ताले को तोड़कर अंदर जाए और उन हलचलों को अपने पास ले आए. वे हलचलें भविष्य में किसी बात की तरफ इशारा कर रही थीं. कुछ तो हो रहा था, कुछ तो शीशा पिघल रहा था. और पिघल कर उसके कानों में गिर रहा था. वह चाहती थी कि उस पिघले शीशे की धार मोड़ दे, पर वह मोड़ नहीं पाई! वह क्या करे? बहुत कुछ तो था करने के लिए, पर वह अपनी नौकरी भी भूल चुकी थी!

आवाजों के खंडहर से जो आवाजें आतीं, वह उसे बेचैन कर देतीं.

वह उन खंडहरों से भटक जाती, कभी रफी के नगमे- ““तुझको पुकारे मेरा प्यार”

“चाहूंगा मैं तुझे शाम सवेरे”…मैं ज़िन्दगी का साथ निभाता चला गया…””

”और वह पसीने से तर होकर जाग उठती. आखिर क्या हो रहा था? उसके साथ यह क्या हो रहा था? उसके हर लम्हे में वे गाने थे. न केवल वे गाने बल्कि यह रहस्य भी कि आखिर उस घर में हो क्या रहा था? वे आवाजें कौन थी? वे लम्हें कौन से थे? वे क्या लिखने जा रही थीं? वह कौन है, जो उसके पहुँचते ही गाने लगता है.

और वह पिघलने लगती थी. वह जल उठती थी उस आवाज़ का पता लगाने के लिए. वह कौन है? क्या कोई अतृप्त आत्मा है जो कहीं से भटक कर आ गयी है? और वह आत्मा शायद रफी की फैन हो?

इस रात वह फिर सीढ़ियों पर आकर बैठ गई। उसकी आहट सुन कर अंदर से वही गाना आया पिछले दो तीन दिन से आ रहा था…

“आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले…””

ओह, कौन कब जा रहा है? क्या आत्मा की मुक्ति का समय आ गया है? क्या वह आत्मा जल्द ही इस फ्लैट को छोड़कर चली जाएगी? क्या वह अब कभी उसे नहीं सुन पाएगी? ओह, नहीं, नहीं! प्रभु, उसकी मुक्ति नहीं! उसकी मुक्ति नहीं! वह उसकी मुक्ति नहीं चाहती! उसकी दादी हमेशा कहती थीं कि हर आत्मा कुछ समय के लिए भटकती है! ओह, तो क्या यह वही आत्मा तो नहीं जो भटक रही होगी? पर किसके लिए? क्या कोई ऐसी इच्छा है, जो उसकी पूरी नहीं हुई? क्या वाकई  रफी-प्रेमी आत्मा की कोई अंतिम इच्छा रह गयी होगी? उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था!

वह रोना चाहती थी पर रो नहीं पा रही थी, उस रात बहुत कुछ परछाइयों ने उससे कहा, और वह उन रेंगती परछाइयों की गिरफ्त में आ गयी. वह फँस गयी, वह निकलना चाहती थी पर वह निकल ना पाई. उसे वह फ्लैट एकदम अपने स्कूल के उस कमरे जैसा लगने लगा जहां पर एक कहानी रहती थी.

संभव है, ऐसी ही कोई कहानी इस फ्लैट की रही होगी.

“”वह अपनी बेबसी पर रो उठी! उसका मन हो रहा था कि वह आरी ले ले और काट डाले उस दरवाजे को, जिसके पीछे वे आवाजें कैद थीं. उन आवाजों को खोजना इतना सरल न था. वह उन खोहों में फंस गयी थी! वह निकल नहीं पा रही थी! प्रभु, उन्हें मुक्ति न देना! और अगर मुक्ति देना भी तो मुझे दिखा देना!” वह पूरी रात न सो सकी थी.

सुबह के तीन बजे, कुछ हलचलें उसके फ्लैट के सामने हो रही थीं, उसने आज फिर उन हलचलों को झूठ समझा! वह सिमट गयी थी. रहस्य उसे अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा था. उसे जल्दी सुबह का इंतजार था।

आज भी आम सुबह थी. हर दिन की तरह बहुत भागादौड़ी थी. उसे रात की हलचलों और फुसफुसाहटों के कारण रोज़ ही देरी हो रही थी, उस दिन भी अपवाद न था.

नैंसी मेन गेट से होती हुई गलियारे में दाखिल हुई कि सामने से डॉ.शांतनु दिखे.

