मुंबई का प्रतिरोध ज़ारी है

जेएनयू में विद्यार्थियों के ऊपर हुए हमले के बाद स्वतःस्फूर्त ढंग से कई स्थानों पर प्रदर्शन हुए। मुंबई में गेटवे ऑफ़ इंडिया पर हुए प्रदर्शन में युवा लेखिका अनुकृति उपाध्याय ने भी भाग लिया था। उन्होंने उस माहौल, उस अनुभव का आँखों देखा हाल लिखा है-

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ऑक्युपाइ गेट वे

गेट वे ऑफ़ इण्डिया के पीत-भूरे मेहराबदार द्वार और मीनारों-छतरियों से उड़ कर कबूतरों का गोल, ताज के लाल गुम्बदों से मंडित श्वेत-सलेटी मुख्य-फलक और कटावदार खिड़कियों पर छा गए हैं।  एक नवविवाहित जोड़ा हाथ थामे खड़ा है।  गुलाबी पोशाक़ पहने युवती की काजल-अँजी आँखें जिज्ञासा से गोल हैं।  युवक अपनी देह का भार एक पैर से दूसरे पर डालता रुके रहने और चल देने के बीच डोल रहा है। वगेट वे का विशाल प्रांगण पीले-पुते, धातुई डिवाइडर से अवरुद्ध है।  ख़ाकी वर्दियों में पुलिस के दल के दल डिवाइडर के पीछे और ताज होटल के सामने वाले फुटपाथ पर फैले हैं। वॉकी-टॉकी चर-चरा रहे हैं। रिपोर्टर माइक हाथ में लिए मक्खियों से भनभना रहे हैं।  टीवी चैनलों के कैमरा की मशीनी आँखें बर्राहट के साथ सब यंत्रस्थ कर रही हैं। इन सब से निरपेक्ष,  सिर पर जलते सूर्य से बेपरवाह, सड़क-किनारे के अनगढ़ काले पत्थरों पर कुछ लोग बैठे हैं।  डफली ठनक रही है।  नारे बुलंद हैं।  पैरों से ताल दी जा रही है। ‘सरफ़रोशी की तमन्ना ‘ अभी-अभी ख़त्म हुआ है और ‘हम होंगे कामयाब’ का मुखड़ा उठाया गया है।  पुलिस के घेरे में विद्यार्थियों, युवा काम-काजियों, अधेड़ सहृदयों और बूढ़े जोशीलों का दल इन्क़िलाब का उत्सव मना  रहा है। ये ‘ऑक्युपाइ गेट वे’ है, ब्रिटिश दमन का प्रतीक  चिह्न  गेट वे ऑफ़ इण्डिया छेक कर शासन-तंत्र के दमन का विरोध। सोमवार सुबह के ग्यारह बजे हैं और  लोग काम काज छोड़ कर आए हैं।  बम्बई ने अपना खरापन दिखा दिया है। नवविवाहित जोड़ा वरुण ग्रोवर की ‘हम कागज़ नहीं दिखाएंगे ‘ के सम्मोहन में बँधा रुका रहता है।

गायकों का छोटा सा दल दम लेने रुका है। एक व्यक्ति जो इस छोटे से समूह के एक छोर पर खड़ा चुपचाप देख रहा था नारों की कमान सँभालता है। ‘हल्ला बोल’ ‘हम क्या माँगें आज़ादी ‘ और ‘इन्क़िलाबो, इन्क़िलाबो , इन्क़िलाबो ज़िंदाबाद’ के करारे नारे तालियों की ताल पर गूँजने लगते हैं। धरने पर बैठे जन जोश में कसमसा उठते हैं।  नारों के दौर के बाद वह व्यक्ति कुछ कहना चाहता है।  वह जे. एन।  यू.  का एन. साईं बाला जी  है।  वह विद्यार्थियों और शिक्षकों पर हुए हमले के बारे में बोलता है, ‘यह आपको मीडिया नहीं बताएगा, लेकिन मैं बता रहा हूँ।  ‘ वह हमलावरों के नाम गिनाने लगता है,  वे कैसे बेधड़क हॉस्टलों और विश्व विद्यालय परिसर में घुस आए , कैसे पत्थरों , लाठियों से घेर कर मारने लगे , कैसे वी. सी. और प्रशासन और पुलिस तमाशाबीन बने रहे।  ‘फीस बढ़ाने के विरुद्ध हम शान्तिपूर्ण  प्रदर्शन कर रहे थे और हमारे साथियों को मारा गया।  मुझे बहुत दुःख है कि मैं कल रात अपने साथियों के साथ नहीं था, मैंने कल उनके साथ पत्थर -लाठियाँ नहीं खाए।  उस माहौल में भी मैं उन के साथ सुरक्षित महसूस करता।’ दोपहरी की धूप में दहशत भरी रात नमूदार होती है, सुनने वालों के बदन असहाय हतप्रभ लोगों के डर की सुरसुरी से भर जाते हैं ।

