पंकज कौरव और राहू सीरिज की चार कविताएँ

पंकज कौरव का लेखन मुझे इसलिए बहुत पसंद है क्योंकि लेखन में प्रयोग का साहस उनके अन्दर है और वे अपने प्रयोगों को साध भी लेते हैं. मसलन छाया ग्रह राहू को लेकर लिखी गई उनकी कविताएँ पढ़िए- मॉडरेटर
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राहु – 1
 
मैं न होकर भी उतना हूं
जितना तुम होकर भी नहीं
 
 
 
हां भ्रम हूं मैं
मेरा 
कोई एक रूप नहीं
इसकी उसकी और 
चाहो जिसकी छाया हूँ मैं
मैं रहस्य हूं
और
आलस्य भी मैं ही हूं
 
 
 
मैं बांस की फांस हूँ
और
सुरीली तान छेड़ती
बांसुरी को फूंकने वाली श्वास भी हूं
 
 
 
कमान तान ली जो
तो डोर हूँ और तीर भी मैं ही हूं
बारूद का ढेर
मैं अपने पिछवाड़े में रखता हूं
फट जाऊं तो बम हूँ
सलीके से सुलगाया 
तो रॉकेट और मिसाइल भी हूं
 
 
 
जब प्रेम में हूँ
तो राधा के मिलन की प्यास हूँ
मीरा के लिए दरस की आस भी मैं ही हूँ
चिलम भी मैं
और कलम मैं
मस्तराम की मस्ती भी मैं हूँ
और
आशाराम जैसे संतों की
अय्याशी की बस्ती भी मैं ही हूं
 
 
 
हाँ 
मैं एक टैबू हूँ
इंटरनेट का सारा मायाजाल 
मुझसे है
ट्रोल भी मैं
और एक्ज़िट पोल भी मैं ही हूं
 
 
 
पोर्न भी मैं
और पॉपकॉर्न भी
सनी लियोनी भी मैं
और
सनी देओल भी मैं ही हूं
मैं ही आलिया हूं
और
जॉन एलिया भी मैं ही हूं
 
 
 
कॉर्नर की सीट भी मैं
हॉउसफुल का बोर्ड देख 
प्रेमी जोड़े के दिल में उठने वाली
टीस भी मैं ही हूँ
कैमरे का लैंस भी मैं
ऑस्कर विनिंग परफॉर्मेंस भी मैं
दुनिया के अमीरों का बैंक बैलेंस भी मैं ही हूँ
 
 
 
वनस्पतियों में मैं अफीम और गांजा हूँ
अपने मन का राजा हूँ
 
 
सविता भाभी की चाहत मैं
ऑफिस में लेडीज़ टॉयलेट के बाहर
ठरकी बुड्ढों की आहट भी मैं
गे भी मैं
और
बायसेक्ससुअल भी मैं ही हूँ
हस्तमैथुन करते हुए दिमाग में तैरने वाला चित्र हूं
मैं सचमुच बड़ा विचित्र हूं
 
 
 
मैं रिस्क भी हूं
पॉलिटिक्स भी
विवाद मैं ही पैदा करता हूं
शक भी मैं हूं
और
नेताओं की चिर बकबक भी मैं ही हूं
 
 
 
सबको मैं ही लगाता सुर्खाब के पर
मैं ही सुर्खियां देता हूं
बिदरोही मैं बहुरूपिया मैं
बिदेसिया भी मैं ही हूं
मुझ में से ही जन्म लेतीं हैं
विदेश भ्रमण की सारी इच्छाएं
मेरा ही पराक्रम बना देता है
किसी को शत्रुहंता
तो किसी को आत्महंता
 
 
 
लेकिन कुछ ऐसा भी है
जिससे मैं खुद भी ख़ौफ़ खाता हूं
परंपराओं की बेड़ियों मेरा दम घोंट देती हैं
और
धर्म साबुत निगल जाता है
सूरज और चांद को ग्रहण लगाने वाले
इस राहु की आत्मा
 
 
 
धर्म ही हर बार
मेरा हत्यारा रहा है
क्योंकि मैं धर्मों का
एक सबसे बड़ा राज जानता हूं
 
 
 
दरअसल
इस धरती पर किसी भी धर्म में
अपने संस्थापकों का कोई अंश बचा ही नहीं
सारे के सारे पता नहीं किसकी नाजायज़ औलादें हैं?
 
 
 
राहु – 2
 
उनके प्रचारित 
इस झूठ में
कुछ भी झूठ नहीं
कि 
अमृत मंथन में छल
सिर्फ हम असुरों ने किया था
 
 
 
आखिर वे देव थे
भला उन्हें 
अमृत की क्या ज़रूरत?
 
