मुझे दो मेरी ही उम्र का एक दुःख

आज दोपहर २.३० बजे इण्डिया इंटरनेशनल सेंटर में तस्लीमा नसरीन की सौ कविताओं के संचयन ‘मुझे देना और प्रेम’ का लोकार्पण है. वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक की कविताओं का अनुवाद किया है हिंदी के प्रसिद्ध कवि प्रयाग शुक्ल ने. उसी संचयन से दो कविताएँ- जानकी पुल.
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तुम्हें दुःख देना अच्छा लगता है
मुझे दो मेरी ही उम्र का एक दुःख
मुझे दुःख पाना अच्छा लगता है
दुःख के साथ घूमूंगी दिन भर,
दुःख में सनी खेलूंगी खुले मैदान में
दुःख के साथ दुपहर भर पोखर में डुबकी लगाकर
ब्रह्मपुत्र का किनारा छूकर
सुख के दो-एक प्रसंगों की बातें करती हुई लौटूंगी घर.
मुझे मेरी ही उम्र का एक दुःख दो
मुझे दुःख पाना अच्छा लगता है.
दुःख को लेकर साथ,
स्मृति के पैरों में घुंघरू बाँध
पूरी शाम मधुमक्खी की भन भन सुनूंगी
रात में उसकी देह से सटकर सोऊँगी जब
आने पर स्वप्न के दूंगी उसे चौकी बैठने को.
बिछौने के इस छोर से उस छोर तक
दुःख को पालतू बिल्ले की तरह
छाती से चिपटाकर करुँगी प्यार.
दुःख मुझे उठाकर ले जायेगा
बाथरूम, नाश्ते की मेज़ पर
मुझे मेरी उम्र का एक दुःख दो
मेरा दुःख अधिक नहीं है.
२.
भारतवर्ष कोई बेकार कागज़ नहीं था जिसके किए जाने हों दो टुकड़े
सैंतालीस शब्द को मैं मिटा देना चाहती हूँ रबर से.
सैंतालीस की स्याही को मैं पानी और साबुन से चाहती हूँ
धो देना.
सैंतालीस का काँटा फंस गया है गले में
इसे नहीं चाहती निगलना
चाहती हूँ उगल देना.
उद्धार करना चाहती हूँ पुरखों की माटी को.
जिस तरह चाहती हूँ ब्रह्मपुत्र को, सुवर्णरेखा को भी चाहती हूँ
वैसे ही
चाहती सीताकुंड पहाड़ को, और कंचनजंघा को भी.
चाहती हूँ श्रीमंगल को तो जलपाईगुडी को भी.
चाहती शालवन विहार को, एलोरा अजंता को भी.
कर्ज़न हाल यदि हमारा है, तो है कोई विलियम भी.
इकहत्तर में जिसने किया युद्ध वह मनुष्य
जयी हुआ,
उसने किया विदा द्विजाति तत्व को,
सैंतालीस के सामने वह मनुष्य पराजित नहीं होता कभी.     
  

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