सौम्या बैजल की नई कविताएँ

हिंदी का विस्तार अनेक रूपों में हुआ है. सबसे उत्साहवर्धक बात यह है कि हिंदी में अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों ने लिखना शुरू किया. अलग-अलग पेशों को लोग हिंदी में लिख रहे हैं. जिनको हिंदी में आउटसाइडर समझे जाने वाले लोग आज इनसाइडर माने जा रहे हैं, और उनके लेखन में ताजगी भी है. सौम्या बैजल ऐसी ही एक कवयित्री हैं. आज उनकी दो कविताएँ- मॉडरेटर
========================
घर 
साथ चलते चलते
हमारे कदम
एक ही लय में हो लिए
हाथ पल पल टकरा- टकरा कर
देखो, साथ हो लिए
भीड़ में तुम्हारी आँखें
मुझे ढूंढ रही थी
आँखें मिलते ही जैसे
खुद को मुझमें ढूंढ रही थी.
क्यों तुम्हारी बांहों में
सिमट कर सांस लेना चाहती हूँ मैं ?
क्यों धीरे धीरे तुमसे सट कर
बिखरना चाहती हूँ मैं ?
टूटना चाहती हूँ.
थक गयी हूँ लड़ते लड़ते
कभी दुनिया की आकांक्षाओं से
और कभी खुद की, खुद से रखी हुई आशाओं से।
यह नहीं कहती की तुम मुझे समेटो
नहीं. न तुम्हारा दायित्व हूँ, न तुम्हारी कमज़ोरी
तुम्हारी इच्छा बनना चाहती हूँ,
जिसे तुम रोज़ दुआ में मांगो.
फूलों की बरसात नहीं चाहती
कागज़ पर कविताएं नहीं मांगती
अपने हाथों में तुम्हारे हाथ चाहती हूँ,
जिनकी गर्माहट एक दूसरे में खो जाए कहीं.
तुम्हारी आवाज़ चाहती हूँ,
जो मेरे आगे बिलख भी ले, और हंस भी
तुम्हारी मृदुता चाहती हूँ,
जिसे छुपा कर तुम चलते हो.
तुम्हारे ख़ौफ़ , तुम्हारे डर जानना चाहती हूँ,
किस बात से चौंक जाओ वह समझना चाहती हूँ,
तुम्हारी बेचैनियों के साथ
हमारा चैन ढूंढ़ना चाहती हूँ.
चाहती हूँ कि तुम वह भी समझो जो मैं नहीं कहती
सन्नाटों में आहिस्ता चलते मेरे क़दमों की
आहट पहचानो तुम कभी
सोते, चलते आँखें मीचते, पलकों में बैठाओ तुम कभी.
चाहती हूँ कुछ राज़ रख दो
मेरी पलकों पर तुम कभी
आँखें खोलकर जब मैं देखूं
मिले मुझे कहानियां नयी.
जहाँ हम घंटो बिना कुछ कहे
बैठे रहें , तुम भी और मैं भी
ख़ामोशी से दास्तानें कहें
हम भी और तुम भी.
आओ चलो सपनो की नींव रखें
मिटटी के घरौंदे में नहीं,
आओ एक दूसरे में,
घर ढूंढे अपना कहीं.
कई बार सोचती हूँ
कई बार सोचती हूँ,
कि क्या मेरा तुम्हें
बेक़रारी से याद करना,
तुम्हे नींद से जगाता होगा?
क्या वह इंतज़ार
जो मैंने तुम्हारा किया है
क्या उसने तुम्हें
बैचैन किया होगा?
क्या हर उस चीज़ से तुम्हारा हाथ टकराना
जिसे मैंने कई बार छुआ है,
तुम्हे कभी भी
मेरे स्पर्श की याद दिलाता होगा?
क्या जिस तरह
गाड़ी में बैठकर
मेरे हाथ खालीपन टटोलते हैं,
तुम्हारे हाथों को कोई मिल जाता होगा?
क्या कभी कुछ पढ़ते ही,
मुझे कुछ सुनाने का मन करता है तुम्हारा?
या उस किताब के बीते हुए पन्नों में
मेरा भी अस्तित्व खो जाता होगा?
कभी अकेले सोचा है,
कि अगर हम साथ होते तो क्या होता?
शायद चेहरे पर झुर्रियां साथ उमड़ती,
लेकिन रिश्ता सदा ताज़ा रहता
कह दो कि तुम भी,
मेरी आवाज़ सुनते चलते हो,
कहीं तुम्हारे अपने गहरेपन में,
अब मैं घर कर चुकी हूँ.

More From Author

सिंगापुर शहर कम है, उपभोक्तावाद का मंदिर है

पंकज कौरव और राहू सीरिज की चार कविताएँ

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

जानकी पुल को सहयोग करें

Jankipul : A Bridge of World's Literature एक नयी शुरुआत! मेरा कॉलम #Jankipul के लिए " जनहित में जारी सब पर भारी" आपकी टिप्पणी की अपेक्षा रहेगी