“”हाय नैंसी, क्या हुआ बहुत परेशान दिख रही हो। ऑल वेल? देखो, तुम्हारे पेशेंट आ गए होगें।“

वे उतनी हड़बड़ी में थे कि नैंसी का जवाब बिना सुने अपने केबिन में घुस गए।

पेशेंट क्या, भांति भांति के टूटे-फूटे लोग जो मरम्मत के बाद कई कई दिन अपनी हड्डियों पर मोम चढ़वा कर, सिंकाई करवाते और नैंसी को दुआएं देते लौट जाते।

सरकारी अस्पताल की भीड़ मिली जुली होती है जिसमें चोर सिपाही सब एक साथ आते हैं। वह जानती थी कि कुछ पेशेंट लाइन लगाने के डर से सुबह ही धरना देकर बैठे होंगे। पर वह क्या आज रोज की तरह उनकी हड्डियों पर मोम के साथ अपनी स्निग्ध मुस्कान का लेप चढ़ा पाएगी। अनमनी-सी वह गलियारे में निकल पड़ी।

पता नहीं क्या मन में आया कि अपने विभाग की तरफ न जाकर शांतनु के कमरे केबिन की तरफ मुड़ गई। हमेशा बाहर खड़ा रहने वाला उनका सहायक भी गायब था।

डॉ.शांतनु के कमरे में बैठे तीन लोग अजीब-सी हंसी हंस रहे हैं. एक पुलिस अधिकारी था। उनमें एक सादे ड्रेस में सामान्य कदकाठी का आदमी पर विचित्र-सा। उसे आदमी संदिग्ध लगा। वार्ड व्बाय वहीं हाथ बांधे खड़ा था। वह थोड़ा-सा अपसेट लग रहा था। उसके चेहरे पर शिकन थी। अपने मेंटोर, बुजुर्ग शांतनु को इस तरह निर्ल्लज हंसी हंसते हुए पहली बार देख रही थी। जब भी मिलते, मुस्कुराते रहते। आज उनकी सोंधी मुस्कान बारिश के बाद कूड़े के ढेर को छू कर आती हवा-सी लग रही थी। छोटा-सा केबिन और वहां होने वाली सारी बातचीत विचित्र थीं और वह समझ नहीं पा रही थी कि केबिन से भाग जाए या खाली स्टूल पर बैठ कर सुने सारी बातें।

”यू नो, ये एक मोस्ट वांटेड अपराधी था! कैंपस में जाकर छात्रों का नेता बन गया था। होस्टल में छिपता फिर रहा था! पुलिस इसे हर तरफ ढूंढ रही थीं! वैसे सुनते हैं, कि बहुत ही पढ़ा लिखा था, टॉपर था! लेकिन नेतागिरी में बरबाद हो गया। यूनिवर्सिटी कैंपस का सारा माहौल ही खराब कर दिया था। कमीने सब के सब इसके साथ मिलके देश के खिलाफ जहर उगलते थे…”

“निपटा दिया साले को…। ले के रहेंगे ले के रहेंगे…तो लेओ…दे दिया।

दारोगा खींसे निपोर रहा था।

“आओ नैंसी…बैठो…कुछ खास, सब ठीक तो है न। ”

””नहीं सर, लेकिन मुझे आपसे अकेले में कुछ बात करनी है।”

“”बोलो, यहीं बोलो कोई बात नहीं, ये रिपोर्ट लेने ही आए हैं। इन्हीं का कारनामा है, इनसे ही आधी रात को मुठभेड़ में मारा गया है एक देशद्रो…क्रिमिनल…“

“सर, लेकिन…एक गड़बड़ है…”

दारोगा धीरे से बात करता हुआ झुका। कागजों में से एक फोटो निकाल कर दिखाते हुए फुसफुसाया–

“जहां बाएं साइड में सीने में गोली लगी है वहां काले काले प्वाइंटस दिख रहे, गोदना जैसे फोटो में। सर ये तो पास से गोली चलाने की साइन होती है। रिपोर्ट में लिखेंगे कि आठ फीट की दूरी से गोली लगी. ये नजदीक का मामला है, पास से गोली मारी गई है. फोटो में जो ये काले काले धब्बे हैं, वो फोटोशॉप में साफ करवाना होगा। आप मेरे प्वाइंटस पर ही ध्यान केंद्रित करिए।“

नैन्सी के कान खड़े हो गए। वह बैठ नहीं पाई।

डॉ. शांतनु ने वार्ड ब्वाय को कुछ निर्देश देकर बाहर भेजा और खुद फिर से पुलिस वाले के साथ गपशप में मशगूल हो गए। नैन्सी को लगा, वह उस केबिन में अप्रासंगिक हो चुकी है।

एक पल वह ठिठकी..फिर बाहर चली गई। दारोगा की निगाह उसका पीछा कर रही थी। उसे लगा कि उसकी पीठ पर दो संदिग्ध आंखें चिपक गई हैं।

“मुझे उम्मीद है, आप इन बातों को अपने तक रखेंगी मिस नैन्सी..।“ शांतनु की आवाज थी।

अंदर से हंसने की आवाजें आ रही थीं। शांतनु बधाई दे रहे थे पुलिस वाले को.