इस बीच एक मंत्री और उनके कुछ संतरी पधारे हैं ।  लोग उन पर तिरस्कार भरी दृष्टि डालते हैं ।  जन-मन भाँप कर वे धरने वालों के साथ धरती पर बैठ जाते हैं ।  मीडिया के लोगों में कुछ सरगर्मी होने लगी   वे घूम घूम कर लोगों की प्रतिक्रिया पूछने लगे । साईं बाला जी बिना माइक के बोल रहा है और मीडिया वालों के चख-मख से सुनने में अड़चन आ रही है ।  उन्हें चुप रहने के लिए कहा जाने लगा और झल्लाए लोगों ने ‘गोदी मीडिया ‘ के नारे लगाए।   एक युवा रिपोर्टर ने विरोध किया।  ‘हाओ कैन यू से दिस? ये ठीक नही… ‘ नारे ‘शेम , शेम ‘ के शोर में बदल गए।  रिपोर्टर तुनक कर चली गई।  गेहूं के साथ शायद घुन पिस  गया।  एक प्रदर्शन कारी ने कहा कि सारे मीडिया वालों पर आरोप नहीं लगाया जा सकता , कुछ अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं , सही समाचार दिखा रहे हैं। मंत्री जी के साथी ने कहा – ‘क्या व्यर्थ की बातें हैं, जी , नारे लगाओ, नारे।’ प्रदर्शनकारियों ने उन्हें हिक़ारत से देखा।  यह हमारा प्रदर्शन है , आप कौन अपनी बात थोपने वाले।  मंत्री जी ने इंगित से साथी को चुप किया और टिप्पणी के इच्छुक मीडिया वाले को हाथ हिलाकर, ‘मैं यहां नागरिक के तौर पर आया हूँ…. ‘  साईं बाला जी ने  रिपब्लिक और टाइम्स नाओ के पत्रकारों  के अपने माइक पर से चैनल के नाम-पट्ट हटा कर आने पर चुटकी ली और मीडिया को यूनियन बनाने की सलाह दी।  चारों तरफ लोग मीडिया पर आक्रोश जताने लगे।  मंत्री जी उठ खड़े हुए।  ‘छाँव में प्रदर्शन का बंदोबस्त देखता हूँ, पुलिस से बात करता हूँ… ‘ ‘हम कहीं यहीं जाएंगे, यहीं धरना ज़ारी रहेगा। धूप छाँह हमारे लिए बराबर है … ‘ कुछ आयोजकों ने आवाज़  लगाई। हवा का रुख भाँपने में वे मीडिया से बेहतर निकले और अपने लवाज़मे के साथ  रुखसत हुए।  जाते जाते नारा भी लगा गए ‘जे. एन . यू. तेरे जज़्बे को अस्सलाम अस्सलाम !’ उनकी राजनीतिक सूझ -बूझ पर नतमस्तक होना पड़ा।  एक लड़की ने मीडिया के लोगों को व्यक्तिगत रूप से लानत मलामत न करें की अपील दोहराई।  लोग अलग-अलग मत रखने लगे।  गिटार लिए बैठा  एक प्रदर्शनकारी कहता है , ‘अब संगीत हो जाए, नाओ फॉर सम म्यूजिक… ‘   चिलचिलाती धूप में पसीनातर लोग साज़ उठा लेते हैं।  मुंबई का प्रतिरोध ज़ारी है।

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