 
 
उनके पास सबकुछ था
विलासिता में डूबी उनकी काया
कंचन सी चमकती थी
उनके यहां स्त्रियां
या तो देवी थीं या अप्सराएं
बावजूद इसके
बच्चे पैदा करने के अलावा
वे कुछ नहीं कर सकते थे
 
 
 
जबकि हमने 
ज़मीन जोतकर 
पैदा कीं फसलें,
हम ने ही बनाई 
उनके नगर तक
अनाज ले कर जाने वाली सड़कें
हम ही गाड़ीबान बनें और बैल भी
इतना ही नहीं
वे आसानी से
सारा अनाज पचा सकें 
इसके लिए 
हमने ही जंगलों में खोजीं
ऐसी जड़ी-बूटियां जो भड़का सकें उनकी जठराग्नि
 
 
 
खैर हम असुर थे ही मूर्ख
लेकिन
दुनिया को भ्रम में रखने वाला
मैं राहु
आखिर कैसे उनकी बातों में आ गया
कि
होता होगा ऐसा कोई रस 
जो अमर कर देता है
यह जानते हुए कि
महुआ की मादक गंध से
पल भर में 
स्वर्ग का द्वार खोलने
का हुनर भी
उन्होंने हमसे ही सीखा था
 
 
 
चलो माना 
हमसे गलती हुई
लेकिन सांप का फ़न पकड़कर
खींचने का पराक्रम भी उनमें कहाँ था?
उन्होंने तो डरते हुए बस पूंछ पकड़ी
पता नहीं 
पहाड़ के उस पार उन्होंने
वाकई सांप को पूंछ की ओर से
पकड़ा भी था या नहीं?
या कि 
किसी विशाल बरगद या पीपल से 
बांध रखा था
और क्या सचमुच
वह कोई सांप ही था?
क्योंकि 
उसे खींचने में हमारी देह से
स्वेद की धार फूट पड़ती थी
जिसके बाद वह सांप
स्प्रिंग के मानिंद 
खुद सिकुड़ जाता था
हम फिर खींचते
वह फिर सिकुड़ जाता
हम खींचते रहे वह सिकुड़ता रहा
 
 
 
हमें भरोसा था
हमारा स्वेद 
समुद्र से निकलने वाले अमृत का 
सारा खारापन सोख लेगा
उम्मीद थी कि
उसकी मिठास शाश्वत 
और शीतलता अनंत काल तक 
टिकी रहने वाली साबित होगी
हमने
चिरयौवन निरोगी काया को
अपने सारे संघर्षों के
खात्मे की गारंटी माना
यह बेशक हमारी गलती रही
 
 
 
हमें 
जल्दी समझ लेना चाहिए था
संसार का वह सबसे बड़ा झूठ
पर
वह धोखा 
बड़ी चतुराई से रचा गया था
हम इधर अमृत की कामना में 
सागर मथते रहे
उधर
मंथन से निकली चीजों से 
उन्होंने अपना घर भर लिया
 
 
 
काश कि मुझे पहले पता होता 
अमृत जैसा कुछ होता ही नहीं
सपनों और कामनाओं को छोड़
मौत सबको आती है
 
 
 
सबसे डरावनी बात 
यही रही
कि 
मेरी अधूरी कामनाएं 
ज़िंदा रह गईं
मेरे अधूरे सपनें चिरकाल तक 
भटकने-भटकाने के लिए छूट गए
 
 
 
क्योंकि
अमृत मंथन जैसे उस प्रहसन के बाद
अंत में उन्होंने
मेरा गला रेत दिया था…
 
 
 
 
 
राहु – 3
 
ज्ञात कैसे
अज्ञात को रोके खड़ा है
 
 
 
नौ से बढ़कर
अब रस ग्यारह हो गए हैं
 
पर काव्य में
जस की तस है
बारहवें रस की उत्पत्ति की संभावना
सिर्फ रहस्य ही
हर गणना से बाहर रहा है
 
 
 
तेरहवीं की पांत में खाते हुए
दोने के तल्ले पर बची रह गई
गुलाबजामुन की चाशनी भी रस है
लेकिन
रहस्य नहीं
 
 
 
जन्म, जरा, मरण
का रहस्य सुलझाने
जब भी कोई सिद्धार्थ महल त्यागेगा
वह त्याग स्वंय ही सिद्ध करेगा
अज्ञात का रहस्य
पर जब वह सारे रहस्य सुलझाकर
लौटेगा वापस संसार में
तब भी बहुत सा रहस्य बचा रह जाएगा
 
 
 
फिर फिर कोई महल छोड़ चल देगा
और 
बनकर लौटता रहेगा गौतम बुद्ध
 
 
 
देखो
बुद्धत्व कैसी अनंत प्रक्रिया है
तब भी तुम
ज्ञात के दंभ में कैसे
अज्ञात को रोके खड़े हो
बिल्कुल अपनी ज़िद पे अड़े हो
कितने बुद्धू हो तुम
सचमुच एकदम फुदुदू हो तुम…
 
 
 
राहु – 4
 
क्या चंद्र की तरह
सुखदुख में
घटता बढ़ता है तुम्हारा मन?
 
 
 
तुम
बेशक तर्क दे सकते हो
चांद से तुम्हारे मन का क्या वास्ता?
 
 
 
लेकिन इतना तय है
मुझसे पहले गर तुमने
नहीं जीता अपना मन
तो
मैं जीत लूंगा
 
 
 
फिर मत कहना
लग गया ग्रहण…

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