“आपको तरक्की, इनाम सब मुबारक…बड़ा काम अंजाम दिया आपने, कल देखना, पेपर सारे भरे पड़े होंगे आपकी बहादुरी के किस्सों से…”

“क्या बताऊं डाक साब…बड़ा हिम्मती था ये शाहिद अब्बास…किसी से नहीं डरता था। बेखौफ था साला, हर समय गाने गाता रहता था, नारे लगाता रहता था, जब पकड़ा उसको तब भी नहीं कांपा। बोलता था, साब मार दीजिए हमें, जितनी जल्दी हो, मौत का इंतजार मत करवाइए साब…। पट्ठे को महीने भर खिलापिला के तैयार किया और जिस दिन मरना था, उस दिन साला पसीने से नहा गया था. गायक बन गया था साला. गाना गा रहा था…कांप रहा था…गा रहा था…कांप रहा था…हो हो हो…रफी की आत्मा समा गई थी…गाते गाते मरा.”

सादी ड्रेस वाले आदमी ने कुछ सामान डाक्टर के टेबल पर रखा।

एक पुरानी उधड़ी जिल्द वाली किताब थी…रफी की मुस्कुराती हुई फोटो पर लिखा था-रफी के अनमोल नगमें।

“हमने उसका सारा सामान फोरेंसिक लैंब में भेज दिया बस यही रख लिया। इसकी जांच कराके क्या मिलना।“

डॉ.शांतनु बोल रहे थे-

”अपराधियों को भी अपनी जिंदगी प्यारी होती है, अपनी मौत सामने देख कर कौन न कांपेगा, रफी के गाने सुनने वाला भला मरना क्यों चाहेगा, जरुर इश्क का मारा होगा बेचारा…”

बाहर वार्ड ब्वाय बड़बड़ा रहा है-

“पैसे लेकर गलत रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं सर…अच्छी बात नही है, हद है कि घूसखोर पुलिस भी घूस देती है।“

बंद फ्लैट का तिलिस्म टूटने लगा था। तो वहां रखे जाते हैं एनकाउंटर के मुंतजिर। उसने माथा पकड़ लिया। कान में आवाजों का कोरस गूंज रहा था।

सारी फुसफुसाहटें करुण नाद में बदल रही थीं। वे सारी आवाजें, बड़बड़ाहटें डि-कोड हो रही थीं जिन्हें वह तब नहीं समझ पा रही थी। उस तिलिस्म को तोड़ने के बारे में खयाल उठा, और भय की लहर हड्डी को चीर गई। उसे वीडियों क्लिपिंग्स की याद आई जिसमें एक सुंदर सा नौजवान देर रात छात्रों की भीड़ से घिरा नारेबाजी कर रहा है। भीड़ उसके पीछे पागल दिख रही थी। वह देशद्रोही करार दिया जा चुका था। उसके अपराधों की लिस्ट तैयार की जा चुकी थी। और वह फरार था, पुलिस उसे खोज रही थी। वह सरगना घोषित किया जा चुका था। उसके पक्ष में कोई गवाह नहीं। एक कहानी खत्म हो गई थी हमेशा के लिए। कुछ और कहानियों का तिलिस्म बाकी है। उसे लगा, वह अदालत में खड़ी है, गवाही दे रही है पुलिस के खिलाफ। पुलिस दूर से किसी की तरफ ऊंगली दिखा रही है। उसकी विधवा मां चेहरे पर तूफान लिए खड़ी हैं। तूफान उसे लपेट रहा है। वह कंपकंपा गई।

ओह, यह खेल चल रहा है।

नैंसी की आँखों में काली घटाएं उमड़ आईं थीं। कानों में रफी के नगमें बजने लगे।

 ओह, रफी, आज की रात मेरे दिल की सलामी ले ले”…

ओह, क्या यही मुक्ति थी? वह मुक्ति और प्रेम में फंस गयी? आखिरी रात का गाना यही तो था। तीन बजे रात से जो उसकी बेचैनी थी, जो हलचल थी, वह इस तरह शांत होने वाली थी? वह घर की तरफ कदम बढ़ा रही है और उसकी नसों में गाना बज रहा है. नैंसी भाग रही है, होठ थरथरा रहे हैं पर कोई गाना नहीं फूट रहा…।

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